लेखन में कोरी भावुकता नहीं, खरी संवेदना चाहिए - अनुराग शर्मा ✍️

अनुराग शर्मा से सत्यवीर सिंह की वार्ता


अनुराग शर्मा
प्रेमचंद की हिंदी कहानियों की पहली ऑडियो बुक के निर्माता, हिंदी-अंग्रेजी पर समान अधिकार प्राप्त, 12 वर्ष की अल्पवय में डायरी लेखन के शौकीन, 43 की आयु में 34 घर बदल चुके, स्वावलम्बी इतने कि छोटे से लेकर सभी बड़े घरेलू कार्यों के लिए किसी का मुँह नहीं ताकते। हम बात कर रहे हैं बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी तथा स्वास्थ्य सेवाओं के अनुभवी और इन सबके साथ साहित्य सेवी, सेतु संपादक अनुराग शर्मा की। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में जन्मे अनुराग शर्मा स्वरकार और कलमकार दोनों हैं। अनुराग शर्मा पहले स्वरकार जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों को ऑडियो रूप दिया। शर्मा जी का युवा पीढ़ी को संदेश है कि 'सफलता का शॉर्टकट हो सकता है परंतु श्रेष्ठता का नहीं होता।' बकौल अनुराग शर्मा - "वैविध्य की स्वीकार्यता, भेद का आदर, साम्य की खोज, जीवन का सम्मान, परपीड़ा की अनुभूति जैसी सामान्य मानवीयता" लेखक बनने की आवश्यक शर्तें हैं। लेखन हेतु उनका आर्ष वाक्य है- 'कोरी भावुकता नहीं, खरी संवेदना चाहिए।' लेखक, संपादक अनुराग शर्मा से उनके व्यक्तित्व, कार्यक्षेत्र, लेखन, संपादन के साथ हिंदी की वैश्विक स्थिति, गति आदि पर डॉ.सत्यवीर सिंह की बातचीत।


डॉ. सत्यवीर सिंह
सत्यवीर सिंह: अनुराग जी नमस्कार। अपनी जीवन यात्रा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

अनुराग शर्मा: नमस्ते सत्यवीर जी। मेरा जन्म रामपुरी चाकुओं के लिये प्रसिद्ध रामपुर, उत्तरप्रदेश में हुआ। प्राथमिक शिक्षा रामपुर, बरेली, और जम्मू में हुई। स्नातक रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से और स्नातकोत्तर शेफ़ील्ड हेलम विश्वविद्यालय से हुआ। बीस वर्ष की आयु में नौकरी आरम्भ की। बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, तथा स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में कार्य का अनुभव है। अब तक मुख्यतः ग्यारह नगरों में रहा हूँ जिनमें पिट्सबर्ग का निवास अब तक सबसे लम्बा रहा है।


सत्यवीर सिंह: भारत में निवास और अमेरिका प्रवास में आपने क्या अंतर पाया?

अनुराग शर्मा: अमेरिका और भारत बिल्कुल एक से देश हैं, जुड़वाँ बहनों जैसे – लोकतांत्रिक, वैविध्यपूर्ण, स्वतंत्र, शिक्षा का महत्त्व समझने, और अपने नागरिकों को समान अवसर देने वाले देश। कुछ मामूली लेकिन महत्त्वपूर्ण अंतर फिर भी हैं। अन्य विकसित देशों की तरह अमेरिका में भी अनुशासन और प्रशासन दोनों हैं जबकि भारत में प्रशासन लापरवाह बल्कि कई स्थितियों में पूर्णतः अनुपस्थित है। विनम्रता और आत्मानुशासन को भीरुता समझा जाता है। ‘जानता नहीं मैं कौन हूँ’ मानो हमारा राष्ट्रीय वाक्य बन गया हो। दूसरा बड़ा अंतर यह है कि अमेरिका का एक सामान्य निवासी अपना समस्त जीवन भ्रष्टाचार के स्पर्श के बिना बिता सकता है, जबकि भारत में भ्रष्टाचार के हाथ बहुत लम्बे हैं और भले लोगों को हर पग पर उसका सामना करना पड़ता है।


सत्यवीर सिंह: लेखन; नौकरी और परिवार में बाधक हैं या साधक? इस त्रिकोण में संतुलन कैसे बनाते हैं?

