भारतीय रंग अस्मिता और आगरा बाज़ार

सुधांशु शर्मा

कुम्हारियाकांके; रांचीझारखंड
चलभाष: +91 887 754 1225
ईमेल: Sudhbharti@gmail.com


लेखक के अंतर्द्वंद्व से किसी कृति का जन्म होता है। अंतर्द्वंद्व सृजन प्रक्रिया में साधन का काम करता है। लेखक को हमेशा इस बात का आभास भी नहीं होता कि वह क्या रचने जा रहा है। कई महान रचनाओं से पहले उसके रचनाकारों को इस बात का इल्म ही नहीं था कि उनके द्वारा रचा जाने वाला साहित्य इतना महान होगा। यह अंतर्द्वंद्व है जो उसे साध्य तक स्वयं ही ले जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि अंतर्द्वंद्व जितना गहरा होगा, रचना अपने निष्कर्ष तक उसी तीव्रता से पहुँचेगी। आगरा बाज़ार नाटक भी उसी अंतर्द्वंद्व का परिणाम है। यह नाट्य लेखन का निकष है। यह अपने कलेवर में अद्वितीय है। कई भूली-बिसरी परंपरा को जीवंत करने वाली कृति है। इसके एक छोर पर शास्त्रीयता है तो दूसरे छोर पर भारत का लोक रंग। यह दोनों के मध्य ऐसे है मानो दोनों के बीच संबंध स्थापित करता हो। इसलिए दोनों पक्षों के लोग इसे नाटक मानना ही नहीं चाहते। यह नाटक वर्षों से बनी बनाई रीतियों को तोड़ता है। इस परम्परा पर ध्यान दिया जाए तो मात्र दो ही रचनाएँ दिखाई पड़ती हैं। भास का 'मृच्छकटिक' और भारतेन्दु का अंधेर नगरी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला नाटक है आगरा बाज़ार। दरअसल ये वे नाटक हैं जिनसे रंगमंच जनमंच में बदला था। आगरा बाज़ार का संबंध उसी सक्रियता से जिसने लोक और रंग में गहरा समन्वय स्थापित किया।

हबीब तनवीर ने संस्कृत नाटकों को आत्मसात किया था, पाश्चात्य नाट्य परम्परा को विधिवत सीखा था, और फिल्मों में भी काम किया था। बचपन से ही अभिनय के प्रति लगाव रहा व तभी से वह अभिनय  करते आ रहे थे। इन सबका लाभ उन्हें नाट्य परम्परा के गहरे अंतर्विरोध को समझने में मिला। उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण ने इसके लिए नए रास्ते तलाशने में जरा भी संकोच नहीं किया। पाश्चात्य नाट्य परम्परा में समय, स्थान और क्रिया व्यापार का महत्व है। संस्कृत नाट्य परम्परा में शब्दों को जितनी महत्ता प्राप्त है, वहीं लोक रंग परंपरा में क्रिया व्यापार का महत्व उसी प्रकार है। हबीब तनवीर के नाटकों में इन तीनों परम्परा से चीजें अपने सुविधानुसार लेते देखा जा सकता है। अगर उनका नाटक 'चरणदास चोर' देखा जाए तो उसमें शब्द की महत्ता और क्रिया व्यापार दोनों समाहित है। इस प्रसंग में हबीब तनवीर कहते हैं- "अगर उनमें आप और चीजों पर ग़ौर न भी करें सिर्फ कथानक पर ही जाएँ तो देश, काल और क्रिया की रुकावट के बिना कथानक चलता चला जाता है। मसलन मृच्छकटिकम में शोधन से कहा जाता है कि ज़रा पुष्करण्ड उद्यान में जाकर देखो किसी स्त्री की लाश पड़ी है या नहीं! वह वहीं घूमकर कहता है, 'हाँ, मैं वहाँ गया और मैंने देखा कि किसी स्त्री के कपड़े पड़े हैं', आपको कथा में इससे ज्यादा क्या चाहिए?"[i]

