हिन्दी साहित्य और पर्यावरणीय शिक्षा

नेहा हितेश कल्याणी

पी.एच.डी (हिन्दी, संस्कृत), एम. फिल.(संस्कृत),  एम.ए. (हिन्दी, संस्कृत), नेट (संस्कृत), सेट (हिन्दी )
सहायक व्याख्याता, भाषा विभाग (हिन्दी), गो. से. अर्थ-वाणिज्य महाविद्यालय, नागपुर
चलभाष: +91 823 798 3333
ईमेल: kalyanineha00@gmail.com


सारांश:- वैदिक सभ्यता में प्रकृति की पूजा की जाती थी। भारतीय संस्कृति में वन और वनस्पति का अत्यधिक महत्व है। प्राचीन काल में मानव प्रकृति को स्वामी और स्वयं को सेवक मानता था, किन्तु कालान्तर में मानव की स्वयर्थपरकता और महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण ने उसकी सोच को परिवर्तित कर दिया, वह जहाँ जहाँ से गुजरा उसने उसको रेगिस्तान बना दिया आज प्रकृति की भयावह स्थिति इन पंक्तियों में व्यक्त की जा सकती है-
"विश्व जन भयभीत, दूषित सृष्टि से।
जल, थल, नभ बदरंग मानव वृष्टि से।।"

भारत में पर्यावरण शिक्षाः- बढते प्रदूषण के खतरों से जनता को परिचित करवाने और पर्यावरण संरक्षण में जन भागीदारी की महत्ता को मानते हुए मंत्रालयों, शोध व अनुसंधान संस्थानों की स्थापना हुई। सर्वप्रथम उच्च शिक्षा स्तर में विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा प्रारम्भ हुई। 1986 में प्रारम्भ नई शिक्षा नीति में पर्यावरण के प्रति सजगता लाने हेतु पाठ्यक्रमों में इसे शामिल किया गया। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह पर्यावरण को आधार बनाकर शिक्षा का एक मॉडल पाठ्यक्रम तैयार करें। मानव संसाधन मंत्रालय ने भी आवश्यक कदम उठाकर स्कूली शिक्षा में पर्यावरण उन्मुखीकरण की योजना द्वारा इसे पाठ्यक्रम में रखा।
पर्यावरण पर शोध, खोज एवं अनुसंधान के लिए देश में तीन उत्कृष्ट केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी है -
1. भारतीय विज्ञान संस्थान- बंगलोर, आई आई एस
2. पारिस्थितिकी अनुसंधान केन्द्र, अहमदाबाद
3. भारतीय खान संस्थान, धनबाद

कुंजी शब्दः- पर्यावरण, हिन्दी, साहित्य, सवंर्धन, शिक्षा आादि


शोध-प्रपत्र

प्रस्तावनाः- आधुनिक जीवन की कैसी विडम्बना है कि हम प्रकृति से निरन्तर दूर होते जा रहे है। यहाँ दूरी से मतलब स्थानीय दूरी से नहीं बल्कि प्रकृति की सहभागिता और साहचर्य से है। निरन्तर प्रकृति की उपेक्षा करता मानव यह भूल जाता है कि उसके शरीर की रचना प्रकृति के पंच तत्वों से मिलकर ही बनी है। अर्थात प्रकृति तो मानव के तन व मन दोनों में व्याप्त है। प्रकृति के अभाव में सुखमय मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। तुलसीदास ने रामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में भी यही लिखा है कि -
"क्षिति जल पावक गगन समीरा
पंच रचित अति अधम सरीरा"

वैदिककालीन अध्ययन से पता चलता है कि तत्कालीन सभ्यता में प्रकृति की पूजा की जाती थी। भारतीय संस्कृति में वन और वनस्पति का अत्यधिक महत्व है। परिणामतः भारतीय संस्कृित को अरण्य संस्कृति कहा जाता था। प्राचीन काल में मानव प्रकृति को स्वामी और स्वयं को सेवक मानता था,किन्तु कालान्तर में मानव की स्वkर्थपरकता और महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण ने उसकी सोच को परिवर्तित कर दिया, वह जहाँ-जहाँ से गुजरा उसने उसको रेगिस्तान बना दिया। 21 वीं सदी की ओर बढते मानवीय कदमों ने जहाँ एक ओर प्रकृति को उपेक्षित कर दिया है, वहीं दूसरी ओर अपनी लोलुपता को उन्नत किया है। आज प्रकृति की भयावह स्थिति इन पंक्तियों में व्यक्त की जा सकती है-
"विश्व जन भयभीत, दूषित सृष्टि से।
जल, थल, नभ बदरंग मानव वृष्टि से।।"