अनुराग शर्मा: हम सबको प्रतिदिन 24 घण्टे ही मिले हैं। हमारी उत्पादकता समय को साधने की क्षमता पर निर्भर करती है। 13 वर्ष की भारतीय सरकारी बैंक की नौकरी में मैंने सेवाशर्तों का पालन करते हुये कभी सम्पादक के नाम पत्र तक नहीं लिखा। वह बाधा हटने पर धीरे-धीरे लेखन फिर से लीक पर आ गया। मेरा सिद्धांत रमता जोगी, बहता पानी का, अर्थात संतोषमय संतुलन का है। जीवन जितना दे उतने का सदुपयोग करें। समय मिले तो लिख लें, न मिले तो भविष्य के लिये पंक्ति में लगा दें। अपने उद्देश्य को ओझल न होने दें, लेकिन उचित समय न होने पर उसके लिये बेताब न हों। पारिवारिक दायित्व सबसे पहले, फिर जीवनवृत्ति और सामाजिक दायित्व, शेष सब उनके बाद। उदारमना रहें, श्रमदान कर सकें तो श्रम, धन दे सकें तो धन, रक्तदान, शिक्षण, लेखन, सम्पादन, संवाद, जब, जो, जितना हो सके उसमें संतोष करें, न हो सके तो उचित समय की प्रतीक्षा कर लें।


सत्यवीर सिंह: आपके जीवन का वह वाकया जिसने आपको लेखन की तरफ मोड़ दिया।

अनुराग शर्मा: ऐसा कोई विशेष दृष्टांत तो याद नहीं पड़ता। पुस्तकों के बीच पला बढ़ा। साहित्यिक रुझान बचपन से ही था, अनुकूल वातावरण मिलते ही पनपने लगा।


सत्यवीर सिंह: आपके कृतित्व की संक्षिप्त रूपरेखा तथा उल्लेखनीय कार्य

अनुराग शर्मा: उल्लेखनीय तो पता नहीं, लेकिन थोड़ा बहुत काम किया अवश्य है। पहली प्रकाशित पुस्तक ‘इंडिया ऐज़ एन आईटी सुपरपॉवर’ एक शोध पुस्तक है। निजी पुस्तकों में एक कथा संग्रह और एक लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पतझड़ सावन वसंत बहार मेरे सम्पादन में प्रकाशित एक काव्य संकलन है जिसमें पाँच अन्य कवियों के साथ मैं भी हूँ। देशांतर दिल्ली हिंदी अकादमी द्वारा प्रकाशित प्रवासी काव्य संग्रह है। विभिन्न विषयों के कुछ आलेख पुस्तकों में छपे हैं, उनमें से भी केवल एक मेरे पास तक पहुँची है, अन्य अभी देखी नहीं हैं। लघुकथाओं और उनकी समीक्षाओं की पुस्तक शृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल‘ के एक नवीन खण्ड में मैं भी हूँ। मैंने वह संकलन नहीं देखा है इसलिये उसके बारे में अधिक नहीं बता सकता। हिंदी और अंग्रेज़ी के कई साझा संकलनों में आलेख, और कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं में भी छपता रहा हूँ, मित्र कभी कोई क्लिप या यूआरएल भेजते हैं तो पता लग जाता है।

एक मित्र की प्रेरणा से विनोबा भावे के गीता प्रवचनों का आठ घंटों का हिंदी ऑडियो बनाया था और उसी के गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी संस्करणों के निर्माण में भी सहयोग रहा। एक ऑनलाइन रेडियो स्टेशन ढाई साल तक चलाया – 22,000 घण्टे अनथक। 10-11 वर्ष पहले ‘सुनो कहानी’ शीर्षक से हिंदी की नई-पुरानी कहानियों के साप्ताहिक पॉडकास्ट का कार्यक्रम शुरू किया था जो आज भी इंटरनेट पर ‘बोलती कहानियाँ’ के नाम से चल रहा है। मासिक ऑनलाइन कवि सम्मेलन, काव्य के माध्यम से संवाद के ‘शब्दों के चाक पर’ जैसे कार्यक्रम भी किये हैं जो अपने समय में खूब पसंद किये गये थे। प्रेमचंद की कथाओं की पहली हिंदी ऑडियो बुक मेरी आवाज़ में थी। एक स्थानीय संस्थान में दो वर्षों तक बच्चों और वयस्कों को हिंदी पढ़ाई है। हिंदी और अंग्रेज़ी के स्वतंत्र मासिक संस्करणों वाले सेतु से तो आप परिचित हैं ही।


सत्यवीर सिंह: आपकी नज़र में एक लेखक के लिए कौन-कौन सी बातें ध्यातव्य हैं।

अनुराग शर्मा: पंजाबी में बुल्लेशाह ने कहा, “इक नुक्ते विच गल मुकदी है।” अंग्रेज़ी का कथन है, डॉट द आईज़ एण्ड क्रॉस द टीज़ (dot the i's and cross the t's)। हिंदी की कहावत है, “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि” और संस्कृत में तो “कविर्मनीषी परिभूस्वयंभू ...” में कवि शब्द का अर्थ ही अलग है। कल्पनाशील होना एक लेखक की विशेषता है परंतु लेखन में एक-एक बिंदु महत्त्वपूर्ण है। विषय की समझ, गहन अनुभव, और गम्भीर श्रम अच्छे लेखन के मूल में हैं। उत्कृष्ट लेखन सुनी-सुनाई बातों और अनगढ़ कपोलकल्पना से उत्पन्न नहीं होता। ज्ञानवृद्ध हों, या वयोवृद्ध, अनुभवहीन लेखन खोखला है। जीवन व शालीय शिक्षा बहुत कुछ सिखाते हैं। कालजयी कृतियाँ भी बहुत कुछ सिखाती हैं। तीर्थयात्रा हो या पर्यटन, देशाटन भी हमारी आँखें खोलता है।