हबीब कथानक में किसी प्रकार का झोल नहीं चाहते थे। वह हमेशा से अपने साध्य के प्रति सचेत रहे। चाहे राडा छोड़ने की बात हो या अपनी भाषा मे नाटक करने का। रचनाशीलता में समझौतावादी रवैया नहीं अपनाया। इसलिए तो आगरा बाज़ार जब उन्होंने लिखा था तब तक किसी प्रकार का प्रशिक्षण भी नहीं लिया था। इस नाटक में नज़ीर अकबराबादी केंद्र में हैं लेकिन वह एक बार भी रंगमंच पर नहीं आते हैं। उन्होंने उनकी कुछ कविताओं को चुना और बारीक़ सी कथात्मकता के साथ नज़ीर का विवरण दिया। इस बात को कहते हुए हबीब कहते हैं “...और इस तरह अचानक मैं एक नए शिल्प तक पहुँच गया। मेरी शिराओं और धमनियों में यादें लगातार बहती रहती हैं और भीतर ही भीतर मुझे पुलकित करती रहती हैं।”[ii] यह अनायास लिखा नहीं गया था। इसके पीछे हबीब की लोक के प्रति गहरी आत्मीयता और लगाव प्रेरक का काम कर रही थी। उनको यह डर था कि भाषा के परिवर्तन से चरित्र और सांस्कृतिक लोकाचार में भी परिवर्तन आ सकता है, इसलिए उन्होंने राडा को अपने लिए प्रासंगिक ही नहीं समझा। उनको डर था एक अभिनेता के रूप में वह अस्वाभाविक और आडम्बरपूर्ण हो जाएंगे। जो उनके जैसे सच्चे साधक के लिए आत्महत्या की तरह था। दरअसल ये वही बातें हैं जिनसे आगरा बाज़ार जैसी कृति की रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है। जो बाज़ार अंकन करती है और उसमें इतनी स्वाभाविकता है कि मंच पर चल रहे बाज़ार में दर्शक खुद को शामिल पाता है। सम्पूर्ण रंग इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना दुष्कर है। शूद्रक के संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम के हिन्दी अनुवाद मिट्टी की गाड़ी में लोक रंगमंच की पारंपरिक शैली व तकनीकी  में लोककलाओं का प्रयोग किया। जिसके लिए उन्हें संस्कृत विद्वानों के विरोध का भी सामना करना क्योंकि उनका मानना था कि यह नाटक शास्त्रीय शैली में ही किया जाना चाहिए, लोकधर्मी शैली में नहीं।[iii]  स्वाभाविकता उनके शिल्प की बुनियाद ही है। नवीनता का मोह और सृजनात्मक होने की प्रवृति ने ही हबीब से कई दिलचस्प कार्य कराए। बकौल हबीब, “1954 में आगरा बाज़ार स्टेज किया। जामिया मिलिया के टीचर आदि भी उसमें शामिल हो गए थे आर्ट डिपार्टमेंट में पूरा मैदान और एक मंच था। स्टेज ढका हुआ था और बाकी मैदान जो था खुला था। उधर से गाँव वाले बकरी लेकर गुजरा करते थे, कभी-कभी नाटक देखने के लिए रुक जाते थे। मैंने उनसे कहा तुम लोग यहाँ बैठे देख रहे हो? तुम लोग बकरी लेकर मंच पर जाकर देखो, वे बकरी समेत वहाँ पहुँच गए। इस तरह गाँव के लोग बकरी जानवर लेकर शामिल हो गए थे।”[iv]
इस तरह आगरा बाज़ार अपने स्वाभाविक गति में आगे बढ़ता है। आगरा बाज़ार में सब कुछ है जो एक बाजार में हो सकता है। पान वाला है, ककड़ी वाला है। लोगों का समूह है। कहीं बतकही हो रही है तो कहीं किसी किस्से की चर्चा। भाषा का द्वंद्व भी है। हिंदी उर्दू की कहानी भी है। नज़ीर ऐसे कवि थे जिन्होंने रोटी पर लिखा, ककड़ी पर लिखा। वह सब कुछ है इस नाटक में। नज़ीर की ये पंक्तियाँ कितनी सार्थक है जो उस  बाज़ार और नाटक में अपनी पूरी सम्पूर्णता से आता है-
       कपड़े किसी के लाल हैं, रोटी के वास्ते
       लम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्ते
       क्या क्या न करम कराती हैं रोटियाँ
      अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ...
भूख, रोटी, ककड़ी आदि स्वाभाविक जीवन की सामूहिक चेतना ही हैं। जिसे एक समय नज़ीर ने समझा था, अब हबीब समझ रहे थे। आगरा बाज़ार अपने कलेवर में अनूठा तो है ही तत्कालीन परिस्थितियों की प्रासंगिकता जिस तरह यह नाटक ओढ़ कर आता है, वह अद्वितीय है। आगरा बाज़ार उस इंसानियत की कहानी है जो गांवों की मिट्टी में समायी थी लेकिन शहरी जीवन के सूनेपन में धुंधली होती जा रही थी। नज़ीर को कथानक में रखने का कारण भी वही कारण रहा होगा। इस प्रसंग में आगरा बाजार की भूमिका में हबीब कहते हैं, "... उसकी नज़्मों के आहंग में रजाईयत और अफ़ादियत की गूंज सुनाई दी और मैं इस ख़्याल से फड़क गया कि नज़ीर की आवाज हर शायर से अलग है, मगर इंसानियत की आवाज़ है और ये हमगिरी किसी को नसीब नहीं हुई।"[v]

