कहानी: इडली की प्लेट

अलका प्रमोद


“दादी दरवाजा खोलो आपकी चिया आ गयी” यह सुनते ही वंदना जी घुटने के दर्द को दरकिनार कर लंगड़ाती-लंगड़ाती दरवाजा खोलने दौड़ीं।

 “धीरे दौड़ो वंदना, चिया ही होगी” अखिल जी ने टोका।

“चिया है तभी तो ... कितनी धूप है बेचारी गर्मी से हलकान हो गयी होगी।”

दरवाजा खोलते ही चिया पूरे अधिकार से बोली, “दादी कितनी देर लगाती हैं दरवाजा खोलने में आपको पता है चिया को कितनी जोर से प्यास लगी है।”

वंदना तुरंत एक प्लेट में चिया की मनपसंद बर्फी और पानी ले कर आयीं और उसे देते हुए बोलीं, “मुझे पता है मेरी चिया धूप में आएगी तो उसे जोर की प्यास लगेगी इसीलिये तो मैंने तेरी मनपसंद बर्फी बाबा से मंगवा कर रखी हुई है।”

“थैंक्यू दादी” कहते हुए चिया ने दोनो हाथों में बर्फी ले ली और गटागट पानी का गिलास खाली कर दिया। नन्ही चिया ने पानी पी कर मानों वंदना जी के मन की प्यास बुझा दी हो। नन्ही चिया की बालसुलभ चेष्टाएँ वंदना जी को असीम सुख तो प्रदान करती ही हैं उसके आने से उनके घर भी ऊर्जस्वित हो उठता है जिसके परार्वतन की रश्मि वंदना जी को भी स्फूर्तिवान कर देती है। वह नित्य ही चिया के लिये कुछ न कुछ उसके मन का बना कर रखती हैं। उसे खाकर चिया के चेहरे पर जो तृप्ति उभरती है उसकी प्रतिच्छाया वंदना जी के चेहरे पर तृप्ति बन कर उभरती। कभी-कभी वह सोचती है कि इतनी ही बड़ी तो वरुण की बेटी मायरा भी हो गयी है। वीडियो कॅालिंग पर उसका चेहरा तो प्रायः ही उन्हें दिख जाता है पर वह न तो सात समुंदर पा बैठी पोती की छुअन को अपने अन्दर समा पाती हैं न ही उसे अपने स्नेह का ताप अनुभव करवा पाती हैं। बस मोबाइल ने उसके चेहरे से उनकी पहचान करवाने का अहसान अवश्य किया है। न तो मायरा को दादी के हाथों के बने लड्डू का स्वाद पता है न ही वंदना जी की स्मृति में मायरा की पसंद-नापसंद का रिकार्ड बन पाया है। वहाँ तो अधिकार है चिया की फरमाइशों का, सपने में भी उन्हें चिन्ता रहती है कि चिया ने कल के लिये क्या बनाने की फरमाइश की है। वंदना सोचतीं कि वह तो चिया में मायरा का सुख ढूँढ लेती हैं क्या मायरा को भी कोई दादी अपने हाथों से लड्डू बना कर खिलाती होंगी?

“दादी, बाबा कहाँ हैं? आज कल जब मैं आती हूँ मिलते ही नहीं हैं।”

“बेटी बाबा कुछ काम से बाहर गये हैं अभी आते ही होंगे” वंदना ने कहा।

“दादी यह जो बाबा हैं न उनका घर में बिल्कुल मन नहीं लगता ,यह भी नहीं सोचते कि दादी घर पर अकेले हैं” चिया ने तनिक क्रोध से कहा।

उसके बाल सुलभ सयानेपन पर वंदना जी मुस्कराये बिना न रह पायीं वह समझ रही थीं कि उसे दादी की नहीं बाबा के साथ खेलने की चिन्ता है। चिया को बाबा के साथ कैरमबोर्ड खेलना है इसीलिये उसे बाबा का घर पर न मिलना बुरा लग रहा है।

बाबा और चिया पूरी बराबरी से कैरम की क्वीन को ले कर लड़ाई कर रहे थे। चिया कह रही थी “मैंने क्वीन स्ट्राइकर से मार कर पॉकेट में गिराई है।”

बाबा बहस कर रहे थे “नहीं क्वीन पाकेट के पास आ कर आधी लटकी हुई रुक गयी थी और तुम्हारे पैर के धक्के से मेज हिल गयी और क्वीन पाकेट में गिर गयी।”

चिया ने तुर्की-बतुर्की बहस की “इससे क्या होता है गयी तो पाकेट में न?”

