कोरोनाकाल की समस्त स्थितियों पर गागर में सागर भरता अद्भुत, रस उपन्यास: लाकडाउन डेज़

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: लाकडाउन डेज़ (उपन्यास)
लेखिका: कामना सिंह
पृष्ठ: 216
मूल्य: ₹ 250 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2020
प्रकाशक: अनन्य प्रकाशन, दिल्ली
ISBN: 978 93 89191 64 6
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अध्ययनकाल में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान सहित अनेक स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाली एवं हिन्दी साहित्य की कहानी, बाल एवं किशोर साहित्य, समीक्षा एवं उपन्यास आदि विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाली, विदुषी, साहित्यकार डॉ. कामना सिंह का उपन्यास "लॉकडाउन डेज़" एक ऐसा उपन्यास है जो यह सिद्ध करता है कि एक साहित्यकार की संवेदना एवं भावुकता सामान्य जन से कहीं अधिक होती है। जिन परिस्थितियों एवं घटना-दुर्घटनाओं से एक आम प्राणी क्षणिक प्रभावित होने के बाद उन्हें भूलने लगता है वही परिस्थितियाँ एक साहित्यकार के हृदय को किस प्रकार आन्दोलित करती हैं, इसका अनुमान डॉ. कामना सिंह के उपन्यास "लॉकडाउन डेज़" को पढ़कर लगाया जा सकता है।

दुनिया के तमाम देशों में पाँव पसार चुकी महामारी कोरोना का आतंक किसी से छिपा नहीं है। इस बीमारी से मरने वालों, संक्रमित होने वालों और अपनी रोग-प्रतिरोध क्षमता के बल पर इसे हराने वालों की संख्या लाखों की तादात में है। कोरोना कितना भी भयावह क्यों न हो, पर साहित्यकार की कलम ने निःशंक भाव से इस पर रचनाएँ लिखी हैं। कामना सिंह का उपन्यास इस मायने में विशिष्ट है क्योंकि यह हिंदी में कोरोना पर लिखा जाने वाला पहला उपन्यास होने के साथ-साथ इस विषय का गंभीर एवं विशद लेखा-जोखा भी है।

उपन्यास का प्रारम्भ बहुत ही आकर्षक तरीके से किया गया है। पूरे उपन्यास का निचोड़, उपन्यास के नायक कुणाल के द्वारा कहलवाकर-
"मैं एक छोटे से घर में क्वारंटीन में रहकर यह प्रकरण लिख रहा हूँ। बात लॉकडाउन के दौर की है, पर मुझे लगता है कि इंसान के जीवन की पूरी कहानी इसमें समाई है।

मानव का एक आकलन। मानव-जीवन, उसकी उपलब्धियाँ-अनुपलब्धियाँ, जय-पराजय, उत्साह-अनुत्साह सभी कुछ है इसमें। यह कहानी सामने आई, सिर्फ एक वायरस की बजह से। वायरस जिसने मानव-प्रजाति को हिला दिया। वायरस जिसने मनुष्य की आँखें खोल दीं।" (पृष्ठ-9)

सचमुच ही इंसान के जीवन की पूरी कहानी इसमें समाहित करने के लिएँ डॉ. कामना सिंह ने विश्व का कोना-कोना तो छान मारा ही है मनुष्य के हृदय का भी कोई कोना अछूता नहीं छोड़ा है।

लगभग पचास वर्ष पूर्व पढ़े हुए शरत्चंद्र के उपन्यास श्रीकांत की नायिका द्वारा लड़कपन में श्रीकांत के गले में करौंदा की माला डालना मुझे अभी तक विस्मृत नहीं हुआ है। डॉ. कामना सिंह के इस उपन्यास की नायिका ईशानी भी उपन्यास के प्रारम्भ से अन्त तक नायक कुणाल की स्मृतियों के द्वार खटखटाती नजर आती है। ईशानी एक ऐसी लड़की जो अपने माता-पिता के साथ कुणाल के पड़ोस में आकर रहने लगी थी और अपने माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण पूरे दिन कुणाल की बड़ी दोनों बहनों के साथ ही पढ़ते-खेलते, जाने कब उसके माँ-पापा के दिल में जगह बनाकर उसके घर की सदस्या की हैसियत पा चुकी थी। वह भी कुणाल की बहनों के साथ लूडो खेलते समय चैथी गोटी कुणाल के नाम की रखकर स्वयं ही चलती भी थी और उसके द्वारा चली कुणाल की गोटियाँ ही हमेशा जीतती भी थीं। और कुणाल की गोटियों द्वारा जीत को, कुणाल को बताती भी थी। जिसे सुन कुणाल अपने आप पर गर्व महसूस करता। कुणाल आत्मकेन्द्रित, अपने आप में ही लीन रहने वाला, जिसने ईशानी से कभी ठीक से बात तक नहीं की। बल्कि एक दिन लूडो की गोटियाँ स्वयं चलने पर हार जाने के कारण वह इतना खिसियाया कि उसने ईशानी को डाँट भी दिया।

अति महत्वाकांक्षी कुणाल, अपने दफ़्तर के काम से आस्ट्रेलिया गया था। कोविड-19 के कारण सभी देशों का वातावरण बदलने लगा था। आस्ट्रेलिया से लौटते में उसने बड़ी ही हड़बड़ाहट में फ्लाइट पकड़ी। जब वह भागते हुए हवाई जहाज तक पहुँचा, उसके नाम की अंतिम पुकार की उद्घोषणा हो रही थी ।

"जहाज चलने को तैयार था। स्विचऑफ करने के लिए मोबाइल खोला। स्क्रीन पर कई घंटे पहले आया ईशानी का मैसेज चमक रहा था,-"यदि तुम मेरे साथ चलना नहीं चाहते, तो हमारा अलग हो जाना ही बेहतर है। कुणाल, सोमवार तेईस मार्च को मेरी शादी है और मंगलवार को विदाई। (पृष्ठ-15)

