कांट की नैतिकता - ईश्वरमयी

डा. मनहर चारण

विभागाध्यक्ष/इंचार्ज, चेतना विकास मूल्य शिक्षा विभाग,
आई.ए.एस.ई. मान्य विश्वविद्यालय, सरदारशहर
 ईमेल: manharcharan@gmail.com, 9509797972

कांट (Immanuel Kant, 1724-1804) पाश्चात्य जगत का अत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक है। कांट का दर्शन अभी तक आलोचनात्मक दृष्टि के आधार पर मूल्यांकन की ओर पूरा नहीं हुआ, मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि समकालीन पाश्चात्य दर्शन में आज दो प्रमुख धाराएँ हैं- ब्रिटेन तथा अमेरिका में विश्लेषण (एनालिसिस) का प्रचलन है और यूरोप, विशेषतः फ्रांस तथा जर्मनी में फेनामेनालाजी तथा आस्तित्ववाद की लोकप्रियता है। कांट के दर्शन का प्रभाव पहले से स्वीकार किया गया है किन्तु फेनामेनालाजी तथा अस्तित्ववाद के संदर्भ में भी कांट के दर्शन की प्रासंगिकता पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। एक ऐसा ही प्रयास अंग्रेजी भाषा में राबर्ट सी. सोलोमन (1942-2007) ने फ़्रांस रेशनलिज्म टु एग्जिस्टेन्शियलिज्म में किया है। संक्षेप में कहा जाए तो कांट प्रमुख रुप से दो प्रश्नों का उतर खोजने के प्रयास में हैं – प्रथम, वैज्ञानिक ज्ञान कैसे संभव है? और द्वितीय, नैतिक तथा धार्मिक जीवन कैसे संभव है? कांट, विज्ञान तथा नैतिकता दोनों को सुरक्षित करना चाहता है और कांट का दावा है कि कापरनिकसीय (1473-543) क्रान्ति पर आधारित उसका आलोचनात्मक दर्शन ऐसा करने में सक्षम है। कांट की इस समस्या का ज्ञान की समस्या से गहरा संबंध है अर्थात मानव के ज्ञान का स्वरूप क्या है? परिणामस्वरूप वर्तमान तक मानव द्वारा रचित रचनात्मकता अपने-अपने स्तर का स्पर्श लिए हुए हैं मानवीय ज्ञान कहलाने वाली वस्तु में रचनात्मकता स्पर्श तो अंकित है, किन्तु ज्ञान का निर्धारण मानवीय चेतना न होकर वस्तु द्वारा निर्धारित है अर्थात मानव वस्तु को रुप और आंशिक गुण तक ही समझता है, स्वरूप तथा धर्म को समझना, मानवीय चेतना को समझना है। अभी सारा ज्ञान वस्तु सापेक्ष है, उसमें भी रूप प्रधानता में है। जबकि अस्तित्व की सकी इकाइयों का आचरण निश्चित है, इस निश्चित आचरण को जानना ही मानवीय चेतना को समझना है। जानने के आधार पर ही ज्ञान संप्रेषणीय होता है एक ही प्रकार की चेतना स्वीकार होती है, साझीदारी में सहभागिता होती है।

विश्लेषणवाद, जो सर्वाधिक प्रभावशाली विचारधारा है, इस पर भी कांट के दर्शन का स्पस्ट प्रभाव है पी.एफ. स्ट्रासन (1919-2006) ने कांट के महत्व पर टिप्पणी की है- हमारे लिए एक ऐसे जगत की कल्पना सम्भव है जो, हमारे अनुभव से भिन्न हो। किन्तु ऐसे अनुभवों का बोधगम्य वर्णन नहीं हो सकता। हमारे सोचने की और बोधगम्य वर्णन करने की एक सीमा होती है.... इसकी खोज एक अत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक का कार्य है। इस कार्य को कांट से बेहतर ढं़ग से किसी अन्य दार्शनिक ने नहीं किया है।

