जनवरी 2020 नववर्ष का नवाङ्क

अनुराग शर्मा
नूतन वर्ष 2020 के प्रथम अंक में एक बार फिर आप सबका स्वागत है। भारत में नववर्ष का आरम्भ हमने दो भारतीय उत्सवों के साथ किया है - वाग्देवी सरस्वती का पूजन और भारतीय गणतंत्र का अभिनंदन। भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से स्वतंत्रता के साथ-साथ साहित्य, संगीत, कला, शिल्प आदि को भी विशिष्ट महत्त्व दिया गया है और इस दिशा में एक लेखक, पाठक, या टिप्पणीकार के रूप में सेतु तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में आपका साहित्यिक योगदान महत्त्वपूर्ण है। सेतु के पाठकों के साथ-साथ सेतु में रचनाएँ भेजने वाले सभी लेखकों के हम सदा आभारी रहेंगे। पत्रिकाओं का अस्तित्व लेखकों और पाठकों की कृपा से ही है।

विभिन्न साहित्यिक विधाओं के लिये सेतु का चत्वर प्रदान करते समय हम साहित्यिक उद्गार के वैश्विक प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उभरते लेखकों की रचनात्मकता और शैली के निखार के लिये भी प्रयासरत रहे हैं। इस सम्बंध में सेतु ने समय-समय पर प्रतियोगिताएँ आयोजित की हैं, समारोह किये हैं और समय-समय पर जानकारीपूर्ण विभिन्न आलेख भी प्रकाशित किये हैं।

जिस प्रकार कोई व्यवसायी अपने व्यवसाय में धन और अन्य संसाधनों का निवेश करता है, लेखन में भी भाषा, व्याकरण, विषय की जानकारी में अपने समय, प्रयास और संसाधनों का निवेश एक मूलभूत आवश्यकता है। विदित है कि सेतु का फलक विश्वव्यापी और संसार की दो सबसे बड़ी भाषाओं से सम्बद्ध है। मेरे मूलतः हिंदीभाषी होने के कारण मुझे बार-बार यह देखना रोचक है कि अन्य देश या भाषा की तुलना में हम भारतीय हिंदी के प्रति कितने सजग रहते हैं। सेतु का प्रथमांक प्रकाशित करने से पहले हमने सेतु के लेखकों की सहायता के लिये 'लेखकों से अनुरोध' में रचना प्रेषण से सम्बंधित समस्त जानकारी प्रकाशित कर दी थी। फिर भी आज तक लगभग प्रतिदिन फ़ेसबुक, वाट्सऐप, ईमेल आदि के द्वारा कोई न कोई संदेश ऐसा आता है जिसमें कोई लेखक यह जानना चाहता है कि क्या वह रचना भेज सकता है। उन सभी के लाभ के लिये मैं एक बार फिर यह बताना चाहता हूँ कि सेतु में आपकी सभी अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है बशर्ते आपने लेखकों से अनुरोध पढ़ा हो और आप तथा आपकी रचना उससे सहमत हों और यह सहमति आपके प्रेषण में स्पष्ट भाषा में अभिव्यक्त की गयी हो। सेतु एक पूर्णतः स्वैच्छिक प्रयास है, हमारे संसाधन अत्यधिक सीमित हैं। तो भी हमारा प्रयास यही है कि हम प्रत्येक प्रेषण और प्रत्येक प्रश्न का समुचित उत्तर दे सकें लेकिन हर पाँच मिनट में एक कविता हमें और बीस अन्य पत्रिकाओं को एकसाथ ईमेल करने की क्रिया को लेखन नहीं स्पैम ही मानना होगा।

अंग्रेज़ी संस्करण में ऐसा व्यवहार देखने को नहीं मिलता। वहाँ आने वाली रचनाओं के साथ प्रेषण के नियमों से सहमति, रचना के अप्रकाशित होने का वचन आदि संलग्न होते हैं। मुझे उत्सुकता है कि जब अंग्रेज़ी में ऐसा हो सकता है तो हिंदी लेखन में ही अपक्षाओं की इतनी उपेक्षा क्यों?

