राह मिल गई (बाल कहानी संग्रह) - अमिता दुबे

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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पुस्तक: राह मिल गई (बाल कहानी संग्रह)
लेखिका: अमिता दुबे
पृष्ठ: 40
मूल्य: ₹ 80.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2019
प्रकाशक: राजेश पुस्तक केन्द्र, दिल्ली
ISBN: 978-81-932556-9-8 
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                                मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सहित तीन दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत लेखिका एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पत्रिका ‘साहित्य भारती’ एवं ‘बाल वाणी’ की सम्पादक, विदुषी डॉ. अमिता दुबे जी ने जहाँ हिन्दी साहित्य की समालोचना, कहानी, उपन्यास, काव्य और समीक्षा आदि की ढाई दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं वहीं उन्होंने बाल साहित्य की भी कई पुस्तकों की रचना की है।

                                बच्चों का हृदय कोरे कागज सरीखा होता है। कोरे कागज पर आप जो भी इबारत लिखना चाहें, आसानी से लिख सकते हैं। इसीलिए पुराने समय में दादा-दादी या नाना-नानी सोने से पूर्व अपने नौनिहालों को चरित्र निर्माण करने वाली कहानियाँ सुनाया करते थे किन्तु आज के व्यस्ततम जीवन में उस कमी की पूर्ति कई बाल पत्रिकाएँ एवं कहानी-संग्रह कर रहे हैं। डॉ. अमिता दुबे जी का बाल कहानी-संग्रह "राह मिल गई" भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है।

                                 संग्रह "राह मिल गई" इनका सद्यः प्रकाशित बाल कहानी संग्रह है जिसमें कुल पाँच बाल-कहानियाँ समाहित की गई हैं। संग्रह की सभी कहानियाँ सहज एवं सरल भाषा में लिखी गई कहानियाँ हैं जो बाल एवं किशोर वय के बच्चों को तो पसन्द आयेंगीं ही, बड़े भी इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। संग्रह में मन की बात के अन्तर्गत लेखिका ने स्वयं लिखा है कि-

"बच्चों की बातें, उनकी अभिव्यक्तियाँ उनके प्रश्न, उनके उत्तर और कभी-कभी उनकी धारणाएँ हम बड़ों को यदा-कदा आश्चर्यचकित कर देने वाली होती हैं। हम बड़े इस भ्रम में रहते हैं कि ये तो बच्चे हैं, इनकी बात का क्या महत्व। लेकिन हम नहीं जानते या अनजाने में यह भूल जाते हैं कि ये बच्चे ही हमारा भविष्य होते हैं। समाज की सम्भावना होने के साथ-साथ देश के कर्णधार भी होते हैं ये बच्चे।" (पृष्ठ-4)                     

                                संग्रह की पहली और शीर्षक कहानी है "राह मिल गई"। कहानी की नायिका आभा जिसका पढ़ाई में मन नहीं लगता फलस्वरूप परीक्षा में अधिकतर विषयों में फेल हो जाती है और फिर माता-पिता की डाँट खाती है।

                                विदुषी लेखिका ने यहाँ बाल मनोविज्ञान के आधार पर बालक-बालिकाओं का पढ़ाई में मन न लगने के कई कारणों का आभा की सहपाठिन सहेलियों की आपसी बातचीत के द्वारा उल्लेख किया है-
                                "वैसे एक बात तो है, अगर पढ़ाते समय कोई डाँट दे तो जो डर और दबाव दिमाग में घर कर जाता है। उसके कारण जिन्दगी भर वह चीज समझ में तो आनी नहीं है। जब-जब वह विषय सामने आयेगा तो डाँट और भय उलझन पहले पैदा करते हैं। उलझन का वही बोझ जब तक विषय परिवर्तन नहीं करवा लेता तब तक चैन नहीं लेने देता।" (पृष्ठ-9)

                                बच्चों की रुचि के अनुसार दिलाये गये विषय बच्चे को पढ़ाई में आगे बढ़ने में काफी सहायक होते हैं, अतः माता-पिता को बच्चे की अन्य रुचियों को पहचान कर उसे उसी दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ऐसा लेखिका का मानना है। आभा की सहेलियों के मुख से यही कहलवाया है लेखिका ने-

                                "आभा के गले की मिठास, उसका सधे स्वर में गाना, उसके गीतों का संकलन, सब कुछ कितना अद्भुत है न? सब लोग हर विधा में तो प्रवीण होते नहीं। कोई गणित में अच्छा होता है, कोई संगीत में। जो जिस में अच्छा हो उसे उसी विषय आगे बढ़ने का अवसर मिले तो कितना अच्छा हो।" (पृष्ठ-8)

                लेखिका ने कमजोर विषय में सफलता प्राप्त करने का तरीका भी बतलाया है। आभा की सहेली अंषुमा कहती है कि-
"मेरी मम्मी कहती हैं, जो विषय तुम्हें जितना डराये, उससे उतनी ही दोस्ती करो। जिससे हम दोस्ती करते हैं उसके साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहते हैं। अन्य विषयों से ज्यादा समय उस विषय को दो तो अपने आप डर समाप्त हो जायेगा।" (पृष्ठ-12)

