लोकगीत, लोकोक्ति, मिथक और कटु यथार्थ: एक अनुभव

चंद्र मोहन भण्डारी
घुघूती बासूती 
के खाले, दूध-भाती?

उत्तराखंड के सभी अंचलों, खासकर कुमाऊँ अंचल में शायद ही कोई होगा जो इन पंक्तियों का स्वाद न ले चुका हो, कभी शिशु के रूप में और कभी माता, पिता या किसी सयाने के रूप में जो बच्चे को घुटनों का झुलना झुलाते हुए उसे सुलाने की कोशिश करता है गीत की इस पंक्ति को दोहराते हुए। अधिकतर लोरी की तरह प्रयुक्त इस लोकोक्ति या लोकगीत के कई संस्करण हैं; किसी अन्य संस्करण में एक नव-विवाहिता दूर ससुराल में रहते मायके की याद करती है: घूर घुघूती घूर घूर, मैत मेरो दूर। पर सबसे अधिक प्रचलित संस्करण वही है लोरी के रूप में पैरों का झुलना झुलाते बच्चे को सुलाने का प्रयास। इस संदर्भ में कुछ अच्छे ब्लाग [1] भी देखने को मिलते हैं। जब फिल्मों मे भी लोरी का प्रचलन हुआ तब वह प्यारा सा गीत सुनने को मिला: चंदन का पलना, रेशम की डोरी, झुलना झुलाऊँ मैं निदिया को तेरी। संदर्भ वही है अनुभूति भी वही, क्या फर्क पड़ता है पलना घुटनों का हो या चंदन का। वैसे गौर करें तो फर्क है भी, जो अनूभूति  पहले  से मिल सकती है  वह दूसरा दे ही नहीं सकता। पहले जब जीवन सरल था और प्रौद्योगिकी का प्रवेश सीमित था लोकगीत और लोक कथाएँ जीवन से अंतरंग रूप में जुड़ी थीं और जीवन की गहन अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने में न केवल सक्षम थीं अपितु भविष्य के कठिन दौरों में एक मरहम की तरह भी काम करतीं थीं। मुझे लगता है मरहम के अलावा इन अनुभूतियों के प्रभाव की तुलना एक हिमनद यानि ग्लेशियर से की जा सकती है जो गर्मी बढ़ने पर धीरे-धीरे पिघलता है और जीवनदायी तरल तब हमें उपलब्ध कराता है जब उसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो। सब मिलाकर यह कहना होगा कि घुघूती पर्वतीय कूर्मांचल की एक चिड़िया है, जो लोकोक्ति के अनुसार पिछले जन्म में एक कन्या थी जिसके साथ एक कथा [1] जुड़ी है, जो कई लोरियों व लोकोक्तियों का आरम्भ बिंदु है। वह किसी के लिये एक सखा है दु:ख-सुख बांटने को; सबसे अधिक वह एक मिथक जैसा है जो उस क्षेत्र में लोगों को अचेतन की गहराइयों तक स्पर्श कर सकता था इस तरह के अनुभव हर अंचल के लोगों के जीवन से अंतरंग रूप में जुड़ते आये हैं। कई अंचलों में कागा एवं पपीहा गहन अनुभुतियों की अभिव्यक्ति से जुड़ते रहे हैं।  आज यह सब बदल रहा है जब हर तरह की सुविधा है पर वह अंतरंग पल नहीं हैं जो संभवत: आज की अनेक विकृतियों, तनावों एवं उलझनों के मूल में हैं।   

