स्वास्थ्य को पटकनी देता कोरोना उद्योग

कौशलेंद्र

- डॉ. कौशलेन्द्र

आम आदमी ने सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पायरेटरी सिंड्रोम) को वर्ष 2003 में तब जाना जब इसने कहर ढाना शुरू किया। वर्तमान कोरोना वायरस अपने परिवार का पाँचवाँ ज्ञात म्यूटेंट वायरस है। किसी वायरस का म्यूटेंट यूँ ही बड़ी आसानी से नहीं बन जाया करता। प्राकृतिक रूप में इस प्रक्रिया में एक लम्बा समय लगता है किंतु प्रयोगशाला में इसके म्यूटेंट बड़ी आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। प्रयोगशाला में तैयार किए जाने वाले वायरस का वैक्सीन और दवाई बनाना भी आसान होता है वरना इसमें भी कई साल लग जाया करते हैं। रविवार यानी दिनांक 29 मार्च 2020 तक इसके वैक्सीन और स्पेसिफ़िक दवाई के मार्केट में आ जाने की ख़बर है। यह सब जादुई तरीके से हो रहा है ...बिना समय गँवाये, गोया सब कुछ चरणबद्ध तरीके से स्क्रिप्ट के अनुसार शूट किया जा रहा हो।


साइंटिफ़िक हल्ला  - हम सब एक वैज्ञानिक अतिवाद के शिकार हैं। अतिवाद यह है कि जब तक हमें फ़ोटॉन के बारे में कोई मुकम्मल और वैज्ञानिक जानकारी नहीं मिल जायेगी ...आठ-दस रिसर्च पेपर इंटरनेशनल ज़र्नल्स में प्रकाशित नहीं हो जाते तब तक यह कैसे माना जा सकता है कि सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा वास्तव में हमें सूर्य से ही मिल रही है? यानी शोध पूर्ण होने तक हम सूर्य की ऊर्जा का उपयोग भी नहीं करेंगे ...क्योंकि ऐसा करना अवैज्ञानिक और रूढ़ परम्परा का पालन करना होगा जो कि एक वैज्ञानिक होने के कारण हम नहीं कर सकते ...और न किसी को करने दे सकते हैं। ऐसा ही अतिवाद एंटीवायरल वैक्सीन और दवाइयों के बारे में है। वैज्ञानिक परम्पराओं को नहीं मानते किंतु वैज्ञानिक अतिवाद अब एक परम्परा बन चुका है।

युद्ध के तरीके – सामान्यतः अदृश्य वायरस से निपटने के पाँच ज्ञात तरीके उपलब्ध हैं, 1- नित्य जीवन में वैज्ञानिक अस्पर्श्यता (Self quorontine) का पालन, 2- हाथ धोने के लिए साबुन, गर्म पानी और अन्य वस्तुओं को निःसंक्रमित करने के लिए ब्लीचिंग पावडर के घोल का प्रयोग, घर के कमरों की शुद्धता के लिए सरईधूप, जौ, सरसों, काला तिल और घी आदि से धूपन (Fumigation) का प्रयोग, 3- विटामिन सी का प्राकृतिक रूप में प्रयोग, 4- वैक्सीनेशन, 5- वायरस के स्ट्रेन की विशिष्ट औषधि का प्रयोग।

उपाय संख्या एक से चार तक के प्रयोग प्रीवेंटिव हैं जबकि अंतिम उपाय क्योरेटिव है। हम अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अतिवाद में चौथे और पाँचवे उपायों पर ही सारा ध्यान केंद्रित रखते हैं जबकि ये सार्वकालिक और पूर्ण सुरक्षित नहीं हैं। हमारे वैज्ञानिक अतिवाद में बाज़ार के नियम भी प्रभावी और निर्णायक होने लगे हैं। यही कारण है कि स्क्रिप्ट के अनुसार पहले तो भय का प्रचार किया जाता है फिर उसके उपायों को खोज लेने का दावा किया जाता है जो (स्वाइन-फ़्लू की औषधि टैमीफ़्लू की तरह) ट्रिलियन डॉलर्स के वार्षिक टर्नओवर के व्यापार का कारण बनता है।