यह निर्विवाद तथ्य है कि अधिकांश ध्वनियों को अंकित करने में देवनागरी लिपि संसार की किसी भी अन्य लिपि की तुलना में पीछे नहीं है। फिर भी सेतु में विचार के लिये भेजी गयी अनेक रचनाओं में दिखती अशुद्धियों की भरमार बार-बार यह सोचने को बाध्य करती है कि एक भारतीय, और हिंदीभाषी के रूप में हम लोग सामूहिक रूप से इतने बेपरवाह क्यों हैं? क्या हमें (कामरेड) माओ और (बच्चों की) माँओं के बीच के अंतर की पहचान नहीं है? यदि है तो हम माओ और माँओं को एक सा ही क्यों लिखते हैं? क्या लोगो (प्रतीक) और लोगों (जन-समुदाय) का अंतर हमारे लिये महत्त्वपूर्ण नहीं? नर तन और नर्तन में अंतर है। हर फब्ती फबती नहीं है। यदि हम लेखक हैं तो हमें लेखन को गम्भीरता से लेना होगा और ध्वनियों, अक्षरों, मात्राओं, बिंदुओं, चिह्नों, और स्पेस की बारीकियों को समझना चाहिये। सेतु में हमारा अनुरोध केवल अप्रकाशित रचनाओं का है लेकिन कुछ लेखक नियमित रूप से पूर्व-प्रकाशित रचनाएँ भेजते जाते हैं। प्रत्युत्तर में भेजी ईमेल पढ़ने की ज़हमत तक न करने वाले प्रेषकों से मैं विनम्रता के साथ यही निवेदन करना चाहता हूँ कि लेखक या वक्ता बनने का प्रथम नैसर्गिक सोपान पाठक या श्रोता बनना है। बच्चे जन्म से बोलना प्रारम्भ नहीं करते, वे लम्बे समय तक ध्वनियाँ सुनते रहते हैं और फिर बोलते हैं, और बाद में भी सीखते हैं। मैं तो आज भी नये-नये उच्चारण सीख रहा हूँ। वाचन वाली स्थिति लेखन की भी है। पहले हमने अक्षरमाला सीखी, फिर शब्द पढ़े और तब वाक्य लिखे। लेखन सम्बंधी सहायता तथा सेतु में अपनायी गयी लेखन-शैली के बारे में आवश्यक मूलभूत जानकारी कृपया सही लिखें आलेख में संक्षेप में दी गयी है। एक बार अवश्य पढ़िये। इसी शृंखला में आओ हिंदी सीखें की आठवीं कड़ी में विराम चिह्नों सहित, लेखन में प्रयुक्त सामान्य चिह्नों की जानकारी दी गयी है। इस संदर्भ में यह याद रखना आवश्यक है कि सभी विराम चिह्नों के बाद एक स्पेस लगाना आपके लेखन को पठनीय बनाता है। दिन-रात, माता-पिता, आदि शब्द-युग्मों में लगे योजक चिह्नों के अतिरिक्त अधिकांश चिह्नों के बाद स्पेस आना ही चाहिये। विराम चिह्नों से पहले स्पेस की आवश्यकता नहीं है। बल्कि यूनिकोड में नागरी के पूर्णविराम चिह्न के भीतर ही पहले इतना स्थान बना है जो उसे अपने पहले दिये वाक्य से दूर रखता है। शंका की स्थिति में इस सम्पादकीय को ही देखिये। इसमें पूर्णविराम के चिह्न के बाद स्पेस है, उसके पहले कोई स्पेस नहीं है। वहाँ दिखने वाली दूरी उस विरामचिह्न से ही आ रही है।

कथा, काव्य, समीक्षा, तथा स्थायी स्तम्भों के साथ यह अंक आपको समर्पित है। अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराइये। नववर्ष की मंगलकामनाएँ।

आपका

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