मार्टिन हाइडेगर  (1889-1976) तथा सार्त्र  (1905-1980)  की फेनामेनाजिकीय दृष्टि से भी कांट के दर्शन की प्रासंगिकता देखी जा सकती है, अपने दार्शनिक ग्रंथ- ‘एग्जिस्टोन्रीयलिज्म ऐज ए हम्यूमनिज्य’ में सात्र्र स्पष्टतः कान्टीय ढं़ग से मानवीय स्वतंत्रता की बात करता है। बाद में जब सार्त्र ने कांट की मान्यता को छोड़ कर स्वतंत्रता को निषेध करने की क्षमता से युक्त बताया, जो कि सर्वथा नई बात नहीं है। कांट की स्वतंत्रता की अवधारणा तार्कित आधारों द्वारा प्रतिपादित है, जब कि सात्र्र उसे अस्तित्वपरक अर्थ में ग्रहण करता है। कांट नैतिकता को तर्कसंगत मानते हुये भी उसे ज्ञान का विषय नहीं मानता, वह व्यवहारिक जीवन की वास्तविकता है, कांट के इस विचार से नैतिक जीवन की अस्तित्वपरक अवधारण की ओर जाना स्वाभाविक प्रतीत होता है।

कांट की अस्तित्वपरक अवधारणा, नैतिकता तथा नीतिशास्त्र को समझने के लिए Critique of Pure Reason  (1783) (1787) Idea for a Universal History (1784) Critique of Judgment 1790) Perpetual peace (1795) इन ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य है। कांट दार्शनिक से ज्यादा आस्थावादी था। अपने लेखन में स्पष्टता के बावजूद भी वह आस्था की सुरक्षा के लिए ज्ञान (कांट ने ‘ज्ञान’ शब्द का प्रयोग तकनीकी अर्थ में किया है। ज्ञान का अर्थ बुद्धि, विकल्प  एवं इन्द्रिय-संवेदनों से प्राप्त ज्ञान है।) को निषेध मानता है। मैंने आस्था की सुरक्षा के लिए ज्ञान का निषेध आवश्यक समझा है। वहीं अपने जन्म स्थल (कोनिग्सबर्ग) के प्रति भी इतनी ही गहरी आस्था रही है - ‘इसमें रहकर, बिना कहीं गए भी, मनुष्यों तथा जगत के संबंध में समस्त ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।’

रूडॉल्फ कार्नप (1891-1970) लिखते हैं - ‘तत्वमीमांसा, मूल्यशास्त्र एवं नीतिशास्त्र के तथाकथित वाक्य वस्तु, वाक्यभास है, तार्किक तथ्य से सर्वथा रहित वे केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति है।’ बुद्धि के लिए जो अगम्य है, वह आस्था का विषय है। बुद्धि का अपना अंतर्विरोध ही बुद्धि का सीमांकन करता है और उस सीमा से परे का क्षेत्र, आस्था का खुला हुआ विषय है। अतः कांट का मानना है कि अंर्तवती तत्वमीमांसा तो संभव है, किन्तु अतिवर्ती तत्वमीमांसा असम्भव है। कांट के समकालीन बुद्धिवाद और अनुभववाद के विरोध से दर्शन में एक गतिरोध आ गया। हालांकि, हा्रूम के संदेहवाद तथा तत्व मीमांसा से उत्पन्न बुद्धि के विप्रतिषेधों ने तात्विक चिंतन की सार्थकता के सामने बहुत बडा़ प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। ऐसी स्थिति में कांट का दर्शन दो प्रमुख समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास करता है- प्रथम, गणित तथा प्राकृतिक विज्ञानों की हा्रूम के संदेहवाद से रक्षा करना था। क्योंकि कारणता के सिद्धान्त का खण्डन करके हा्रूम ने विज्ञान के क्षेत्र में अनिश्चितता उत्पन्न कर दी तथा गणित के प्रति उसका दृष्टि भ्रामक था। कांट का पूरा ‘प्रालिगोमेना तथा क्रिटिक ऑफ प्योर-रीजन’ के ‘ट्रांसेन्डेन्टल एस्थेटिक’ तथा ट्रांसेन्डेटंल एनालिटिक’ खंड इसी समस्या के समाधान के लिए लिखे गए हैं।