बचपन में घुघुती की आवाज सुनी थी विशेषकर बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में। इसे पर्वतीय अंचल की कोयल कहूँ तो अन्योक्ति न होगी। दोनों की आवाज एक जैसी नहीं फिर भी मिठास दोनों में है। शायद घुघूती की आवाज में एक दर्द भी है। मेरा अनुमान है कि बासूती शब्द बोलने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है वैसे ही जैसे कोयल की कुहुक। जब एक लम्बे अंतराल के बाद पर्वतीय अंचल का भ्रमण किया तब नहीं सुनाई दी वह मधुर आवाज। घुघूती ही क्यों अब तो वह जानी-पहचानी  गौरैया भी कम ही दिखाई देती है। सर्वत्र विद्यमान कागा भी अब कम ही दिखाई देता है। याद आता है काले कव्वा नाम का वह बाल-त्योहार जो मकर-संक्रांति के ठीक अगले दिन मनाया जाता था जब बच्चे कागा को आमंत्रित करते गले में माला से लटकी खाद्य सामग्री का प्रलोभन देते। यह परम्परा जो सदियों से चली आयी थी अब उस अंचल में भी विलुप्तप्राय ही है।

विकास के साथ बहुत कुछ खोते जा रहे हैं हम और एक अजीब ऊहापोह में है इंसान कि कैसे विकास के साथ पारम्परिक जीवन की अच्छाइयों को भी लेकर चला जा सके। परिवर्तन तो होना ही है पर उसकी दशा और दिशा निर्धारण में हमारी कोई सार्थक भूमिका हो सकती है यह सवाल मैं अक्सर खुद से पूछता रहता हूँ। तब मेरे मन अभ्यंतर में एक घुघूती बोल उठती है धीमी आवाज में, और कुछ कह जाती है,  कवि जयशंकर प्रसाद [2] की इन पंक्तियों की तरह जहाँ संदर्भ दूसरा है।  कविता में यही विशेषता होती है कि शब्द बहुअर्थी हो सकते हैं और किसी विशेष संदर्भ में कही गई बात अन्यत्र भी सार्थक जान पड़ती है।
इतना न चमत्कृत हो बाले*
अपने मन का उपकार करो
मैं एक पकड़ हूँ जो कहती
ठहरो कुछ सोच विचार करो।
(बाले के स्थान पर मानव)

सोच-विचार हो रहा है खूब हो रहा है लेख लिखे जाते हैं गोष्ठियाँ आयोजित होती हैं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की भरमार है हर जगह, पर जमीनी हकीकत में कोई खास फर्क नहीं दीख रहा। बात आखिर है क्या? मैंने फिर अंदर का रुख किया और प्रयास किया कि कुछ गहन सोच-विचार कर बात की तह तक पहुच सकूं। मुझे लगा मेरी बातों का आंशिक उत्तर ऊपर कही गई बातों में ही छिपा है खोजने की कोशिश तो करो। सोचा घुघूती से ही पूछूँ, पर वह बेचारी क्या बता पायेगी जो स्वयं अपने अस्तित्वजनित संकट से जूझ रही है। वही क्या अन्य पक्षी भी बेहाल हैं औद्योगीकरण जनित विकास के इस काल में। इनमें चील और गिद्ध जैसे सबल पक्षी भी हैं जो प्रदूषण की वजह से विलुप्त होते जा रहे हैं।

लोरियों का जिक्र हुआ था पहले की पंक्तियों में जिनमें दो पलनों का जिक्र किया गया- चंदन का पलना और घुटनों का। चंदन का पलना हर एक को नसीब नहीं हो सकता जबकि दूसरा हर एक को नसीब होता आया है सदियों से; मुझे लगा कि घुघूती वाली लोरी और उसका क्रियान्वयन किसी प्रौद्योगिकी की दरकार नहीं रखता, आर्थिक सम्पन्नता की भी नहीं। किसी को कहीं भी उपलब्ध है होता रहा है और अगर चाहें तो भविष्य में भी हो सकता है। और इसमें आत्मीय का जो स्पर्श सुख है वह भी बोनस की तरह मिलता रहता है। आधुनिकीकरण के साथ हमारी  सोच भी बदली है जब हम बहुत कुछ उपयोगी और सार्थक बातों को पुराना कहकर छोड़ देते हैं। सोचता हूँ क्या इसी संदर्भ को जीवन के अन्य मसलों पर लागू नहीं किया जा सकता? क्या विकास का अर्थ केवल मानव के संदर्भ में ही लिया जाना चाहिये? क्या मात्र नया या आधुनिक होना विकास की आवश्यक शर्त है? क्या विकास का सही अर्थ हम समझ रहे हैं? सवालों के हुजूम हैं और उत्तर नदारद।

