अमेरिका में हिंदी की अध्यापन सामग्री

कुसुम नैपसिक
- कुसुम नैपसिक

पीएचडी (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, भारत)
हिंदी प्रवक्ता, ड्यूक विश्वविद्यालय, उत्तर कैरोलाइना, संयुक्त अमेरिका


हिंदी में अध्यापन सामग्री का निर्माण बहुत पहले शुरू हो गया था जब पहली बार 1947 में पेंसलवेनिया विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई विभाग खोला गया। तब लिखी गईं ज़्यादातर पुस्तकें अब आसानी से उपलब्ध नहीं हैं लेकिन अमेरिका में अध्यापन सामग्री बनाने की नींव वहीं से पड़ी।

विदेशों में विश्वविद्यालय के विद्यार्थी जब पहली बार हिंदी की प्राथमिक कक्षा में आते हैं तो उन्हें हिंदी भाषा का पूर्व ज्ञान नहीं होता या कुछ देसी विद्यार्थियों को थोड़ा-बहुत बोलना आता है। वे अक्सर कक्षा में उपयोगी कुछ वाक्यांशों एवम् बातचीत और लिपि के अभ्यास से भाषा सीखने की शुरुआत करते हैं। इसके लिए भारत में मिलने वाली छोटे बच्चों की किताबें काम नहीं आतीं क्योंकि उन किताबों में बच्चों की कविताएँ, लोककथाएँ, और कहानियाँ बालसुलभ मन को केंद्र में रखकर लिखी गई होती हैं और उसमें बहुत मुश्किल व्याकरण और शब्दावलियों का प्रयोग किया जाता है। विदेशों में पढ़ने वाले युवा उसका आनंद नहीं उठा पाते और शायद उनको ये पुस्तकें बचकानी लगें, इसलिए उनकी ज़रूरतों और रुचियों को ध्यान में रखकर उनके लिए पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया जाता है और ऑनलाइन सामग्री का चुनाव किया जाता है।

यह सोचना भी आज के तकनीकी युग में मुश्किल लगता है कि तीस-चालीस साल पहले बिना यूट्यूब और डिजिटल किताबों के विद्यार्थी इतनी अच्छी हिंदी कैसे सीख पाते होंगे। यहाँ हिंदी प्रोफ़ेसर रूपर्ट स्नेल की बात याद आती है उन्होंने अपनी ‘कंपलीट हिंदी’ पाठ्यपुस्तक की भूमिका में लिखा था, ‘आज हिंदी विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध संसाधनों को देखकर मुझे थोड़ी ईर्ष्या होती है क्योंकि कुछ दशक पहले जब मैंने अपनी हिंदी की यात्रा शुरू की थी तब ये उपलब्ध नहीं थे।’ (पृष्ठ १४) आज तमाम ऑनलाइन सामग्री ने हिंदी पढ़ने, लिखने, बोलने और सुनने को बहुत सुगम बना दिया है। ऑनलाइन रेडियो और टीवी विश्व में कहीं भी देखे-सुने जा सकते हैं। इन सबके बावजूद विद्यार्थियों को शुरुआत में ऐसी सामग्री की दरकार होती है जो उन्हें सिलसिलेवार भाषा का अभ्यास करवाने में सक्षम हो सके। आगे उन्हीं पुस्तकों और ऑनलाइन संसाधनों का विस्तार से वर्णन किया जाएगा जो आजकल अमेरिकी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में पढ़ायी जा रही हैं।
हिंदी लिपि के लिए ‘रूपर्ट स्नेल’ ने एक पुस्तक प्रकाशित की है जो अपने में अनोखी है और इसका प्रयोग करके छात्र हिंदी लिपि का अभ्यास स्वयं कर सकते हैं। वैसे सभी प्राथमिक पुस्तकों की शुरूआत में भी लिपि से सम्बंधित कुछ पाठ ज़रूर होते हैं जिससे लगभग दो हफ़्तों में ही विद्यार्थी लिपि सीख जाते हैं। 