कांट का दूसरा लक्ष्य परिकल्पनात्मक तत्वमीमांसा की भ्रांतियों को भेद करके उसके स्थान पर तत्वमीमांसा को एक विज्ञान के रुप में स्थापित करना था। नैतिकता तथा विज्ञान कांट के लिए दोनों ही महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। कांट अन्तर्वर्ती तत्वमीमांसा (इमेनेंट मेटाफिजिक्स) की स्थापना करके इसका उतर देता है। इसके लिए कांट ने आलोचनात्मक पद्धति का प्रयोग किया है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘कांट’ की यह क्रांति तो कॉपरनिकस-विपरीत क्रांति हुई, क्योंकि कॉपरनिकस ने सृष्टि के मध्यबिन्दु के रुप में प्रतिष्ठित मनुष्य (पृथ्वी) को उसके स्थान से विस्थापित करके परिधि की ओर ढ़केल दिया, जबकि कांट परिधि पर स्थिर मनुष्य को मध्यबिन्दु पर लाकर प्रतिष्ठित करता है । क्योंकि कांट को नैतिकता मानव की आत्मा में दिखती है न की किसी वस्तु विशेष में।

हारुम का संदेहवाद लॉक (1632-1704) की अनुभववादी प्राक्कल्पनाओं का तार्किक निष्कर्ष है। जबकि लॉक ने ज्ञान को लेकर उठाए अपने प्रश्नों- ज्ञान के स्रोत, सीमा व विस्तार का निर्धारण उसका प्रयोजन? आदि के समाधान में बुद्धि को ‘कोरे कागज’ की भांति प्रस्तुत करके अनुभववाद की नींव रखी थी। किन्तु ‘आलोचना’ के प्रति कांट तथा लॉक के दृष्टिकोण में मौलिक भेद है। लॉक की आलोचना का स्वरूप मनोवैज्ञानिक है, जबकि कांट की आलोचना का आधार दार्शनिक अथवा ज्ञानमीमांसा है।

कांट का नीतिशास्त्र:
कांट ने ‘क्रिटिक ऑफ़ प्रैक्टिकल रीजन’ के निष्कर्ष के प्रारम्भ में लिखा है ‘मुझे ऊपर तारे तथा मेरे भीतर विद्यमान नैतिक नियम- इन दोनों पर जितना में विचार करता हूँ, उतना मुझ में भयमिश्रित श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है तारों से कांट का तात्पर्य प्रकृति जगत से है जो अनिवार्य, सार्वभौम नियमों को प्रदर्शन लिए हुए है, साथ ही नैतिक नियम से कांट का तात्पर्य- मानव के उस अदृश्य अस्तित्व से है, जिसके भीतर एक भिन्न प्रकार का जगत विद्यमान रहता है। कांट का नीतिशास्त्र यही स्थापित करने का प्रयास है कि ईश्वर, आत्मा तथा स्वतंत्रता के प्रत्यय का होना अनिवार्य है, इसके अभाव में नैतिक आधार तय करना मुश्किल है। इसकी वास्तविकता का आधार ज्ञान नहीं बल्कि आस्था है। नैतिकता को कांट ने मनुष्य के तीन प्रकार के प्रेरकों से प्रेरित हो कर कार्य करने की प्रवृत्ति में रखा है -
1. अतार्किक इच्छा की पूर्ति
2. अधिक से अधिक इच्छाओं को तृप्त करने की, अधिकतम सुखी होना
3. नैतिक नियम के आदेशों की पालना।