                संग्रह की दूसरी कहानी का शीर्षक है-‘सन्तुष्टि का सपना’।

                                यह ऐसे लोगों की कहानी है जो अपनी हीनभावना को छुपाने के लिए झूठ का सहारा लेते है। कहानी का नायक है स्पर्श। विद्यालय में पहले दिन उसके कक्षा अध्यापक ने उसकी अच्छी चित्रकारी की प्रशंसा करते हुए सभी छात्रों से उसका परिचय कराया तो सभी उससे घनिष्ठता बढ़ाने के लिए लालायित नजर आये। किन्तु स्पर्श ने घमण्ड के साथ यह कहते हुए दूरी बना ली कि दोस्ती तो बराबर वालों के साथ होती है। मेरे पापा एक डॉक्टर हैं। मेरा बहुत बड़ा बंगला है। तुम सब मेरी बराबरी के नहीं हो। तुम लोगों के पास न तो अच्छे जूते-कपड़े ही हैं और न तुम्हारे घर ही बड़े होंगे। इसलिए मैं न तो तुम लोगों के घर जा सकता हूँ और न तुम्हें अपने घर बुला सकता हूँ। इतना ही नहीं स्पर्श अपने अहंकार और कुसंगति के कारण पढ़ाई में पिछड़ने लगा। बीमार पड़ जाने के कारण जब स्पर्श कई दिन तक विद्यालय नहीं आया तो उसके सहपाठियों ने उसके घर जाकर उसे देखने की योजना बनाई। जब सब साथी खोजते हुए स्पर्श के घर पहुँचे तो देखकर आश्चर्यचकित रह गये। स्पर्श के पापा एक मैडीकल स्टोर पर कर्मचारी और उसका घर कामवालों के लिए दिए जाने वाला छोटा सा मकान था।

                स्पर्श की माँ ने जब सभी सहपाठियों को अन्दर बैठा लिया तो स्पर्श अपनी माँ पर नाराज हो उठा कि आपने इन्हें अन्दर क्यों बैठाया। उसने कहा-

                "आप नहीं जानतीं यहाँ से जाकर वे मेरा कितना मजाक बनाएंगे। मैंने सबको बता रख है कि मेरे पापा डॉक्टर है। हम बड़े घर में रहते हैं। बहुत अमीर हैं। मैं किसी से नहीं मिलना चाहता। मम्मी प्लीज, आप सबको भगा दो।" (पृष्ठ-19)

दिनेश पाठक ‘शशि’
इस पर माँ बड़ी शांति पूर्वक स्पर्श को समझाती हैं कि-
                                " बेटा, पहली गलती तो तुमने यह की कि सबको अपने बारे में गलत बताया। झूठ बोला। और दूसरी गलती यह करने जा रहे हो कि अब फिर अपने बारे में सच को छुपा रहे हो। सच्चाई का सामना करना सीखो। मेरा विचार है कि तुम्हें अपने दोस्तों से मिलकर अपने पिछले व्यवहार के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए।" (पृष्ठ-19)

                                जीवन का सफर कभी दिखाबे और झूठ की बैसाखियों पर नहीं टिकता, विदुषी लेखिका ने यही सबक इस कहानी में देने का प्रयास किया है। स्पर्श की बीमारी की स्थिति को समझते हुए उसके साथी घर पर होमवर्क आदि की अपनी कॉपियाँ पहंुचाने और सहायता करने का आश्वासन देकर चले गये तो स्पर्श की माँ ने उसे समझाया-"देखा बेटा, तुम बेकार में डर रहे थे। तुम्हारे दोस्तों ने तो कुछ भी जताया ही नहीं कि तुमने उनसे झूठ बोला या शेखी बघारी। अब बारी तुम्हारी है, तुम्हें अपनी गलती से सबक लेते हुए यह संकल्प लेना चाहिए कि आज से तुम कभी झूठ नहीं बोलोगे और न ही अपनी स्थिति को छुपाओगे।" (पृष्ठ-20)

                "समझौते प्यारे-प्यारे" संग्रह की तीसरी कहानी है। छोटी-छोटी बातें जिनका सामना दैनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति करता है उन्हीं को लक्ष्य करके यह प्यारी सी कहानी गढ़ी गई है। बच्चों का मन करता है टी.वी. पर कार्टून देखने का, आधुनिक गानों को जोर-जोर से बजाने का, क्रिक्रेट मैच की धमाचैकड़ी मचाने का लेकिन दादी को यह सब अच्छा नहीं लगता। इसी तरह की और भी बहुत सी छोटी-छोटी बातों का उल्लेख लेखिका ने कहानी में किया है और निष्कर्ष स्वरूप कहलाती हैं-