वही ईशानी जिसके साथ कुणाल ने कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया। उसके विवाह का मैसेज पढ़कर कुणाल हड़बड़ा कर सोचने लगा-
"आज मंगलवार चैबीस मार्च है। दोपहर का बारह बज रहा है। यानि ईशानी की विदाई हो चुकी होगी। ...ईशानी की शादी! ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था। (पृष्ठ-11)

फ्लाइट से उतरकर थर्मल स्क्रीनिंग के बाद टैक्सी में बैठा कुणाल दिल्ली की सूनी-सूनी सड़कों को देखकर आश्चर्य करता है। टैक्सी ड्रªाइवर उसे भारत में फैल रहे कोरोना के कारण लॉकडाउन के बारे में जानकारी देता है। वह आस्ट्रªलिया से लाये कागजातों को लगभग बन्द पड़े अपने दफ्तर की अलमारी में रखकर टैक्सी में आ बैठता है, पर अब जाये कहाँ? उसका रैस्ट हाउस, होटल, रेस्तरा सभी कुछ तो लॉकडाउन ने सील कर दिए हैं।
"साढ़े छह बज चुका था। सिर दोबारा दर्द से फटने लगा था। मैं सोच में था... अब कहाँ जाऊँ? क्या होटल में? आज गेस्ट हाउस बन्द हुआ है, यदि कल से होटल भी बन्द होने लगे, तो सड़क पर कहाँ खड़ा होऊंगा?"(पृष्ठ-20)
उसे याद आया, एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय उसे जाँच अधिकारियों ने क्वारंटीन होने की सलाह दी थी। अचानक उसे अपनी पिछली नौकरी का सहकर्मी, मित्र मिलिन्द याद आया जिसने उसके ‘की-रिंग’ मे अपने फार्म हाउस की चाबियाँ डालते हुए उससे कहा था कि मित्र जब भी जरूरत पड़े, मेरे फार्म हाउस में आ जाना। रास्ते में टैक्सी ड्राइवर को सेब खरीदते देखकर कुणाल भी 10 किलो सेब खरीद लेता है।

कोरोना के भय ने कुछ ही दिन में दिल्ली के वातावरण को कितना बदल कर रख दिया है देखकर कुणाल हैरान है-
"सड़कें अजीब लग रही थीं, अनपहचानी सी। यह वह दिल्ली नहीं थी, जिसको देख मेरा दिल उमंग से भर जाता था। ...किसी अजीबोगरीब वीडिओ गेम की सड़कों जैसी सड़कें, जिनमें बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच कुछ गाड़ियाँ तेजी से चल रही हों।" (पृष्ठ-21)

फार्म हाउस का ताला खोलकर वह अन्दर जाकर अजनबी जगह पर अपने को अजीब ऊहापोह की स्थिति में महसूस करता है। सोचता है, वह यहाँ क्यों आया, टैक्सी को सीधे बनारस ही क्यों नहीं ले गया अपने माँ-पापा के पास।

"दूसरी ओर घर का सुकून। माँ-पापा का सानिध्य। और? और कोई भी नहीं। ईशानी? ईशानी की शादी हो चुकी है कल, मैं जानता था। और आज उसकी विदाई हुई होगी। ऐसे में वहाँ पहुँचना! मैंने मैसेज देर से पढ़ा। काश! मैं मैसेज जल्दी पढ़ लेता।

अगर जल्दी पढ़ लेते तो? तो क्या कर लेते? उसकी शादी में शामिल होने पहुँचते? ...या... या... उसे रोकते?"
यह मैं क्या सोच रहा हूँ मेरा ईशानी से क्या वास्ता? हे भगवान, मेरे दिमाग को क्या हो गया है?
बनारस चलो अभी। मन ने कहा।

नहीं। रुको यहीं। दिमाग ने कहा, पागल हुए हो क्या? जिन गलियों को छोड़ आये उनका लोभ खतम करो। वह पराई हो चुकी है आज। अब उसके लिए सोचना भी मूर्खता है।
पर ईशानी? मुझे लगा जैसे मैं हार रहा हूँ (पृष्ठ-24)

और फिर लेखिका ने ईशानी के प्रति कुणाल के मानसिक द्वन्द्व और ऊहापोह का बहुत ही मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है उपन्यास में।
"रात के अंधकार में मेरी सारी सोच बस ईशानी में समाती जा रही थी। ... एक हारे हुए इंसान। ...नहीं, कभी नहीं, मैं हारा हुआ इंसान नहीं हूँ ईशानी किसी और से शादी करे, यह मेरा ही फैसला था।" (पृष्ठ-24)

फिर जाँच अधिकारी के शब्द याद आते हैं-
"तुम्हें अपने को क्वारंटीन करना होगा। यह देश और मानवता के हित में बहुत जरूरी है।" (पृष्ठ-23)

कुणाल अन्दर ही अन्दर भयभीत भी है कि कहीं आस्ट्रेलिया से उसके साथ कोरोना भी साथ न आया हो अतः उसकी सोच घर-परिवार, समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को महसूस कराते हुए उस जंगल में, फार्महाउस की ओर मोड़ देती है।

"सोच को सही दिशा मिली... हाँ मैं बीमार हो सकता हूँ मेरे साथ कोरोना वायरस भी हो सकता है। ऐसे में बनारस जाना यानि... छी...अपनी स्वार्थपरता पर शर्म आई। मन को सुकून मिला कि सामने दिखता छोटा सा घर एकदम खाली है। बेहतर ही रहा मिलिन्द यहाँ नहीं मिला।" (पृष्ठ-25)