नैतिकता के नियमों को तर्कशास्त्र से जोड़ते हुए कांट कहते हैं ‘तर्कशास्त्र के नियम प्रत्यक्ष तथा निरीक्षण से प्राप्त नहीं होते, इसलिए सामान्य तथा अनिवार्य होते हैं, उसी प्रकार नैतिकता के नियम भी इंद्रियानुभविक परिस्थितियों से निगमित न होने के कारण सार्वभौम यथार्थता से युक्त होते हैं। नैतिक नियम से प्रेरित कार्यों की वैधता तथा नैतिकता के प्रमाण नैतिक नियम ही हैं। परिणाम ऐसे कार्यों के मूल्य को प्रभावित नहीं करते। परिणाम कुछ भी हो कांट के अनुसार क्या कर्ता की इच्छा का विषय नैतिक नियम है, अथवा अन्य कोई आधुनिक तत्व? कांट के अनुसार मनुष्य की इच्छा शुभ नहीं होती, इसलिए नैतिकता का आधार दैवीय इच्छा है? क्योंकि दैवीय इच्छा पूर्णतः शुभ है वह कर्तव्य-अकर्तव्य के द्वंद्व का अतिक्रमण कर चुकी होती है। ऐसा ईश्वर के लिए ही सम्भव है, मनुष्य के लिए नहीं। मनुष्य केवल शुभता से प्रेरित होकर कार्य करता है, कांट के अनुसार अहंकार या धर्मोन्माद को जन्म देना है। मानव स्वभाव में प्रवृत्तियाँ तथा वासनायें जैसे संवेदनात्मक तत्व विद्यमान होते है। मनुष्य का स्वभाव भावनाओं और विवेक के द्वंद्व से परिभाषित है इसी द्वंद्व या संघर्ष के माध्यम से वह महानता (मनुष्य स्तर की) प्राप्त करता है। कांट महानता युद्ध व संघर्ष के माध्यम से ही होती, दूसरी तरफ कांट नैतिकता का बात करता है अर्थात कांट की दार्शनिकता में युद्ध नैतिकता है? युद्ध किसी नैतिकता/महानता का आधार कैसे होता है यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

कांट ने मनुष्य की नैतिकता को ओर स्पष्ट करने के लिए मनुष्य के सभी कार्यों को तीन स्तर पर विभाजित किया है-
1 सहज प्रवृत्ति या मानसिक झुकाव के रहते, होने वाले कार्य।
2 स्वार्थ भाव से होने वाले कार्य।
3 कर्तव्य के लिए किये जाने वाले कार्य।

 एक और सहज प्रश्न - यदि कोई व्यक्ति कर्तव्य के लिए कर्तव्य करता है और उसी के प्रति उसका सहज झुकाव भी है, तो उस कार्य की नैतिक स्थिति क्या होगी? दरअसल, कांट ने मनुष्य के कार्यों का विभाजन तो कर दिया, लेकिन मनुष्य की सहज प्रवृत्ति क्या होती है तथा नैतिकता क्या है? इस पर दर्शन में बहुत स्पष्टता नहीं दी है नैतिक नियम का स्वरूप आदेशात्मक होती है, आत्म प्रेम का सिद्धान्त परामर्शदायक होता है। कांट के ही शब्द है- यह आदेश प्रत्येक व्यक्ति अपने को सुखी रखे- मूर्खतापूर्ण होगा। इस प्रकार के तथा इसी से मिलते-जुलते अन्य कथन यह आभास देते हैं कि मनुष्य की नैतिकता कांट के दर्शन में कितनी स्पष्ट है इस भाव से नैतिकता मनुष्य के स्तर की नहीं ईश्वरीय स्तर की है। मनुष्य को विभिन्न परिस्थितियों में चुनाव करना होता है, ऐसी स्थिति में नैतिक मूल्य या मूल्य का स्तर क्या होगा? यह स्पष्ट नहीं है। किसी अन्य की सहायता से कर्तव्य के प्रति सहज प्रवृत्ति को कांट ईश्वरीय सम्भावना मानता है, मनुष्य की नहीं, मनुष्य को विभिन्न विपरीत संवेदनाओं के मध्य विवेकपूर्ण अपने कर्तव्य का चुनाव करना होता है। इसलिए किसी कर्तव्य के प्रति सहज भाव कार्य करना नैतिक मूल्य तो होगा किन्तु उसका स्तर मानवीय स्तर नहीं होगा। कांट, ईश्वरीय शक्ति को भारतीय दर्शन की तरह रहस्य में ही रखता है अर्थात स्पष्टता का अभाव स्पष्ट है।