प्रथम वर्ष की पुस्तकों में ज़्यादातर व्याकरण, वार्तालाप, शब्दावलियों, गतिविधियों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं जिनमें प्रमुख हैं: ‘रूपर्ट स्नेल’ कृत टीच योरसेल्फ़ सीरीज़ की ‘कंपलीट हिंदी’ यह किताब बहुत मशहूर हुई और शायद हर हिंदी पढ़ने और पढ़ानेवालों के पास इसकी एक प्रति ज़रूर मिलेगी क्योंकि इसमें व्याकरण का स्पष्टीकरण सरल और संक्षिप्त है, इस पुस्तक से विभिन्न उदाहरणों के ज़रिए विद्यार्थी स्वयं पढ़के भी आसानी से हिंदी सीख सकते हैं। यह किताब अन्य सभी किताबों से सस्ती और आकार में छोटी भी है।

पहलेपहल मैंने इसका प्रयोग स्वयं हिंदी व्याकरण सीखने के लिए किया था और विश्वविद्यालय में भी इससे कई सालों तक पढ़ाया था। इसमें हर पाठ में व्याकरण से सम्बंधित कुछ उदाहरण दिए हुए हैं फिर एक या दो वार्तालाप भी दिए हैं। यह पुस्तक सरल से कठिन की ओर जाते हुए व्याकरण को समेटती है। इसमें हर पाठ के अंत में कुछ सवाल भी दिए गए हैं लेकिन किताब के अंत में उन सवालों के जवाब भी हैं इसलिए कक्षा में गृहकार्य देने के लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि विद्यार्थी सीधे-सीधे अपने सब जवाब नक़ल करके लिख देते हैं लेकिन जो लोग स्वयं सीख रहे हैं उनके लिए सही जवाब जानना ज़रूरी है। इसमें सीडी भी है जिसमें पुस्तक में आए सभी संवादों की रिकॉर्डिंग दी गई है। अभी तक जितनी भी प्राथमिक व्याकरण की पुस्तकें बाज़ार में उपलब्ध हैं उनके साथ सीडी भी हैं लेकिन अब परेशानी यह है कि इसे चलाने के लिए सीडी ड्राइवर आधुनिक कम्प्यूटरों से नदारद हैं। 

अन्य मशहूर व्याकरण की पुस्तकों में ‘उषा जैन’ द्वारा लिखित “इंट्रडक्शन टू हिंदी ग्रामर” का भी शुमार है इसमें व्याकरण के बेहतरीन अभ्यास दिए गए हैं जिसमें अंग्रेज़ी से हिंदी या हिंदी से अंग्रेज़ी अनुवाद करना, वाक्यों को परिवर्तन करके लिखना आदि अभ्यास शामिल हैं। एक और विशेषता यह है कि व्याकरण जितने स्पष्ट ढंग से इसमें समझाया गया है अन्य किसी पुस्तक में नहीं। इसमें व्याकरण के सम्बंध में वार्तालाप नहीं दिए गए हैं पहले व्याकरण समझाया गया है फिर उसको कैसे लिखा जाए उसका फ़ॉर्मूला दिया गया है फिर उदाहरण हैं और अंत में अभ्यास। इस पुस्तक को देखकर गणित की किताब की याद ज़रूर आएगी जिसमें पहले फ़ॉर्मूला दिया होता है फिर उसका प्रयोग, और अंत में अभ्यास। अभ्यास में पूछे गए सवाल के जबाव इसमें नहीं दिए गए हैं इसलिए कक्षा में और गृहकार्य के रूप में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

‘फ़ौज़िया फ़ारूक़ी’ और ‘जशुआ पियन’ की ‘प्रारंभिक हिंदी: एक सम्पूर्ण पाठ्यक्रम’ एक भारी-भरकम पुस्तक है जिसमें आठ इकाइयाँ हैं और हर इकाई का एक मुख्य विषय है जैसे ‘मैं और मेरा स्कूल’, ‘मेरा परिवार और मेरा घर’, ‘दिनचर्या’, ‘बाज़ार में’ इत्यादि। फिर इन विषयों के बारे में बातचीत करने के लिए जिन व्याकरणों और शब्दावलियों की ज़रूरत हो सकती है उनका विवरण दिया गया है। इसमें हर इकाई में पाँच से छह पाठ हैं जिसमें मुख्य विषय को विस्तार मिला है। इसके साथ ही हर इकाई के अंत में एक पुनरलोकन पाठ जोड़ा गया है जो आगे बढ़ने से पहले पूरी इकाई का एक दोहराव है।