फार्म हाउस का वह छोटा सा घर आधुनिक सभी सुविधाओं से युक्त पाकर कुणाल ने सुकून महसूस किया। रसोईघर में भी पर्याप्त खाद्य सामग्री रखी हुई मिली। दीवार पर टी.वी भी लगा हुआ था। वाथरूम में नहाने के बाद, किचिन में जाकर एक कप चाय तैयार की और सोफे पर बैठकर टी.वी.ऑन कर दिया।

"सभी चैनलों पर अफरा-तफरी मची हुई थी। ज्यादातर चैनलों पर जो न्यूज आ रही थी वह कोरोना से जुड़ी थी। ...अजीब सा लगने लगा मुझे। बनारस में क्या चल रहा होगा? कोरोना से बड़ी उम्र के लोगों को ज्यादा खतरा है, यह बात चिंतित करने वाली थी। ...मेरी दोनों दीदियाँ पहले ही ससुराल जा चुकी हैं और आज तो ईशानी भी चली गई होगी। अब माँ-पापा का ध्यान कौन रखेगा? और ईशानी की अम्मा की देखरेख कौन करेगा? ...मन बेहद बेचैन हो उठा। यह कैसा समय है? उन तीनों को मेरी जरूरत है और मैं यहाँ इस कमरे में बंद। क्या करूँ? एक बार पापा से फोन पर बात करूँ?" (पृष्ठ-27)

पर पापा से बात करने की हिम्मत नहीं हुई उसकी क्योंकि थोड़े दिन पहले ही कुणाल की धन के प्रति लालसा और अति महत्वाकांक्षा के कारण उसके पापा उससे नाराज हो गये थे। उनकी इच्छा थी कि कुणाल पढ़-लिखकर बनारस के आस-पास ही कोई काम करे और अपनी खेती-बारी की भी देखभाल करे, किन्तु दिल्ली आई आई टी. की पढ़ाई के बाद खेती का कार्य देखना कुणाल को अपमानजनक लगा। पापा द्वारा ईशानी के साथ विवाह की बात पर तो कुणाल एकदम ही उखड़ गया। उसका सपना किसी बड़े शहर में जाकर अधिक धन कमाने की लालसा और किसी आधुनिका के साथ विवाह का था। कुणाल के विचार में ईशानी सीधी-सरल और पुरातनवादी थी जिसमें कुणाल के मन के अनुरूप कोई भी गुण नहीं था।

रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का राष्ट्र के नाम संदेश आता देखकर कुणाल चौंका-
"उस पल अपने देश के प्रधानमंत्री को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह उस कमरे में मेरे साथ हैं। मेरे साथ ही क्यों, उस पल तो वह पूरे देश के साथ थे। माँ-पापा के साथ। दीदियों के साथ। ईशानी के साथ थे। पूरी मानव प्रजाति के साथ थे। कोई भी अकेला नहीं था उस समय।" (पृष्ठ-27)

उक्त वाक्य लिखकर लेखिका डॉ. कामना सिंह ने पूरे देश के प्रति देश के प्रधानमंत्री द्वारा महसूस की गई जिम्मेदारी और अपनत्व के भाव को व्यक्त करके सिद्ध किया है कि भारत के प्रधानमंत्री, अन्य देशों के प्रधानमंत्री से कहीं बेहतर इंसान हैं जो अपने देश की जनता के हर सुख-दुख में अपने को भागीदार समझते हैं।
भारत में इक्कीस दिन का लॉकडाउन हो गया था। ...यानि मैं ही नहीं, कोई भी कहीं नहीं जा सकता था।" (पृष्ठ-27)

जब किसी के मन में अन्तर्द्वंद्व चल रहा होता है तो वह मनुष्य उस स्थिति से बचने के लिए अपना रास्ता बदल लेता है। लेखिका ने ईशानी को लेकर कुणाल के मन में चल रहे अन्तर्द्वंद्व को बड़े ही मनोवैज्ञानिक रूप से चित्रित किया है। कुणाल मोबाइल पर फिर किसी कॉल या मैसेज को पढ़ने से कतरा रहा था इसलिए फ्लाइट से उतरकर अभी तक उसने मोबाइल से किसी को कॉल नहीं किया था यहाँ तक कि वह मोबाइल को स्विचऑन करना तक भूल गया था। इतने दिन में मोबाइल की बैटरी भी जा चुकी थी अतः उसने अपने बैग में चार्जर ढूंढ़ना शुरू किया जो नहीं मिला। शायद अपनी फाइल के साथ अपने दफ्तर की अलमारी में ही बन्द कर आया वह।

यहाँ लेखिका डॉ. कामना सिंह की दूरदृष्टि की प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जा सकता कि उन्होंने उपन्यास के ताने-बाने को निर्विघ्न आगे बढ़ाने के लिए कितने सुन्दर बहाने का प्रयोग किया कि मोबाइल की बैटरी चली गई और चार्जर भी वह अपने लैपटाप के साथ ही दफ्तर में ही छोड़ आया है। यानि इस जंगल में बने फार्महाउस में पूरे क्वारंटीन के दौरान कुणाल न किसी को अपना हाल चाल बता सकता है और न किसी के हाल-चाल पूछ ही सकता है और वह इस समय कहाँ पर है, यह बात भी किसी को नहीं बता सकता है। केवल और केवल पूरे समय दीवार पर लगे उस टी.वी. के सहारे दुनिया के समाचार जान सकता है।

टी.वी. के माध्यम से ही उसे पता चलता है कि कुछ महीने में ही देश की क्या से क्या स्थिति हो गई है? इंसान की एक-दूसरे के प्रति सोच में कितना बदलाव आ गया है -
"आज सड़कें सूनी पड़ी हैं। लोग एक दूसरे को शक भरी निगाह से देख रहे हैं। हाथ मिलाते सें डर रहे हैं। दूसरे की दी चीज खाने में डर रहे हैं। भय! भय! और सिर्फ भय। और यह सारा परिवर्तन सिर्फ एक वायरस की वजह से। कोविड-19।" (पृष्ठ-33)