वंदना ने चिया का पक्ष लेते हुए कहा “क्यों छोटी सी बच्ची से लड़ रहे हैं अगर वह कह रही कि क्वीन पॉकेट में गयी है तो मान लीजिये, छोटी सी बच्ची से जीत कर आपको क्या मिलेगा?”

अखिल ने कहा “अरे वो बेईमानी कर रही है तो करने दूँ?”

“क्या आप भी बच्चे बन गये हैं, नन्ही बच्ची है जीत कर खुश हो जाएगी।”

“मैं उसे खेल सिखाना चाहता हूँ, ऐसे तो उसके अन्दर खेल की स्पिरिट नहीं आ पायेगी।”

“ओफ्हो इतनी छोटी बच्ची है उसके लिये तो बस टाइमपास है, कितना अच्छा लगता है जब वह जीत कर ताली बजाती है, लगता है उसने दुनिया जीत ली है।”

“नहीं वंदना बच्चों को सही गलत की पहचान बचपन से ही करवानी चाहिये उन्हें सही संस्कार देना चाहिये, हम उन्हें छोटा समझ कर उनकी खुशी के लिये प्रायः ही गलत बात सिखा देते हैं। बच्चे बहुत कुछ समझते हैं, हम ही उन्हें नासमझ समझते हैं।”

फिर कुछ रुक कर बोले “आखिर हम ही तो उसे सिखाएँगे न।”

एक क्षण को तो वंदना का मन हुआ अखिल को याद दिलाये कि चिया मात्र एक पड़ोसी बच्ची है उनकी पोती नहीं। उनकी पोती मायरा तो सात समुंदर पार है और वह अपने मम्मी-पापा और उस देश की आबोहवा में संस्कारित हो रही है पर अगले ही क्षण उसे अपनी सोच पर लज्जा आयी, चिया कितना प्यार करती है उसे स्कूल से आ कर सीधे उसके घर ही आती है। चिया की मम्मी रुचि भी तो उन्हें कितना सम्मान और प्यार देती हैं। जब भी कोई स्पेशल डिश बनाती हैं तो उसे अवश्य देती है। राहुल भी क्या अपने माता-पिता से कम समझता है उन्हें?

उस दिन सुबह-सुबह घंटी बजी देखा तो राहुल था। वह अन्दर आया और पाँव छू कर बोला “चाचा जी, चाची जी जल्दी से तैयार हो कर बाहर आइये आपको आज मेरे साथ ग्यारह बजे चलना है।”

अखिल “कहाँ भई, कहाँ चलने का आदेश है?”

“चाचा जी आपकी कृपा से मैं आज नई दुकान खोलने जा रहा हूँ, आप ही तो हमारे बड़े हैं आपके आशीर्वाद के बिना तो मेरा काम हो ही नहीं सकता।”

अखिल को अनायास ही याद आ गयी वह सुबह जब वह सुबह की चाय पी रहे थे कि वंदना ने कहा “सुनिये बहुत दिन हो गये वरुण का मोबाइल नहीं आया।”

“अरे बिजी होगा कहीं। “

“क्या पता कहीं कोई प्राब्लम न हो, भगवान करे सबकी तबियत ठीक हो। कैसे बाप हो, तुम्हीं कॉल कर लो।”

अखिल ने मोबाइल मिलाया तो उधर से वरुण ने कहा “हाँ पापा जल्दी बोलिये मैं बहुत बिजी हूँ।”

“कुछ नहीं तुम ठीक हो न बहुत दिनों से तुम्हारा मोबाइल नहीं आया तो चिन्ता हो गयी।”

“पापा मैं ठीक हूँ आज मेरे अपने बिजनेस का नया प्रोजेक्ट लॉन्च हुआ है उसी में बिजी हूँ बाद में बात करूँगा।”

अखिल ने उत्साह से कहा “अरे वाह इतनी बड़ी बात तुमने बताया भी नहीं।”

“क्या फर्क पड़ता है पापा आप आ तो पाते न इतनी दूर ,बाद में बता ही देता।”