धरती पर जीवन का विकास हुआ जिसमें वनस्पतियाँ और करोड़ों प्रकार के जीव विकसित हुए। यह जैविक-विकास-कथा का सार है। अब बात आती है मानव-जीव के तथाकथित सांस्कृतिक विकास की। मानव की विकास-गाथा आज जिस मोड़ पर है वह धरती पर मानव के एकाधिकार और उसकी उपभोगी संस्कृति के विकास की गाथा मात्र बनती जा रही है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि धरती एवं उसके पर्यावरण के साथ संतुलन बनाये रखते हुए आगे की यात्रा तय की जाय? सब हो सकता है पर करेगा कौन? बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?

मेरे मन की घुघूती बार-बार प्रतीकों में इसी ओर इशारा करती रही है: प्रौद्योगिकी जरूरी है जितनी आवश्यक हो, पर इतना न चमत्कृत होवें उससे कि वह एक नशा बनकर रह जाय। मन का उपकार एवं उपचार दोनों की जरूरत अधिक है क्योंकि वही समस्या के मूल में है। महात्मा गांधी का कथन, कि प्रकृति में हमारी जरूरत के लिये पर्याप्त है पर हमारी लालसा के लिये नहीं, एक इशारा है दिनोंदिन बढ रही उपभोक्ता-संस्कृति की तरफ, और जाने-अनजाने बढ़ती जाती पर्यावरणीय समस्याओं की। ऐसा नहीं कि हम बेखबर हैं इन सब बातों से। इन बातों पर सोच-विचार होता जाता है और प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जाता है। वह परिवेश, वह वातावरण जो मेरे बाल्यकाल तक पर्वतीय अंचल में दीखता था आज वहाँ भी क्षतिग्रस्त लगता है और हो भी क्यों न; बढ़ती आबादी, बढ़ती जरूरतें, बढ़ती प्रतियोगिता, बढ़ता तनाव और इन सबसे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक दबाव। आज के विश्वव्यापी संक्रमण को ही लेलें, कितना कुछ बदल गया है कुछ ही महीनों के अंतराल में। इस संक्रमण-काल में तो रिश्ते भी बदलते दिखाई दिये। हर कोई हर किसी के लिये खतरा है जिससे बचते रहना है बस जिंदा रहना जरूरी है किसी भी कीमत पर। शायद यह भी सांस्कृतिक-विकास-यात्रा का एक पड़ाव है।

लेकिन वह जो हिमालय है सामने बिनसर में खड़ा मैं देख रहा वैसा ही दिखता है जैसा बचपन में दिखा करता था। इस धरा के पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण है इसकी भूमिका। इसीके हिमनदों से सिंचित ये नदियाँ हमारे जीवन एवं संस्कृति के मूल को सिंचित करती रही हैं हजारों सालों से। कवि प्रसाद के ही शब्दों में:
अम्बर-चुम्बी हिम-श्रंगों से
कलरव-कोलाहल साथ लिये
विद्युत की प्राणमयी धारा
बहती जिनमें उन्माद लिये।

वह प्राणमयी धारा अब क्षीण हो चुकी। आज कोसी के किनारे खड़ा देख रहा था कि किस तरह क्षीण हो गई है। यह नदी तो वैसे भी हिमनदों से सिंचित नहीं पर जो हिमनदों से अवतरित हैं वे भी बेहाल हैं। हिमरेखाएँ सिकुड़ती जाती हैं वैश्विक तापवृद्धि के कारण जो इंसान की करतूतों का प्रतिफल है। बात सिर्फ अनियंत्रित विकास की ही नहीं, बात इसके आगे की भी है। बात दरअसल मानव की आकांक्षाओं, कुंठाओं, विकृतियों और लालसाओं की है जिसे हम महाभारत के हर पात्र में देखते आये हैं और जिसके अंश हममें से हर एक में उपस्थित हैं अलग-अलग रूपों, अनुपातों एवं परिमाणों में।

