माँ की ममता की पराकाष्ठा को सिद्ध करता उपन्यास: मातृ चेतना

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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पुस्तक- मातृ चेतना (उपन्यास)
ISBN- 81.89388.08.8
रचनाकार- डॉ. शोभा अग्रवाल
प्रकाशक- लव कुश प्रकाशन, लखनऊ-226006
पृष्ठ- 96
मूल्य- ₹ 300.00
प्रकाशन वर्ष- 2020
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हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में लेखनी चलाने वाली विदुषी, साहित्यकार डॉ शोभा अग्रवाल की सद्यः प्रकाशित पुस्तक "मातृ चेतना" एक ऐसा उपन्यास है जिसकी रचना जीवन के अनुभव और अनुभूतियों की गहनता के आधार पर  की गई है।
डॉ शोभा अग्रवाल ऐसी साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्य लेखन में बहुत से नये प्रयोग किए हैं और यही कारण है कि उनकी प्रत्येक पुस्तक एक विशिष्ठ पहचान बनाती है। उनके पास अनुभव और अनुभूतियों का अपार भण्डार है और उन्हें अभिव्यक्त करने की सशक्त क्षमता भी।
 कुल 67 पुस्तकों की रचयिता डॉ शोभा अग्रवाल का यद्यपि उपन्यास विधा में रचित "मातृ चेतना" पहला ही उपन्यास है किन्तु उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते इस बात का कहीं भी अहसास नहीं होता कि यह लेखिका का प्रथम उपन्यास है।
उपन्यास की मुख्य पात्र सुनीता है जो अपने प्रथम पुत्र के जन्म के कुछ दिन बाद ही वैधव्य को प्राप्त हो गई थी। पति की मृत्यु होते ही सास-ससुर ने सुनीता को यह कहकर कि तेरा पुत्र भाग्यहीन है, जन्म लेते ही अपने पिता को खा गया, जबरदस्ती उसके माता-पिता के साथ मायके भेज दिया। मायके में आये हुए अभी 28 दिन ही बीते थे कि एक दुर्घटना में सुनीता के पिता की भी मृत्यु हो गई। अब तो सुनीता की माँ भी विचलित हो उठी और उसने सुनीता को आर्थिक सहायता देने का आश्वासन देते हुए उसे अन्यत्र किराये के मकान में रहने पर मजबूर कर दिया।

उसकी बातें सुनकर एक माताजी ने, जो अपने मकान में अकेली ही रहती थीं, सुनीता को आश्रय दे दिया-
"सुनीता की कहानी सुनकर माता जी का मन द्रवित हो उठा। उन्होंने कहा-‘संयोगवश घटी घटनाओं को किस तरह अपशकुन का नाम दे दिया जाता है। आश्चर्य है कि पढ़े-लिखे लोग भी इस तरह सोच सकते हैं। खैर, जब तक तुम समायोजित नहीं हो जाती, मेरा पूरा सहयोग रहेगा। खाना तुम मेरे साथ खा लिया करो। तुम पढ़ी-लिखी हो, सरकारी नौकरी के लिए एप्लाई करती रहो, तब तक ट्यूशन पढ़ाओ। मैं आज ही मौहल्ले में चर्चा करूँगी। घर पर आकर बच्चे पढ़ लिया करेंगे।" (पृष्ठ-10)

सुनीता ने माता जी का सम्बल पाकर अपने आप को अपने पुत्र प्रणव के लालन-पालन और जीविका चलाने के लिए अध्यापन कार्य में व्यस्त कर लिया। प्रणव काफी मेधावी निकला और उसने सभी कक्षाएँ अच्छे अंकों सहित पास करते हुए बैंक में परिवीक्षाधीन अधिकारी की पोस्ट प्राप्त कर ली। माताजी अब अधिक वृद्ध हो गई। सुनीता और प्रणव ने उनकी खूब सेवा की। उन्होंने अपना मकान सुनीता के नाम लिखवानें के लिए कहा तो सुनीता ने माता जी से निवेदन किया कि यदि आप मकान को मुझे देना ही चाहती हैं तो मेरी प्रार्थना है कि इसे मेरे नाम न करके सीधे प्रणव के नाम ही करा दीजिए ताकि बार-बार नाम बदलवाने का झंझट न रहे। माता जी ने ऐसा ही किया-
"सुनीता ने कहा-‘माता जी आप मकान मुझे देना ही चाहती हैं तो प्रणव के नाम लिखिए ताकि बार-बार नाम न बदलना पड़े। माता जी को भी यह ठीक लगा।" (पृष्ठ-12)