यह हिंदी की शायद पहली पुस्तक है जिसके पृष्ठ रंगीन हैं और तस्वीरों के ज़रिए शब्दावली दिखाई गई है। इसमें व्याकरण ठीक-ठाक ढंग से समझाया गया है, और इसमें दी गईं गतिविधियाँ आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरूप हैं जिसमें बोलने, सुनने, लिखने का अभ्यास शामिल है। इस पुस्तक को भी मैंने कुछ समय तक अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया था। पुस्तक में व्याकरण का क्रम बहुत तर्कपूर्ण नहीं है जैसे ‘पूर्णकाल’ (परफ़ेक्टिव टेन्स) जिसका प्रयोग अतीत में किए गए कार्यों को बताने के लिए होता है उसे सैंतीसवें पाठ में स्थान मिला है। इस पुस्तक का मिलता-जुलता रूप उर्दू में भी है यह उन विश्वविद्यालयों के लिए बहुत उपयोगी है जहाँ हिंदी-उर्दू एक साथ पढ़ाई जाती है।

फिर ‘रिचर्ड डिलेसी’ और ‘सुधा जोशी’ की “एलिमेंटरी हिंदी” है जिसके साथ एक अभ्यास पुस्तिका भी है जो अलग से ख़रीदनी पड़ती है। इस पुस्तक से मैं पिछले पाँच सालों से हिंदी पढ़ा रही हूँ। इसमें भी व्याकरण से सम्बंधित वार्तालाप दिए गए हैं जो दीपक और कविता के कॉलेज की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें दिए गए ब्यौरे अब वक़्त के गर्द में पुराने पड़ने लगे हैं और कई बातों के साथ उसका समय भी बताया गया है जो अब उतना मज़ेदार नहीं लगता।

स्थानों के नाम जैसे ‘इलाहाबाद’ का बहुत इस्तेमाल हुआ है लेकिन अब उसका नाम भी बदलकर ‘प्रयागराज’ हो गया है। कभी-कभी इसमें आए संवाद बहुत रसहीन और उबाऊ लगने लगते हैं किंतु इस किताब के साथ जो अभ्यास-पुस्तिका है उसमें अच्छी अभ्यास की गतिविधियाँ हैं। मुश्किल वही है जो अन्य पुस्तकों के साथ है कि सब प्रश्नों के उत्तर किताब के अंत मिल जाते हैं।

ग़ौरतलब है कि हिंदी शिक्षण से जुड़े लोग विभिन्न अध्यापन सामग्रियों का उपयोग करते हैं। कुछ शिक्षक कोई पाठ्यपुस्तक नहीं इस्तेमाल करते। वे कुछ इस पुस्तक से कुछ उस पुस्तक से और कुछ ऑनलाइन सामग्रियों से मिला-जुला कर पढ़ाते हैं। मेरे विचार से यह पढ़ाने का बहुत अच्छा तरीक़ा नहीं है क्योंकि कभी-कभी विद्यार्थी को समझ नहीं आता कि कक्षा में क्या हो रहा है। एक पाठ्यपुस्तक होने से वे अपनेआप भी सीख सकते हैं। यूँ, कहा जा सकता है कि कोई एक सामग्री विदेशों में हिंदी शिक्षण के लिए पर्याप्त नहीं है। सदैव समसामायिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सामग्री जोड़नी ही पड़ती है जो तत्कालीन विद्यार्थियों की रुचियों के अनुसार हो।

प्रारंभिक अथवा माध्यमिक हिंदी सीखते हुए विद्यार्थी बहुत उत्साहित रहते हैं किंतु जैसे ही वे थोड़ा-बहुत पढ़ना, लिखना सीख लेते हैं उनके पढ़ने समझने लायक़ सामग्री का अभाव दिखाई देने लगता है। वे कुछ ऐसा पढ़ना चाहते हैं जो आसान हो और उनकी उम्र के अनुसार थोड़ा परिपक्व भी हो। विश्वविद्यालय के वातावरण में उन्हें अपने या अपने आसपास के वातावरण के बारे में तथा, समाज और संस्कृति के बारे में जानने और समझने की भी उत्सुकता बनी रहती है। वे भाषा में न केवल बातचीत करना बल्कि उसमें सुनना, पढ़ना और लिखना भी जानना चाहते हैं।