आज बिनसर से हिमालय दर्शन करते सोच रहा हूँ आज भी उतना ही सुंदर, आकर्षक और भव्य लगता है पर सुलग रहा है अंदर ही अंदर। पड़ोसी देश की बढ़ती महत्वाकांक्षा और विस्तारवादी नीति ने तिब्बत तक की विजय से उसे संतुष्ट नहीं किया अब वह सारे हिमालय को रणभूमि मे तब्दील करने के प्रयास में है। बात सिर्फ पारम्परिक रणभूमि की हो तब भी वह कुछ समय के लिये स्वीकार्य मानी जा सकती है पर जो आज उस देश की नीति है वह माउंट एवरेस्ट तक अपनी माइक्रोवेव टावर लगा रहा, सडकें बना रहा नदियों का रुख मोडने के प्रयास कर रहा है। यानि हिमालय जैसी विराट गिरि-श्रंखला का पर्यावरण खतरे में है और  जिसका सबसे अधिक असर हमारे देश में ही होना है। चीन की नीतिगत समस्याओं से भी ज्यादा हानिकर है मानव-प्रवृत्ति या इंसानी फितरत, जो इन सबके लिये जिम्मेदार है। आज हर चीज के बाजारीकरण और व्यवसायीकरण की प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है। हममें से बहुतों ने कुछ समय पहले प्रकाशित वह फोटो जरूर देखा होगा जिसमें माउंट एवरेस्ट पर जाने वालों की लम्बी लाइन लगी थी क्योंकि शिखर पर एक बार में कुछ लोग ही जा सकते थे और शिखर से कुछ नीचे दर्जनों लोग अपनी बारी के इंतजार में खड़े थे। यह भी एक बिजनेस सा बन गया है जिसमें कुछ प्रशिक्षित पर्वतारोही आर्थिक रूप से सम्पन्न उत्साही युवाओं को सामान्य प्रशिक्षण के बाद ऐसे अभियानों पर ले जाते हैं। इस तरह के अभियान आने वाले समय में पर्यावरण के लिये हानिकारक गतिविधियों में अग्रणी हो सकते हैं।

घूघूती फिर बोल उठी- ठहरो, कुछ सोच-विचार करो।

हमें पग-पग पर साथ देती हमारे अंतर्मन की आवाज ही घुघूती है कभी वह चिड़िया रूप में सामने आती है कभी एक सहयोगी के रूप में जिससे नव-विवाहिता मायके की याद का दुख बांट दिल हलका कर लेती है या बच्चे घुटनों का झूला झूलते दूध-भाती का स्वाद लेते हैं पर मेरे जैसे बहुतों के लिये वो इसके भी आगे है एक अंतर्मन की आवाज जिसकी उड़ान हमारे विचार-प्रवाह के साथ चलती है। वह विचार-प्रवाह को गति देती है और दिशा भी, जिसमें आधुनिक एवं पारम्परिक अनुभूतियों को एक साथ लेकर बढ़ सकें। ‘ठहरो, कुछ सोच-विचार करो’, विकास एवं प्रकृति के संतुलन को साथ लेकर चलने की बात करो। यही एक साथ लेकर चलने की बात वह कहती है।

