अभिनव भारत के प्रथम राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य -साधना

छेदी साह
- डॉ. छेदी साह

अभिनव भारत के प्रथम राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के उद्बोधक, राष्ट्रीय जागरण के वैतालिक और युगचेतना के सच्चे प्रतिनिधि साहित्यकार थे। वे भारतीय संस्कृति को वाणी देने वाले आदर्शवादी कवि थे। श्रेष्ठ रचनाकार अतीत का गौरव गानेवाला, वर्तमान का बहुत बारीक से देखने वाला और भविष्य का अद्वितीय सूत्र होता है।

 राष्ट्रकवि गुप्त जी ने प्रायः अपनी प्रत्येक रचना में अतीत के स्वर्णिम आदर्शों को उपस्थित करने का प्रयास किया है। गुप्त जी के प्रभापूर्ण काव्य में अतीत का सुंदर रूप वर्तमान को प्रेरणा का सक्षम भाव सौंपता है ताकि कुव्यवस्था में छटपटाता हुआ वर्तमान कोई नयी राह पा सके। ‘रामायण, ‘महाभारत’ और ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ जैसे स्थायी ग्रंथों ने हिंदी साहित्य के अधिकांश कवियों को प्रभावित किया है और हिंदी के प्रायः सभी श्रेष्ठ कवियों ने उनके आभार को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया है। इसका अतीत संस्कृति की पवित्रा सलिला की तरह भव्यता का प्रकाश-स्तंभ है, जिसमें विश्व कल्याण का अमृत छलकता रहता है। ‘साकेत’ के राम हों या ‘पंचवटी’ के लक्ष्मण, ‘द्वापर’ के कृष्ण हों या बलराम, गुप्त जी ने कभी भी अपने आदर्श को विलुप्त नहीं होने दिया। भारतेंदु ने जिस खड़ी बोली की प्रस्तावना की और उसे परिपक्वता प्रदान करने का दायित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा। गुप्त जी द्विवेदी युग के कवि होने के नाते खड़ी बोली की पुष्टि के रचनात्मक आंदोलन के एक महत्त्वपूर्ण रचनाकार थे। श्री गुप्त जी द्वारा प्रणीत ‘जयद्रथ वध’, ‘सैरंध्री’ आदि रचनाओं की पृष्ठभूमि और प्रेरणा महाभारत के प्रसंग ही हैं। ‘प्रदक्षिणा’, ‘साकेत’ और ‘पंचवटी’, इन तीन काव्य-ग्रंथों का मूल आधार रामायण है। राष्ट्रकवि गुप्त जी ने इन रचनाओं के अवसर पर अपने युग का भी ध्यान रखा है। ‘साकेत’ हिंदी साहित्य जगत् का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रणीत एक निबंध ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ वहीं से प्रेरणा लेकर गुप्त जी ने ‘साकेत’ महाकाव्य की रचना की। रामायण की कथा का एक लघु, अत्यंत ही संक्षिप्त अंश लेकर पंचवटी की रचना की। वातावरण चित्रण, वार्तालाप, नाटकीयता आदि की दृष्टि से यह छोटी-सी रचना काफी अच्छी है। ‘साकेत’ के साथ इसे भी कवि की श्रेष्ठतम कृति कहा जा सकता है। श्री गुप्त जी की ऐसी रचनाएँ भी हैं, जिनका आधार बौद्धकालीन संस्कति और कथा है। इनमें ‘यशोधरा’ और ‘अनघ’ का नाम महत्त्वपूर्ण हैं। ‘अनघ’ पद्यबद्ध रूपक है तथा बौद्धकालीन जातक कथा का रूपांतर मात्रा है। ‘यशोधरा’ एक खंड काव्य है और हिंदी जगत् में यह एक महत्त्वपूर्ण रचना मानी जाती है। पद्य-मिश्रित होने के कारण इसे चंपू-काव्य कहा जाता है। यशोधरा के चरित्रा का उत्कर्ष दिखलाकर जननी और पत्नी का सुंदर रूप प्रस्तुत कर सकने में गुप्त जी ने सफलता पायी है। ‘गुरुकुल’, ‘तेगबहादुर’, ‘रंग में भंग’ आदि इसी प्रकार की रचनाएँ हैं। देशप्रेम, इतिहास, संस्कृति और दर्शन के प्रति प्रेम गुप्त जी की समस्त कृतियों में हैं। ‘कुणाल गीत’ के गीतों में मानवतावाद और लोककल्याण की भावना का स्वर मुखर है। सर्वे भवन्तु सुखिनः का अपूर्व आदर्श गुप्त जी का रहा है। उनका समस्त काव्य इसी प्रेरणा के गौरव से दीप्त, इसी विराट् मानवतावाद से भरा-पूरा है। भारतवर्ष की श्रेष्ठता का बड़प्पन करते हुए कवि कवि कहता है1                          