वर्तमान में जहाँ हर ओर पारिस्थितिकी असन्तुलन होता जा रहा है। वहीं मानव जीवन में भी अनेक विसंगतियाँ पैदा हो रही है। इन विसंगतियों में जनसंख्या वृद्धि, तथा पर्यावरण के प्रति नागरिक सजगता का अभाव प्रमुख है। पर्यावरण के तीन प्रमुख प्रकोष्ठों वायु, जल, और स्थल के प्रदूषणों से वायवीय प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा स्थल प्रदूषण फैलता जा रहा है जिनसे न केवल मानव जगत को अपितु जीवन एवं वनस्पति जगत को भारी खतरा पहुँच रहा है।
कहीं नहीं बचे हरे वृक्ष, न सागर बचे हैं
बनाते जिन पर वे घोंसले वे वृक्ष
कट चुके हैं या सूख चुके है,
क्या जाने अधूरे और बंजर हम,
अब और, किस बात के लिए रूके हैं?

वायवीय पर्यावरण में जहाँ मानवीकृत वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, नाभिकीय विस्फोटों से उत्पन्न विकार पैदा हो रहे है तो औद्योगिक संस्थानों, परमाणु रियेक्टरों तथा पन बिजली घरों की चिमनियों के उठते धूुएं से स्वच्छ वातावरण प्रदूषित हो रहा है। इसी तरह औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित जल नदी नालों को गन्दा कर रहा है।
उपरोक्त प्रदूषणों से मुक्ति की चाह में हम प्रदूषण निवारक उपायों को अपना तो रहे है। किन्तु जनवृद्धि के कारण ये उपाय निरर्थक होते जा रहे है। जनवृद्धि के कारण प्राकृतिक उपादानों से व्यक्ति लाभान्वित नहीं हो पा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जनवृ़द्धि से अधिक उपभोक्तावादी अमीर संस्कृति से पर्यावरण को खतरा हो रहा है। निश्चित ही वर्तमान में भी हमारे देश में इतने प्राकृतिक संसाधन है कि यदि हम उनका उपयोग सही ढंग से करें तो आसानी से हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। स्वार्थवश लकडियों की कटाई से क्षुब्ध नरेश अग्रवाल कहते है कि-
"मैं गुजर रहा था, अपने चिरपरिचित मैदान से
एकाएक चीख सुनी, जो मेरे प्रिय पेड की थी
कुछ लोग खडे थे,बडी-बडी कुल्हाडियां लिए
वे काट चुके थे इसके हाथ, अब पाँव भी काटने वाले थे
हम लोग लाश उठा रहे है।
अंतिम संस्कार भी करा देगें
तुम राख ले जाना।"

भौतिकतावादी, सुविधाभोगी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने प्रकृति को असहाय व विवश बना दिया है। परन्तु मानव यह भूल गया है कि स्वयं पर हुए अत्याचार का प्रकृति सदैव विरोध करती है। जय शंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य कामायनी मे लिखा है-
"प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब भूले थे मद में
भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के मद में।
वे सब डूबे डूबे उनका वैभव बन गया पारावार,
उमड रहा था देव सुखों पर दुःख जलधि का नाद अपार।"

उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि यदि प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया तो वो मानव को भी क्षति पहुंचा सकती है। वर्तमान युग में जनवृद्धि से जीवन यापन का जो दायरा बढा है उसमें कृषि प्रधान क्षेत्रों से जनसंख्या का शहरों की ओर भागना प्रमुख है। शहरों की भौतिक चकाचौंध, धन, शिक्षा और उच्च जीवन स्तर की तलाश में व्यक्ति औद्योगिक क्षेत्रों की ओर आकर्षित हुआ है। इस परिवर्तन से उद्योगों की उत्पादन क्षमता अवश्य बढी है किन्तु श्रमिकों का शोषण और गरीबी में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दूसरी ओर शहरीकरण की इस प्रवृति से गांवों की कृषि उत्पादन स्थिति पर प्रभाव पडा। यह अवश्य हुआ कि हरित क्रान्ति और वैज्ञानिक कृषि उत्पादन तरीकों से कृषि उपज में वृद्धि हुई किन्तु जनसंख्या वृद्धि से बढती महंगााई की तुलना में यह वृद्धि बहुत अधिक नहीं थी।
शहरीकरण से शहरों का भौगोलिक विस्तार हुआ जिससे जंगल कटना शुरू हुआ। जंगल कटे तो मौसम पर इसका प्रभाव हुआ। वर्षा कम हुई तो भूजल स्रोतों की कमी होने लगी परिणामस्वरूप पीने के पानी की समस्या सामने आई। कंकरीट के जंगल उगाने के लिए प्रकृति द्वारा उपहार में दिये गये हरे-भरे जंगल कटवाने के बाद धन लोलुप मानव को जब धरती बंजर करी जब न हुआ अफसोस की लताड लगााने वाला कवि सत्य ही वर्षाचक्र से उत्पन्न पर्यावरणीय संकट की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है-
"तू बारिश के वास्ते,आसमान को मत कोस
जब धरती बंजर करी, तब न हुआ अफसोस।"