बोधगम्यता लेखन की दूसरी अनिवार्यता है। बदायूँ में मेरी दादी एक कहावत सुनाती थीं, “आब-आब कह मर गये, ढिंगै धर्यो रहो पानी।” लेखक का नियंत्रण पाठक के मन पर भले न हो अपनी कृति पर भरपूर होना चाहिये। लेखक का संदेश पाठक तक बिना किसी संशय के, यथावत पहुँचना चाहिये। बात भाषा, व्याकरण, शब्द-सम्पदा और वाक्य विन्यास पर अधिकार की भी है। सृजनात्मक लेखन के लिये सृजन कौशल, कथन-शैली, अचम्भित करने की कला जैसे गुण अनिवार्य हैं। लेखक को अपनी ऑडियेंस की यथासंभव पहचान हो और लेखन सहज और सरल होते हुए भी पाठक को चमत्कृत करे। रामायण और महाभारत से लेकर कथा सरित्सागर और पंचतंत्र तक की कथाएँ शताब्दियाँ बीतने पर भी हर पीढ़ी के लिये आज भी रोचक और शिक्षाप्रद हैं।

सातत्य का अपना महत्त्व है। वे जन भाग्यशाली हैं जिनके पास लिखने की फ़ुर्सत है या जिनकी जीवनवृति लेखन, सम्पादन, भाषा, या शिक्षण आदि से जुड़ी है। अन्य लेखकों के लिये अनुशासन और समय-प्रबंधन एक अनिवार्यता है। लिखने की एक अनिवार्य शर्त पढ़ना भी है। अच्छे लेखक दूसरों का लिखा भी पढ़ते हैं, प्रेषण के नियम भी पढ़ते हैं, और अपने लेखन के प्रकाशित होने पर सम्पादित रूपांतरण को भी पढ़ते और आँकते हैं। अच्छा लेखक शिक्षक नहीं, विद्यार्थी है, सिखाता कम और सीखता अधिक है; आलोचना, अस्वीकृति, और सम्पादन, सभी से निरंतर कुछ न कुछ सीखता है।

लगन और निष्ठा भी महत्त्वपूर्ण हैं। किसी भी अन्य कौशल की तरह लेखन भी अनुभव से मंझता और अभ्यास से निखरता है। लेखक द्रष्टा है, उसकी दृष्टि में विस्तार है। वह सब देखता है जो सामान्य दृष्टि से ओझल रहता है। लेकिन असली बात एक अच्छा व्यक्ति और आदर्श नागरिक होने की है। वैविध्य की स्वीकार्यता, भेद का आदर, साम्य की खोज, जीवन का सम्मान, परपीड़ा की अनुभूति जैसी सामान्य मानवीयता न हो तो कोई अच्छा लेखक कैसे बनेगा? लेखन में कोरी भावुकता नहीं, खरी संवेदना चाहिये। अच्छा लेखक अंतर्मन से बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का साधक होता है। मलिन मन के साथ कोई कितना भी ढोंग करे, उसका लेखन प्रचारात्मक हो सकता है प्रभावशाली नहीं; न वह सार्वभौमिक होगा न कालजयी।


सत्यवीर सिंह: आपके लेखन के प्रेरणा स्रोत तथा सृजन की भूमिका?

