सुमित्रानंदन पन्त पर गांधी का प्रभाव

- गुड्डू कुमार

पी एचडी शोधार्थी, अ.मु.वि, अलीगढ़


 छायावाद आधुनिक हिंदी काव्य की प्रमुख प्रवृत्ति है जिसका उदय 1916–18 के आसपास हुआ था। छायावाद प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की राष्ट्रीय परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम था। मुक्ति की जो आकांक्षा उस युग की नयी पीढ़ी में पैदा हुई थी, वही काव्य के रूप में ‘छायावाद’ बनकर अवतरित हुई। छायावादी काव्य मुक्ति और स्वाधीनता का काव्य है। यह वैयक्तिक अनुभूतियों की आत्माभिव्यक्ति और आत्म-प्रसार का काव्य है।

छायावाद के कवियों को प्रकृति से गहरा लगाव था। उन्होंने प्रकृति-प्रेम, ‘स्व’ की अभिव्यक्ति, राष्ट्र-प्रेम, समाज-सुधार आदि को अपने काव्य का विषय बनाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि छायावाद, इन सभी प्रवृत्तियों का समुच्चय है और इस समुच्चय का केंद्रबिंदु है – मुक्ति की भावना। प्रस्तुत आलेख मुक्ति के इस आलोक में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत के काव्य पर गांधीवादी दर्शन के प्रभाव को परिलक्षित करता है।

कालक्रम की दृष्टि से हिंदी साहित्य में छायावाद का आरंभ और गांधी जी का दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश वापसी साथ-साथ होता है। इस समय का भारत परंपरागत जड़ता एवं ब्रिटिस शासन की क्रूर-नीति के कारण दोहरे शोषण का शिकार था। गांधी जी के स्वदेश आगमन के साथ ही स्वाधीनता आंदोलन का जो बीज भारत में पनप रहा था, देश के कोने-कोने में पहुँचने लगा।

राजनीति केवल गोष्ठी तक संकुचित न रहकर जन-सामान्य तक पहुँचने लगी थी। स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य लौकिक, मूर्त और जन-सामान्य के जीवन से अधिक संबद्ध थी। इसके माध्यम से भक्ति आन्दोलन की भाँति आम-जन को मोक्ष का राही न बनाकर, जीवन की ज्वलंत समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जा रह था। यही कारण रहा कि स्वाधीनता आंदोलन, भक्ति आंदोलन से भी प्रासंगिक एवं जीवंत था।

स्वाधीनता आन्दोलन के निर्माण में गांधी जी के व्यक्तित्व एवं उनके विचार का अहम् योगदान था। वे राजनीति से ज्यादा अध्यात्म के निकट थे। उनकी दृष्टि राजनीतिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक आदि समस्याओं तक जाती थी। इसलिय उनका प्रभाव राजनीति के अतिरिक्त वैचारिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी पड़ा। गांधी जी के इसी व्यक्तित्व के कारण, उनके एक आह्वान पर भारत की बयार बदल जाती थी। इस बयार से पन्त जी कैसे वंचित रह सकते थे? सन् 1921 में महात्मा जी के भाषण से प्रभावित हो पन्त जी ने कॉलेज छोड़ दिया।

‘युगांत’ पंतजी के छात्र-जीवन के बाद की रचना है। इस काव्य संग्रह के निर्माण काल से पहले कवि का महात्मा जी से पहली मुलाकात सन् 1934 में हुई थी। गांधी जी के विचारों से प्रभावित कवि मन को इस मुलाकात ने एक सात्विक चैतन्य की ओर मोड़ दिया। बापू के व्यक्तित्व और सिद्धांत से प्रभावित पंत जी का भावुक हृदय, उन्हें भावी संस्कृति का आधार मानने लगे। पंत जी बापू को संबोधित करते हुए कहते हैं कि –
 तुम मांस-हीन, तुम रक्त-हीन,
 हे अस्थि-शेष! तुम अस्थि हीन,
 तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
 हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!
 तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
 जिसमें असार भव–शून्य लीन;
 आधार अमर होगी, जिस पर
 भावी की संस्कृति समासीन!