बेटा जिस गति से उन्नति के सोपान चढ़ रहा था वह अखिल को गर्व से भर गया , उन्होने वंदना से कहा “अरे सुनो वंदना वरुण ने अपना एक और नया प्रोजेक्ट लगाया है।”

वंदना हाथ जोड़ कर “चलो ईश्वर करे हमारा बेटा ऐसे ही आगे बढ़े।”

वह बात दूसरी है कि एक दूसरे को बधाई देते समय दोनो ने एक दूसरे से आँख नहीं मिलायी थी, मिलाते भी कैसे दोनो ही अपनी-अपनी उपेक्षा के दंश को छिपाने का असफल प्रयास जो कर रहे थे।

अखिल का मन आर्द्र हो उठा था उसने राहुल को दिल से आशीर्वाद दिया और उल्लसित आवाज में चिल्लाये “वंदना जल्दी से अपनी स्पेशल वाली साड़ी पहन कर तैयार हो जाओ। “

“क्यों सुबह-सुबह कौन सी पार्टी में जाना है?”

“तुम्हें तो हमेशा पार्टी ही दिखायी पड़ती है, अपने राहुल की नई दुकान का इनॉगुरेशन है भई , हम लोग ही समय पर नहीं पहुंचेंगे तो वह पगला फीता नहीं काटेगा।” कहते हुए कितना लाड़ उमड़ पड़ा था उनकी आवाज में वह वंदना ही समझ सकती थी।

वंदना ने कहा “सुनिये रास्ते में कुछ मिठाई वगैरह ले लीजियेगा, हम बड़े हैं सबको मिठाई खिलाना हमारा फर्ज बनता है।”

“आज तो बड़ी खुशबू आ रही है, क्या बना रही हो भई?”

“आज सण्डे है न रुचि को इडली बहुत पसंद है वह कह रही थी कि उसे मेरे हाथ की बहुत अच्छी लगती है तो सोचा बना लूँ।”

“हुम्म तो रुचि और राहुत के लिये बन रही है हाँ भई मेरी किसे चिन्ता है।”

“अरे तो आप तो खाएँगे ही न।”

“हाँ खैरात में मुझे भी मिल जाएगी “अखिल ने वंदना को चिढ़ाते हुए कहा।

“कैसी बात करते हैं अरे बच्चे हैं उनकी खुशी में हमारी खुशी है।”

“आप के लिये तो रोज ही बनाते हैं पर यह बच्चे तो सण्डे को ही चैन से खा पी पाते हैं।”

“अरे वंदना मैं तो हँसी कर रहा था सच तो यह है कि इन बच्चों से हमारा पता नहीं किस जनम का नाता है” अखिल ने कहा।

 “कितना सम्मान करते हैं हमारा नहीं तो कौन किसी से मतलब रखता है अरे आज तो लोग पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते एक यह लोग हैं जितना अपनत्व देते हैं कि याद ही नहीं रहता कि इनसे हमारा खून का रिश्ता नहीं है” वंदना भी भावुक हो गयी थी।

 “हमें तो लगता है कि जरूर यह हमारे पिछले जन्म के बच्चे हैं।”

“पिछला जन्म क्यों कह रही हो इसी जन्म में कौन सा कमी है उनके व्यवहार में?”  अखिल ने टोका।

“दादी मैं आ गई बताओ मेरी चाकलेट कहाँ है” चिया आ कर वंदना की गोद में बैठ गयी। वंदना ने उसे बाहों में लेते हुए दो चाकलेट पकड़ा दी।

वंदना ने चिया से कहा “जरा मम्मी को बुला लो बेटा।”

“क्यों मेरी चाकलेट खाने की शिकायत करोगी” चिया ने चाकलेट को अपनी जेब में ठूँसते हुए कहा।

वंदना ने चिया को प्यार करते हुए कहा “नहीं मेरी बेटू, तेरी शिकायत तो मैं कर ही नहीं सकती।”
रुचि आयी तो इडली की प्लेट देख कर बोली “चाची जी आप कितनी अच्छी हैं आपको कैसे पता चला कि मुझे आज आपके हाथ की इडली खाने का मन था?”

