प्लेटो की काव्य-संबंधी मान्यताओं का अध्ययन

प्राची तिवारी

शोधार्थी (पीएच.डी)
हिंदी साहित्य,दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग, दिल्ली-110007
चलभाष: +91 875 057 8276; ईमेल: prachitiwari023@gmail.com

"यदि हम राज्य में सत्य, न्याय और सदाचार की रक्षा करना चाहते हैं तो कविता का बहिष्कार करना होगा! कवियों को राज्य से निकाल देना होगा" (प्लेटो)

यूनान के एथेंस में प्लेटो का आविर्भाव हुआ था। आरंभ में ही स्पष्ट कर दें की प्लेटो मुख्यता दार्शनिक व राजनीतिक चिंतक थे। इन्हीं क्षेत्रों से उनकी काव्य संबंधी मान्यताएं निर्धारित हुई हैं।

प्लेटो की काव्य संबंधी मान्यताओं पर विचार करने से पहले उस समय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को संक्षेप में समझ लेना आवश्यक है क्योंकि कोई भी चिंतन अपने समय से गहराई तक जुड़ा होता है तथा प्रभावित रहता है। यूनान के उत्तरी भाग में मकदूनिया, मध्यवर्ती में आत्तिका व दक्षिण में लाकोनिया था। मकदूनिया सिकंदर महान की जन्म-भूमि होने के कारण प्रसिद्ध है। आत्तिका की राजधानी एथेंस यूनान की समस्त बौद्धिक, वैज्ञानिक एवं कलात्मक उपलब्धियों का उद्गम-स्थल है तथा विश्व-भर में इसी कारण यूनान अमर है। लाकोनिया की राजधानी स्पार्टा का नाम आज भी उसके शौर्य, वीरता के लिए याद किया जाता है।

प्लेटो का जन्म 427 ईसा पूर्व में हुआ था। प्लेटो के जन्म से 4 वर्ष पहले स्पार्टा ने एथेंस पर आक्रमण किया जो 27 वर्षों तक चला तथा अंततः 404 ईसा पूर्व में एथेंस की पराजय के साथ समाप्त हुआ। अर्थात प्लेटो का शैशव यौवन युद्ध में बीता तथा एथेंस की शर्मनाक हार को प्लेटो ने अपनी आंखों से देखा। एथेंस की सारी बौद्धिकता कला धरी की धरी रह गई। स्पार्टा के शौर्य के आगे एथेंस ढह गया। प्लेटों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा तथा उनके चिंतन की दिशा इसी के अनुरूप ढल गई। अपनी पुस्तक 'गणतंत्र' में वे कहते भी हैं- 'गुलामी मृत्यु से भी भयावह है।' यह पंक्ति वही लिख सकता है जिसने गुलामी सही हो। इसी कारण प्लेटों को शौर्य वीर का महत्व ज्ञात हुआ।

एथेंस की पराजय के पाँच वर्षों बाद सुकरात को मृत्यु-दंड दे दिया गया। सुकरात के विचार रूढ़ि विरोधी थे। वह प्लेटो के गुरु थे। रूढ़िवादी उनको बेहद नापसंद करते थे। सुकरात बुद्धि और तर्क के अतिरिक्त किसी भी बाह्य सत्ता का आदेश मानने को तैयार नहीं थे। उनकी विचार-प्रक्रिया में भावना का स्थान न था। लोकतांत्रिक एथेंस में उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया। इस प्रकार इन घटनाओं ने एथेंस की बौद्धिकता, कलात्मकता, लोकतांत्रिकता के प्रति प्लेटो की आस्था डिगा दी।

इस प्रकार प्लेटो के मानस का निर्माण हुआ। इसीलिए प्लेटो के संपूर्ण चिंतन का मुख्य उद्देश्य आदर्श राज्य-निर्माण रहा। प्लेटो का यह आदर्शवाद समकालीन समाज के पतन की गहरी प्रतिक्रिया का परिणाम है।

अब यदि बात की जाए उनकी काव्य-संबंधी मान्यताओं की तो प्लेटो की मुख्य चिंता है- आदर्श राज्य में काव्य और कला की उपयोगिता। इस संबंध में निर्मला जैन ने लिखा है- "इसकी उपयोगिता का निर्णय करने के क्रम में उन्होंने कला की परिभाषा, कलाओं में काव्य का स्थान, काव्य का स्वरूप, काव्य की प्रेरणा, काव्य के विषय, काव्य के रूप, काव्य के भावात्मक प्रभाव, काव्य और सत्य, काव्य और जीवन का संबंध, काव्य और सौंदर्य एवं शिवत्व आदि अनेक विषयों का स्पर्श किया है। इस सूची की परिव्यप्ति एक व्यवस्थित काव्य-सिद्धांत के पुनिर्माण की संभावना की ओर निश्चित रूप से संकेत करती है, भले ही प्लेटों के संवादों में किसी निश्चित क्रम का निर्वाह न हुआ हो।" (पाश्चात्य साहित्य चिंतन- निर्मला जैन)