नैतिकता का सर्वोच्च सिद्धांत: नैतिक आदेश
‘इस भांति आचरण करो कि तुम्हारी इच्छा का नियम भी समय सार्वभौम आदेश की स्थापना करने वाला सिद्धांत बन सके। कांट, यहां नैतिकता के सर्वोच्च सिद्धान्त में नैतिक आदेश की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ कहता है- यह आदेश की प्रत्येक व्यक्ति अपने को सुखी रखें, मूर्खतापूर्ण होगा। लगभग सभी दार्शनिकों में एक समानता यह रही है कि अपनी ही बात, तर्क या सिद्धान्त को, कुछ समय पश्चात उसी या दूसरी पुस्तक, सिद्धान्त में काट देते हैं अर्थात एक ही बात कहने वाले दार्शनिक की अभिव्यक्ति में विरोधाभास देखने को मिलता है। यहां हम नैतिकता के सर्वोच्च सिद्धान्त को समझने के लिए नियम, सिद्धान्त एवं आदेश, शब्दों को थोड़ा स्पष्ट करेंगे।

सिद्धान्त को दो भाग में विभाजित करते हुए कांट लिखते हैं- व्यक्तिगत तथा वस्तुगत। यह कहना अनावश्यक है कि व्यक्तिगत सिद्धान्त, व्यक्ति विशेष अपने कर्तव्य का निर्धारण करता है, इसके विपरीत, वस्तुगत सिद्धांतों की वैधता सार्वभौम होती है व प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति के लिए स्वीकार्य होते है। व्यक्तिगत सिद्धान्त के लिए ही कांट नियम (मैक्सिम) शब्द का प्रयोग करता है। तथा वस्तुगत सिद्धान्त के लिए नैतिक आदेश (मॉरल लॉ) पद का प्रयोग करता है। अतः नैतिक नियम वह सिद्धान्त है जिस पर कोई व्यक्ति आचरण कर रहा है न कि वह वस्तुगत सिद्धान्त जिस पर कि उसे आचरण करना चाहिए। जिस मनुष्य के कार्य का प्रेरक नैतिक नियम होता हो तथा उस नैतिक नियम को वह सर्वोच्च आदेश के रुप में भी स्वीकार कर सकता हो, तभी उसका कार्य नैतिक कहा जा सकता है। नैतिक नियम मनुष्य के कार्य के औचित्य को स्थापित करता है, आदेश से उसकी भिन्नता इस बात में है कि वह यह निर्देश नहीं देता कि वह कार्य के लिए करणीय है।

नियम भी दो प्रकार के होते है:- आकारपरक (फार्मल) तथा उपादानपरक (मैटीरियल) संवेदनात्मक प्रवृत्तियों पर आधारित नियत उपादानपरक नियम है। यह इन्द्रियानुभाविक नियम होते हैं, क्योंकि इनका आधार इच्छाओं की अनुभूति होती है, इन्द्रियानुभव से स्वतन्त्र नियम प्रागानुभविक नियम होते है, उन्हें ही कांट आकार परक नियम की संज्ञा देता है।

साथ ही कांट मनुष्य के व्यवहार को नियन्त्रित करने वाले कारण भी तीन बताते है।
1. किसी कारण का उपयोगी होना
2.  व्यक्तिगत रुप से शुभ हो जाना
3. नैतिक रुप से शुभ हो जाना, कांट के अनुसार सार्वभौम आदेश का सूत्र इस प्रकार है, उसी नियम पर आचरण करो जिसके माध्यम से तुम उसी समय यह इच्छा कर सको कि एक सार्वभौम आदेश बन जाये। कांट की नैतिकता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस कार्य का सामान्यीकरण किया जा सकता है अथवा नहीं। यदि किसी कार्य को करते समय मैं यह इच्छा कर सकूँ कि सभी व्यक्ति वह कार्य करते तो निश्चित ही मैं नैतिक कार्य कर रहा हूँ। इसके विपरीत यदि में यह चाहूँ कि केवल मुझे ही इस कार्य को करने की छूट हो तो मैं एक अनैतिक कार्य का अनुसरण कर रहा हूँ। कांट की नैतिकता सार्वभौमिकता लिए हुए है, लेकिन सार्वभौमिकता को स्पष्ट करने में कांट समय नहीं देते।