ऐसा प्रतीत होता है कि लेखिका डॉ. कामना सिंह ने कोरोना वायरस के बारे में जानकारी होते ही दूरदर्शन एवं समाचार पत्रों की सारी खबरों को कलमबद्ध करके अपने पास रखना प्रारम्भ कर दिया था। तभी तो केवल भारत ही नहीं विश्व के कोने-कोने की खबरों को अपने उपन्यास का हिस्सा बना पाने में उन्होंने महारत हासिल की है। क्वारंटीन में अपने को उस एक कमरे में बन्द किए कुणाल टी.वी. के माध्यम से ही प्रतिदिन नई-नई खबरों से परिचित हो रहा है।-

"उन दिनों न्यूज में बताया जा रहा था कि कोरोना वायरस मांसाहार से जुड़ा है। यह वायरस पशुओं से मनुष्यों में आया है।" (पृष्ठ-34)

"एक भारतीय दम्पति का किस्सा जनवरी में ई-समाचार पत्रों की सुर्खियों में था। चीन के वुहान में टेक्सटाइल यूनीवर्सिटी में कार्यरत इस भारतीय दम्पति ने भारत सरकार से मदद मांगी थी।" (पृष्ठ-35)

"लगभग इसी तरह का किस्सा घटा था सात सौ भारतीय छात्रों के साथ, जो वुहान के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे।" (पृष्ठ-36)

"कोरोना वायरस की वजह से चीन के बाहर किसी मरीज की मौत का पहला मामला फिलीपींस में सामने आया था।" (पृष्ठ-37)

"... मानवीयता के प्रदर्शन की धुन में इटली किस तरह धोखा खा गया। एक चीनी व्यक्ति बीच बाजार में खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली थी। एक कागज अपनी शर्ट के ऊपर लगा रखा था, जिस पर लिखा था, मैं इंसान हूँ वायरस नहीं। मुझे गले लगाओ।" (पृष्ठ-37)

"संसार का एक अति विकसित देश चीन, जहाँ से कोरोना की शुरुआत हुई। चीन से पहुँचा इटली, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, इंडिया और फिर पूरे विश्व में।"." (पृष्ठ-64)

कुणाल कमरे में बन्द है लेकिन दुनिया जहान की प्रतिदिन घट रही घटनाओं की जानकारी उसे टी.वी. से प्राप्त हो रही हैं। टी.वी से ही उसे पता चला कि अंतिम संस्कार करना जिन्हें कभी मानवता की सेवा लगा करता था, उनकी सोच भी कितनी बदल दी है इस वायरस ने-
"इटली के एक कस्बे के एक अस्पताल में कोरोना वायरस से संक्रमित पिचासी वर्षीय व्यक्ति की जीवन लीला खत्म हो गई। लेकिन पाँच दिन बीतने के बाद भी उनका मृत शरीर अंतिम संस्कार के लिए इंतजार कर रहा है।" (पृष्ठ-38)

"हमें अपना काम कभी भी खराब नहीं लगा। यह मानवता की सेवा है।... ... पर कोरोना वायरस ने हमारी इस सोच को भी बदल सा दिया है।" (पृष्ठ-55)

"अस्पतालों में शवों के ढेर लगे हुए हैं। बर्फ वाले ट्रकों में लाशें रखी जा रही हैं। नर्सिंग होम के बाहर भी शवों की लाइन लगी हुई है।" (पृष्ठ-56)

"आज हम जिन लोगों के शवों को लाएँगे, उनका अंतिम संस्कार तीन सप्ताह में हो पायेगा।... छोटे गिरिजाघर को मुर्दाघर में बदला है।" (पृष्ठ-58)

कुणाल बन्द पड़े मोबाइल के कारण मजबूर था फिर भी कभी-कभी अपनी भारतीय संस्कृति की खबरें टी.वी. पर देख-देख कर प्रसन्न हो लेता था-
"चार्जर के न होने से लाचार था मैं। अपनों की चिंता करना और उनकी खुशी के लिए, उनकी सुरक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास करना, यह हमारे देश भारत में ही सम्भव है। यह प्रेम भाव, सहृदयता हमारे खून में हमेशा से है।" (पृष्ठ-42)

"एक देश में कहा जा रहा है कि बुजुर्ग अस्पताल के बजाय घर पर रहें। बुजुर्ग अपनी पूरी उम्र जी चुके हैं। उनके ऊपर साधनों की बर्बादी से क्या फायदा।... भगवान का शुक्र है कि हमारे भारत में ऐसा कोई नहीं सोचता।" (पृष्ठ-62)

"जियो और जीने दो" कहती है हमारी भारतीय संस्कृति।." (पृष्ठ-60)

इस आपात काल में भारत सरकार द्वारा दी जा रही सहायता का भी पूरा उल्लेख करना नहीं भूली हैं डॉ. कामना सिंह -
"सरकार ने बहुत सी राहत योजनाएँ लागू की थीं, जिन्हें देखकर मुझे अच्छा लगा। ...उज्ज्वला योजना के तहत आठ करोड़ बी.पी.एल. परिवारों को तीन महीने तक फ्री सिलिण्डर। ...बीस करोड़ महिला जनधन एकाउण्ट धारकों को पाँच सौ रुपये प्रति महीने अगले तीन महीने तक। ...कोरोना पर सरकार का फैसला मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ेगी। पाँच करोड़ परिवारों को फायदा। ...अगले तीन महीने तक गरीबी रेखा के नीचे आने वाले हर व्यक्ति को प्रतिमाह पाँच किलो चावल, एक किलो दाल... इंश्योरेंस का एलान...आदि... आदि." (पृष्ठ-46)
देश में जैसे-जैसे कोरोना बढ़ रहा है, मजदूर वर्ग व्याकुल होकर अपनी-अपनी जगह से उठकर चल दिया है। इस पलायन के कारण सरकार के मूल कार्य, कोरोना की रोकथाम, में पड़े व्यवधान का उल्लेख करते हुए लेखिका ने चिन्ता व्यक्त की है-
"जो सरकार पहले जी जान से कोरोना से लड़ रही थी, आज वह मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए व्याकुल है। ठिकाना, रोटी-पानी, मेडिकल सुविधाएँ, सभी कुछ सरकार मुहैया करायेगी।"... (पृष्ठ-77)