प्रणव जब विवाह योग्य हो गया तो एक सुन्दर सी लड़की देखकर सुनीता ने रूमा के साथ प्रणव का विवाह भी कर दिया। प्रणव के दो बच्चे भी हो गये और वे स्कूल पढ़ने भी जाने लगे।

दिनेश पाठक ‘शशि’
सुनीता अब अस्वस्थ रहने लगी। डॉक्टर्स ने बताया कि इन्हें टी.बी. हो गई है लेकिन चिंता की बात नहीं है। आजकल नियमित इलाज से टी.बी. बिल्कुल ठीक हो जाती है।
रूमा ने सुना तो वह चिंतित हो उठी। उसने प्रणव से कहा कि माताजी को टी.वी. हो गई है और यह छूत का रोग है। ऐसा न हो कि घर में बच्चों को भी हो जाय। इसलिए आप माताजी को वृद्धाश्रम में रख आओ तो ठीक है-
"माता जी को किसी वृद्धाश्रम में रख दिया जाय। वहाँ संगी-साथियों में उनका मन भी लगा रहेगा और हमें संक्रमण का खतरा भी नहीं रहेगा।" (पृष्ठ-14)                                                                                                                       

प्रणव, रूमा को समझाने का प्रयास करता है किन्तु रूमा हठ करती है तो प्रणव एक दिन दफतर से लौटकर घुमाने के बहाने सुनीता को एक वृद्धाश्रम के गेट पर ले जाता है। गेट पर वृद्धाश्रम का बोर्ड लगा देखकर सुनीता भड़क उठती है और प्रणव को किसी पार्क में चलकर बैठने के लिए कहती है। पार्क की बैंच पर बैठकर सुनीता, प्रणव को बहुत डाँटती है और कहती है कि क्या हर माता-पिता अपनी सन्तान को इसीलिए पालते-पोसते हैं कि बड़े होकर सन्तान उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दे।
"सुनीता जी ने तेज आवाज में कहा-‘चुप रहो। तुम्हें किन मुसीबतों में पाला, तुम सोच भी नहीं सकते हो। और अब मेरी जरूरत भी क्या है? मकान भी तुम्हारे नाम करवा दिया है और मेरे सारे पैसों में भी तुम्हारा ज्वाइण्ट एकाउण्ट है।
मैं चाहूँ तो तुम्हारे ऊपर केस करके गुजारा भत्ता माँग सकती हूँ। लेकिन छोड़ो, मुझे अपनी कोख पर गर्व था, आज शर्म आ रही है। मैं जाऊंगी अवष्य वृद्धाश्रम में लेकिन तुम्हारे साथ नहीं, पुलिस के साथ जाऊंगी।
"पुलिस के साथ?" प्रणव घबराते हुए बोला।
घबराओ नहीं, तुम्हारी रिपोर्ट नहीं करूंगी। तुम्हारी रिपोर्ट करने का मतलब है अपनी रिपोर्ट करना। मेरे ही पालन-पोषण में कुछ न कुछ कमी रह गई होगी। तभी तूने ऐसा कदम उठाया है। मैं रूमा को दोष नहीं दे रही। अगर उसने कहा भी था तो तू मुझसे तो कह सकता था। खैर, अब तू जा और जीवन में फिर कभी मिलने का प्रयास मत करना। (पृष्ठ-15)

सुनीता, प्रणव की कार से उतरकर रिक्सा करके पुलिस स्टेशन पहुँचती है और पुलिस इंसपेक्टर को सारी बात बताकर कहती है कि उसे किसी वृद्धाश्रम में पहुँचवा दीजिए-