गौर करें तो लगता है हमारी सांस्कृतिक विकास कथा इसी सोच-विचार की कथा है उसका ही अनिवार्य निष्कर्ष है। और वह जो इकाई हमें सोच-विचार में सहायता करती है इंसान का मस्तिष्क – वह कुदरत का कमाल है या उसकी भूल- यह मैं अभी तक तय नहीं कर सका। लेकिन जो और जैसा भी हो वह मूल में है सारे सांस्कृतिक-विकास के। इस इकाई की बनावट लाजवाब है और यही वजह रही है कि इंसान कुदरत के रहस्यों को समझने में इस कदर सफल हो सका। लेकिन ये पिटारा इंसान को अपनी जकड़ में लेने की क्षमता रखता है उलझाये रखता हैं। तभी तो महाभारत का युद्ध हुवा, विश्व-युद्ध और तरह-तरह की मानव-निर्मित त्रासदियाँ। मानव के मस्तिष्क  की बौद्धिक क्षमता निर्विवाद है पर मनोवैज्ञानिक आधार पर वह अभी अशक्त एवं अपरिपक्व है। 

हममें से अधिकतर लोग चाहते हैं कि चीजें बदलें और सही दिशा में बदलें पर जमीनी हकीकत में बदलाव नहीं आता। हमारी हालत उस नशेड़िये की तरह है जो नशे का इस कदर आदी हो चुका है कि चाहते भी उसे छोड़ नहीं सकता। हम भी धीरे-धीरे एक असहज, दिखावे की जिंदगी जीने के आदी होते जा रहे हैं और यह लगभग भूल चुके हैं कि स्वस्थ, सहज व तनावरहित परिवेश कैसा होता है। बात केवल बाहरी भौतिक परिवेश की ही नहीं अपितु मन के परिवेश की भी है हम न केवल वायुमंडल से घिरे हैं हमारे चारों ओर एक सूचना-मंडल भी घेरे है और हर एक मन दूसरे सैकड़ों वैसे ही मनों के परिवेश में आबद्ध है। यह दूसरा परिवेश भी प्रदूषित होने के कगार पर है। कुछ लोगों का मानना है कि यह लगभग पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है हम जिस सूचना-मंडल मे निवास करते हैं वह एक भानुमती का पिटारा है जो अंग्रेजी में प्रयुक्त पैंडोरा का पिटारा (Pandora’s Box) की ही तरह समझा जा सकता है। ग्रीक पौराणिक कथा के अनुसार पैंडोरा को एक संदूक उपहार में मिला, जिसमें ताला लगा था और एक चाभी भी थी। साथ ही यह हिदायत भी कि इसे खोलना नहीं। एक बार पैंडोरा अपनी उत्सुकता को न रोक सकी और उसने चाभी लगा कर संदूक खोल दिया। उसका खुलना था कि सब तरह की बु्री और अवांछित चीजें- द्वेष, नफरत, लालच, क्रोध आदि- सभी निकल बाहर आ गये। पैंडोरा के पिटारे जैसा ही है हमारा मस्तिष्क [3, 4] और उसका क्रिया-कलाप यानि मन, लेकिन एक फर्क जरूर है; मस्तिष्क के पिटारे से सिर्फ बुरी चीजें ही बाहर नहीं आती कभी-कभार अच्छी चीजें भी नजर आ जाती हैं। इसी पिटारे का उपकार व उपचार जरूरी है ताकि बाहर आने वाली अच्छी बातों का प्रतिशत बढ़ाया जा सके।

घुघूती फिर कुछ कह रही है जरा सुनूँ: 
संक्रमण-काल में जो हो रहा है शायद उस ओर इशारा है इस बार। इतिहास में पहले भी महामारियों ने दस्तक दी और तबाही मचाई पर इस बार मामला कुछ उलझा सा लगता है मुश्किल दौर में किसी अपने का स्पर्श जो सहारा देता है वह मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुरक्षा-कवच हुआ करता है। आज वह विलुप्त सा हो चला है खासकर इस संक्रमण (5) के मामले में। कल जब हालात सामान्य हो जायें तब क्या वैसा ही सुरक्षा-कवच फिर हासिल हो सकेगा या नहीं कुछ कहना मुश्किल है।

