दो कविताएँ

ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता
- ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता

1. 
हाँ मुझे नहीं आता
अलमारी को सजा के रखना
नहीं आता
पसंद है मुझे कि कोई न देखे मेरी चीजों को
और
न कभी टोके कि
ये यहां वहां ऐसे वैसे रखती ही क्यों हो
मुझे जवाब देना नहीं आता
आलों में रखी मेरी किताबें, कापियाँ, डायरी
मुझे बिखरी अच्छी लगती थीं
मैं उनको थोड़ा बाहर ही खींच कर रख लेती थी
कि 
जब मन हो खींच लूँ
पढ़ लूँ कुछ,
लिख दूँ कुछ,
मुझे अच्छा लगता था कई बार दराजों के बिखरे सामानों के बीच अपनी कोई खोई चीज़ ढूँढना
डाँट तो बहुत खाई इन सब पर
इसलिये कई बार बिखरे समान को साफ़ कपड़े से ढँक दिया करती थी चुपचाप
अब बहुत कुछ बदल गया है
रखती हूँ करीने से चीजों को
टोकती हूँ, रोकती हूँ
हर समान की लिखकर पर्ची बनाती हूँ,
लाडो रख दे कुछ इधर उधर तो ज़ोरदार फटकार भी लगाती हूँ
अलमारियों पर चिपकी रहती है,हर काम करने की लिस्ट
उसके काम
खुद के काम
सबके काम
पर अब
भी 
मुझे बहुत याद आता है
मेरा बिखरा हुआ आज़ाद कमरा।
***

2.
 कितने सुंदर रंग है न!
सभी रंग मुझे अच्छे लगते हैं
हर रंग कुछ कहता है मुझसे
नदी,जल,पहाड़ हर दिन रंग बदलते हैं
ये रंग मुझे अच्छे लगते हैं
क्या इन रंगों को मैं अच्छी लगती हूँ?
क्यों मुझे बताना पड़ता है
कि मेरा रंग अलग क्यों है
क्यों मैं अपने पिता के रंग की हूँ
माँ का रंग मुझे नहीं मिला
जिसने कहा यही कहा कि 
तुम सबमें अलग हो
पर
अलग व्यवहार से नहीं रंग से हो
जब पहुँची तस्वीर खिंचवाने स्टूडियो में
फोटोग्राफर ने मेरा रंग बदल दिया
मैं बहुत चिल्लाई और कहा कि
ये मैं नहीं हूं
मुझे वही रहने दो जो मैं हूँ
कोई न कोई
कभी न कभी
उपाय सुझाता रहता
ये लगा लो,वो लगा लो
साफ़ हो जाओगी,
शादी हो जायेगी
सवाल नहीं होंगे
मैं सुनती रहती
संभलती रहती
साफ़ रंग को शायद सजना कम पड़ता है
पोतना कम पड़ता है
ये रंग पहचान का सबब है क्या?
मैं खोती जा रही थी रंगों की दुनिया में
कभी-कभी डर भी जाती थी
भेद -प्रभेद देखने के बाद
मुझे लगा कि
मेरा रंग तो वह है। जिसमें
कोई और रंग मिला दे तो क्या बनेगा
सोचना बंद किया और करना शुरू किया
अपना मान देखा
सम्मान देखा
अपनी दुनिया बनाई
अपने रंग पर 
मुस्कुराकर कहा 
हूँ मैं साँवले रंग की हूँ।

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