कला और साहित्य से असीम आनंद प्राप्त होता है, यह बात प्लेटो स्वीकार करते हैं किंतु वे ऐसे आनंद को जो आदर्श राज्य के मार्ग में बाधक सिद्ध हो कोई महत्व नहीं देते। कला और साहित्य का निकष उनके लिए सौंदर्य या आनंद न होकर उपयोगिता थी। यहाँ तक की सौंदर्य के संबंध में उनकी धारणा थी कि जो वस्तु उपयोगी है वही सुंदर है। प्लेटो ने साहित्य के विरुद्ध लगभग मोर्चा खोलते हुए उस पर अनेक आरोप लगाए। डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने इन आक्षेपों को चार भागों में बांटा है-

1. मिथ्यात्व 2. अमौलिकता 3. अनुपयोगिता 4. कवि:दुर्बलता एवं अनाचार का पोषक
(भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धांत- डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त)

प्लटो प्रत्ययवादी (idealist) दार्शनिक है। प्रत्ययवाद के अनुसार प्रत्यय अर्थात विचार ही परम सत्य है तथा ईश्वर उसका स्रष्टा है। यह दृश्यमान वस्तु-जगत प्रत्यय का अनुकरण है। विचार अमूर्त है, दृश्यमान वस्तु-जगत को ही अपनी कला द्वारा चित्रित करता है, इसलिए कला का क्रम तीसरा है। कला वस्तु-जगत का अनुकरण करती है। इस प्रकार कला अनुकरण का अनुकरण है। इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं-

विचार–दृश्यमान वस्तु-जगत–कला
अनुकरण अनुकरण
(आभास) (आभास)

पहला स्थान विचार (प्रत्यय या परम सत्य) का, दूसरा उसके आभास वस्तु जगत का और तीसरा वस्तु जगत के आभास कला-जगत का, इसीलिए परम सत्य से कला का तिहरा अलगाव है और अनुकरण का अनुकरण होने से वह मिथ्या है। अव्वल तो यह वस्तु-जगत मिथ्या है, उस पर भी कलाकार मिथ्या जगत की अनुकृति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार व सत्य से तिगुना दूर है। इसी कारण वह प्लेटो के अनुसार प्रशंसनीय नहीं, दण्डनीय है।

कलाकार अथवा साहित्यकार कृति नहीं अनुकृति प्रस्तुत करता है। यह हम बता चुके हैं। इससे सीधे-सीधे यह बात सिद्ध हो जाती है कि इनमें मौलिकता का लेश-मात्र भी नहीं होता। ये नितांत अमौलिक होते हैं। और बात रही अज्ञानता की तो प्लेटो के अनुसार कवि-कलाकार का महत्व मोची या बढ़ई जितना भी नहीं। एक मोची का कार्य देखकर जब दूसरा मोची अनुकृति द्वारा जूतों की जोड़ी बनाता है, तो हम उसे अमौलिक तो कह सकते हैं परंतु अज्ञानी नहीं क्योंकि वह जब तक जूता बनाने का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता तब तक अनुकृति प्रस्तुत नहीं कर सकता। परंतु कलाकार के पास जूता बनाने का ज्ञान न भी हो, फिर भी उसका प्रतिबिंब प्रस्तुत कर देगा। मोची के जूते तो फिर भी काम आ सकते हैं, परंतु कलाकार द्वारा प्रस्तुत चित्र सर्वथा निरुपयोगी है। इस प्रकार कलाकार व उनकी कला नितांत अमौलिक व अज्ञानता से भरी रहती है।

प्लेटो उपयोगिता की बात करते हैं। जो चीज उपयोगी नहीं, वह त्याज्य है। चूँकि कला अनुकृति है मिथ्या है, इसीलिए वह किसी भी दृष्टि से उपयोगी सिद्ध नहीं होती। प्लेटो के विचार से कलात्मक रचनाएं समाज के लिए सर्वथा अनुपयोगी हैं। कवि द्वारा वर्णित विषय से न तो उसकी यथातथ्य जानकारी प्राप्त होती है तथा न ही उससे हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है। इसी कारण प्लेटो होमर की भी आलोचना करते हैं।

प्लेटो का सबसे बड़ा आरोप बल्कि इसे हमला कहना अधिक सही होगा कि काव्य-कवि दुर्बलता व अनाचार के पोषक होते हैं। प्लेटो के लिए यह अपराध है। प्लेटो के विचार से किसी भी समाज और राज्य में सत्य, न्याय और सदाचार की प्रतिष्ठा तभी संभव है जबकि उसके सभी व्यक्ति अपनी वासनाओं और भावनाओं पर पूरा नियंत्रण रखते हुए विवेक-बुद्धि के अनुसार चलें। इसके विपरीत कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्तियों की भावनाओं को उद्वेलित करता है।