हौवे की हवा – वैक्सीन कभी भी स्थायी नहीं होते, एंटीवायरल दवा भी स्थायी नहीं होती क्योंकि वैक्सीन और एंटीवायरल दवा केवल उसी वायरस और उसी स्ट्रेन के लिए प्रभावी होते हैं जिनके लिए उनका निर्माण किया जाता है। किसी नए स्ट्रेन के लिए उनका कोई उपयोग नहीं किया जा सकता अर्थात वायरस के नए स्ट्रेन के लिए दोबारा नई वैक्सीन और नई एंटीवारल ड्रग की ख़ोज करनी होगी। यह एक अनंत सिलसिला है जिसके आगे हमें कभी तो अपने हथियार डालने ही होंगे।

मज़बूत किलेबंदी से परहेज़ का व्यापारिक दर्शन – इस विषय पर चर्चा करने से पहले हमें वायरस की सामान्य संरचना के बारे में जानने की आवश्यकता है। सामान्यतः कोई वायरस RNA अथवा DNA जेनोम वाला एक ऐसा कंडीशनल और अपॉर्चुनिस्ट पैरासाइट है जिसके ऊपर प्रोटीन का एक कवच होता है। इसके ऊपर लिपिड की दोहरी सतह वाला एक और कवच हो सकता है जिसके बीच में प्रोटीन की एक सतह होती है। यानी सबसे ऊपर लिपिड (फ़ैट) की सतह होती है जो गर्मपानी और साबुन के झाग में घुलकर आसानी से अलग हो सकती है। इसके बाद बचती है प्रोटीन की सतह जो शुष्क वातावरण में स्वतः ही निष्क्रिय हो जाती है। इसके बाद बचता है जेनोम जो अपने कवच के बिना शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। नित्य उपयोग की वस्तुओं की सतह पर वायरस हो सकते हैं जिन्हें समाप्त करने का सबसे सरल है उपाय है ब्लीचिंग पावडर के पानी में बने घोल का वस्तुओं पर छिड़काव। इन उपायों से वायरस को तो निष्क्रिय किया जा सकता है किंतु तब बिलियन-ट्रिलियन डॉलर्स के व्यापार की भूमिका निर्मित नहीं हो सकेगी। इस व्यापार में वैक्सीन है, स्पेसिफ़िक दवाइयाँ हैं, इम्यूनिटी बढ़ाने वाले टॉनिक्स हैं, मास्क हैं, सैनेटायज़र्स हैं, ... और है छिपी हुई वह नीति जिसके अनुसार एक और नए स्ट्रेन और उसके तामझाम की भूमिका निर्मित होती है।

हमारी इस मज़बूत किलेबंदी में विटामिन सी का प्राकृतिक स्रोत नीबू भी शामिल है। नीबू का एक्स्ट्रेक्ट सेलुलर मेटाबोलिज़्म और माइटोकॉंड्रियल वेस्ट प्रोडक्ट के निस्तारण के लिए प्रभावी खाद्य द्रव्य माना जाता है जिसके संतुलित उपयोग से शुद्ध हुआ शरीर का आंतरिक परिवेश रोगप्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है। यह विदित है कि ज़िंक और विटामिन सी का अंतिम बायोलॉज़िकल प्रभाव शरीर की स्वाभाविक एंटीवायरल क्षमताओं में वृद्धिकारक होता है। किंतु ताजे नीबू के सेवन से भी किसी भारी भरकम उद्योग की भूमिका निर्मित नहीं हो पाती।

इन सब वैज्ञानिक और व्यापारिक तथ्यों पर विचार करने के बाद किसी भी वायरस से बचाव के लिए शरीर की मज़बूत रोगप्रतिरोध क्षमता में वृद्धि के सामान्य से उपायों के द्वारा शरीर की किलेबंदी का उपाय व्यावहारिक न माने जाने की वैज्ञानिक(?) परम्परा पूरी दुनिया में चल पड़ी है। अतः प्रतीक्षा कीजिए एक नए वैक्सीन की, कुछ महँगे पैथोलॉजिकल टेस्ट्स की, किसी नई एंटीवायरल दवा की और कुछ महँगे टॉनिक्स की। ...और इसके बाद तैयार रहियेगा कुछ सालों बाद एक और नए घातक स्ट्रेन का सामना करने के लिए।

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