"जो भारत कभी पूरे दमखम के साथ कोरोना का मुकाबला कर रहा था, वह आज अपने नागरिकों की गलतियों की वजह से खतरनाक स्थिति में पहुँच रहा है।" (पृष्ठ-183)

उस कमरे में अकेले बन्द रहते हुए कुणाल को कई दिन बीत चुके हैं। उसके पास टी.वी. देखने के सिवा फुर्सत ही फुर्सत है। उसका मन उड़कर कभी बनारस में माँ-पापा के पास पहुँच जाता है तो उसी क्रम में ईशानी भी उसकी स्मृति के दरवाजे को निरन्तर खटखटाती रहती है। उसे याद आ रहा है खेल-में हार जाने पर ईशानी को डाँट देना, ईशानी का रोकर अपने घर भाग जाना, बड़ी बहन द्वारा पापा से शिकायत की धमकी पर ईशानी के घर जाकर उसे मनाना और हाथ पकड़कर अपने घर वापस ले आना। और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दिल्ली में एडमीशन हो जाने पर ईशानी का प्रश्न करना-
"मेरे दिल्ली जाने के एक दिन पहले ईशानी मेरे कमरे में आई और बुरा सा मुँह बनाकर खड़ी हो गई। फिर उसने कुछ हिचकिचाकर प्रश्न किया-‘कुणाल, कोई अपना शहर क्यों छोड़ देता है?’
‘जरूरत की वजह से ईशानी ।’
‘मैंने तय करा है मैं कभी भी अपने शहर से दूर नहीं जाऊगी।’
‘मन में एक गर्व जगा कि मैं अंग्रेजी पढ़ने वाला, इंजीनियरी पढ़ने वाला स्मार्ट इंसान हूँ और यह हिन्दी मीडियम की, अपने गाँव-देहात से जुड़ी, एक पिछड़ी हुई लड़की है।’
‘ओह! उस दिन कितना गलत था मैं! आज पछतावा होता है अपनी सोच पर।"." (पृष्ठ-53)

किशोरावस्था की ऐसी मनोवैज्ञानिक और मोहक बातें उपन्यास के बीच-बीच में लेखिका ने समाहित की हैं कि कोरोनावायरस जैसे भयावह और नीरस विषय पर लिखा उपन्यास भी रसमय हो उठा है।
धर्म और राजनीति करने वाले हर मुद्दे पर कुछ न कुछ खोज ही लेते हैं। लेखिका ने इस बात का उल्लेख भी उपन्यास में किया है-
"शव जलाया जायेगा या दफनाया जायेगा, इस बात पर जगह-जगह बहस शुरू हो गई हैं।... आज परिस्थितियाँ इस कदर जटिल हो गई हैं कि शवों का अंतिम संस्कार मुख्य मुद्दा है। उसे कैसे किया जा रहा है, यह मुख्य नहीं है। फिर भी झगड़े हो रहे हैं। जबकि यह समय एक होने का है।"." (पृष्ठ-65)

लॉकडाउन का पालन न कर संक्रमण फैलाने वाले लोगों के विषय में लेखिका ने वास्तविकता से पर्दा हटाकर लिखा है-
"विदेश में महामारी के डर से कांपने वाले लोग देश में आकर बेहिचक महामारी फैलाते रहे। जिस मकसद से लॉकडाउन किया था, वह मकसद तो पूरा होता नहीं दिख रहा। जब पढ़े-लिखे समझदार लोग गलत आचरण कर रहे हैं तो कम पढ़े-लिखे अनपढ मजदूरों से क्या उम्मीद की जाये?"
"इटली से लौटे एक आला अफसर ने केरल से बिहार तक सफर किया। उसे क्वारंटीन किया गया था क्योंकि वह पाॅज़िटिव पाया गया था।"
"एक डाॅक्टर माँ का बेटा लंदन से वापस आया। माँ ने अपने बेटे को घर में छुपा लिया।"
देश में संक्रमण केस लगातार बढ़ते जा रहे हैं इन पढ़े-लिखे समझदार या पढ़े लिखे मूर्खों के कारण।"." (पृष्ठ-78)

कुणाल का मन जब टी.वी. के इन समाचारों से ऊबने लगा तो फिर से ईशानी की स्मृति ने द्वार पर दस्तक दी-
"इस समय ईशानी कहाँ होगी? उसके पति का घर कितना बड़ा होगा?... सारी बातें इधर-उधर से घूम-फिर कर ईशानी पर ही क्यों लौट आती हैं, मैं नहीं समझ पा रहा हूँ उसका-मेरा कोई नाता न तो था, न तो है, न कभी होगा।"
"क्या एक बार फिर झूठ नहीं बोल रहा हूँ मैं? ... कहीं न कहीं तो कोई नाता हमेशा रहा है हमारे बीच। और अब वह नाता खत्म हो चुका है, यही सच है। ...इस सच को झेलने के लिए मुझे अपने अन्दर ताकत लानी होगी।"
"एक बात मेरे मन में कई दिनों से बार-बार आ रही है। अपनी कुंठा के चलते मैंने ईशानी को गंवा दिया।... वह तो हमारे घर के एक सदस्य जैसी थी। हम लोगों को छोड़कर दुनिया में कहीं भी जाना पसन्द नहीं करती थी।... वह कहीं और खुश कैसे रह पायेगी?"(पृष्ठ-80)