नैतिकता को स्पष्ट समझने के लिए कांट का एक और सूत्र है - स्वयं साध्य का सूत्र - इस भांति आचरण करो, जिससे कि अपने तथा प्रत्येक अन्य व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित मानवता को सदा एक ही समय-साध्य के रुप में प्रयोग करो, मांग साधन के रुप में कदापि नहीं। इस सूत्र में कांट ने मानव की गरिमा तथा वस्तुओं की उपयोगिता में अन्तर किया है। किसी वस्तु का प्रयोग किसी अन्य प्रयोजन या साध्य के साधन के रुप में किया जा सकता है। वस्तुओं की यही उपयोगिता है कि मनुष्य के अभीप्सित साध्य की साधन होती है किन्तु इसके विपरीत, मनुष्य के व्यक्तित्व की गरिमा होती है। किसी भी व्यक्ति को अपने साध्य को साधन के रुप में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। कांट की स्वतंत्रता, स्वर्ग तथा नरक के भय तथा प्रलोभन से दूर होने की स्थिति है, भय, प्रलोभन से होने वाली स्थिति को स्वतंत्रता या नैतिकता नहीं कहा जा सकता। भय, प्रलोभन से व्यक्ति कार्य तो कर सकता है लेकिन, किसी साधन को अपना साध्य नहीं कर सकता। कांट के मन में मानवता के प्रति असीम आदर है, वह शोषण मुक्त स्वराज की कल्पना करता है, जिसमें स्वशासन होगा जो व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता पर आधारित होगा कांट के नीतिशास्त्र का केन्द्रीय प्रश्न यही ही है कि क्या व्यक्तिगत नियम को सार्वभौम रूप प्रदान किया जा सकता है? यह निराधार तथा अप्रासंगिक है।

कांट की नैतिकता व स्वतंत्रता के पाँच सूत्र संक्षेप में इस प्रकार है - प्रथम सूत्र में नियम को सार्वभौमिकता की चर्चा करने के पश्चात इस में वह उस नियम की कल्पना प्रकृति के सार्वभौम नियम के रुप में करता है। प्रकृति के नियम से कांट का आशय प्रकृति के प्रयोजनात्मक नियम से है। मानव शेष प्रकृति की तरह नहीं है अतः प्राकृतिक नियम मनुष्य के लिए अधूरे पड़ते हैं, यही कारण है कि वह साधन के रुप में दूसरे मनुष्य को स्वीकारता है। तीसरा, स्वतंत्रता या नैतिकता का कार्य मनुष्य की रक्षा करना है। चौथा सूत्र अनिवार्यता आत्मरोपित है वह अनिवार्य है। पाँचवाँ सूत्र सभी सूत्रों का समावेश है वह स्वतंत्रता तथा प्राकृतिक नियमों (आदेश) को आपस में समाहित करता है।