"जब बेटे-बहू की मानसिकता ऐसी हो जाए तो उस जगह को छोड़ देना ही बेहतर होता है। मैंने उसे भगा दिया व कहा कि मैं तेरे साथ नहीं बल्कि पुलिस के साथ वृद्धाश्रम जाऊंगी।"
"माताजी आज तो आप कह रही हो किन्तु कुछ दिन बाद आपका प्यार लड़के के लिए उमड़ेगा तब आप फिर उसी की तरफ मुँह करेंगी।"
"नहीं,ऐसा नहीं होगा।"
"लेकिन पुलिस कार्यालय के कागजों का पेट भरने के लिए आपको लड़के का नाम, पता तो बताना ही पड़ेगा।"
"ठीक है लेकिन मैं जहाँ पर रहूँगी उस जगह का पता उसे नहीं मालूम होना चाहिए।"
‘ठीक है, उस जगह का पता हम उसे नहीं बतायेंगे।"(पृष्ठ-18)

पुलिस इंसपेक्टर ने सुनीता जी की पूरी बात सुनकर, कागजी कार्यवाही करके उन्हें एक महिला सिपाही को साथ भेजकर एक वृद्धाश्रम में पहुँचवा दिया।
संचालिका के पूछे जाने पर कि आपका सामान कहाँ है?, सुनीता जी ने कहा कि वह अपने साथ कुछ भी नहीं लाई है। संयोग से वृद्धाश्रम की प्रबन्धन समिति में सुनीता जी की परिचित आशा जी मिल जाती हैं। वे एक-दूसरे को वहाँ देखकर आश्चर्य करती हैं। जब उन्हें पता चलता है कि सुनीता को उसके बेटे-बहू ने यहाँ भेज दिया है तो आशा जी को बहुत बुरा लगता है-
"आशा जी का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। वह बोलीं-‘आश्चर्य है मुझे। सुनीता जी ने किन मुसीबतों से अपने बेटे प्रणव को पाला था। जब वह एक महीने का था तब उसके पिता का देहान्त हो गया। ससुराल वालों ने उसे मायके भेज दिया। मायके जाने के कुछ दिन बाद ही सुनीता जी के पिताजी का भी देहान्त हो गया। मायके वालों ने भी बच्चा प्रणव को अपशकुनी मानकर सुनीता जी को नन्हे बच्चे के साथ घर से निकाल दिया।"(पृष्ठ-21)

वृद्धाश्रम की संचालिका, सुनीता जी को गेस्ट हाउस में ठहराकर, दूसरे दिन आशा जी को उनके साथ बाजार भेजकर कुछ जरूरी सामान मंगवा लेती है। सुनीता जी वृद्धाश्रम में अपने आप को बहुत असहज महसूस करती हैं । इस बीच प्रणव भी रोजाना दफ्तर से शाम को वृद्धाश्रम आ जाता है और रोते हुए अपनी भूल के लिए माफी मांगता है किन्तु सुनीता जी की खुद्दारी वापस घर जाने से रोकती रहती है।
वृद्धाश्रम में अक्सर ही बाहर से लोग कभी खाना बांटने आते हैं तो कभी कोई कम्बल बांटने आता है । कभी कोई और अन्य जरूरत की चीजें बांटने आता है। आश्रम की सभी महिलाएँ उन बाहरी लोगों से सामान लेने के लिए लाइन लगाकर खड़ी हो जाती हैं जिन्हें देख-देखकर सुनीता जी को बहुत संकोच होता है। वह किसी से भी कुछ नहीं लेना चाहती।
लेकिन वह अपने भविष्य को लेकर चिंतित अवश्य हो उठती हैं-

"सुनीता जी सोच में डूब जाती हैं। आगे क्या होगा उनका? कौन करेगा सेवा? इतनी चिंतित तो वह तब भी नहीं हुई थीं जब महीने भर के प्रणव को लेकर घर से आई थीं। उस समय न तो उनके पास पैसा था। न घर और न नौकरी। अगर माता जी का सहारा न मिला होता तो क्या होता? आज उनके पास सब कुछ है। अपना घर, अपना बेटा-बहू व बैंक बेलैंस। लेकिन.....?" (पृष्ठ-27)

