मोनिका देवी के उपन्यास में किन्नर जीवन का यथार्थ वर्णन

पुस्तक समीक्षा: नारायण नारलाई


अस्तित्व की तलाश में सिमरन (उपन्यास)
लेखक: मोनिका देवी
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
आईएसबीएन: 9789387941502
प्रकाशन वर्ष: 2019
प्रकाशक: माया प्रकाशन, कानपुर


"अस्तित्व की तलाश में सिमरन" यह उपन्यास डॉ मोनिका देवी द्वारा रचित मौलिक कृति है। जिसमें समाज के तीसरा पक्ष कहे जाने वाले किन्नरों के जीवन को यथार्थ के धरातल पर शब्द देकर उकेरा गया है। इनके जीवन के छुए अनछुए पहलुओं की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह उपन्यास सार्थक सिद्ध हुआ है। आज भी यह समाज की नज़र में उपेक्षित हिस्सा माना जाता है। सिमरन की कहानी लिखकर डॉ मोनिका देवी ने समाज को सच से रूबरू करवाया क्योंकि साहित्य ही समाज का दर्पण है जिसे पढ़कर या श्रवण कर हम अपने विचारों में बदलाव ला सकते है।

मोनिका देवी
आज भी किन्नर समाज अपने अधिकारों से वंचित है इनको सरकार ने अधिकार तो दे दिए है। क्या हमारा समाज इनके प्रति अपनी मानसिकता को बदल पाया है? इसके लिए मैं कहूंगा, 'नहीं'।

किन्नर जीवन की सच्चाई बताता उपन्यास सिमरन के बचपन से आरंभ होता है। एक साधारण परिवार में जब बच्चा जन्म लेता है तो कोई यह नही सोचता कि यह किन्नर है। उस समय भी यही हुआ जब परिवार में बहुत खुशियाँ मनाई गईं और सिमरन को लड़के के रूप में रखा गया। पहली संतान के जन्म से सभी लोग बड़े प्रसन्न थे। हर बच्चे की भांति सिमरन भी पाठशाला जाने लगी। वही से जीवन के दर्द भरे पलों का सवेरा होने लगा। ऐसा सवेरा जिसकी कोई संध्या नही होती। सहपाठियों के द्वारा छेड़छाड़ किये जाने पर उसके मन में एक टीस सी होने लगी। एक हृदय विदारक चुभन जो जीवन भर की घुटन बन गयी। दीपावली के त्यौहार में पिताजी ने रंगोली के रंग लाकर दिए। सिमरन ने भी बड़े मन से सुंदर रंगोली का निर्माण किया जिसे देखकर परिवार वाले बहुत खुश हुए कि बच्चे ने रंगोली बढ़िया बधाई है। अब सिमरन उम्र के बारह बरस काट चुकी थी। परिवेश के साथ वह स्वयं को ढाल नही पा रही थी। क्योंकि उसकी आत्मा एक नारी की थी जिस्म नर का। वह स्त्री रूप में रहना चाहती थी। अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर परिवार के समक्ष रखना चाहा, लेकिन कोई सुनने को तैयार ही नही था। वह उसको समाज, इज्जत आदि का डर देकर चुप कर देते। वह खुलकर जीना चाहती है। परिवार साथ छोड़ देता है आस का दामन छूट जाता है परंतु सिमरन हार नही मानती। स्कूल होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में वह अपने परिवार को बताने पर परिणाम सिमरन के विपरीत ही आया। उसको फिर से वही पुरानी डर की कहानी सुनकर चुप करा दिया गया। अब यह घटनाएँ सिमरन की रोज की दिनचर्या का हिस्सा बनती जा रही थी।

नारायण नारलाई
परिवार में आर्थिक तंगी पाँव पसारने लगी ऐसे वक्त में सिमरन ने दुकान चलाकर अपने परिवार को सहारा दिया। घर का काम, स्कूल की पढ़ाई करना, यही उसका उद्देश्य बन गया। नौवी कक्षा में अच्छे अंक पाकर भी उसके घर वाले खुश नही हुए । माँ ने फीस भरने से मना कर दिया। सिमरन की स्कूल शिक्षिकाओं ने फीस भरी तब जाकर उसकी दसवीं की पढ़ाई शुरू हुई लेकिन पूरी नही हो सकी। पिताजी ने दुकान बंद कर दी जिससे घर का माहौल दूषित हो गया। घर में मारपीट गाली-गलौज, यही सब रहने लगा। कमाने का काम सिर्फ सिमरन का था। सिमरन का भाई जो भी पैसा मिलता उसे दोस्तों में उड़ा देता। उसे घर की कोई चिंता नही थी।