कठिनाई यह है कि इस प्राथमिक स्तर पर वे बहुत साधारण शब्दावली और व्याकरण ही समझ सकते हैं इसलिए हिंदी साहित्य पढ़ना उनके लिए कठिन होता है क्योंकि उसे समझने के लिए विद्यार्थियों को कुछ वर्षों का अनुभव अपेक्षित होता है। इस स्थिति में अक्सर शिक्षक व्याकरण की किताब से ही पढ़ाते हैं और उसी किताब के व्याकरण के अनुसार कुछ गतिविधियाँ करवाते हैं। ऐसा करवाना ठीक है क्योंकि इसके परिणाम साधारण होंगे लेकिन बहुत बढ़िया नहीं। ज़रूरी है कि शिक्षक इसके साथ-साथ नई तकनीकों के सहारे कुछ गतिविधियाँ भी करवाएँ।

कहा जा सकता है कि हिंदी लिपि सीखने के बाद जब विद्यार्थियों में थोड़ा-बहुत पढ़ने, लिखने और समझने की क्षमता आ जाती है तो इसी बीच की खाई को भरने के लिए शिक्षक स्वयं ही कुछ सामग्री तैयार करने लगते हैं जिनका सरोकार दैनिक आवश्यकताओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों से जुड़ा होता है।

‘कुसुम’ और ‘पीटर नैपसिक’ ने भी इसी तरह की सामग्रियों को इकट्ठा करके इसे पुस्तक की रूपरेखा दी, जिसे ‘रीडिंग हिंदी’ का नाम दिया है। अनेक पाठकों और समीक्षकों के सुझावों के बाद इसे पुस्तकाकार रूप में लाया गया। यह पुस्तक व्याकरण और शब्दावली की दृष्टि से आसान से मुश्किल की तरफ़ जा रही है सबसे पहले वर्तमान काल और उससे सम्बंधित अभ्यास हैं और उसके बाद भूतकाल फिर भविष्य काल। इसमें ब्लैक-एंड-वाइट चित्रों और कार्टून का भी प्रयोग किया गया है।

पाठ की शुरुआत होती है एक तस्वीर से और प्री-रीडिंग के दो सवालों से ताकि विद्यार्थी पाठ से सम्बंधित बातों पर अपने विचार प्रकट कर सकें और पाठ पढ़ने के लिए तैयार हो सकें। हर कहानी के अंत में कहानी में आए संस्कृति से सम्बंधित बातों को विस्तार से बताया गया है। हर पाठ में पाँच गतिविधियाँ हैं जिनमें लिखने की गतिविधियाँ हैं जैसे ग़लत-सही, घटनाओं को क्रम से लगाना, पाठ में आए प्रश्नों के उत्तर देना, बातचीत करने के कुछ सवाल, पोस्टर बनाना इत्यादि। इस रीडर में जिन विषयों को उठाया गया है उनमें पारिवारिक मुद्दे, दहेज प्रथा, ग़रीबी, शिक्षा, जाति-प्रथा आदि मुख्य हैं। इसमें व्याकरण की व्याख्या नहीं की गई है इसलिए इसका प्रयोग एक पूरक पुस्तिका के रूप में हो सकता है। यह पुस्तक विदेशी विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर लिखी गई है जिसकी भाषा आसान है किंतु विषय गम्भीर।

इसके अलावा कई शब्दकोश भी उपलब्ध हैं जिसमें ‘रूपर्ट स्नेल’ का शब्दकोश प्राथमिक कक्षा के लिए बहुत उपयोगी है। ख़ास बात यह है कि इसमें शब्द को कैसे इस्तेमाल करना है उसकी व्याख्या भी दी गई है जैसे “X का इंतज़ार करना”। कुछ लोकोक्तियाँ और मुहावरें भी इसमें सम्मलित हैं। फिर ‘आर एस मैकग्रेगर’ की हिंदी इंग्लिश डिक्शनरी भी माध्यमिक और प्रवर छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है। कुछ विद्यार्थी ऑनलाइन शब्दकोश पर निर्भर करते हैं क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध हैं, और समय के साथ-साथ बेहतर होते जा रहे हैं।