हमने हिमालय के सुलगने और उसके पर्यावरणीय संतुलन का जिक्र किया था। पर वह शांति का आभास देता हिमालय खुद कितना अशांत और अधीर है इस ओर घुघूती ने इशारा किया। मुझे याद आ गया पूरा वाकया कि कैसे धरती की टैक्टोनिक प्लेटों में हलचल होती रहती है और वे स्थिर न होकर गतिशील हैं। भारतीय भूभाग 50 करोड़ साल पहले एक अलग महाद्वीप था आज के एशिया से अलग, और शेष एशिया एक अलग भूखंड। पहला भूखंड उत्तर की ओर गतिमान था और वह जा टकराया तिब्बत के पास वाले हिस्से से। इस अत्यंत विराट टक्कर का स्वाभाविक निष्कर्ष था मध्यवर्ती भूभाग का ऊपर उठना और हिमालय आ गया अस्तित्व में। हिमालय के ऊँचे हिस्सों में समुद्री जीवों के अवशेष इसके प्रमाण हैं और हिमालय के ऊपर उठने की प्रक्रिया आज भी जारी है। टक्कर से होने वाला विध्वंस और हिमालय श्रंखला का जन्म। लगता है भगवान शिव का नटराज रूप सृष्टि एवं विनाश की जिस निरन्तरता को प्रस्तुत करता है वह हर कहीं देखने कि मिलता है सामने के हिमालय में हो या हमारे अंतर्मन की परतों में। 

आज लगता है घुघुती की आवाज में जो मिठास और दर्द साथ छलकते हैं वे कहीं हिमालय की इस गाथा से जुड़ जाते हैं। दर्द उस टक्कर का है जो विनाश को चित्रित करती है और मिठास  उस सृजन के लिये जो हिमालय श्रंखला के अस्तित्व के लिये जिम्मेदार है। दोनों अंतरंग रूप से जुड़े हैं सृष्टि-विध्वंस का द्वैत सर्वत्र दिखाई देता है। मुझे याद आते हैं एल्डो लियोपोल्ड [6] के  शब्द:
Wilderness is the raw material out of which man has hammered for himself the artefact known as civilisation.

निर्जन वन-प्रांतर वह कच्चा माल है जिससे इंसान ने अपने लिये ठोक पीट कर एक शिल्प निर्माण किया जिसे सभ्यता कहा जाता है।

कैसी अजीब बात है यह वन-प्रांतर ही जीवन का मूल है ओर लियोपोल्ड की मानें तो सभ्यता का भी; लेकिन सभ्यता का विकास उसे हर पल दूर लिये जा रहा है उस इकाई से जो उसके जन्म एवं विकास का कारण रही। कुछ वैसी ही बात हम दूसरे रूपों में भी देखते आ रहे हैं। आज विकास के नाम पर इंसान जिस तरह पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है वह भी इसी आधार पर समझा जा सकता है।

हिमालय फिर चर्चा में है मेरे अंतर्मन की परतों के बीच टकराहट से जन्मे तनाव के रूप में और सृजन के रूप में; हिमालय मेरे मन में है हर एक मन में है वैसे ही जैसे घुघूती के बोल अंतर्मन की आवाज के रूप में हर मन में हैं। सृष्टि-विनाश का द्वन्द, वन-प्रांतर और सभ्यता का द्वन्द, मानव मन की विध्वंसात्मकता-रचनात्मकता का द्वन्द। इस तरह का द्वैत हमारे अस्तित्व की सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता और जिसका प्रभावी व कुशल प्रबंधन आगे की विकास-यात्रा का निर्धारण करेगा।

संदर्भ:

[1] घूघुती बासूती का ब्लाग:  http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/02/blog-post_25.html
[2] जयशंकर प्रसाद, कामायनी, लज्जा सर्ग, कविता कोश।
[3] वी. रामचन्द्रन, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003.
[4] चन्द्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु पत्रिका, सितम्बर 2019.
[5] चन्द्रमोहन भंडारी, देखि दिनन को फेर, सेतु पत्रिका, मई 2020.
Aldo Leopold, Sand County Almanac, Oxford University Press, London, 1949

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