राजनीति और नैतिकता के मध्य संबंध स्थापित करते हुए गांधी जी ने साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर बल दिया था। गांधी जी साधन को साध्य से पहले रखते थे। उनका मानना था कि – जैसे साधन होंगे, वैसा ही साध्य होगा। साध्य की प्रकृति साधन से निधारित होती है। साधन की तुलना बीज से कर सकते हैं और साध्य की वृक्ष से। अत: जैसा बीज डालेंगे, वैसा ही वृक्ष उगेगा। यदि साधन अनैतिक होंगे तो साध्य चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, वह अवश्य ही भ्रष्ट हो जायेगी क्योंकि गलत रास्ता कभी सही मंजिल तक नहीं लें जा सकता। जो सत्ता भय और बल-प्रयोग की नींव पर खड़ी की जाती है, उससे लोगों के मन में स्नेह और आदर की भावना पैदा नहीं की जा सकती है। गांधी जी ने स्वराज प्राप्ति के लिए सत्याग्रह का मार्ग चुना था जो स्वच्छ और पवित्र था। उनके इस मनोभाव को पंत जी के निम्न काव्य-पंक्तियों में देखा जा सकता है –
 सहयोग सिखा शासित-जन को
 शासन दुर्वह हरा भार,
 होकर निरस्त्र, सत्याग्रह से
 रोका मिथ्या का बल-प्रसार;
 बहु भेद-विग्रहों में खोई
 ली जीर्ण जाति क्षय से उबार,
 तुमने प्रकाश को कह प्रकाश,
 औ’ अंधकार को अंधकार।

अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में गांधी जी ने लिखा है कि - “मेरे निरंतर अनुभव ने मुझे विश्वास दिला दिया है कि सत्य से अलग कोई ईश्वर नहीं है।... और सत्य की सिद्धि का एकमात्र उपाय अहिंसा है। अहिंसा की अखंड साधना से ही सत्य का पूर्ण साक्षात्कार प्राप्त किया जा सकता है”। वस्तुत: ईश्वर की तरह ही सत्य का साक्षात्कार भी बहुत कठिन है क्योंकि वह अत्यंत रहस्यमय है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, ज्ञानी और मनीषी उसके भेद को नहीं जान सके तो साधारण मनुष्य उसे क्या पहचान पाएगा? वह तो सत्य की ओर जाने वाला मार्ग पर ही चल सकता है और वह मार्ग है – अहिंसा। महाभारत में ‘अहिंसा परमो धर्म:’ की शिक्षा दी गई है। महात्मा बुद्ध और महावीर ने भी अपने अनुयायियों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। पश्चिम में ईसा मसीह ने भी सारे संसार को अहिंसा की शिक्षा दी थी। परंतु अहिंसा क्या है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है – ऐसा व्यवहार जिसमें हिंसा का सहारा न लिया जाए, ऐसा व्यवहार जिसमें किसी को पीड़ा न पहुँचायी जाए। यह तो अहिंसा का नकारात्मक पक्ष है जो यह बताता है कि क्या नहीं करना चाहिए? दूसरी और गांधी जी ने अहिंसा के सकारात्मक पक्ष को पहचानने का प्रयत्न किया जो यह निर्देश देता है कि मनुष्य को क्या करना चाहिए?

अत: अहिंसा का सकारात्मक पक्ष है – प्रेम। अहिंसा वह सिद्धांत है जिसमें अपने विरोधी को प्रेम से जीता जाता है, घृणा या लड़ाई से नहीं। अहिंसक की दृष्टि में कोई भी घृणा का पात्र नहीं हो सकता; पापी नहीं हो सकता। गांधी जी बाईबल के इस वाक्य के अनुयायी हैं – ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’। अगर कोई पापी तुम्हारे संपर्क में आता है तो अपने चरित्र-बल से उसे पाप से विमुख करके सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। अहिंसा का पुजारी अपने सहचरों के दुःख से द्रवित होकर उसके निवारण के लिए प्रयत्न करेगा। वह अपने-पराए का भेद मिटा कर जन-सेवा में अपना जीवन अर्पित कर देगा। सत्य और अहिंसा से संबद्ध महात्मा जी के इस विचार को पंत जी के निम्न काव्य-पंक्तियों में देखा जा सकता है -
 सुख - भोग खोजने आते सब,
 आये तुम करने सत्य खोज,
 जग के मिट्टी के पुतले जन,
 तुम आत्मा के म न के मनोज!
 जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
 चेतना, अहिंसा नम्र-ओज,
 पशुता का पंकज बना दिया
 तुमने मानवता का सरोज!