इसके बाद माध्यमिक पुस्तकों पर दृष्टिपात करें तो उनमें ‘नरेश शर्मा’ और ‘तेज भाटिया’ की “इंटरमीडीएट हिंदी रीडर” प्रमुख है। इसमें हर पाठ में अलग कहानियाँ अथवा आलेख हैं और ज़्यादातर प्रामाणिक सामग्री हिंदी साहित्य, समाचार-पत्र, लोक-कथाओं और कुछ पाठ बॉलीवुड फ़िल्मों के संवाद और समीक्षाओं से लिए गए हैं। इसमें पाठ में आए व्याकरण की व्याख्या की गई है और फिर कुछ सवाल दिए गए हैं। सवाल के जवाब भी अंत में दिए गए हैं।

‘शीला वर्मा’ की “माध्यमिक हिंदी पाठ्य-पुस्तक” काफ़ी सरल है और इसमें भिन्न-भिन्न आलेखों को स्थान दिया गया है। दो सहेलियों की बातचीत में खाना पकाने की विधि की जानकारी दी गई है और फिर त्यौहारों, लोक कथाओं, ‘मासूम’ फ़िल्म के संवाद, अकबर-बीरबल, पत्र-लेखन, समाचार-पत्र से लेकर केदारनाथ अग्रवाल की कविता “बसंती हवा” का समावेश किया गया है कुल मिलाकर यह पुस्तक अपनी ओर आकर्षित करती है इस पुस्तक की लिखावट काफ़ी बड़ी है जिससे दूसरे साल के विद्यार्थियों को पढ़ने में आसानी हो सके। इसमें भी पाठ में आए व्याकरण की व्याख्या दी गई है और कुछ सवाल दिए गए हैं। ‘शीला वर्मा’ की ‘उच्च हिंदी पाठ्यक्रम’ की पुस्तक भी उपलब्ध है जो विद्यार्थियों को भारतीय-साहित्य और संस्कृति से परिचित कराती है।   

यमुना काचरू और राजेश्वरी पंढरीपांडे की ‘माध्यमिक हिंदी’ पुस्तक में कथा-साहित्य, व्याकरण और लोकोक्तियों आदि का व्याख्यान है। इसमें पाठ छोटे और रोचक हैं। यह भी एक अच्छी रीडर है।

‘सोनिया तनेजा’ की प्राथमिक कक्षा के लिए ‘बेसिक हिंदी’ उन छात्रों के लिए काम की है जो विदेशी हैं या जिन्हें हिंदी का पूर्व ज्ञान नहीं है। इस पुस्तक में पहले कई पाठ हिंदी लिपि को समर्पित हैं फिर मुख्य रूप से व्याकरण को केंद्र में रखकर पाठ बनाए गए हैं। इसकी भाषा सरल है और विद्यार्थी स्वयं भी इससे आसानी से हिंदी सीख सकते हैं। ‘सोनिया तनेजा’ की माध्यमिक कक्षा के लिए ‘बेसिक हिंदी २’ पुस्तक भी है जो पहले साल के पाठ्यक्रम से तारतम्यता बनाते हुए लिखी गई है। इसमें पढ़ने, लिखने, बोलने और सुनने की कई गतिविधियों को सम्मलित किया गया है जैसे अनुवाद करना, ख़ाली स्थानों को भरना, फ़िल्मी गीतों को सुनना इत्यादि। इसमें कई तस्वीरों का इस्तेमाल भी किया गया है जो पाठ पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ाते हैं।     

इसके पश्चात ‘उषा जैन’ और ‘करीन स्कोमर’ की ‘इंटरमीडिएट हिंदी रीडर’ है जो शुरू होती है कुछ पत्रों और पौराणिक लोक-कथाओं से जो स्वयं लेखिका की क़लम से हैं विद्यार्थियों को ये लेख बहुत भाते हैं क्योंकि वे इनकी भाषा और व्याकरण समझ पाते हैं लेकिन बाद के पाठों में हिंदी साहित्य से कहानियाँ ली गई हैं जो विदेशी विद्यार्थियों के पल्ले नहीं पड़तीं। मात्र एक से डेढ़ साल तक हिंदी सीखकर कोई ‘यशपाल’ की कहानी ‘पहाड़ की स्मृति’ या ‘मोहन राकेश’ का यात्रावृतांत ‘आख़िरी चट्टान तक’ पढ़ ले तो अचरज की बात होगी। बहरहाल यह समस्या मेरी कक्षा में भी आई। मेरे विद्यार्थी विदेशी और नान-हेरिटेज थे उन्होंने कहा, “हमें हर वाक्य को समझने में कठिनाई हो रही है और इसलिए यह पढ़ना दिलचस्प नहीं लग रहा है। अगर कुछ और पढ़ें तो अच्छा होगा।”