नज़ीर एक जनकवि थे। जिन्होंने रोटी और ककड़ी के साथ फूल-पौधों, परिंदों पर भी लिखा। नज़ीर के पास सभी हैं - चम्पा, गुलाब, चमेली, बेला और गिलहरी, कबूतर, तोता भी। वह इतना सहज शायर है कि ककड़ीवाला खीरा पर लिखने बोले और वह लिख कर दे दे। नज़ीर लोकचेतना का रचनाकार है। इसलिए वह  इंसानियत का शायर भी  है। आदमीनामा में नज़ीर ने कहा-
याँ आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन कर जो दौड़ता है सो है वह भी आदमी।

नज़ीर उसी आदमी का शायर है और हबीब भी उसी आदमी की खोज में हैं। आदमी ही सभी का विषय है। वह साध्य भी है, साधन भी है। आगरा बाज़ार में हमजोली कहता है, “ज़माने को दरअसल मुजाहिद की नहीं मौलाना, बल्कि इंसान की ज़रूरत है। इंसान कहीं नज़र नहीं आता।”[vi] वहीं पतंगवाला कहता है- “मियाँ नज़ीर की निगाह में आदमी-आदमी में कोई फर्क नहीं। वह पतंग बनाने वाला हो, चाहे किताब बेचने वाला उनके लिए तो बस आदमी है।” [vii]
 चना और चूरन की अभिव्यक्ति, ककड़ीवाले और खीरावाले के जेहन में आदमी ही है। उसी चेतना से भारतेन्दु अंधेर नगरीरचते हैं और हबीब आगरा बाज़ार। हबीब ने सम्पूर्ण बाज़ार को नाटक में बसा दिया है। यह बाज़ार नज़्मों से चलता है। इस बाज़ार में मीर, ग़ालिब की बात होती है। इस बाजार में बात-बात पर लड़ाई होती है, लेकिन मनाने में भी कोई पीछे नहीं हैं। यह एक तरह बाज़ार की झांकी है, जीवन की झांकी है। कहानी की शुरुआत आवाम की बेरोजगारी से शुरू होती है। फ़क़ीर गाता है -"है अब तो कुछ सुखन का मेरे कारोबार बंद, तबअ सोच में लैलो निहार बन्द" फिर लड्डू वाले कि आवाज़ आती है - "धेले के छह छह बाबूजी, धेले के छह छह बाबूजी हमसे मंदा कोई न बेचे।" इस नाटक में कहानी उस रूप में नहीं मिलेगा जैसा दूसरे नाटकों में मिलता है। इस बाज़ार में कोई नायक नहीं है, बल्कि बाजार ही नायक है।
आगरा बाज़ार उस समय की रचना है जब भारत के शीर्ष शासन व्यवस्था में युगान्तरकारी बदलाव हो रहा था। स्वराज की आस में आम जनता ने सबसे पहले रोटी की मांग की। मूलभूत जरूरत आज भी आम जनता की पहली प्राथमिकता थी। यह भी उल्लेखनीय है कि जिस समय इस नाटक को लिखा जा रहा था तब इस देश मे भाषाई प्रान्तों की मांग का आंदोलन चल रहा था। भाषा की लड़ाई अस्मिता में बदल चुकी थी। भाषाई वर्चस्व की वैसे तो प्रारंभ से ही एक क्षीण लड़ाई चली आ रही थी। जब आम जन की भाषा हिंदुस्तानी थी और राजकाज की भाषा फ़ारसी। इस बात को नज़ीर के समय भी महसूस किया जा सकता है। उस समय भी गौरवशाली मुगलशासन अपने ढलान पर थी। सत्ता में परिवर्तन से आम जनता की आवश्यकताओं में कितना कम बदलाव आता है इसे नाटक में आये विषय और नाटक के रचनाकाल की सामयिकता से समझा जा सकता है। ठीक इसको 'अंधेर नगरी' के समय काल से तुलना करें तो आम जनता की समस्या ज्यों की त्यों दिखेगी। प्रश्न यह नहीं है कि जन-सामान्य की समस्याएँ क्या थी। प्रश्न यह है कि जन-सामान्य कब केंद्र में रहा। बात नज़ीर की हो, अंधेर नगरी की या आगरा बाज़ार तीनों ही उस जन-सामान्य की बात करते हैं। उसकी समस्याओं को सीधे सामने लाते हैं। उनकी समस्या में कहीं कोई खिचड़ी नहीं है, बल्कि वह स्पष्ट है। ककड़ीवाले की बात कहाँ कही गयी है? इतनी स्वाभाविकता कहीं और न मिलेगी।