कांट की नैतिकता तीन पूर्व मान्यताओं पर टिकी है- 1. नैतिकता की सम्भावना मात्र स्वतंत्रता की पूर्वमान्यता पर निर्भर करती है 2. नैतिकता जीवन के लक्ष्य को उसकी सम्पूर्णता में प्राप्त करने की दृष्टि से अमरता की पूर्वमान्यता 3. नैतिकता तथा सुख के समन्वय के लिए ईश्वर की पूर्व मान्यता अपेक्षित है। नैतिकता, स्वतंत्रता ईश्वर की पूर्व मान्यता पर निर्भर होने के कारण कांट की यह अवधारण सार्वभौमिक नहीं हो सकी। क्योंकि कांट का ईश्वर स्वयं में स्पष्ट नहीं है। नीतिशास्त्र का महत्वपूर्ण प्रश्न- हमारी इच्छा स्वतंत्र है अथवा प्राकृतिक कारणों द्वारा निर्धारित है? इसको समझने के लिए कांट ने मनुष्य के सभी कार्यों को दो भागों में बांटा है- 1. सैद्धान्तिक कार्यदृष्टा की दृष्टि से 2. व्यावहारिक बुद्धि की दृष्टि से। इसमें व्यवहारिक बुद्धि वाले कार्य देश, काल, दिशा पर निर्भर हैं, जबकि सैद्धान्तिक दृष्टा, मनुष्य पर सार्वभौमिकता का सिद्धान्त है। कांट ने नैतिकता को समझने-समझाने पर बल इसलिए अधिक दिया है क्योंकि तात्कालिक परिस्थितियों में जर्मनी में नैतिकता का पतन हो चुका था विज्ञान के नाम पर अपराध अधिक स्थान लेने लगा, अतः कांट ने नैतिकता व विज्ञान दोनों पर अपने दर्शन में गहन चिन्तन किया है। नैतिकता के लिए कांट स्वतंत्रता, ईश्वर, अमरता तथा बुद्धिवाद के सहारे अपने विचार को व्यक्त करता है। वास्तविक समस्या नैतिकता तथा नैतिक उत्तरदायित्व की है जो अनुभवातीत स्वतंत्रता से ही संभव है। अनुभवातीत स्वतंत्रता तब तक संभव नहीं है, जब तक मनुष्य को काल के अन्तर्गत प्राकृतिक कारण द्वारा निर्धारित शृंखला से परे न मान लिया जाए। इस प्रकार इन्द्रियानुभविक आत्मा तथा पारमार्थिक आत्मा का भेद कांट के स्वतंत्रता के सिद्धान्त के लिए आवश्यक है। पारमार्थिक सता के रुप में मनुष्य कार्यों का चुनाव करने में स्वतंत्र है, लेकिन परिणामों को नियंत्रित करने में समर्थ नहीं है। यहाँ कांट मनुष्य को ईश्वर के हाथ की कठपुतली मानता है अर्थात मनुष्य की सत्ता पर एक ही सत्ता है जिस पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं है।

ईश्वरमय नैतिकताः
मनुष्य के अभिप्राय और नैतिक नियम यह दोनों बातें सर्वोच्च शुभ की प्राप्ति के लिए जरूरी है। पवित्र इच्छा की अवस्था एक जीवन (एक शरीर यात्रा) में प्राप्त करना संभव नहीं हैं, इसलिए सर्वोच्च शुभ अमरता की मांग करता है, सर्वोच्च शुभ का दुसरा पक्ष हमारी नैतिकता के अनुसार हमें सुख प्राप्त हो अर्थात हम सुख के अधिकारी हों, मनुष्य की निष्पक्ष बुद्धि इस प्रकार की मांग करती है। ऐसी व्यवस्था एक सक्षम सत्ता ही कर सकती है, यह सत्ता ईश्वर है। सुख मानवीय जीवन की अवस्था है। मनुष्य इच्छाओं तथा कामनाओं के साथ प्राकृतिक जगत का एक प्राणी है, वह स्वयं उस जगत की उत्पत्ति का कारण नहीं है अतः मनुष्य के लिए यह संभव नहीं है कि वह अपने बल पर सुख उत्पन्न करने वाली प्रकृति को नैतिकता के अनुरूप बना सके। यदि सम्पूर्ण शुभ या सर्वोच्च शुभ संभव है तो सुख तथा नैतिकता का सामंजस्य होना ही चाहिए। इसलिए ईश्वर की सत्ता को स्वीकारना आवश्यक है जो कि प्रकृति जगत का अंग नहीं अपितु उसका कारण है सुख तथा नैतिकता के सामंजस्य का आधार है।