ईशानी की माँ द्वारा उसकी माँ से यह कहे जाने पर कि ईशानी को आपने सिर चढ़ा रखा है। आगे कौन इसे संभालेगा। माँ द्वारा यह कहा जाना कि इसे बड़ा तो होने दीजिए, यही हमें सम्हालेगी। कुणाल की समझ में आ रहा है अब।
"माँ ऐसा क्यों कहती थीं? क्या उन्होंने मन ही मन ईशानी में अपनी भावी पुत्रवधू को देखना शुरू कर दिया था?"(पृष्ठ-80)

ईशानी से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात आज इस मकान में क्वारंटीन के दौरान कुणाल को रह-रह कर याद आ रही है।
"आज मैं बीमार हूँ पर ईशानी की फिक्र कर रहा हूँ। वह भी तो ऐसी ही थी।" (पृष्ठ-80)

लेखिका के पास हर क्षेत्र में ज्ञान का भण्डार है, ऐसा उपन्यास पढ़ते समय अहसास होता है। चाहे वह बीमारी के बारे में बात हो, महामारी के बारे में बात हो या फिर बाराणसी के मणिकर्णिका घाट के महत्व सम्बन्धी बात हो या फिर जानवरों की तस्करी सम्बन्धी बात हो लेखिका ने उपन्यास में अपनी लेखनी से चमत्कृत ही किया है-
"अजीब संयोग है यह। लगभग हर सौ साल बाद संसार में एक बड़ी महामारी का हमला होता है। मनुष्य की सौ साल की तरक्की का आकलन हो रहा हो मानोे। 1720 में पूरी दुनिया में प्लेग फैला था। जिसमें एक लाख लोगों की मौत हुई थी। उसके सौ साल बाद 1820 में एशियाई देशों में ‘कॉलेरा’ ने महामारी का रूप लिया। कॉलेरा की बजह से सिर्फ जावा में ही एक लाख लोगों की मौत हुई थी। इसके सौ साल बाद 1920 में ‘स्पेनिश फ्लू’ फैला। जिसमें दुनिया में 1.70 करोड़ से 5 करोड़ के बीच लोग मारे गये थे। और अब 2020 में चीन से शुरूआत हुई ‘कोरोना वायरस’ की। लगभग चार महीने के अन्दर दुनिया को बदल दिया है कोरोना वायरस ने। (पृष्ठ-88)
इतना ही नहीं कोरोना वायरस के कारण उत्पन्न हालातों में आम आदमी के सपनों का जिक्र, किन्नरों की समस्या का उल्लेख, मरीजों की क्या मनःस्थिति हो गई है। किसानों की सोच में क्या परिवर्तन आया है। मजदूरों की सोच में, कूरियर सेवादाताओं की सोच में और ऑनलाइन सामान बेचने वालों की मनःस्थिति के साथ-साथ रेड लाइट की वेश्याओं, विभिन्न इमारतों के चैकीदारों की बदली हुई मनःस्थिति, भीख मांगने वालों की दशा आदि का वर्णन लेखिका ने इस उपन्यास में किया है। सब जगह मची उथल-पुथल और उद्योगधन्धों में, मेडिकल आदि में हुए उतार-चढ़ाव, कोरोना वाॅरियर्स का त्याग और सेवा भावना, दुनिया की सबसे ज्यादा उम्र की महिला का एवं तीन हफ्ते की बच्ची का तथा देश के पहले बुजुर्ग दम्पति का कोरोना से ठीक होना, अलग-अलग तरह के विभिन्न लोगों के एकाकीपन के अनुभव, कैंसर होने पर भी आँगनवाड़ी की कार्यकर्ता नीलम का सेवा भाव, कौन सा कोना है जहाँ लेखिका डॉ. कामना सिंह ने झाँक कर नहीं देखा हो?

"कल क्या खायेंगे, नहीं जानते। हमें तो जब तक ताली की आवाज सुनाई न दे, तब तक जिन्दगी, जिन्दगी नहीं लगती।" (पृष्ठ-168)

"जितना हम घर-घर जानें से डर रहे थे, उतना ही लोग बाहरी सामान को हाथ लगाने से भी डर रहे थे।"
रेड ज़ोन में पहुँचकर जब मैं किसी अपार्टमेंट के बाहर खड़ा होता हूँ तो सबसे पहले गार्ड की निगाहें ऊपर से नीचे तक मेरा एक्सरे लेती हैं। मैं साक्षात कोरोना वायरस तो नहीं, उसकी आँखों में यह सवाल होता है। (पृष्ठ-170)
खेतों के बीच बने उस घर में रहते हुए कुणाल को कई दिन हो गये है। टी.वी.पर आ रहे समाचारों से दुनिया के हाल से रूबरू होते रहना और अपने अतीत की स्मृतियों के झूले में झूलने के सिवा वह कर भी क्या सकता है। पढ़ाई के कारण घर-परिवार से दूर रहना और अपने अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण अपने आप में ही सीमित रहना, उसकी आदत बनती जा रही थी। ईशानी के सवालों को उसने कभी गम्भीरता से नहीं लिया, पर यहाँ क्वारंटीन में बन्द पड़े-पड़े उसे विगत का वह सब घटनाक्रम याद आ रहा है-
"इस दौरान घर जाना बहुत कम हुआ। परिवार से दूर रहने की आदत पड़ गई। समय बीतता रहा। मैं छुट्टियों में घर आता। ईशानी खुश होती। एक बार फिर उसने उसी तरह से प्रश्न किया,-‘कुणाल, तुम डिग्री पूरी करने पर नौकरी कहाँ करोगे?’