गांधी जी का मुख्य सरोकार मनुष्य के नैतिक जीवन से था। राजनीति को उन्होंने नैतिकता के साधन के रूप में अपनाया था। उन्होंने भारत के स्वाधीनता के लिए जो आंदोलन चलाया था, उसका मुख्य ध्येय भारत को नैतिक पुनरूत्थान की ओर के जाना था। गांधी जी विकास की ऐसी किसी भी अवधारणा के विरुद्ध थे जिसका लक्ष्य भौतिक इच्छाओं को बढ़ाना और उसकी पूर्ति के उपाय ढूँढना था। उन्होंने शिक्षा दी कि मनुष्य को भौतिक वस्तुओं का उतना ही प्रयोग करना चाहिए जितना उसके शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अनिवार्य हो। प्रशासन के स्तर पर गांधी जी विकेंद्रीकरण के समर्थक थे। उन्होंने यह विचार रखा कि उनका आदर्श राज्य छोटे-छोटे आत्मनिर्भर ग्राम-समुदायों का संघ होगा। प्रत्येक ग्राम समुदायों का प्रशासन पांच व्यक्तियों की ‘पंचायत’ चलाएगी, जिन्हें प्रतिवर्ष निर्वाचित किया जायेगा। ग्राम पंचायतों को विधायी, कार्यकारी और न्यायायिक शक्तियां प्राप्त होगी, परन्तु समाज में मेल-जोल और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नैतिक सत्ता और जनमत के प्रभाव का सहारा लिया जाएगा।

उन्होंने विचार रखा कि ग्राम समुदायों को ताल्लुकों के रूप में, ताल्लुकों के समूह को जनपदों के रूप में, और जनपदों के समूह को प्रदेशों के रूप में संगठित किया जाएगा। शासन के प्रत्येक स्तर को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त होगी, और वह सामुदायिक की भावना से ओत-प्रोत होगा। केन्द्रीय सरकार को इतना अधिकार अवश्य होगा कि वह सब प्रदेशों को एकता के सूत्र में पिरो सके, परंतु इतना नहीं कि वह उन पर अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर दे। पंत जी के निम्न काव्य पंक्तियों में गांधी जी इन भवनाओं को उकेरा गया है –
 ये राज्य, प्रजा, जन, साम्य-तंत्र
 शासन-चालन के कृतक यान,
 मानस, मानुषी, विकास-शास्त्र
 हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान;
 भौतिक विज्ञानों की प्रसूति
 जीवन – उपकरण – चयन – प्रधान,
 मथ सूक्ष्म-स्थूल जग, बोले तुम –
 मानव मानवता का विधान!

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि सुमित्रानंदन पंत के व्यक्तित्व और कृतित्त्व पर समयानुकूल स्वच्छंदतावाद, प्रगतिवाद और ‘अरविंद दर्शन’ का प्रभाव पार्यप्त रूप में परिलक्षित होता है। ‘वीणा’ से ‘ज्योत्सना’ तक की उनकी कविताएँ स्वच्छंदतावादी चरण की कविताएं हैं। ‘युगांत’ के ‘ग्राम्या’ तक की कविताएँ प्रगतिवादी चेतना से प्रभावित है। इसी दौर की कविताओं में पंत जी पर गांधीवाद का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। सन् 1940 के बाद की कविताओं पर अरविंद-दर्शन का प्रभाव है, जिसका मुख्य कारण उनका अध्यात्म की ओर झुकाव है। ‘स्वर्ण-किरण’ से लेकर ‘वाणी’ तक के कविताओं पर अध्यात्म का प्रभाव है। इन समस्त भाव चेतना के अतिरिक्त पंत जी के मन- मस्तिष्क पर गांधी जी का असीम प्रभाव रहा है। पंत गांधी जी के व्यक्तित्व और उनके कर्म-सिद्धांत से इतने प्रभावित थे कि वे उन्हें लौकिकता की रक्षा हेतु अलौकिक मनुज की संज्ञा देते हैं। उन्हें मानवता का अपवाद भी कहते हैं । पंत जी के भाव-विभोर हृदय में बापू के प्रति जो आस्था थी; उसे निम्न काव्य-पंक्तियों में देखा जा सकता है -
 संसार छोड़ कर ग्रहण किया
 नर-जीवन का परमार्थ-सार,
 अपवाद बने, मानवता के
 ध्रुव नियमों का करने प्रचार;
 हो सार्वजनिकता जयी, अजित!
 तुमने निजत्व निज दिया हार,
 लौकिकता को जीवित रखने
 तुम हुए अलौकिक, हे उदार!

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सहायक ग्रन्थ सूची

1. सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी, प्रकाशक – नवजीवन मुद्रणालय, अहमदाबाद।
2. भारतीय राजनीतिक विचारक, ओम् प्रकाश गाबा, प्रकाशक – नेशनल पेपरबैक्स, नई दिल्ली।
3. युगांतर, सुमित्रानंदन पंत, प्रकाशक - इंद्र प्रिटिंग वर्क्स, अल्मोड़ा।
4. साथ वर्ष एक रेखांकन; सुमित्रानंदन पंत, प्रकाशक – राजकमल, नई दिल्ली।
5, सुमित्रानंदन पन्त, डॉ० नगेन्द्र, प्रकाशक – साहित्य-रत्न-भण्डार, आगरा।

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