 योजनाओं के क्रियान्वयन तथा परीक्षण उपायों से समाज को हम जितना दे सकते थे दिया, किन्तु निरन्तर जनवृद्धि के सामने आर्थिक योजनाएँ भी ठप्प हो गई है तब पर्यावरण विदों के अनुसार जनसंख्या शिक्षा द्वारा जन चेतना लाना आवश्यक माना जाने लगा, जिससे पर्यावरण असन्तुलन, जनवृद्धि समस्या, उत्पादन ह्नास तथा गरीबी उन्मूलन आदि के विषय में जनता को जागरूक किया जा सके। पर्यावरण प्रदूषण उन्मूलन, संवर्धन, संरक्षण के प्रति छात्रों, शिक्षकों, पालकों एवं नागरिकों में चेतना जगाायी जाने का प्रयास किया जाने लगा। इस चेतना को जगाने का कार्य निम्न प्रकार की पर्यावरण शिक्षा द्वारा किया जा सकता है-
1. शिक्षा पाठ्यक्रमों में पर्यावरण शिक्षा को स्थायी रूप में सम्मिलित करना।
2. पर्यावरण संस्थानों द्वारा पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रमों में चलाना।
3. पर्यावरण दलों, क्लबों, ज्ञान-विज्ञान जत्थों द्वारा शिक्षा प्रदायन।
4. स्थानीय प्रशासन द्वारा पर्यावरण शिक्षा का प्रचार-प्रसार।
5. प्रौढ शिक्षा समितियों, जनसंख्या शिक्षा क्लबों तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा पर्यावरण शिक्षा।
6. औद्योगिक इकाइयों द्वारा श्रमिक बस्तियों में पर्यावरण शिक्षा का आरम्भ।

यदि अब भी हम पर्यावरण के प्रति सजग व सतर्क नहीं होगें तो जल, वायु, खाद्यान्न और प्राकृतिक सम्पदा के स्रोत समाप्त हो जायेंगे। इसके लिए हमें नष्ट होते जंगलों को सरंक्षित करना होगा। घने वर्षा वन तैयार करने होगें जिससे वर्षा हो परिणामतः भूमि में नमी होगी। नमी एवं जल संवर्धन से कृषि में सुधार होगा।
प्रदूषण को रोकने के उपायः-
1. जल संसाधनों का संरक्षण।
2. औद्योगिक संस्थानों, सडकों के किनारे, सार्वजनिक स्थलों पर अधिकाधिक वृक्षारोपण करें।
3. कूडे को कूडेदान में फेंककर आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखें।
4. वाहनों के हाॅर्न तीव्र आवाज में न हों।
5. जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगायें।

भारत में पर्यावरण शिक्षाः- बढते प्रदूषण के खतरों से जनता को परिचित करवाने और पर्यावरण संरक्षण में जन भागीदारी की महत्ता को मानते हुए मंत्रालयों, शोध व अनुसंधान संस्थानों की स्थापना हुई। सर्वप्रथम उच्च शिक्षा स्तर में विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा प्रारम्भ हुई। 1986 में प्रारम्भ नई शिक्षा नीति में पर्यावरण के प्रति सजगता लाने हेतु पाठ्यक्रमों में इसे शामिल किया गया। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह पर्यावरण को आधार बनाकर शिक्षा का एक मॉडल पाठ्यक्रम तैयार करें। मानव संसाधन मंत्रालय ने भी आवश्यक कदम उठाकर स्कूली शिक्षा में पर्यावरण उन्मुखीकरण की योजना द्वारा इसे पाठ्यक्रम में रखा। निम्न दो केन्द्रों को पर्यावरण कार्य में सहयोग का कार्य दिया गया-
1- Centre for Environment Education, Ahmedabad
2- CPR Environment Education Centre, Madras