वंदना ने कहा “तभी तो कहते हें न कि मन को मन से राह होती है तुम्हारा मन हुआ और मैं समझ गयी।”

रुचि ने हँस कर कहा “आप तो मेरी मम्मी से भी जादा मेरे मन की बात समझ जाती हैं।”

फिर बोली “चाची जी आपने परमाणु मूवी देखी है? सुना है बहुत अच्छी है, मेरा देखने का कितना मन है पर चिया देखने ही नहीं देती पूरी देर ‘घर चलो घर चलो ’की रट लगाये रहती है।”

वंदना ने कहा “तो उसे तुम मेरे पास छोड़ दो, तुम दोनों देख आओ न?”

“चाची जी आप दोनों को परेशान करेगी, सोने भी नहीं देगी।”

“अरे परेशान क्यों करेगी हमारी पोती है उसके साथ तो हम लोगों को अच्छा लगता है एक दिन नहीं सोएँगे तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा।”

“थैंक्यू चाची जी” कहते हुए रुचि के चेहरे की प्रसन्नता देख कर वंदना के चेहरे पर ममत्व की चाँदनी छिटक पड़ी।

इस बार क्रिसमस में घर आये वरुण ने कह ही दिया “मम्मा मुझे समझ नहीं आता कि यह घर मेरा है कि तुम्हारे राहुल, रुचि और चिया का। जब देखो यह लोग घर में आ जाते हैं कोई प्राइवेसी है ही नहीं।”

तभी चिया दौड़ी-दौड़ी आयी “दादी दादी देखो यह मायरा कह रही है कि आप उसकी दादी है, आप तो मेरी दादी हैं न?”

वरुण को अवसर मिल गया, उसने व्यंग्य से कहा “लो यह आ गयी आपकी असली पोती।”

वंदना दुविधा में फँस गयी कि इस नन्ही चिया को क्या समझाये यहाँ तो इतने बड़े हो गये यू एस में इतना बड़ा प्रोजेक्ट संभाल रहे परिपक्व बेटे वरुण को भी यह बात समझ में नहीं आती कि वह तो इतनी दूर बैठा है, उनका मन तो इसी परिवार के सहारे रमा रहता है। चिया ने उसे झिंझोड़ते हुए कहा “बताओ न दादी आप मेरी दादी हो न?”

तभी मायरा बोली “ग्रैंडमा, यू आर माई ग्रैंड मॉम।”

वंदना को सूत्र मिल गया उसने कहा “देखो मैं चिया की दादी हूँ ओर तुम्हारी ग्रैंड मॉम” उसने दोनों को अपनी बाँहों में भर लिया।

बच्चे सरल निश्च्छल होते हैं उन्हें बहलाना तो सरल था पर वरुण और माना को राहुल औेर रुचि की उनके मम्मा पापा के घर में जरूरत से ज्यादा घुसपैठ गले नहीं उतरी। वरुण ने स्पष्ट शब्दों में तो माना ने अपने व्यवहार से राहुल और रुचि के प्रति अप्रसन्नता जताने में कोई कंजूसी नहीं बरती। वंदना और अखिल कुछ दिनों के लिये आयी ठंडी बयार को गरम हवा के झोंके में नहीं बदलना चाहते थे अतः उन्होने नहीं कहा कि मन के दो शब्द कहने को तरसने वाले मम्मा-पापा को राहुल और रुचि वह सम्मान देते हैं जिसकी अपेक्षा उन्हें वरुण और माना से थी। मायरा के बचपन को देखने और जीने की आकांक्षा तो चिया ने ही पूरी की है।

राहुल तो प्रायः ही कहता रहता है “चाची जी बचपन से चिया को तो आप ही ने पाला है। आप ही ने उसे दादी का प्यार और संस्कार दिया है नहीं तो बच्चे आज कल क्रेच में पल कर बीमार होते हैं और नौकरों के भरोसे गलत-सलत बातें सीखते हैं।”

एक दिन टी वी में समाचार किसी बच्ची के साथ दुराचार का समाचार आ रहा था तो रुचि ने वंदना का हाथ पकड़ कर भावुक हो कर कहा “चाची जी आपके कारण ही चिया के लिये हम निश्चिंत रहते हैं नहीं तो यह सब देख कर चिया को किसी और के भरोसे छोड़ कर नौकरी करना हमारे लिये कितना मुश्किल था।”

राहुल ने कहा “चाची जी अगर आपको परेशानी हो तो मुझे खुल कर बता दीजियेगा कहीं हम आपके ऊपर बोझ तो नहीं डालते।”

अखिल ने कहा “राहुल अब तुम हमारे रिश्ते का अपमान कर रहे हो इसका मतलब तो यह हुआ कि चिया हमारी पोती नहीं है।”