                                "सच! अविरल! तुम्हारी मम्मी ठीक कहती हैं यह समझौते की दुनिया है। आंधी, तूफान और झंझावात में जो पेड़ थोड़ा सा झुक जाते हैं, वही टिककर तनकर सदैव खड़े रहते हैं, नहींतो बड़े-बड़े पेड़, मोटे-मोटे तने वाले उखड़कर धराषायी हो जाते हैं। हमें भी प्यारे-प्यारे समझौते करने चाहिए और पक्षियों की तरह फुदकना चाहिए, फूलों की तरह मुस्कराना चाहिए और बादलों की तरह गाना चाहिए।" (पृष्ठ-27)

                                "अनोखी छुट्टियाँ" इस संग्रह की चौथी कहानी है। कहानी के नायक क्षितिज के विद्यालय की छुट्टियाँ चल रही हैं। उसने कक्षा में प्रथम स्थान पाया है। उसकी दादी के अस्वस्थ हो जाने पर उसके मम्मी-पापा गाँव जाने का कार्यक्रम बनाते हैं। वह यह सोचकर कि शहर जैसी सुविधा गाँव में कहाँ मिलेंगी, बड़े अनमनेपन से वह अपने मम्मी-पापा के साथ गाँव जाता है किन्तु गाँववासियों का निष्छल प्रेम देखकर वह अभिभूत हो उठता है। लेखिका डॉ. अमिता दुबे जी ने गाँव और वहाँ के लोगों का ऐसा मार्मिक वर्णन किया है कि कोई भी लालायित हो उठे-"क्षितिज ने धीमी आवाज में पूछा- क्यों आभास, ये सभी लोग हमारे घर में ही रहते हैं। आभास बोला- अरे नहीं, ये लोग तो पड़ोस के घरों में रहते हैं, तुम लोगों को आया हुआ देखकर आ गये हैं। क्षितिज को अपनी कॉलोनी याद आई जहाँ किसी के आने-जाने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। न कोई किसी से इतने प्यार से बोलता है।" (पृष्ठ-31)

                                दादी जी के ठीक हो जाने पर कुछ दिन बाद जब क्षितिज के मम्मी-पापा ने वापस षहर जाने की तैयारी की तो क्षितिज भावुक हो उठा-" मित्रो, यह अनोखी छुट्टियाँ मुझे जीवनभर याद रहेंगी। आप सबने मुझ अनजान को जो प्यार, आदर, सम्मान दिया वह मैं कभी भूल नहीं सकता।"

और फिर उसने हर बार छुट्टियों में गाँव आने का वायदा भी किया। इस प्रकार यह कहानी इस संग्रह की बहुत ही मार्मिक कहानी है।

                पाँचवीं कहानी का ताना-बाना एक ऐसी लड़की तनु को लक्ष्य कर बुना गया है जिसे लगता रहता है कि उसके मम्मी-पापा उसको बिल्कुल भी प्यार नहीं करते केवल उसके छोटे भाई दिव्यांश को ही प्यार करते हैं और इसी कारण वह घर में आते ही तरह-तरह की हठधर्मी करने लगती है। सुबह को देर तक बिस्तर नहीं छोड़ती। घर का कोई काम नहीं करती। लेकिन एक दिन जब उसकी मम्मी सुबह को काम करते हुएकिचिन में गिर जाती हैं और फ्रैक्चर हो जाने के कारण तनु को सोता छोड़कर अस्पताल में भर्ती हो जाती हैं तो तनु को बहुत पछतावा होता है। उसने अपने आप को बदलना शुरू किया तो उसे लगा कि

 घर में सभी उसे बहुत प्यार करते हैं-
                "तनु सोच रही थी अपनी जिद और बेवकूफी में उसने कितने दिन बर्बाद कर दिए। घर में सभी लोग तो वैसे के वैसे ही हैं। बदली है तो केवल वह, उसकी सोच, उसकी दृष्टि। सब कुछ कितना प्यारा हो गया है उसके चारों ओर।" (पृष्ठ-39)

                इस कहानी के माध्यम से विदुषी लेखिका ने उन सभी बच्चों को एक अच्छा संदेश दिया है जिनके मन में अपने माता-पिता के प्रति यह भाव रहता है कि हमारे माता-पिता हम बहन-भाइयों में भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं।

         कुल मिलाकर संग्रह की सभी कहानियाँ शिक्षाप्रद हैं, पुस्तक का मुद्रण साफ-सुथरा एवं त्रुटिहीन है। गैटअप बहुत ही लुभावना एवं प्रयुक्त कागज उच्च स्तरीय है। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी  आशा है।

2 comments :

  1. बहुत सुंदर समीक्षा। उत्तम बाल कथा संग्रह-' राह मिल गई' की विदुषी लेखिका डॉ अमिता दुबे जी व कुशल समीक्षक डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को अनंत हार्दिक बधाइयां।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष- तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी
    मथुरा
    संपर्क सूत्र- 9758593044

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  2. बहुत सुंदर समीक्षा। उत्तम बाल कथा संग्रह-' राह मिल गई' की विदुषी लेखिका डॉ अमिता दुबे जी व कुशल समीक्षक डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को अनंत हार्दिक बधाइयां।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष- तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी
    मथुरा
    संपर्क सूत्र- 9758593044

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