अनुराग शर्मा: मार्क ट्वेन ने लेखक के अनुभव और संवेदना के बारे में बड़ी अच्छी बात कही थी कि, “I am an old man and have known a great many troubles, but most of them never happened.” बड़े लोगों के सरोकार बड़े होते हैं, उनकी पीड़ा, वेदना, संवेदनाएँ सब बड़ी होती हैं। मार्क ट्वेन खुद को कभी न छूने वाले क्लेश की अनुभूति की बात कर रहे हैं। लेखक वही है जो नरसी मेहता के शब्दों में ‘पीर पराई जाने रे’ - परपीड़ा का अनुभव कर सके और पाठक को उसकी तरलता का स्पर्श करा सके। व्याध का कृत्य वाल्मीकि को आदिकवि बना देता है। हम जैसे जन-साधारण की भी भावनाएँ होती हैं, कभी वे पंख लगाकर उड़ती हैं, और कभी उन्हें ठेस भी लगती है। छोटे-बड़े अनुभव लेखन की प्रेरणा दे देते हैं। मैंने अल्पायु में सारा भारत देखा है। सभ्यता, कठिन समय, निर्धनता, संघर्ष, अपमान, भ्रष्टाचार, क्रूरता, उद्दण्डता सब देखे हैं। किशोरावस्था की अनिश्चितता से तो भारत के भूमिहीन, अनारक्षित निम्न-मध्यवर्ग का लगभग हर बालक ही गुज़रता है। वह समय तोड़ भी सकता है और जीवन की दिशा मोड़ भी सकता है। 12 की आयु से डायरी लिखने लगा था। बचपन से नेपाल, और समस्त भारत की विभिन्न संस्कृतियों से मेरे निकटस्थ संबंध रहे हैं। होटलों के अस्थायी निवास न गिनूँ तो 43 वर्ष की आयु तक मैं 34 घर बदल चुका था। हर घर, हर नगर, अनुभवों का भण्डार था। जीवन सिखाता रहा, अनुभव एकत्र होते रहे। अनुभव, अध्ययन, प्रवास आदि सब मिलकर लेखन के प्रेरणास्रोत भी रहे और सृजन की भूमि भी प्रदान करते रहे। किशोरावस्था में एक बार उपेंद्रनाथ अश्क जी से लेखन के बारे में सलाह मांगी थी, जिसका दो पृष्ठ का उत्तर मेरा प्रेरणास्रोत बना।


सत्यवीर सिंह: आपके शिक्षक, मित्र तथा लेखक जिनका आपके जीवन में अविस्मरणीय योगदान रहा

अनुराग शर्मा: भाग्यशाली हूँ कि मैं जहाँ भी रहा, हिंदी के शिक्षकों का स्नेहपात्र बना रहा। तीसरी कक्षा में पहली बार बालसभा में बोलना याद है। फिर पाँचवीं कक्षा में पहली बार दशहरे और दीपावली की छुट्टियों से पहले हाईस्कूल तक के छात्रों की सम्मिलित सभा में अचानक आह्वान किये जाने पर बिना तैयारी एक भाषण दिया तो प्राचार्या ने पाँच रुपये इनाम दिये। दुर्भाग्य से मुझे तब की शिक्षिकाओं के नाम याद नहीं। जम्मू में डिम्पी ने इंद्रजाल कॉमिक्स से और दिग्विजय ने बाल-भारती पत्रिका से परिचय कराया। बरेली में छठी कक्षा में हिंदी के शिक्षक श्री ज्ञानस्वरूप वर्मा ने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के योग्य माना और पहली प्रतियोगिता में ही 15 रुपये मिले और एक बैंक बचत खाता भी खुला जो कभी चला नहीं लेकिन प्रतियोगिताओं में बहुत बाद तक पुरस्कृत होता रहा। इंटर कॉलेज में श्री आनंदस्वरूप और श्री हृदयनारायण ने प्रोत्साहित किया। बरेली कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योतिस्वरूप को मेरी एक कहानी बहुत पसंद आयी थी। मित्रों का सहयोग भी सदा मिलता रहा। सहपाठी मुकेशचंद्र ने मेरी सभी आरम्भिक कथाओं को न केवल सुना बल्कि कइयों को लिपिबद्ध भी किया, और अपने विचार पूरी गम्भीरता से दिये। प्रदीप भारती ने धर्मयुग के पुराने अंकों से कहानियाँ निकालकर दो मोटी-मोटी ज़िल्दें बनवाकर दीं। मित्रों से अब भेंट नहीं होती है, लेकिन वह किशोर कथाकार सदा उनका ऋणी रहेगा।


सत्यवीर सिंह: कथा लेखन में आपको कहानी तथा लघुकथा लेखन रुचिकर हैं, इसका कारण?

अनुराग शर्मा: मैं मूलतः कथाकार हूँ। कथा एक बहुत सशक्त माध्यम है। आलेखों से कहीं अधिक रुचिकर, कविता से कहीं अधिक सांद्र। गद्य विधा होने के कारण वह पद्य जैसे गणना, तुक या लय के बंधनों से मुक्त है। लघुकथा सी सीमित नहीं और उपन्यास सी भारी-भरकम भी नहीं, एकदम संतुलित। आजकल समयाभाव के कारण कहानियाँ छूट जाती हैं, लेकिन यह स्थिति लघुकथा, ग़ज़ल दोहे, और कविता जैसी छोटी विधाओं के अनुकूल है। समयाभाव में मेरी एक और प्रिय विधा फलीभूत होती है, वह है – एक पंक्ति की सूक्तियाँ या वन-लाइनर्स, जो सामान्यतः अंग्रेज़ी में होती हैं।


सत्यवीर सिंह: आपने कहानियों को ऑडियो रूप भी दिया है। जिसमें आपकी स्वर प्रस्तुति बहुत नायाब है। यह नया प्रयोग कैसे संभव हुआ?