निष्कर्ष:-
शोपेन हावर 1788 - 1860  के अनुसार ईश्वर आधारित नीतिशास्त्र का एक बार खण्डन करके कांट पुनः उसी की और वापस लौट आता है। यह सच है कि कांट के अनुसार नैतिकता का स्रोत स्वतंत्र व्यक्ति है। ईश्वर की आज्ञा के अनुपालन से उत्पन्न नैतिकता सही अर्थों में नैतिकता नहीं है। लेकिन यह उसका विश्वास था कि नैतिक जीवन को प्रोत्साहित करने के लिए ईश्वर की सत्ता को प्रतिपादित करना आवश्यक है। ... नैतिक व्यक्ति यह जानता है कि अमरता तथा ईश्वर का विश्वास ‘निष्पक्ष बुद्धि’ से उत्पन्न होता है, किसी भय अथवा प्रलोभन से नहीं।

फैहिगर नैतिकता की पूर्वमान्यताओं पर प्रतिक्रिया करते हुये कहते हैं कि नैतिकता की मांग केवल यह है कि मानो हम स्वतंत्र तथा अमर है तथा मानो ईश्वर का अस्तित्व है। ... अमरता तथा ईश्वर जैसे प्रत्ययों की संवादी वास्तविकताएँ हों। लेकिन ईश्वर तथा अमरता के प्रति कांट का दृष्टिकोण किसी भी अवस्था में हठवादी नहीं हुआ। वह बार-बार इस बात की चेतावनी देता रहता है कि हमें इसका ज्ञान नहीं हो सकता।

कांट की नैतिकता का सिद्धांत इसलिए भी प्रभावी है क्योंकि कांट का मानना है कि ग्रीक नीतिशास्त्र सर्वोच्च शुभ की व्यावहारिक संभावना की समस्या का समाधान न कर सका। इपीक्यूरसवादियों ने सुख के सिद्धांत को ही नैतिकता के सर्वोच्च सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करके उसको अत्यंत संकीर्ण निम्न रूप प्रदान कर दिया। अपने व्यक्तिगत सुख के लिये मनमाने चुनाव को ही उन्होंने नैतिकता का जामा पहना दिया। इसके ठीक विपरीत स्टोइकवादियों ने सद्गुण को सर्वोच्च शुभ के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन उन्होंने एक ओर तो मनुष्य की नैतिक क्षमता को बहुत अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किया जो कि सामान्य अनुभव में पुष्ट नहीं होती और दूसरे उन्होंने सर्वोच्च शुभ के दूसरे महत्वपूर्ण तत्व सुख की अवहेलना की। कांट के अनुसार ईसाई धर्म सर्वोच्च शुभ की जो परिकल्पना प्रस्तुत करता है, उसमें व्यावहारिक बुद्धि की सारी मांगे पूरी हो जाती है। क्योंकि यह मानता है कि नैतिक आदेश पवित्रता की अवस्था प्राप्त करना चाहता है और यह तभी संभव है यदि मनुष्य अमर हो और मनुष्य सद्गुण तथा सुख से संयुक्त सर्वोच्च शुभ का अनुसरण तभी कर सकता है यदि ईश्वर का अस्तित्व हो यही स्मरणीय है कि कांट ईसाई नीतिशास्त्र को ईश्वर आधारित नहीं मानता। कांट का यह दृढ़ मत है कि नैतिक आदेश के पालन करने की प्रेरणा ईश्वर की आज्ञा से उत्पन्न परिणामों से नहीं मिलती अपितु मात्र कर्तव्य की भावना से मिलती है और उसी के समुचित पावन से ईश्वर को प्राप्त करने की समुचित योग्यता प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार कांट के अनुसार, नैतिक आदेश हमें धर्म की और ले जाता है।

संदर्भ ग्रन्थ
- कांट का दर्शन, सभाजित मिश्र, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ 1988
- मानव व्यवहार दर्शन, ए.नागराज, दिव्यपथ संस्थान, अमरकंटक, 2008
- यूरोप में दर्शनशास्त्र, शंकरी प्रसाद, अनुवादक सुशीला डोभाल, राजकमल प्रकाशन, 1992


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