एक दिन प्रणव अपनी माँ से मिलने वृद्धाश्रम आता है। गेटमैन से कहता है कि मुझे सुनीता माताजी से मिलना है तो चैकीदार पूछता है-
"कौन सी सुनीता माताजी से? जो पिछले सप्ताह आई हैं?"
‘हाँ जी।’
"आपका नाम क्या है?"
‘मैं उनका बेटा हूँ।’
ःःबेटा !" कहकर चैकीदार व्यंग्यात्मक हँसी हँसने लगा।
‘क्या हुआ?’-प्रणव ने कहा।
"कुछ नहीं साहब। जब माता जी को यहाँ पर भेज दिया तब कौन किसका बेटा, केवल अपना नाम बताइये।"(पृष्ठ-28)

पुत्र भले ही कुपुत्र हो जाय पर माँ, माँ ही होती है। यह बात पूरे उपन्यास में उभर कर सामने आई है। पुत्र को सामने देखकर सुनीता जी भूल गईं कि यही पुत्र एक सप्ताह पहले उसे इस वृद्धाश्रम में छोड़कर गया है। वह प्रणव से पूछती हैं-
" अभी तैंने कुछ खाया तो होगा नहीं? अभी नाश्ते का समय हो गया है। तुम्हारे नाश्ते के लिए भी बोल आऊं। कहकर वह उठकर कमरे के बाहर गई। जब वह लौटकर आईं तो उनके हाथ में प्लेट में आलू के पराठे थे।"(पृष्ठ-28)
प््राणव यह सुनकर हैरान रह जाता है कि यह पराठे किसी दानी के द्वारा दिए हुए हैं।
"जिस माँ ने अथक परिश्रम करके सदा दूसरों को दिया ही हो, आज वह दूसरों की दया पर आश्रित होकर दान का खाने पर मजबूर है।"(पृष्ठ-29)

सुनीता जी, प्रणव के सामने एक बहुत ही मर्मभेदी ज्वलंत प्रष्न रखती हैं, वह  पूछती हैं कि-

"बीमारी की अवस्था में बच्चे तो बूढ़े माँ-बाप को घर से बाहर करके अनाथालय में डाल दें किन्तु यहाँ पर उनकी सेवा जो करेंगे उनको बीमारी नहीं लगेगी क्या?""(पृष्ठ-29)

प्रणव जब बार-बार माँफी मांगते हुए सुनीता जी को घर वापस ले जाने के लिए कहने लगा तो सुनीता जी ने उससे प्रतिप्रश्न किया-

"प्रणव, एक बात बताओ, रूमा ने तुमसे कुछ भी कहा हो, तुम्हारी संवेदनाएँ कहाँ चली गई थीं? विपरीत परिस्थिति में भी मैंने तो तुम्हें अनाथालय में नहीं डाला था। आज जब मैं सर्वसमर्थ हूँ। मेरे पास जवान बेटा-बहू, प्यारे-प्यारे पोता-पोती हैं। पर्याप्त धन है। अपना घर है। तब अनाथालय में रहने को मजबूर हूँ। (पृष्ठ-30)

विद्वान लेखिका डॉ ष्शेभा अग्रवाल ने इस उपन्यास के माध्यम से वृद्धाश्रमों के अन्दर की मार्मिक बातों को भी बड़े ही सलीके से प्रस्तुत किया है-