अनुराग शर्मा: प्रवासी भारतीयों की पहुँच हिंदी साहित्य, पुस्तकों, पुस्तकालयों तक नहीं है। ऐसे भी लोग हैं जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते, परंतु हिंदी समझते हैं और हिंदी साहित्य में रुचि रखते हैं। ये ऑडियो प्रस्तुतियाँ हिंदी के मौलिक और अनूदित साहित्य को सहज-सुगम बनाने का एक प्रयत्न मात्र है।


सत्यवीर सिंह: अनुरागी मन तथा अन्य संग्रहों की संक्षिप्त विषयवस्तु के बारे में बताएँ

अनुराग शर्मा: अनुरागी मन की शीर्षक कथा मेरी लिखी पहली कहानी है जोकि 1982-84 के काल में घटित हुई थी लेकिन जिसका वर्तमान प्रारूप 2010-11 के आसपास निश्चित हुआ। इस संकलन की अन्य कथाएँ 1988 से 1991 तक मेरे मन में घुमक्कड़ी करती रही हैं लेकिन मसि-कर्गद उन्हें पिछले दशक में मिला। संग्रह में लगभग 27 कहानियाँ हैं। इस संग्रह को मॉरिशस और भारत की सरकारों के संयुक्त उपक्रम महात्मा गांधी संस्थान का प्रथम आप्रवासी हिंदी साहित्य सृजन सम्मान मिल चुका है। ‘छोटी सी बात’ मेरी 25-30 लघुकथाओं का संकलन है।


सत्यवीर सिंह: सेतु, हिंदी और आप एक दूसरे के पर्याय हैं। सेतु के लिए आपसे जब बातें करें तो तुरंत जवाब आता है। यह जागरूक तथा कर्मठ संपादक की पहचान है। कभी सोते भी हैं या नहीं ? हमेशा जागृत। यह कैसे संभव होता है?

अनुराग शर्मा: आठ घण्टे सोता हूँ, लेकिन शेष 16 घण्टे पूर्ण जागृत रहता हूँ। जो काम तुरंत हो सके उसे टालने में विश्वास नहीं है, और जो टल सकता है उसे त्वरित-कार्यों में बाधक नहीं बनने देता। समय प्रबंधन, क्षमता-संतुलन आदि मेरी पसंद के विषय हैं जिनका भरपूर सदुपयोग करता हूँ। दीवारें बनाने, और ईंटों के खरंजे बिछाने से लेकर बड़े पेड़ काटने तक के काम किये हैं। सामाजिक, पारिवारिक, और व्यक्तिगत दायित्वों के पूर्ण निर्वाह के बाद बचे समय में सेतु का काम देख लेता हूँ।


सत्यवीर सिंह: आपकी नज़र में एक कुशल संपादक के लिए कौन-कौन सी योग्यताओं की आवश्यकता होती है?

अनुराग शर्मा: अच्छा सम्पादक स्वीकृति-अस्वीकृति से आगे बढ़कर सम्भावनाएँ प्रस्फुटित करता है। आजकल हिंदी में कई सम्पादक जैसा-पाया वैसा-चिपकाया वाले क्यूरेटर की भूमिका निभा रहे हैं लेकिन सम्पादन-कार्य इतना संकीर्ण तो पहले भी नहीं था, आज के परिवेश में उसकी भूमिका और बढ़ी है। वह लेखक भी है, प्रबंधक भी है, और मेंटॉर या गुरु भी है। गुरुत्व एक आवश्यक योग्यता है। लेकिन सबसे पहले उसे निष्पक्ष, धैर्यवान और ज्ञानी होना ही पड़ेगा। और यहाँ ज्ञानी से मेरा अभिप्राय उसके अपने अज्ञान के ज्ञान से भी है। मातृभाषा हिंदी होने के बावजूद मेरे सामने आज भी ऐसे विषय या शब्द आ जाते हैं जिनका मुझे ज्ञान नहीं है, कभी मैं लेखक से ही सीधा संवाद करता हूँ और कभी विषय-विशेषज्ञों से। कुछ शब्दों की पुष्टि में मैंने आपकी सहायता भी ली है। लघुकथा के क्षेत्र में कितनी ही कृतियाँ पुरानी अंग्रेज़ी बोधकथाओं या कहावतों का रूपांतरण मात्र हैं। आलेखों और शोधपत्रों में तथ्यात्मक त्रुटियों से लेकर मनोगतवाद या किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-तंत्र भी दिख जाता है। कभी-कभार इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर रची कृतियाँ, भी आ जाती हैं। इन स्थितियों में संपादक की समकालीन साहित्यिक जानकारी भी सहायक सिद्ध होती है।


सत्यवीर सिंह: आपने यूनीकोड के प्रयोग पर बल दिया है। इसके माध्यम से हिंदी के भविष्य को कैसे देखते हैं?