ज़्यादातर माध्यमिक पुस्तक की समस्या यह है कि पहले साल से दूसरे साल की सामग्री का स्वरूप इतना अधिक बदल गया है कि संतुलित नहीं लगता। अधिकतर विदेशी विद्यार्थी इसके लिए तैयार नहीं हो पाते। उदाहरण के लिए यदि प्रथम वर्ष की पुस्तक के संवाद हैं (यह संवाद ‘रिचर्ड डिलेसी’ और ‘सुधा जोशी’ की ‘एलिमेंटरी हिंदी’ के आख़िरी पाठ, पृष्ठ संख्या 230 से लिया गया है)

“दीपक: कविता, तुम्हारा पहला इम्तहान कब है?
कविता: मेरा पहला इम्तहान परसों है। तुम्हारा पहला इम्तहान कब है?
दीपक: मेरा भी परसों है। कितने बजे?
कविता: ढाई बजे। क्या हम साथ-साथ चलें?
दीपक: ठीक है। अब मैं कुछ पढ़ाई करूँगा।”

अब माध्यमिक पुस्तक का एक नमूना देखिए। यह ‘उषा जैन’ और ‘करीन स्कोमर’ की पुस्तक के प्रथम पाठ से लिया गया है। पृष्ठ संख्या एक है। 

“भारत की संस्कृति बहुत पुरानी है। यह प्राचीन काल में कला, साहित्य, धर्म और विद्या का बड़ा केंद्र माना जाता था। पुराने समय से ही भारत के धन, वैभव और संस्कृति ने अनेक देशों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। पहले यहाँ यूनानी आए, फिर तुर्क और मुग़ल, और बाद में अँग्रेज़।”

इस आधार पर कहा जा सकता है जहाँ प्रथम वर्ष की पाठ्यपुस्तक में छोटे-छोटे वाक्य हैं और वाक्यों का दोहराव है और अधिकतर वार्तालाप स्टाइल में लिखा गया है और व्याकरण की दृष्टि से भी वाक्य-विन्यास सहज और सरल है वहीं माध्यमिक हिंदी के प्रथम पाठ में ही लम्बे-लम्बे वाक्य दिए गए हैं और शब्दावली भी काफ़ी कठिन है। ज़्यादातर मशहूर साहित्यकारों के लेख, निबंध, कहानी और कविता माध्यमिक पाठ्यपुस्तकों में लिए जाते हैं। मेरे विचार से विद्यार्थी भाषा के क्षेत्र में इतनी लम्बी छलाँग नहीं लगा पाते। इस कारण बहुत से विदेशी छात्र भयभीत हो जाते हैं और हिंदी की कक्षा को अलविदा कह देते हैं।

इसके बाद कुछ ऑनलाइन सामग्रियाँ भी हैं जो बहुत महत्वपूर्ण हैं जिसमें सबसे पहले मैं उल्लेख करना चाहूँगी ‘वर्चूअल हिंदी’ का, जो न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने बनाई है जिसमें बहुत से विषय लिए गए हैं और उन पर आधारित ‘लेसन-प्लान’ भी दिए गए हैं इसके बाद विस्तृत गतिविधियाँ भी दी गई हैं। ये बेहतरीन पाठ कोई भी शिक्षक इस्तेमाल कर सकता है इस साइट में सबसे अच्छी बात है कि यह अपडेट होती रहती है। इसमें कुछ भाषा की त्रुटियाँ अवश्य हैं लेकिन सामग्रियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं।

