कहानी: तन्हाई

मनमोहन भाटिया
- मनमोहन भाटिया

तन्हाई
स्नेहा ने प्रॉपर्टी डीलर को फोन करके एक मकान किराए पर दिलाने की बात कही।
“बहन जी आप जिस मकान में पहले रहती थी, वह अब खाली हो रहा है, वही दिला दूँ। “
“नही भाई साहब वह मकान बड़ा है और किराया भी अधिक है। मुझे दो कमरों का छोटा फ्लैट चाहिए जिसका किराया भी कम हो।”
“ठीक है, मैं फ्लैट दिखा देता हूँ।”
“मैं अभी तो बुलंदशहर में हूँ, रविवार के दिन दिल्ली आऊंगी तब फ्लैट दिखा देना।”
स्नेहा बहुत वर्षो से दिल्ली में रह रही थी और किराए के मकान को हर दो तीन वर्षों में बदलना होता था और इसी प्रॉपर्टी डीलर द्वारा वह मकान किराए पर लेती थी। स्नेहा रविवार की सुबह बुलंदशहर से दिल्ली आई और एक दो कमरे का फ्लैट किराए पर लेकर वापस बुलंदशहर गई, और अगले दिन अपना सामान दिल्ली ले आई। सोमवार के दिन फ्लैट में सामान व्यवस्थित करके स्नेहा ने अपने पुराने स्कूल से संपर्क किया जहाँ वह पिछले बीस वर्षों से पढ़ा रही थी। प्रिंसिपल ने स्नेहा को तुरंत नौकरी दे दी और स्नेहा ने स्कूल जाना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे कुछ ट्यूशन भी मिल गई। स्नेहा का दिन स्कूल और ट्यूशन में कट जाता लेकिन शाम के बाद तन्हाई स्नेहा को अपनी गिरफ्त में ले लेती। अकेली जान क्या करे, कहाँ जाए? स्नेहा स्कूल से वापिस आते समय घर रसोई का आवश्यक सामान खरीद लाती थी और फिर घर से बाहर नहीं निकलती थी।
शाम के सात बजे स्नेहा के ट्यूशन वाले बच्चे चले गए तब उसके नीचे वाली मंजिल में रहने वाली पड़ोसन ने स्नेहा के फ्लैट की डोरबेल बजाई। स्नेहा ने दरवाजा खोला।
"जी कहिए।"
"आप बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं?"
"जी।"
"मैं आपके नीचे वाले फ्लैट में रहती हूँ। मेरी लड़की पाँचवी कक्षा में पढ़ती है, उसकी ट्यूशन की बात करनी है।"
"आइए अंदर बैठ कर बात करते हैं।"
स्नेहा ने पड़ोसन को अंदर आने को कहा। पड़ोसन की आँखों ने पाँच सेकंड में सब कुछ ताड़ लिया। ट्यूशन का तो केवल बहाना था, वह केवल स्नेहा की निजी जिंदगी को टटोलने आई थी क्योंकि स्नेहा पचपन की उम्र में अकेली रह रही थी। कमरे में सिर्फ कुर्सियाँ और मेज रखी थीं जिन पर बच्चे ट्यूशन पढ़ते थे। एक कोने में रखी अलमारी में सजी हुई पुस्तकें रखी हुई थीं। कमरे में कोई साज सज्जा का सामान नहीं था। खिड़की पर पर्दा टंगा था, दूसरे कमरे का दरवाजा खुला था जिसमें पड़ोसन की पैनी नजर ने एक्सरे कर लिया था। एक अलमारी और एक बिस्तर के अतिरिक्त कुछ नहीं था।
"आपके पास सिंगल बेड है?"
इतना सुनते ही स्नेहा मुस्कुरा दी कि पड़ोसन ट्यूशन के बहाने उसकी निजी जिंदगी की जासूसी करने आई है। स्नेहा ने झट से उत्तर दिया "ऐसा है कि मैं अकेली हूँ और मेरा परिवार नहीं है इसलिए मुझे सिर्फ एक बिस्तर की आवश्यकता है। शयनकक्ष की अलमारी में मेरे कपडे हैं और इस कमरे की अलमारी में पुस्तकें क्योंकि मैं अध्यापिका हूँ। मैं विधवा हूँ, मेरे पति की फोटो मेरे शयनकक्ष की दीवार पर टंगी है।" स्नेहा ने एक साँस में पड़ोसन