अनुराग शर्मा: यूनीकोड एक मानक है, हिंदी का नहीं, इलेक्ट्रॉनिक लेखन का। पहले के अमानक फ़ॉण्ट्स की कलाकारियों से इतर यूनिकोड हमें पोर्टेबिलिटी की सुविधा दे रहा है कि किसी भी तंत्र में जो एक बार जैसा लिख दिया गया है वह अन्य तंत्रों में भी वैसा ही रहे। हिंदी के लिये देवनागरी यूनिकोड तो हैं ही, यूनिकोड में कायथी और मुड़िया जैसी अप्रचलित लिपियों के अक्षरों के प्रतिनिधि भी उपलब्ध हैं। यूनिकोड ने संसार की सभी लिपियों को बराबरी का स्थान दिलाया है। देवनागरी में हिंदी, मराठी, नेपाली, संस्कृत आदि भाषाओं में अंतर्जाल में उपलब्ध बहुत सी जानकारी को खोजा नहीं जा सकता है क्योंकि वह अमानक रूपों में लिखी गयी है जबकि यूनिकोड में लिखी सामग्री को सभी सर्च इंजन सरलता से खोज सकते हैं। यूनिकोड आये वर्षों बीत चुके हैं, अब यह हम हिंदीवालों पर निर्भर करता है कि हम हिंदी लेखन को कितना सुलभ, स्तरीय, उपयोगी, प्रामाणिक और रोचक बनाते हैं।


सत्यवीर सिंह: हिंदी की वैश्विक स्थिति, लेखन पर दृष्टिपात कीजिए

अनुराग शर्मा: हिंदी जितनी बड़ी भाषा है उस हिसाब से वैश्विक स्तर पर हिंदी की कोई पूछ नहीं है, और हिंदी की इस वैश्विक उपेक्षा का मुख्य कारण हम भारतीय हैं – हिंदीभाषी, अहिंदीभाषी, भारत सरकार और हिंदी के नाम पर बनी अनगिनत संस्थाएँ, सभी बराबर के ज़िम्मेदार हैं। जिस राजभाषा के बोर्ड, और तख्तियों पर उसके अपने देश में कालिख पोत दी जाती हो और ऐसा करने वाले अपराधियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई न होती हो, उस भाषा के लिये देश के बाहर आदर पाने की कल्पना शेखचिल्ली के ख्वाब से अधिक नहीं। भारत में तो एक सम्पर्क भाषा होने के कारण अहिंदीभाषी परिवार भी हिंदी सीखते, समझते, बोलते हैं, लेकिन भारत के बाहर उनके लिये हिंदी सीखने का कोई कारण नहीं बचता। पारिवारिक संवाद तथा भारतीय संस्कृति के ज्ञान के लिये उनकी मातृभाषा काफ़ी है और सांसारिक कार्यों के लिये अंग्रेज़ी या अन्य स्थानीय भाषा। भारत के बाहर हिंदी कुछ लोगों के लिये व्यवसायिक दोहन या प्रसिद्धि का साधन हो सकती है, परंतु सामान्यतः यह हिंदीभाषी घरों में सिमटी एक बोली मात्र रह गयी है। अंग्रेज़ी सहित किसी भी भाषा से हिंदी का कोई वैर नहीं है लेकिन इतना तो समझना होगा कि अंग्रेज़ी राज की समाप्ति के दशकों बाद भी आज अंग्रेज़ी को वैश्विक स्वीकृति क्यों मिली हुई है।


सत्यवीर सिंह: हिंदी के सामने चुनौतियों कौन-कौन सी हैं?

अनुराग शर्मा: हिंदी के सामने दो ही चुनौतियाँ हैं – 1. हिंदी की उदारता और 2. हिंदी-सेवकों की मजबूरी। हिंदी के कई बड़े नामवर हिंदी की गिनती, वर्णमाला के अक्षर क्रम से नहीं सुना सकते। कितनी ही हिंदी समितियों के सदस्यों का आपसी पत्र-व्यवहार अंग्रेज़ी में होता है। श और ष का अंतर न जानने वाले, और उस अज्ञान के प्रति पूर्ण बेपरवाह हिंदी के प्रोफ़ेसर इंटरनेट पर अंग्रेज़ी के अक्षरों वी और डब्ल्यू के अंतर पर प्रवचन देते हैं। हिंदी के एक प्रोफ़ेसर दम्पति अपने बच्चों के अंग्रेज़ी स्कूल की भारी फ़ीस का ज़िक्र फ़ेसबुक पर बड़े गौरव से करते समय अंदर से खुश होते हैं कि जो अंग्रेज़ी उन्हें कभी आई नहीं वह उनके बच्चे सीख रहे हैं। स्पष्ट है कि हिंदी उनकी पसंद नहीं, मजबूरी है। वे हिंदी में इसलिये हैं कि अन्य क्षेत्रों में वे असफल रहे। हिंदी में उनका काम चल जाता है, यह हिंदी की उदारता है। अन्य किसी भी क्षेत्र में अवमानक स्वीकार्य नहीं है।