"सुनीता जी, यहाँ पर जो भी आता है,दर्द का मारा ही होता है। हमारे-आपके जैसे लोग अपना खर्च तो उठा लेते हैं। कुछ बहनों के पास तो पैसा भी नहीं है। उनका सारा खर्च आश्रम ही उठाता है"-सुधा जी ने कहा।
"जहाँ तक हक की बात है, तब तक तो ठीक है किन्तु पहले तो माताएँ सोचती हैं कि बच्चे तो उनके अपने ही हैं, इसलिए वह अपने नाम पर धन-सम्पत्ति जमा नहीं करतीं हैं। सोचती कि क्या करना है अपने नाम पर पैसा जमा करके। रही बात बिजनेस में हिस्से व हक की तो सोचती हैं कि कौन करे यह सब। वैसे भी बुढ़ापे में कोर्ट-कचहरी वकील यह सब करना किसी के बस में नहीं होता है। (पृष्ठ-33)
इसके अलावा सीनियर सिटीजनों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं की महत्वपूर्ण जानकारी, हेल्पेज इंडिया और मानव अधिकारों आदि की जानकारी भी उपन्यास में बड़े ही सहज रूप से दे दी गई है।
एक दुखित माँ के हृदय की पीड़ा को भुक्तभोगी माँ ही जान सकती है। सुनीता जी की मुलाकात आश्रम में रह रही सुधा जी से हुई। सुधा जी ने अपनी जो पीड़ा व्यक्त की उसे सुनकर सुनीता जी द्रवित हो उठीं।
"सुधा जी, सुनीता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोलीं-‘बहन जी, मुझे आपकी परिस्थिति का पता नहीं किन्तु मेरी कहानी सुनोगी तो दांतों तले उंगली दबा लोगी।" कहते हुए वह भावुक हो उठी।
"जीवन भर बच्चों के लिए करती रही। अब लगता है कि सब बेकार किया। यदि बच्चे न होते तो इतना दुःख न होता। किसी का न होना उतना दुःखदायी नहीं होता है जितना होने पर अनहोना होना।
पति के गुजरने के बाद तेरहवीं वाले दिन से ही मेरे बँटवारे की बात शुरू हो गई।"
‘मकान तो आपके या आपके पति के ही नाम होगा न?’-सुनीता जी ने सुधा जी से पूछा।
"यही तो विडम्बना है कि हम लोगों ने मकान बनवाकर तीनों पोर्शन की रजिस्ट्री अलग-अलग तीनों बेटों के नाम करवा दी। हमें क्या करना था? हम लोगों को तो पेंशन मिल ही रही थी।" (पृष्ठ-36)

सुनीता जी सोचने लगीं कि उनके तो एक ही बेटा है। इनके एक नहीं तीन-तीन बेटे हैं। खुद का मकान भी है। पेंशन भी पा रही हैं। तब भी इन्हें यहाँ आना पड़ा।
कहाँ चली गई हमारी संस्कृति? हम किस संस्कृति की दुहाई देते हैं? भारत में तो मृतकों तक को तर्पण किया जाता है। हर वर्ष उसी तिथि में मृतक का श्राद्ध करके उनको याद किया जाता है। उसी देश में जीवित माता-पिता की यह दुर्गति! पुत्र-पुत्रियाँ घर में रखने तक को तैयार नहीं हैं। शास्त्रों में तो इन्हें जीवित देवता कहा गया है। (पृष्ठ-37)

 सुनीता जी के कमरे में बैठकर आशा जी सुनीताजी को समझाती हैं और घर लौट जाने की सलाह देती है। सुनीता जी बताती हैं कि घर पर तो केवल मेरी किताब और कपड़े ही हैं। बैंक के सभी सावधि जमा आदि में तो मैंने प्रणव के साथ ज्वाइण्ट एकाउण्ट कर दिया है। सुनकर आशा जी नाराज होती हैं और पूछती हैं कि तुमने ऐसा क्यों किया तो सुनीता जी एक माँ की ममता का सबूत देते हुए कहती हैं कि मेरे इस दुनिया से जाने के बाद प्रणव को खाता स्थानान्तरित करने आदि के झंझटों में न पड़ना पड़े, इसलिए।
"आशा जी झुंझलाते हुए बोलीं- तुम्हारा दिमाग खराब है। प्रणव को किसी झंझट में न पड़ना पड़े, ऊँह... और प्रणव आज क्या कर रहा है तुम्हारे लिए? मकान भी उसके नाम करवा दिया और सारे पैसे में भी ज्वाइण्ट एकाउण्ट।"(पृष्ठ-40)
उपन्यास में माँ की ममता की पराकाष्ठा को सिद्ध करते अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं -
"तुम्हारे जो एफ.डी. हैं, उनका व्याज तो तुम्हारे ही खाते में जाता होगा न?"
‘नहीं, प्रणव के वयस्क हो जाने के बाद ज्वाइण्ट एकाउण्ट के साथ ही मैंने व्याज उसी के बचत खाते में जाने का विकल्प दिया  था।’-सुनीता जी ने कहा। (पृष्ठ-53)