नई दिल्ली के राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय ने जनता को प्राकृतिक वनस्पति, प्राणी एवं पर्यावरण में क्या अन्तः सम्बन्ध होता है, इस बात की जानकारी देने की सुविधा प्रदान की जिससे प्राकृतिक पर्यावरण के बारे में नवीन जानकारी प्राप्त की जा सके।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 1986 में ही देश में पहली बार 14 कृषि विश्वविद्यालयों में डिग्री पाठ्यक्रमों के साथ वानिकी विषय पर भी शिक्षा प्रदान की जा रही है। देश के निम्न विश्वविद्यालयों में पर्यावरण पर अध्ययन करवाया जाता है-
1. भोपाल विश्वविद्यालय, भोपाल
2. दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
3. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस
4. बम्बई विश्वविद्यालय, बम्बई
5. पूना विश्वविद्यालय, पूणे

पर्यावरण अनुसंधान के संस्थान:- पर्यावरण शिक्षा के साथ ही शोध कार्य को प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार ने दो अनुसंधान समितियाँ बनाई है, जो निम्नाकिंत है-
1. दि इण्डियन नेशनल मेन एण्ड बायोस्फीयर कमेटी
2. पर्यावरण शोध समिति

उपरोक्त दोनो समितियाँ पर्यावरण अनुसंधान के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के बारे में अनुशंसाएँ करती है और तत्सम्बन्धी क्षेत्र में अनुसंधान की अनुमति देती है। भूमि, जल, वायु, आकाश और ऊर्जा पर विशेष ध्यान देकर अनुसंधान कार्य किये जा रहे हैं। इन्हें पूर्णता प्रदान करने के लिए भी दो तरह के दृष्टिकोण अपनाये जा रहे हैं।
प्रथमः- पारिस्थितिक प्रणाली प्रबन्ध।
द्धितीय- प्रबन्ध और प्रौद्योगिकी पहलू

उक्त पहलूओं में पारिस्थितिकी प्रबन्ध प्रणाली के अन्तर्गत पर्वत, वन और भूमि, द्वीप और तटीय क्षेत्र, शुष्क और अर्द्ध क्षेत्र, नदियाँ आदि आते है। प्रबन्ध और प्रौद्योगिकी पहलू के अन्तर्गत निगरानी, नियंत्रण विकास, प्रणालियाँ और औजार स्वास्थय तथा विष विज्ञान आदि के प्रभाव का जायजा एवं उसका प्रबन्ध शामिल है। पर्यावरण पर शोध, खोज एवं अनुसंधान के लिए देश में तीन उत्कृष्ट केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी है। जिनमें-
4. भारतीय विज्ञान संस्थान- बंगलोर, आई आई एस
5. पारिस्थितिकी अनुसंधान केन्द्र, अहमदाबाद
6. भारतीय खान संस्थान, धनबाद

इन तीनों संस्थानों में पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य होता है। बंगलौर के विज्ञान संस्थान में पश्चिमी घाटों, वायु तथा जल प्रदूषणों पर ध्यान दिया जाता है। अहमदाबाद केन्द्र शिक्षण सामग्री के विकास में कार्य कर रहा है और तीसरा केन्द्र खनन पर्यावरण पर अनुसंधानरत है।
वन तथा सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में अनुसंधान का मुख्य दायित्व भारतीय वन अनुसंधान और कॉलेज देहरादून तथा इसके क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्रों ने संभाल रखा हैं। वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद् का गठन किया गया है। इसके अतिरिक्त पाँच नए केन्द्रों की स्थापना की गई है। जो निम्न प्रकार से है-
1. शुष्क क्षेत्रीय वानिकी अनुसंधान संस्थान, जोधपुर
2. उत्तरी प्रायद्वीप पर्णपाती वन संस्थान, जबलपुर
3. उत्तर-पूर्वी नम और दलदल वाले सदाबहार वन संस्थान, जोरहट
4. लकडी विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान, बंगलौर
5. वृक्ष जनन और आनुवंशिक संस्थान, कोयम्बटूर

उपरोक्त संस्थान राष्ट्रीय स्तर के वानिकी पर्यावरण शोध में सक्रिय भूमिका निबाहते हैं। कुछ संस्थान देश के भिन्न- भिन्न क्षेत्रों में वन्य जीवन पर शोधरत है -
1.निवास स्थान क्रम विकास अनुसंधान।
2. हाथियों के गमनागमन पर शोध।
3. घड़ियाल और मगर की पारिस्थितिकी।
4. खतरे में पड़े पशुओं की स्थिति का अध्ययन।
5. पशुओं के व्यवहार का अध्ययन।
6. पशुओं का स्वास्थय एवं अन्य पारिस्थितिकी अवस्थाएँ।
7. शेर तथा चीते जैसे प्राणियों के अस्तित्व का अध्ययन।
इनके अलावा प्रदेश एवं जिला स्तर पर पर्यावरण एवं सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में कार्य हो रहा है। जनता एवं वानिकी के क्षेत्र से जुडे लोगों की अधिक से अधिक भागीदारी निश्चित करने हेतु भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा वानिकी विस्तार की एक व्यापक योजना तैयार की गई है।