हिंदीसेवकों को अपनी क्षमता, सरोकारों और ज्ञान-क्षेत्र का विस्तार करना होगा। साथ ही हमें हिंदी के प्रति हीनभावना से बाहर आकर; अपनी भाषा, संस्कृति, और परम्परा का आदर करना सीखना होगा। अंग्रेज़ी इसलिये वैश्विक नहीं है कि ब्रिटेन संसार पर राज कर रहा है, बल्कि इसलिये है कि अंग्रेज़ी में किसी भी विषय का कितना भी जटिल शोध सरल, सटीक, और स्पष्ट तरीके से अभिव्यक्त किया जा सकता है। यह तथ्य हिंदी और अंग्रेज़ी के एक बड़े अंतर की ओर संकेत करता है। ध्यान दीजिये - सामान्य और सीमित संवाद से बाहर, हिंदी मात्र हिंदी साहित्यकारों, हिंदी शिक्षकों और हिंदी छात्रों तक सिमटी हुई भाषा है। हिंदी से केवल उनका सरोकार है जिनकी जीविका, या रुचि, या मजबूरी हिंदी है जबकि अंग्रेज़ी के प्रयोगकर्ताओं में जीविका वर्ग से कहीं बड़ा वर्ग उन लोगों का है जिनकी वृत्ति विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र, सांख्यिकी सहित किसी भी अन्य विषय में है। भारत पर ही दृष्टिपात करें तो जटिल विषयों में अभिव्यक्ति का वह दायित्व और उसका श्रेय अंग्रेज़ी के पास ही है। हिंदीवालों के पास हिंदी को साहित्य से बाहर लाने की योजना तक नहीं है। क्या हिंदी में यह चर्चा सुनी कि यूनिकोड के लिये एकलकूट शब्द सही है या समकूट, या सर्वकूट, या कुछ और, और है तो क्यों? हम हिंदी वालों को यह जानने की उत्सुकता भी नहीं कि यूनिकोड को यह नाम क्यों दिया गया है। क्योंकि हमारी दृष्टि में तकनीक, उच्च शिक्षा, और विज्ञान का क्षेत्र हिंदी का न होकर अंग्रेज़ी का है। हम हिंदी कूप के मण्डूक मात्र हैं जो बीच-बीच में हिंदी की सीमित पहुँच और सरकारी निवेश की कमी का मर्सिया पढ़ लेते हैं। इस रुदाली प्रवृत्ति से किसी भाषा का न कभी भला हुआ है, न होगा। भाषा का विस्तार करें, विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के अन्य क्षेत्रों से सहयोग करें, हीन भावना से उबरें, मन-वचन-कर्म में प्रामाणिकता लायें और निहित स्वार्थों का विरोध करें, तभी हिंदी प्रगतिगामी होगी।


सत्यवीर सिंह: ई पत्रिकाओं का भविष्य कैसा है?

अनुराग शर्मा: लगभग एक दशक पहले ईबुक्स ने छपी हुई पुस्तकों को पीछे छोड़ दिया था। भारत में प्रकाशन फिर भी चल रहा था, विश्व पुस्तक मेले जैसे आयोजन भी किसी पर्व की तरह मनाये जाते रहे हैं। लेकिन अब भारत में भी प्रिंट मीडिया पिछड़ रहा है। ई-पत्रिकाएँ क्षण भर में संसार भर में पहुँचाई जा सकती हैं। करोना-संगरोध जैसी स्थिति में भी घर बैठे पढ़ी जा सकती हैं। ई-पत्रिकाओं का भविष्य उज्ज्वल ही है।


सत्यवीर सिंह: हिंदी का लेखक अभी भी कागज, कलम से दीगर तकनीकी साधनों से दूर है। इसके लिए कौनसे कारक जिम्मेदार हैं?

अनुराग शर्मा: भारत में अंग्रेज़ी का मोह है। वह शिक्षा, ज्ञान, शक्ति, और समृद्धि की प्रतीक भाषा बन चुकी है। साधन-सम्पन्न वर्ग हिंदी से दूर है और साधनहीन वर्ग तकनीक से, यही डिजिटल डिवाइड है। डिजिटल डिवाइड की खाई को पाटा जाये। शिक्षा नीति में आरम्भिक कक्षाओं से ही भारतीय भाषाओं में तकनीक का समन्वय होना चाहिये।


सत्यवीर सिंह: हिंदी का पाठक बहुत सीमित होता जा रहा है। इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं?