रचना अपने युग से बेहद प्रभावित होती है। उसमें उतनी ही तीक्ष्णता आती है जब रचनाकार का युगबोध उतना ही बहुआयामी होता है। हबीब के युगबोध का आगरा बाज़ारप्रतिनिधित्व करता है। उस समय की वो बात जो आम जनता के बीच घट रही था, इस नाटक में मिल जाएगी। इस नाटक की प्रासंगिकता नज़ीर के समयकाल से भी जुड़ी है और अपने रचनाकाल से भी, या यों कहें कि आज भी यह अपनी प्रासंगिकता में चरम पर है क्योंकि आज भी रोटी आम जनता की पहली मांग है। शासन में कई बदलाव आए लेकिन आम लोगों के जीवन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। नाट्य आलोचक इकबाल नियाजी का मानना है कि “आगरा बाजार जैसे नाटक प्रस्तुति ने हिदुस्तानी नाटककारों के सामने ये मिसाल पेश की, कि किस तरह यथार्थवादी ढांचों को पसंद करके पश्चिमी और पूर्वी रिवाजों से जुड़कर एक नए तरह की तर्ज पर ड्रामों को प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसमें लोक नाटक के फार्म को और उसके असर को जान-बूझकर ठूँसा नहीं गया है। फिर भी डायलाग से लोक नाटक की अदाकारी व कारीगरी के रंग फूटते हुए महसूस होते हैं।”[viii]    
बहरहाल 'आगरा बाज़ार' नाटक अपने कथ्य और शिल्प दोनों में हिंदी नाटक की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। हबीब ने जो मुहावरा रचा उसको आज भी लोग समझने की कोशिश में लगे हैं। यह कोई बनी बनाई परम्परा तो थी नहीं कि आसानी से लोग इसे स्वीकार कर लेते। इसे समझने के लिए किताबों में जाना नहीं पड़ेगा और न ही किसी संस्थान में रहकर इसे सीखा जा सकता है। इसे समझने के लिए लोगों के बीच लोक में जाना होगा। ज़मीन से जुड़े लोगों से मिलना होगा। तभी इसकी स्वाभाविकता समझ आएगी व उसकी मारक क्षमता को समझ पाएंगे। कोई भी रचना अपने रचे जाने पर पूर्ण तो हो जाती है। लेकिन सार्थकता उसके पाठक तय करते हैं। नाटक की सार्थकता उसे मंच से प्राप्त होती है। इस पैमाने पर आगरा बाज़ार का कोई सानी नहीं है। आप कल्पना कर सकते कि दर्शकों के बीच से कोई टोली गाने गाते हुए निकले और मंच पर जाए, दर्शकों के रोमांच को बस वहीं रहकर महसूस किया जा सकता है। हबीब का रंगमंच आधुनिक रंगमंच था। ऐतिहासिक, राजनीतिक समझ के साथ ही लोककथाओं, शायरी, संगीत में रुचि रखने वाला, लोकरंग का नया मुहावरा स्थापित करने वाले नाटककार का अर्थपूर्ण नाटक रहा आगरा बाजार 

संदर्भ ग्रंथ सूची



[i] गुन्देजा,संगीता. नाट्य दर्शन. नई दिल्ली.वाणी प्रकाशन. पृ.सं. 88
[ii] अग्रवाल, महावीर प्रसाद. हबीब तनवीर का रंग संसार. दुर्ग छत्तीसगढ़ : श्री प्रकाशन. पृ.सं. 314
[iii] खान, ज़ाहिद. एक लोकधर्मी आधुनिक. नटरंग.86-87 (2010 जुलाई-दिसंबर). पृ.सं. 58  
[iv] अग्रवाल, महावीर प्रसाद. हबीब तनवीर का रंग संसार. दुर्ग छत्तीसगढ़ : श्री प्रकाशन. पृ.सं. 315
[v] तनवीर हबीब, आगरा बाजार. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन.             
[vi] वहीं, पृ. सं. 64   
[vii] तनवीर हबीब, आगरा बाजार. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन.पृ.सं. 101     
[viii] खान, ज़ाहिद. एक लोकधर्मी आधुनिक. नटरंग.86-87 (2010 जुलाई-दिसंबर). पृ.सं.54

1 comment :

  1. बढ़िया लिखा है। न केवल 'आगरा बाज़ार' और हबीब तनवीर की विशेषताएँ सामने आई हैं, बल्कि उस चिंता को भी पकड़ा गया है, जिससे गुजर कर ऐसी रचना संभव हो पाती है।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।