प्लेटो का कहना है कि होमर के महाकाव्यों (इलियड व ओडिसी) में देवताओं को क्रूर, लोभी, कलही, प्रतिशोधी आदि रूपों में चित्रित किया गया है। यह अनुचित है। इसी प्रकार वीरों और नायकों के चरित्र भी निर्बलताओं से रहित नहीं हैं। इस प्रकार मनुष्यों को इनसे कोई सत्प्रेरणा नहीं मिलती।

काव्य में भय, काम, वासना, कलह, विलाप आदि का चित्रण होता है। इस कारण वीरता के बजाय भीरुता और कापुरुषता का प्रसार होता है। ये भाव शुद्धता, सात्विकता और संयम में बाधक होते हैं।

काव्य ऐसी कहानियों से भरा है जिनमें सज्जन तो दुख भोगते दिखाए गए हैं और दुर्जन सुख भोगते। प्लेटो के अनुसार जिस विधान में सदाचार के लिए दंड और कदाचार के लिए पुरस्कार होगा, वहाँ नैतिकता कैसे टिकेगी? न्याय के प्रति कैसे विश्वास उपजेगा? इसीलिए ऐसा काव्य हेय है।

प्लेटो नाटकों के अभिनेता की भी बात करते हैं। पात्र अच्छे भी होते हैं तथा बुरे भी। बुरे पात्रों का अनुकरण करते-करते अभिनेताओं में भी बुराइयाँ आ जाती हैं। इसका असर देह, दिमाग पर पड़ता है। प्लेटो के आदर्श राज्य के निर्माण में यह बाधक है। कोई शालीन व्यक्ति अपना दु:ख किसी के सामने व्यक्त नहीं करता परंतु कई बार नाटक में कोई करुण दृश्य आने पर वह सबके सामने विलाप करने लगता है। इससे वीर व धैर्य भाव का ह्रास होता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि काव्य भावमूलक होता है। प्लेटो तर्क की ही सत्ता मानते थे। काव्य भाव को उद्दीप्त करता है, तर्क को नहीं, हृदय को प्रभावित करता है, बुद्धि को नहीं। भावातिरेक से न केवल सत्य व शिव से वंचित होना होता है बल्कि संयम व संतुलन बाधित होता है।

प्लेटो काव्य को 'अन्योक्ति' की भी छूट देने को तैयार नहीं थे। प्लेटो का कहना है कि बालक या नवयुवक में इतनी बुद्धि नहीं होती कि वह अन्योक्ति तथा यथार्थ में भेद कर सके।

निष्कर्ष रूप से देखा जाए तो प्लेटो के काव्य-संबंधी प्रतिमान साहित्येतर हैं। प्लेटो का सपना आदर्श राज्य के निर्माण का है। प्लेटो के आदर्श राज्य के निर्माण में जो बाधक तत्त्व हैं प्लेटो उनको बाहर कर देने के पक्षधर हैं चाहे वह काव्य ही क्यों न हो।

इन बिंदुओं के आधार पर प्लेटो को काव्य विरोधी ठहरा दिया जाता है। परंतु चीजें इतनी भी सरल नहीं होतीं। निस्संदेह प्लेटो के समय का काव्य वासना में डूबा था। युद्ध में पराजित एथेंस की गरिमा तार-तार हो रही थी। रोम जलता रहे और नीरो बंशी बजाता रहे यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है। ऐसे में यदि प्लेटो जैसा दार्शनिक काव्य के प्रति घोर आलोचनात्मक हो जाए तो आश्चर्य कैसा! सन 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद (जिसमें भारत पराजित हुआ था) 'दिनकर' जैसा गांधीवादी कवि परशुराम की प्रतीक्षा लिखता है तो आश्चर्य कैसा!

प्लेटो का रुख़ यदि घोर आलोचनात्मक है तो उनके पास इसका ठोस आधार है। प्लेटो यदि कवियों को राज्य से बाहर करने का सुझाव देते हैं तो वे यह भी कहते हैं- "यह सब होते हुए भी इस बात की घोषणा कर देनी चाहिए की यदि प्रिय लगने वाली मधुर कविता तथा अनुकरणात्मक कलाएँ किसी सुव्यवस्थित राष्ट्र में बने रहने के लिए युक्ति प्रदर्शित कर सकें तो हम सहर्ष उनको नगर में प्रविष्ट कर लेंगे क्योंकि हम स्वयं उसके आकर्षण के विषय में अत्यंत सचेत हैं।"