दादी जी को कई दिन तक जब घर में नहीं देखा तो सुनीता जी के पोता हरीश और पोती कनु ने खुसुर-पुसुर की। वे दोनों दादी जी से रोजाना कहानी सुनते थे। दादी जी उन्हें प्यार भी तो कितना करती हैं। पापा बोलो न दादी जी कहाँ पर हैं? बच्चों के प्रष्नों ने प्रणव को निरूत्तर कर दिया । तीर्थ यात्रा पर गई हैं कहकर उस समय किसी तरह बच्चों को सन्तुष्ट कर तो दिया, पर कब तक?
प्रणव के मुँह से बच्चों की बातें सुनकर सुनीता का मन द्रवित हो उठा। ‘उनके पोता-पोती के मन में अपने माता-पिता के प्रति गलत भावना न घर कर जाए’ सोचकर  उन्होंने शनिवार की सायं प्रणव के साथ एक दिन के लिए घर चलने का वायदा किया। घर पहुँचकर सुनीता ने बच्चों को बताया कि तीर्थ करने जिनके साथ गई थी, लौटने पर वहाँ एक वृद्धाश्रम देखा। वृद्धाश्रम के पुस्तकालय को चलाने वाली माताजी की तवियत खराब हो गई। मुझे पुस्तकें पढ़ने का कितना षौक है, तुम जानते हो इसलिए मैं उस पुस्तकालय का कार्यभार देख रही हूँ। पुस्तकें भी पढ़ती हूँ और अपनी उम्र की बहुत सी महिलाओं से बातचीत करके अच्छा भी लगता है।
माताजी ने बच्चों के सामने हम लोगों पर आरोप न लगाकर सारे इल्जाम अपने ही ऊपर ले लिए, सोचकर रूमा की आत्मा अपराधबोध से कराह उठी। प्रणव  व रूमा ने माताजी के कमरे में जाकर उनके पैर पकड़कर माफी मांगी और वापस वृद्धाश्रम न जाने के लिए कहा तो सुनीता ने अभी इस बात को स्वीकार नहीं किया।
वृद्धाश्रम पहुँचने पर सुधा जी व आषा जी आदि ने घर के हालचाल पूछे। आशा जी ने कहा कि सुनीता आज मैं तुमको एक बिना मांगी सलाह दे रही हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम अपने घर वापस चली जाओ। इसके कई कारण हैं-
"एक तो घर, घर ही होता है। यहाँ पर चाहे जितनी भी सुविधाएँ मिल जायें, अपनत्व की एक टीस सदा उठती रहती है। दूसरा, तुम बीच में घर गई तो प्रणव, रूमा और बच्चों सभी ने स्वागत किया। प्रणव के साथ-साथ रूमा को भी गलती का अहसास हुआ।
प्रणव तुम्हारे पास आता ही रहता है न। अबकी बार जब आये और घर चलने के लिए कहे तो मना मत करना।"
सुनीता जी ने मुस्कराते हुए दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका कर कहा-‘जो आज्ञा गुरुदेव।’
"और... इतवार के दिन प्रणव, प्रणव की पत्नी रूमा और बच्चे हरीश व कनु सभी लोग सुनीता जी के पास आये। सबके आग्रह पर सुनीता जी ससम्मान घर वापस चली गई।"(पृष्ठ-96)
इस प्रकार यह उपन्यास घरों में पुत्र-पुत्रवधू और बच्चों के द्वारा वृद्धजनों के प्रति किए जाने वाले उपेक्षाभाव से  बहुत ही बारीकी से अवगत कराते हुए आगे बढ़ता है। बीच-बीच में वृद्धाश्रम में रह रही अन्य महिला पात्रों की भी घटनाओं का भी सविस्तार मार्मिक वर्णन किया गया है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि नई जैनेरेशन  इस उपन्यास को एक बार पढ़ ले तो फिर अपने बुजुर्गो का अपमान और उपेक्षा करने की हिम्मत नहीं करेगा। यह कहना अतिशंयोक्ति पूर्ण नहीं होगा कि "रामचरित मानस की तरह ही इस उपन्यास को भी प्रत्येक घर के प्राणी यदि पढ़ें ंतो उनके अन्दर की संवेदना और इंसानियत का श्रोत सूखेगा नहीं"।
सहज,सरल भाषा-शैली में लिखा गया डॉ शोभा अग्रवाल का यह उपन्यास ‘मातृ चेतना’ मुद्रण की त्रुटियों से मुक्त है। पात्रों के मुख से निःसृत एक-एक वाक्य पाठक के दिल में उतरता जाता है।
पात्रों का चरित्र चित्रण जीवंत है। पात्र योजना तथा उनके पारस्परिक व्यवहार एवं सम्बन्धों को जिस बारीकी से गढ़ा गया है प्रशंसनीय है। उपन्यास का अन्त सुखान्त है।
लेखिका ने अपनी बात के अन्तर्गत कहा है कि "बुजुर्ग हो गये लोगों को महत्वहीन समझना हमारी भूल है। वह कुछ न भी करें तो भी उनके अन्तर से निकला हुआ आशीर्वाद ही हमारे लिए काफी है। जो बच्चा माँ का पल्लू पकड़कर पीछे-पीछे घूमता था वह इतना संवेदनशून्य कैसे हो जाता है कि उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देता है। इस उपन्यास को लिखने का उद्देश्य ही यह है कि लोगों की सहज संवेदनाएं उनके मन में स्थिर रहें। सर्वत्र मातृ देवो भव, पितृ देवो भव की ध्वनि गुंजायमान हो।"
उपन्यास पूर्णतः उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में गिना जा सकता है। डॉ शोभा अग्रवाल इसके लिए साधुवाद की पात्र हैं। पुस्तक का हिन्दी साहित्य जगत में स्वागत होगा ऐसी आशा है।