आखिर में सिमरन काम तलाश लेती है और हमसफर नामक संस्था में नौकरी करती है। इसके बाद उफेज़ा नामक संस्था में एच आई वी के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम करने लगी। दुर्भाग्य से वह नौकरी छूट गयी। फिर उसे पास ही प्लास्टिक के काम बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम मिल गया। वहाँ पर उसकी मुलाकात बॉबी नाम के लड़के से हुई । वह रात में स्टेज शो किया करता था और दिन में सिमरन के यहाँ आने लगा। समलैंगिक बॉबी फेक्ट्री के मजदूर नेता की सारी बात मानता था, यहाँ तक कि वह उसका हमबिस्तर होने को भी तैयार था। वह मजदूर नेता यही इच्छा सिमरन से भीी रखने लगा। स्वाभिमानी सिमरन ने तुरन्त मना कर दिया। लेकिन सिमरन की माँ यह नही चाहती थी । वह कहती कि जो यह चाहे करने दे, तेरी नौकरी बनी रहेगी। परंतु सिमरन इसके लिए नही मानी।

सिमरन की दास्तान मन को व्याकुल कर देने वाली है। उसके दोस्तों ने उसे समझाया कि उसका परिवार उसका इस्तेमाल कर रहा है, हिजड़ों का कोई नही होता। सिमरन ने जिसे गुरु बनाया उसने भी उसको तकलीफ ही दी। यहाँ तक कि किन्नर समाज की रस्म का निवारण करवाकर उसे मरने के लिए छोड़ दिया।

उसकी गुरु शराब पीकर मारने-पीटने पर आमदा हो जाती, कभी कभी सारी रात गाली-गलौज में कटती थी। ट्रेन में भीख मांगने से लेकर संस्थाओं में काम करने तक के सफर में कहीं न कहीं उसके शरीर से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करते समाज के इज्जतदार लोग मिलते रहे। राजवीर नाम के लड़के से सिमरन को प्यार भी हुआ। यह लड़का उसे एक बार रेल में मिला था, जिसकी आर्थिक सहायता सिमरन ने की। वह उसे अपने घर 5 साल तक रखती है। उसने भी बुरे वक्त में सिमरन का बहुत साथ दिया। लेकिन वह सिमरन को अपनाता नहीं है क्योंकि वह एक हिजड़ा है और हिजड़ों के हमदर्द नहीं होते, उन्हें सिर्फ दर्द ही दर्द मिलता है।

अगर उसके माता पिता ही उसे अपना लेते तो शायद यह दास्तान नहीं बन पाती और उसका जीवन भी एक सुनहरी याद जैसा होता जिसे जितना याद करो उतना ही मन प्रसन्न होता है। एक अबोध बच्चे के साथ हैवानियत की पीड़ा सहने के लिए उसे मजबूर किया गया, आखिर क्यों? क्या इसलिए कि वह किन्नर है? क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? इन्हीं मुद्दों को सोचने पर मजबूर करती है यह सिमरन की कहानी। आगे कोई सिमरन ना बन पाए।

डॉ मोनिका देवी ने सिमरन की इस हकीकत को अपने शब्दों में पिरोकर साहित्य जगत को एक अनमोल खज़ाना सौंप दिया है। यह पाठक का कर्तव्य है कि वह यह देखे और समझे कि यह उपन्यास यथार्थ से कितना जुड़ा हुआ है। इसमें किन्नर समाज के रीति रिवाज, लोक गीत आदि के बारे में भी जानने का अवसर मिलेगा। उपन्यास साधारण भाषा शैली में लिखा गया है। मुहावरे व लोकोक्तियों का प्रयोग अपनी-अपनी जगह सार्थक सिद्ध होता है। कुल मिला कर यह उपन्यास पाठक को बांधे रखता है।

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