इसके बाद उन विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर एक साइट बनाई गई है जो चिकित्सक बनना चाहते हैं, इसका नाम है “स्वास्थ्य की भाषा” इसमें भारतीय आयुर्वेदिक, होमियोपैथिक, यूनानी आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। डॉक्टरों के साथ साक्षात्कार और मरीज़ों और डॉक्टरों के बीच होने वाली बातचीत, उनकी मरीज़ों को दी जाने वाली सलाह को वीडियो के द्वारा दिखाया गया है। इसमें वीडियो में आए मुश्किल शब्दों की शब्दावली भी दी गई है कुछ सवाल-जवाब भी दिए गए हैं। इस साइट में बहुत वर्षों से कोई अपडेट नहीं हुआ है।

“स्टारटॉक हिंदी ऑडियो-विज़ुअल प्रोजेक्ट” भी एक ऑनलाइन वेबसाइट है इसमें थीम पर आधारित वीडियो दिए गए हैं और हर इकाई में शब्दावली, वीडियो की बातचीत को हिंदी में लिखा गया है ताकि विद्यार्थी उसे पढ़कर और सुनकर समझ सकें। इसके साथ ही इसमें ‘लेसन-प्लान’ भी दिए गए हैं। यह वेबसाइट भी अध्यापकों के लिए उपयोगी है। 

इसके अतिरिक्त ‘अफ़रोज़ ताज’ की वेबसाइट “ए डोर इनटू हिंदी” नॉर्थ कैरोलाइना विश्वविद्यालय के प्रायोजन से बनायी गई थी इसमें शुरू के पाठ काफ़ी उपयोगी हैं। इसमें व्याकरण की व्याख्या भी दी गई है और भारत के अलग-अलग प्रांतों में जाकर फ़िल्माते हुए भाषा और संस्कृति सिखाने का प्रयत्न किया गया है। यह साइट उर्दू में भी है जो शिक्षक हिंदी-उर्दू एक साथ पढ़ाते हैं उनके लिए यह साइट ख़ासतौर से बहुत उपयोगी है।

सबसे महत्वपूर्ण ऑनलाइन वेबसाइट है यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस, ऑस्टिन की हिंदी-उर्दू फ़्लैगशिप की। इसमें शिक्षकों और विद्यार्थियों को बहुत काम की शिक्षण सामग्री मिल सकती है। जिसमें साहित्यकारों और फ़िल्मकारों के साक्षात्कार, पॉडकास्ट, पाठ्यपुस्तकें, वॉइसमेल इत्यादि दिए गए हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है अभी तक कोई भी पाठ्यपुस्तक सम्पूर्ण नहीं है किसी में कोई समस्या है किसी में कोई। लेकिन अनुभवी एवं कुशल शिक्षक इसे अपनी सूझबूझ और भिन्न-भिन्न उपलब्ध सामग्रियों की मदद से सम्पूर्ण बना सकते हैं। पाठ्यपुस्तक कोई भी हो लेकिन कम से कम एक पुस्तक पाठ्यक्रम में ज़रूरी है जिससे विद्यार्थियों को भाषा समझने में सुविधा हो सके। यू-ट्यूब पर उपलब्ध कार्यक्रम जैसे “सत्यमेव जयते” और ‘गुलज़ार’ के टीवी सीरीज़ पहले से ही अमेरिका में पढ़ाने हेतु उपयोग किए जाते रहे हैं जिनमें सामाजिक असमानता और न्याय के प्रश्न उठाए जाते हैं। इसी प्रकार शिक्षकों द्वारा बनाई गईं ऑनलाइन सामग्री भी बहुत काम की हो सकती हैं अगर इनको यथोचित अपडेट किया जाए और समय के साथ इसमें उचित बदलाव लाया जाए अन्यथा लिंक पर जाने पर अधिकतर यही सूचना मिलती है ‘यह पेज उपलब्ध नहीं है।’

संदर्भ ग्रंथ ग्रंथ

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  • Richard Delacy and Sudha Joshi, Elementary Hindi Workbook: An Introduction to the Language (Tuttle Publishing, 2014)
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Websites

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  • The University of Texas, Austin, 2020, Hindi Urdu Flagship: http://hindiurduflagship.org/
  • The University of Texas, Austin, 2020, The language of health: http://hindiurduflagship.org/resources/learning-teaching/language-for-health/
  • University of North Carolina at Chapel Hill, A door into Hindi: https://taj.oasis.unc.edu/lessons.html



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