प्लेटो काव्य के महत्त्व, आकर्षण व प्रभाव को समझते हैं। वे स्वयं काव्य-प्रेमी थे। सुकरात से मिलने से पहले वह काव्य भी लिखा करते थे। वह काव्य को अनुकरण अवश्य मानते थे परंतु प्लेटो का विरोध अनुकरण से नहीं, अनुकरण के विषय से है।

प्लेटो के अनुसार सभी मनुष्य आदर्श राज्य अर्थात अच्छा शासन चाहते हैं, शासन अच्छा तभी हो सकता है जब उसके नागरिक अच्छे हों, नागरिक तभी अच्छे होंगे जब उनकी शिक्षा अच्छी होगी।

प्लेटो की दृष्टि राज्य के भावी नागरिकों की शिक्षा पर केंद्रित थी। इसीलिए उन्होंने ऐसे विषयों को अनुकरणीय माना जिनसे सदमूल्यों में आस्था पैदा हो। उनका स्पष्ट मानना था कि विवेकहीन, अपरिपक्व मन पर दुष्प्रभाव डालने वाले साहित्य का पूर्णतः निषेध होना चाहिए वह सत्य ही क्यों न हो।

प्लेटो कला में सत्य का अंश केवल शुभ के रूप में मानते हैं। अतः कविता का सत्य इसी में है कि वह जीवन के शुभ का अनुकरण करें। इस प्रकार 'गणतंत्र' के दसवें अध्याय में काव्य संबंधी प्रश्न काव्य की नैतिकता का न रहकर काव्य-सत्य का हो गया है।

प्लेटो के काव्य-संबंधी विचार व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। निस्संदेह उनकी काव्य-संबंधी मान्यताओं का खंडन किया जा सकता है बल्कि किया भी गया है, स्वयं उनके शिष्य अरस्तु ने अपने विरेचन सिद्धांत से उनकी मान्यताओं का खंडन किया है। परंतु उसी से प्लेटों को काव्य विरोधी कहना न्याय संगत नहीं है उनकी मान्यताएं अपने समय से प्रभावित हैं।

प्लेटो नें काव्य-सृजन की प्रक्रिया पर भी विचार किया है। प्लेटो की एक अत्यंत महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि सभी कवि अपनी काव्य-रचना वे किसी सचेत कलात्मक प्रेरणा द्वारा नहीं बल्कि दैवी शक्तियों से प्रेरित एवं अभिभूत होकर करते हैं। कोई भी कवि जब तक वह शक्ति को धारण करता है तब तक काव्य के देववाणी तुल्य उपहार का अधिकारी नहीं होता। काव्य का सृजन ऐसी मन:स्थिति में होता है जब कवि का सहज विवेक प्रबुद्ध न रहकर किन्हीं दैवी शक्तियों के अधीन हो जाता है और वह एक आरोपित व्यक्तित्व धारण कर लेता है। इस अवस्था में वह केवल एक यंत्र, एक माध्यम रह जाता है। अर्थात काव्य-सृजन प्रक्रिया को प्लेटो ने एक सुचिंतित कलात्मक प्रयास नहीं माना। परंतु कहना होगा प्लेटो ने प्रेरणा-सिद्धांत का प्रतिपादन कविता को वैज्ञानिक ज्ञान से अलगाने के लिए किया, कवि की अवमानना या अनादर के लिए नहीं।

जिस वातावरण में प्लेटो का विकास हुआ था उसने प्लेटो को ऐसा सोचने पर मजबूर किया। जिस प्रकार के साहित्य की खोज प्लेटो कर रहे थे वह उन्हें उस समय न मिला, परिणाम स्वरूप उनकी दृष्टि घोर आलोचनात्मक हो गयी। अन्यथा उनका चिंतन आज भी मार्गदर्शन देता है। कविता को अनुकृति बता कर काव्यमीमांसा के क्षेत्र में एक ऐसे सिद्धांत की प्रतिष्ठा की जो आगे चलकर काव्य-समीक्षा का आधार बना। प्लेटो ने काव्यानुभूति का स्वरूप आनंददायक एवं उसका आधार भावोद्वेलन को स्वीकार करते हुए आस्वादन-प्रक्रिया के सूत्रों की स्थापना की। इस दृष्टि से प्लेटो की स्थापनाएँ भारतीय रस-सिद्धांत के बहुत निकट हैं। काव्य-सृजन प्रक्रिया संबंधी उनका 'प्रेरणा सिद्धांत' भारतीय काव्यशास्त्र के काव्य हेतुओं में 'प्रतिभा' के समीप है।

फिर भी अपने दृष्टिकोण की एकांगिता व अपने युग की दूषित प्रवृत्तियों के कारण उन्होंने कविता को संतुलित दृष्टिकोण से नहीं देखा। परंतु उनका ध्येय आदर्श राज्य की स्थापना था, इसी कड़ी में उनकी दृष्टि ऐसी हुई तो आश्चर्य नहीं।


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