अखिल ने कान पकड़ कर कहा “माफ करिये चाचा जी अब कभी नहीं कहूँगा।”

चिया यह देख कर ताली बजाने लगी “ओ हो आज पापू ने भी कान पकड़ा मजा आ गया बाबा नहीं तो पापू मुझसे ही मेरी गलती पर कान पकड़वाते हैं।”

यह सुन कर सब हँसने लगे थे। वंदना और अखिल का जन्मदिन हो या विवाह की वर्षगांठ वरुण और माना से पहले राहुल और रुचि उपहार ले कर शुभकामनायें देते।

समय की धार ने बहुत कुछ बहा दिया था रुचि ने वह नौकरी छोड़ कर घर से ही कंसल्टेंसी का काम कर लिया था चिया कक्षा पाँच में पहुँच गयी थी। स्वाभाविक है चिया का आना कम हो गया था। अब राहुल और रुचि उसे घर पर अकेला छोड़ कर भी चले जाते थे, क्योंकि उसे अपने घर में रह कर खिलौनों से खेलना अधिक भाता था।

बहुत दिन हो जाते उनसे मिले। वंदना ने सोचा बहुत दिन हो गये राहुल और रुचि को रवा इडली नहीं खिलायी। वह तो व्यस्त हो गये हैं तो नहीं आ पाते आज रविवार है तो वह ही क्यों न उन्हें बुला ले। उसने तुरंत राहुल का मोबाइल पर कॉल करके आदेश दिया “रुचि से कह दो आज मैं उसकी मन पसंद रवा इडली बना रही हूँ तुम लोग नाश्ता यहीं करोगे।”

वंदना उत्साह से नाश्ता बनाने में जुट गयी। ग्यारह बज गये जब राहुल रुचि नहीं आये तो वंदना ने मोबाइल पर कॉल की पर उन्होंने मोबाइल भी नहीं सुना।

नाश्ता ठंडा होने लगा अखिल को अलग भूख लग रही थी। वंदना ने सोचा हो सकता है दोनों किसी काम में व्यस्त हों, एक ही दिन तो मिलता है छुट्टी का, चलो उनके घर पर इडली दे आते हैं। एक प्लेट में इडली-सांभर ले कर वह रुचि के घर पहुँची। उसने द्वार की घंटी बजायी तो चिया ने दरवाजा खोला “मम्मी दादी हैं” कहते हुए अपने कमरे में चली गयी संभवतः टीवी पर कोई मनपसंद शो देख रही थी। वंदना अंदर चली आयी। रुचि और राहुल बेड रूम में थे उन्हें नहीं पता चला कि वंदना अन्दर आ गयी है। उसने जो सुना उससे उसके पाँव वहीं पर जाम हो गये, रुचि कह रही थी “यार राहुल आज सनडे है मेरा मूड पिज्जा खाने का था सोचा था बाहर से आर्डर दे दूँगी पर तुम्हारी प्यारी चाची जी ने इडली बनायी है सारा मूड बिगाड़ दिया।”

राहुल बोला “अरे यार इडली तो फिर भी झेल लें पर उनकी बातें झेलना सबसे बड़ी मुसीबत है।”

“प्लीज इन बुड्डे-बुढ़िया से पीछा छुड़ाओ।”

राहुल ने कहा “कितना तो अवायड करता हूँ समझते ही नहीं तो क्या करें।”

“हाँ... अपने बेटे बहू तो अमेरिका में मजे कर रहे हैं हम पर रुआब दिखाते हैं।”
“यह तो सच में हमको अपना बेटा बहू समझने लगे हैं कभी कहेंगे इतने दिन से आये क्यों नहीं, कभी कहेंगे मैं नाराज हूँ तुमसे, नाराज माई फुट।”

“अब तो चिया भी बड़ी हो गयी है और अब मुझे आफिस भी नहीं जाना होता है नाउ दे आर आफ नो यूज़।”

वंदना को आसमान घूमता लगने लगा वह उल्टे पाँव लौट आयी। बाहर सड़क का कुत्ता गेट पर बैठा था जिसे वह प्रायः ही बचा खाना दे देती थीं और वह इसी आस में उनके निकलने पर आस-पास घूमने लगता था। उन्होने इडली की प्लेट बाहर खड़े कुत्ते के सामने डाल दी।

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