 वानिकी में शोध अनुसंधान से सम्बन्धित ज्ञान व सूचना की जानकारी हेतु राष्ट्रीय पर्यावरण चेतना अभियान प्रारम्भ किया गया। वर्तमान में पर्यावरण चेतना जाग्रत करने हेतु प्रादेशिक स्तर पर पर्यावरण संगठन बन गये हैं। पर्यावरण अनुसंधान के क्षेत्र में भी सूचना संग्रहण के कार्य हो रहे है। पर्यावरण सजगता और प्रगति में सहायक बनने वाले नागरिकों के लिए केन्द्र सरकार द्वारा "पर्यावरण पुरस्कार" भी स्थापित किये गये हैं। जिनमें से कुछ निम्न प्रकार से है-
1. पीताम्बर पंत राष्ट्रीय पर्यावरण फैलोशिप, 1978
2. इन्दिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार, 1987

उपसंहारः- हिन्दी गद्य मे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध भी पर्यावरणीय समस्याओं को व्यक्त करने का सुन्दर माध्यम रहे है। उन्होंनें न केवल पर्यावरण के अनुचित दोहन व प्रदूषण के विषय में लिखा, अपितु पर्यावरणीय स्रोतों के उचित उपयोग व सरंक्षण के विषय मे महत्वपूर्ण सुझााव व निर्देश भी दिये हैैं।‘ आम फिर बौरा गये’ अशोक के फूल, मनुष्य का भविष्य आदि निबन्धों में ग्लोबल वार्मिग, प्रदूषण तथा मनुष्य के आत्मकेन्द्रित दृष्टिकोण पर उनका चिन्तन दर्शनीय है। इस प्रकार के साहित्य को यदि पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर विद्यार्थियों को अध्यापन करवाया जाये तो निश्चय ही देश के भावी नागरिकों की दृष्टि को प्रकृति अनुरागी बनाकर पर्यावरण के संवर्धन की दिशा मे हम प्रयास कर सकते है।
प्रकृति और जीवन में सामंजस्य बनाकर ही हम पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते है। वन्य-जीवन और प्राकृतिक सम्पदा को बचाना ही मानव जीवन का संरक्षण होगा। बेकार भटकते युवाओं को पर्यावरण दलों का गठन कर प्राकृतिक सौन्दर्य का सरंक्षण और संवर्धन करने में सहभागी होना चाहिये। यदि ये भावी नागरिक पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक रूख दिखाये तो निश्चय ही इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। जब सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के हितों के लिए कार्य करे तो क्या नागरिकों की यह जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिये कि अपने राष्ट्र के सरंक्षण एवं संवर्धन के लिए उन्हें प्रयास करना चाहिये। क्योंकि देश के नागरिकों की सजगता व रचनात्मक सहभागिता ही इस समस्या का सटीक उपाय है। सर्वप्रथम जन वृद्धि पर अंकुश लगााने में नागरिकों को सहयोग करना चाहिये तत्पश्चात नागरिकों के सन्तुलित सहयोग के साथ ही अन्य असन्तुलन स्वतः ही सन्तुलित हो जायेंगे।

"उठो! मेरे साथियों, उठो! इस दूर तक फैली जमीन को
हरा करने का उपक्रम करें।
दिशाओं में फैले साधनों का सामंजस्य करना है, हमें सबके लिए।"

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1. पर्यावरण विज्ञानः- डॉ. विजय कुमार त्रिपाठी, एस. चन्द एण्ड कम्पनी, नई दिल्ली
2. पर्यावरण और हमः- डॉ. डी. के. ठाकुर, पुस्तक संचय, जयपुर
3. पर्यावरण प्रबन्धनः-प्रो. एच. पी. बेहरा, हिमालया पब्लिशिंग हाउस
4. रामचरिमानस, किष्किन्धा काण्ड श्लोक 11 चौपाई 2, गीता प्रेस गोरखपुर
5. कामायनी, श्रद्धा सर्ग, जयशंकर प्रसाद, प्रथम संस्करण 1995
6. नरेश अग्रवाल माध्यम सहस्त्राब्दि अंक-9 जनवरी-मार्च 2003, सम्पादक - डॉ. सत्यप्रकाश मिश्रा, पृष्ठ - 80

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