अनुराग शर्मा: जैसा हमने पहले विमर्श किया, जब हिंदी ही सीमित हो गयी है तो पाठकवर्ग स्वतः ही सीमित होगा। विज्ञानकथा हो या तकनीकी शोधपत्र, हिंदी साहित्य से इतर हर कृति यदि अंग्रेज़ी में ही लिखी और पढ़ी जायेगी तो हिंदी का पाठकवर्ग कैसे बनेगा? स्पष्ट है कि हिंदी वे ही पढ़ेंगे जो अंग्रेज़ी नहीं पढ़ सकते। जो साधनहीन भारतीय अंग्रेज़ी नहीं पढ़ सकते उनके लिये किंडल खरीदना तो दूर पुस्तक खरीदना भी एक विलासिता है। उर्दू साहित्य और पत्रकारिता को देखिये, हालत हिंदी से बदतर है क्योंकि उन्होंने अपने क्षेत्र को और संकीर्ण किया है। उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों से सीख लेकर हमें चाहिये कि हम हिंदी के पाठक की रुचियों और क्षमताओं का विस्तार करें, रुचिकर साहित्य सुलभ कराएँ। हिंदी में गम्भीर गद्य लेखन को बढ़ावा दें। करदाताओं के धन से चल रहे हिंदी संस्थानों और पुस्तकालयों के दायित्व निश्चित करें। हिंदी के योग्य, निस्वार्थ हितैषियों को महत्तर दायित्व के पदों तक पहुँचाएँ तो हिंदी की दशा और दिशा दोनों में सुधार होगा।


सत्यवीर सिंह: 'सेतु' के माध्यम से आपको जो वैश्विक अनुभव हुआ और हो रहा है। कुछ उल्लेखनीय बातें?

अनुराग शर्मा: सेतु के माध्यम से, हिंदी और अंग्रेज़ी, साहित्य और कला के क्षेत्र में वैश्विक पटल पर चल रही गतिविधियाँ के बारे में बहुत कुछ जानने को मिल रहा है। अनेक उत्कृष्ट लेखकों और सम्पादकों से परिचय हुआ है और उन्हें सुदूर पाठकों तक पहुँचाने में अपना भी बित्तेभर का योगदान रहा है। कुल मिलाकर चार वर्षों की ओर अग्रसर होते विनम्र प्रयास की प्रगति संतोषजनक है।


सत्यवीर सिंह: नवोदित, नवांकुर लेखकों को आपका संदेश?

अनुराग शर्मा: मौलिक और स्वाभाविक लेखन में विश्वास रखिये। सफलता के शॉर्टकट हो सकते हैं परंतु श्रेष्ठता का शॉर्टकट नहीं होता। गुणवत्ता के लिये निरंतर प्रयास करना होता है। ज्ञानार्जन कीजिये, लिखने से अधिक पढ़ने में विश्वास कीजिये। रचनाएँ जहाँ भेज रहे हैं, उनके अनुरोध (प्रेषण के नियम) पर भी ध्यान दीजिये। अपनी पोस्टें साझा करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन जिनकी रुचि मात्र अपने लेखन में होती है, वे अक्सर अपनी कृतियों के एकमात्र पाठक होते हैं। उदात्त बनें, उन्नति करें।


सत्यवीर सिंह: धन्यवाद, नमस्ते।

अनुराग शर्मा: आपका हार्दिक आभार, नमस्ते!

4 comments :

  1. सार्थक बातचीत, इसके द्वारा अनुराग जी के काम और सोच के बारे में विस्तार से जानने मिला।

    ReplyDelete
  2. वाह! विस्तृत साक्षात्कार किन्तु सबकुछ सार्थक।
    अनुराग जी के विचारों से भिज्ञ होने के बाद उन्हें सादर नमन करने को मन करता है।
    परिवार, नौकरी और सामाजिक दायित्वों का सफल निर्वहन करते हुए द्विभाषी सेतु का नियमित संपादन । अति श्रमसाध्य कार्य।
    हार्दिक साधुवाद अनुराग जी।
    डाॅ सत्यवीर जी को भी बधाई।
    साक्षात्कार में एक शब्द सुधारने का विनम्र निवेदन करना चाहूंगा-
    व्याघ्र की जगह क्रौंच पक्षी होना चाहिए। बाल्मीकि जी ने क्रोंच पक्षी की पीड़ा से द्रवित होकर रचना की थी।
    सादर
    डाॅ दिनेश पाठक शशि मथुरा भारत
    9412727361

    ReplyDelete
  3. सम्पादक की अपेक्षाएं क्या हैं, यह बात भी लेखकों को समझनी ज़रूरी होती है. इस बातचीत से बतौर सम्पादक (और हिन्दी के लेखक) अनुराग जी के विचार मालुम पड़े. बहुत बढ़िया ...

    ReplyDelete
  4. साक्षात्कार किसी रचना सा लगा।सेतु की नई पाठक हूँ । सेतु पर हिंदी के लिये हो रहे गम्भीर व सार्थक लेखन से हृदय शीतल हो गया।सत्य वीर जी व अनुराग शर्मा जी का शुक्रिया ।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।