2 comments :

  1. वाह! 'मातृ चेतना' उपन्यास की लेखिका डॉ शोभा अग्रवाल ने एक उत्कृष्ट उपन्यास की रचना की है। उन्हें हार्दिक बधाई।
    इस उपन्यास की उत्कृष्ट समीक्षा हेतु साहित्य गौरव श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को कोटि-कोटि नमन।

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    1. शकुन्तला बहादुरJune 8, 2020 at 10:11 AM

      डॉ. शोभा अग्रवाल का उपन्यास “ मातृ-चेतना “ एक मार्गदर्शक एवं उत्साहवर्धक कृति है। युवा पीढ़ी की
      आँखों से स्वार्थपरता का आवरण हटाकर , उनको जीवन देने वाले और आत्मनिर्भर बनाने वाले माता-पिता की सेवा करने और कर्त्तव्य पालन करने का संदेश देने में लेखिका पूर्णत: सफल रही हैं। यह वृद्धजनों की समस्या का सम्मानजनक समाधान देता है। विद्वद्वर डॉ. दिनेश पाठक जी ने इस उत्कृष्ट उपन्यास की
      उत्तम समीक्षा हेतु लेखिका के साथ ही समीक्षक महोदय को भी अनेकशः साधुवाद!!


      प्रशंसनीय समीक्षा करने में रचना
      केसाथ पूरा न्याय किया है। उसके बाद कहने के लिये कुछ अवशेष नहीं रहता है। लेखिका के साथ ही
      समीक्षक महोदय को भी अनेकशः साधुवाद।

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