की आँखों में आँख डाल कर सब कुछ कह दिया जिसे सुनने के बाद पड़ोसन एक झटके में खड़ी हो कर बिना कुछ आगे बोले फटाफट सीढ़ियाँ उतर गई। स्नेहा ने पड़ोसन को नीचे उतरते देखा और मुस्कुराते हुए कुछ पल दरवाजे पर रुक कर नीचे झाँक कर स्थिति का जायजा लिया। उसके घर तो एक ही पड़ोसन आई थी, लेकिन अन्य सभी ऊपर कान लगाए नीचे खड़ी थीं। बिगड़ा मुँह बनाए पड़ोसन किसी से बिना बात किए अपने फ्लैट में घुस गई। अन्य सभी पड़ोसनें उसके फ्लैट के भीतर एकत्रित हो गई और स्नेहा ने अपने फ्लैट का दरवाजा बंद कर दिया।
"लोगों की मानसिकता कहीं भी कभी भी नहीं बदलेगी। वही घिसी पिटी सोच कि एक औरत अकेली क्यों रह रही है? माई फुट।"
"कूल डाउन स्नेहा बेबी।"
"तुम कुछ और दिन इस पृथ्वी पर मेरे साथ नहीं रुक सकते थे। बड़ी जल्दी थी जाने की?" स्नेहा ने बिस्तर पर लेट कर पति सुदेश की फोटो को ताकते हुए कहा।
"यह जीवन और मृत्यु सब प्रभु के हाथों में है। मैंने तेरे बिना जीवन कभी नहीं सोचा था।"
"तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने सोचा था।"
"न मैंने सोचा न तुमने सोचा, मालूम नहीं प्रभु ने क्या लीला रची कि हम हम न रहे, तुम तुम न रहे।"
"सुधीर तुम्हारे साथ मुझे कोई चिंता नहीं थी सब बढिया, इच्छानुसार चल रहा था। तुम गए और मैं तन्हा हो गई।"
"बच्चों के साथ रह लो।"
"तुम मजाक कर रहे हो और मुझे चिढ़ा रहे हो।"
"रह सकती हो।"
"शौर्य बहू और पोते के संग विदेश चला गया और दर्पण भी अब विदेश जा चुकी है। बेटा, बहू, पोता, बेटी, दामाद सबके होते हुए भी अकेली तन्हा दीवारों से बात कर रही हूँ। सुदेश अब तो तन्हाई ही मेरी जीवनसंगिनी है।"
"तुम्हें शौर्य के साथ विदेश चले जाना चाहिए था।"
"कह कर गया था कि बुला लूंगा लेकिन आज दो वर्ष हो गए हैं, अब मैंने आस छोड़ दी है।"
"दर्पण के साथ भी रह सकती हो।"
"सुदेश, सारी जमा पूंजी तो शौर्य और दर्पण की शिक्षा और विवाह पर खर्च हो गई। मैं उनके लिए बोझ ही हूँ तभी फोन भी नहीं करते हैं। संतान पर सब कुछ न्यौछावर किया और मुझे मिली तो सिर्फ तन्हाई।"
"तुम भाई के पास बुलंदशहर भी गई थीं, वापिस आ गईं।"
"बच्चों के विदेश जाने के बाद ही मैं समझ गई कि मुझे कोई रखना नहीं चाहता है। रिश्तेदार पूछने लगे कि बच्चे साथ क्यों नहीं ले गए अब मैं इसका क्या जवाब दूँ। इसी कारण भाई के पास रहने के लिए चली गई लेकिन वहाँ भाई भाभी पूछने लगे कि बच्चे क्यों नहीं रखते हैं, बस मैं वापिस आ गई तन्हा रहने के लिए।"
"तुमने किसी को यहाँ का पता भी नहीं दिया?"
"किसी को नहीं दूंगी। यह तो शुक्र है कि तुमने समय काटने के लिए ट्यूशन पढ़ाने की सलाह दी थी जो तुम्हारे जाने के बाद काम आई और एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका की नौकरी मिल गई। सैलरी तो कम है लेकिन मेरे अपने लिए बहुत है। अब मुझे किसी रिश्तेदार की परवाह नहीं है। तुम तन्हा छोड़ गए हो, बच्चे भी तन्हा छोड़ गए अब तन्हा ही रहना है और तन्हाई में तुमसे गुफ्तगू करनी है।"

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