‘जहाँ मिल जाए।’-मेरा उत्तर था।

‘यहाँ बनारस में?’-आँखों में कौतूहल झलक रहा था।

‘नहीं, यहाँ नहीं। यहाँ तो तरक्की की कोई गुंजाइश ही नहीं है।’-मैंने मुँह बनाकर कहा।
वह चुप हो गई, पर उसकी आँखों में झलकती मायूसी मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ।" (पृष्ठ-115)

"... कितनी अजीब बात है जो बांधने वाले रिश्ते थे, मैंने उन्हें अहमियत नहीं दी। और जो भटकाने वाली बात होती हैं रुपया-पैसा, शान-शौकत, उन्हीं में उलझकर मैं इधर से उधर घूमता रहा।" (पृष्ठ-116)

मनुष्य अपने आप को छलता रहता है। अति महत्वाकांक्षाएँ उसे भटकाती रहती हैं तभी तो कुणाल ने अपने पिता और ईशानी की भावनाओं को नहीं समझा।"

क्वारंटीन के दौरान इस एकाकीपन में कुणाल को स्मृतियों की बयार विगत में उड़ा-उड़ा ले जा रही है। ईशानी के पिताजी की मृत्यु होने के कुछ दिन बाद जब वह घर गया था तो उसे अपने पापा की बातें अजीब सी लगीं। वे बनारस के आस-पास कोई नौकरी करने और अपने गाँव की खेती की देख-रेख की उसे सलाह दे रहे थे।

"क्यों, क्या पढ़े-लिखे लोग रोटी नहीं खाते। और रोटी खेतों से ही उगती है बेटा।" (पृष्ठ-117)

मगर आईआईटी दिल्ली की पढ़ाई के अहंकार और अमेरिका या इग्लैंड जाकर बसने के सपने ने उसे अपने पापा की बात पर ध्यान नहीं देने दिया-

"चार साल आईआईटी दिल्ली में पढ़ाई करने के बाद, मैं आपके गाँव में खेती करने जाऊंगा, ऐसा आपने सोच भी कैसे लिया पापा? मैं दिल्ली में रहने के बाद यदि कहीं जाने की सोचूंगा, तो अमेरिका जाने की सोचूंगा, इंग्लैंड जाने की सोचूंगा।" (पृष्ठ-117)... ..

"... महामारी के समय, पता नहीं क्यों अपनी जन्मभूमि बहुत याद आ रही है... पापा ने तो मुझे बार-बार समझाया था कि नौकरी छोड़ दो। काष! मैंने उनकी बात मान ली होती।" (पृष्ठ-117)

ईशानी की स्मृति कुणाल को इस हद तक भावुक करने लगी है कि उसे अपनी भूल का अहसास होने लगा है। लेखिका ने बहुत ही मार्मिक तरीके से इसे व्यक्त कराया है कुणाल के मुँह से-
" ईशानी में मैंने अपनी जीवन संगिनी कभी नहीं देखी थी। दोनों दीदियों की शादी के बाद भी ईशानी सुबह से शाम तक हमारे घर में ही रहती थी। यह देखकर मुझको हमेषा सुकून मिलता था कि वह मेरे माँ-पापा का ख्याल रख रही है। मैं उससे शादी करूंगा, ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था। पर आज इस कमरे में क्वारंटीन रहते हुए मैंने सबसे ज्यादा ईशानी को ही याद किया है। उसके तौर-तरीके, सिद्धान्त जैसे थे, शायद हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लोगों को उसी तरह की जीवन-षैली को अपनाना चाहिए। सब कुछ पाकर भी जमीन से जुड़े रहना, यही तो उसका तरीका था न! और यही मैं नहीं सीख पाया था न! इसलिए मैंने उसकी कीमत पहले नहीं समझी।
यहाँ इस घर में रहते हुए आज उन्नीसवाँ दिन है। लेकिन मैं अभी भी ईशानी के उसी मैसेज पर अटका हुआ हूँ-‘यदि तुम मेरे साथ चलना नहीं चाहते, तो हमारा अलग हो जाना ही बेहतर है।’ (पृष्ठ-191)

इस बार होली पर घर आने के लिए पापा का फोन पाकर विवश होकर वह घर गया था। पापा ने उसकी नौकरी, निवास का पता और फोन नम्बर मांगा था। साथ ही किसी साथी का फोन नम्बर भी। सुनकर झुंझलाहट के बावजूद उसने सबका उत्तर दिया था। दिल्ली के अपने मित्र मिलिन्द का मोबाइल नम्बर भी।

घर बसाने के बारे में पापा का प्रश्न सुनकर वह चिड़चिड़ा उठा था। ईशानी को साथ ले जाने की कहने पर तो वह बौखला ही उठा था। कहाँ और क्यों के प्रश्न सुनकर पापा भी झल्ला पड़े थे-

"मैं ईशानी की जिम्मेदारी की बात कर रहा हूँ ... उसके पिता के अन्तिम समय में मैंने उन्हें वचन दिया था कि मैं उनकी बेटी का ताउम्र ख्याल रखूंगा।"

"ठीक है, इसकी कहीं भी शादी कर दीजिए। जितने पैसों की जरूरत होगी, मैं दे दूंगा।"

"कहीं भी क्यों करूँ? तुम्हारे साथ क्यों नहीं?"’(पृष्ठ-197)

पिता-पुत्र के बीच विवाद बढ़ते देख माँ बीच में आ गई थीं।

"कुणाल तुम होश में नहीं हो। यह ईशानी का घर है। वह यहाँ घर के सदस्य की हैसियत से आती है।" पापा बोले थे।

"मैं होश में ही हूँ मैं इसके साथ नहीं बंध सकता। आप मुझे माफ कर दीजिए। (पृष्ठ-197)
पापा को दवाई लेते रहने की हिदायत देकर मैं दिल्ली के लिए चला तो उन्होंने कहा था, "दूर बैठकर हमारी चिंता करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं बेटा। तुमने अपने सारे फर्ज पूरे कर दिए हैं। ... और अब, जल्द ही तुम्हें ईशानी की शादी की सूचना भेज देंगे।"

"जी पापा, यही ठीक रहेगा।" (पृष्ठ-199)

"बनारस की गली की सीधी-सादी ईशानी मुझे कहाँ लेकर जायेगी? मैं दिल्ली की हवाओं से बात करने वाली पत्नी के लिए भी तैयार था। बडा सा घर और सुन्दर सी पत्नी पाना मेरा लक्ष्य बन गया था।" (पृष्ठ-202)

लेकिन जब दिल्ली की हवाओं से बात करने वाली मणिका मिली तो ...। नई कम्पनी के मालिक मधुकर ने अपनी बेटी मणिका से कुणाल की शादी करने के उद्देश्य से दोनों को मिलने का अवसर देते हुए मुरुथल जाने का सुझाव दिया।

"चमेली के फूलों भरी डाल सी महकती अति खूबसूरत मणिका दिल्ली यूनीवर्सिटी की पढ़ी अपने पिता की दुलारी ही नहीं, बहुत बिंदास भी थी।" (पृष्ठ-145)

मणिका बोल्ड थी, और किस हद तक थी, यह मुझे जल्दी पता चल गया।... .मधुकर सर की कीमती कार में बैठकर जब हम दोनों मुरथल पहुँचे तो वहाँ मणिका के दो दोस्त पहले से मौजूद थे।... एक लम्बा सा ‘हाय’ कहकर दोनों बांहें फैलाकर वह उन दोनों लड़कों से जिस तरह लिपटी, उसे देख मेरे संस्कारी मन ने कितना झटका खाया, मैं ही जानता हूँ।" (पृष्ठ-149)

परांठे खाने के बाद शराब की बोतल और फिर कुणाल को दूसरी कार से घर जाने की कहकर खुद दोनों दोस्तों के साथ और मस्ती करने के लिए रुकने की कहने पर कुणाल के होश उड़ गये और दूसरे ही दिन उस कम्पनी को रिजाइन कर वह मधुकर सर और उनकी पुत्री मणिका से दूर भाग लिया।

मणिका के बहाने लेखिका ने बड़े-बडे शहरों में आधुनिक सभ्यता के नाम पर धनपतियों के बच्चों में फैल रहे अपसंस्कृति के कीटाणुओं की ओर भी इशारा कर दिया है।

कोरोना वायरस जैसे नीरस विषय को लेकर भी डॉ. कामना सिंह ने इस उपन्यास को जैसा सरस और पाठक को अन्त तक पढ़ते जाने पर बाध्य करने वाला लिखा है वह कला सराहनीय एवं अद्वितीय है।

और उपन्यास का अन्त? अन्त तक अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि उपन्यास का अन्त ऐसा भी हो सकता है।
दिनेश पाठक ‘शशि’

क्वारंटीन का बीसवाँ दिन।

कुणाल विचारमग्न है। मन में उथल-पुथल मची है। इन बीस दिनों में उसने जीवन और जगत का जो अनुभव सिर्फ आत्म-मंथन से पाया है, वह कदाचित् शिक्षा की ऊंची डिग्रियां भी नहीं दे सकी थीं। पैसे के पीछे भागने का दुष्परिणाम उसके सामने है। छत और दीवारों से निर्मित एक घर के अंदर जब शांतिपूर्वक रहा जा सकता है, तो उसने अपने गृह-नगर बनारस को छोड़ दर-दर की भटकन को क्यों स्वीकार किया? इंसान का पेट जब सामान्य दाल-रोटी से भर सकता है, तो किन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसने देश-विदेश की खाक छानी? लॉकडाउन के इन तीन सप्ताह में जब लंबे चिंतन-मनन द्वारा उसके मन की आँखें खुल गई हैं, तो फिर भूमंडलीकरण के युग की त्रासदी क्यों झेले? कुणाल का यह जड़ों की ओर लौटना ही वह पर्यवसान-बिंदु है, जो उपन्यास को एक महत् उद्देश्य से जोड़ देता है। फिर प्रेम की मधुरिमा से अवसाद को तिरोहित होना ही है। यही अंधेरे से उजाले की खोज इस उपन्यास की मूल संवेदना है। निश्चय ही यह संवेदना उपन्यास को बार-बार पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। कोरोना महामारी पर हिंदी का न सिर्फ पहला, बल्कि अपने ढंग का अकेला उपन्यास सिद्ध करती है।

इस अद्भुत उपन्यास में डॉ. कामना सिंह ने अथाह जानकारियों का समावेश बहुत ही सहज और सरल रूप में किया है कि लगता है विश्व के कोने-कोने को उन्होने इसमें समाहित कर दिया हो। शिल्प की कसावट और प्रयुक्त भाषा-शैली ऐसी है कि पाठक पूरा उपन्यास पढ़ लेने के बाद ही छोड़ता है। पूरे उपन्यास में घटनाक्रम इस तरह पिरोये हुए हैं कि पाठक की जिज्ञासा पढ़ने के प्रति निरन्तर बढ़ती ही जाती है।

उपन्यास का मुद्रण त्रुटिहीन और प्रयुक्त कागज स्तरीय है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास का भरपूर स्वागत होगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

3 comments :

  1. लाकडाउन डेज उपन्यास की समीक्षा प्रकाशित होने पर विदुषी लेखिका डॉ कामना सिंह व श्रेष्ठ समीक्षक श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को अनंत हार्दिक शुभकामनाएं।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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  2. अच्छा लिखा है पाठक जी आपने!

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  3. बहुत अच्छी समीक्षा। बधाई।

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