                                             ‘‘भूलोक का गौरव,
                                             प्रकृति का लीलास्थल कहाँ?
                                             फैला मनोहर गिरि हिमालय और
                                             गंगाजल जहाँ?
                                           संपूर्ण देशों से अधिक किस
                                             देश का उत्कर्ष है
                                           उसका कि जो ऋषि भूमि है
                                            वह कौन भारतवर्ष है।”

वर्तमान भारत की दयनीय दशा का मार्मिक चित्र उपस्थित करते हुए कवि कहता है- 2
     ‘‘भारत कहो तो आज तुम क्या हो वही भारत अहो।
      हे पुण्यभूमि! कहाँ गयी है वह तुम्हारी श्री कहो?
      अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पंक है;
      वह राज राज कुबेर अब हा! रंक का भी रंक है।

 शिक्षा की अधोगति का चित्र उपस्थित करते हुए कवि रोष के स्वर में कहता है3
                       हा! आज शिक्षा मार्ग भी संकीर्ण होकर क्लिष्ट है।

     कुलपति-सहित उन गुरुकुलों का ध्यान ही अवशिष्ट है। बिकने लगी विद्या यहाँ अब, शक्ति हो तो क्रय करो, यदि शुल्क आदि न दे सको तो मूर्ख रहकर ही मरोμराष्ट्रकवि गुप्त जी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह हैμउनकी पंक्ति-पंक्ति में लहराता हुआ मानवतावाद है। गुप्त जी का मानवतावाद ‘भारत-भारती’ के क्लेशित स्वरों से लेकर यशोधरा के वियोग के अश्रुनिर्झर तक लहराने वाला मानवतावाद है। ‘द्वापर’ और ‘सैरंध्री’ में ‘प्रदक्षिणा’ और ‘पंचवटी’ में ‘चंद्रहास’ तथा ‘तिलोत्तमा’ में ‘साकेत’ और ‘अनघ’ में आवाज बदल-बदलकर प्रतिध्वनि करने वाला मानवतावाद है, जो उनकी काव्य-साधना का महाप्राण है। मेरी दृष्टि में ‘भारत-भारती’ इनका सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। यह आलोक दीप बनकर हिंदी साहित्य में उपस्थित हुआ। इस सुकृति की सुप्रभा से गुप्त जी का यश इतना फैला कि वे राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हुए। इसमें गुप्त जी ने न केवल अपने अतीत के स्वर्णिम आदर्शों और उस युग की उपलब्धियों का ही उल्लेख किया है अपितु वर्तमान की कुव्यवस्था पर खुलकर आँसू भी बहाए हैंै। ‘हम कौन थे’ के द्वारा अतीत का सुंदर चिंतन, ‘क्या हो गये हैं’ के माध्यम से अद्यतन का, अपने युग का निरूपण ‘और क्या होंगे अभी’ के द्वारा भविष्य का इशाराμइन तीन क्षेत्रों में कवि की ओजस्वी चेतना प्रबुद्ध हुई है। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने इसी मानवतावाद को ‘मनुज की आशा’ में शाश्वत देखा, माखनलाल चतुर्वेदी इसकी प्राप्ति के लिए स्पर्धा और त्याग का साधना-पथ पकड़े रहे और निराला ने उसे ही ‘राम की शक्ति पूजा’ में सशक्त सत्य और अजेय सिद्धांत के रूप में पाया। जयशंकर प्रसाद ने ‘हिमालय के आँगन में प्रथम किरणों का दे उपहार’ देने वाली उषा का अभिनंदन किया, दिनकर ने पौरुष के पुँजीभूत ज्वाल के रूप में ‘मेरे नगपति मेरे विशाल’ की याचना की। गुप्त जी ने उन समस्त पौराणिक परंपराओं को सँभालने का प्रयास किया है। भारतवर्ष की तत्कालीन दुर्दशा पर व्यथा प्रकट करते हुए गुप्त जी ने लिखा है4
      “हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।
            आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”5

                वर्तमान काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त का आविर्भाव संवत् 1943 में झाँसी के चिरगाँव में हुआ था। सुविख्यात लेखक डॉ. आर. एन. गौड़ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजहंस हिंदी निबंध’ में लिखा है, ‘‘गुप्त जी की प्रारंभिक रचनाएँ कलकत्ता के जातीय पत्रा में प्रकाशित हुआ करती थीं। पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आने पर उनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदी जी ने समय-समय पर उनकी रचनाओं में संशोधन किया और ‘सरस्वती’ में प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहन दिया। द्विवेदी जी से प्रोत्साहन पाकर गुप्त जी की काव्य-प्रतिभा जाग उठी और शनैः-शनैः उनका विकास होने लगा।” हिंदी साहित्य को गुप्त जी की काव्य प्रतिभा पर गर्व है। ‘साकेत’ पर हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक भी प्राप्त हुआ था। ‘जय भारत’ उनकी नवीनतम कृति है। सुप्रसिद्ध आलोचक बच्चन सिंह के शब्दों में, “गुप्त जी एक साधक कवि है, उनकी साधना की चरमोपलब्धि ‘साकेत’ है।”6

                 गुप्त जी की प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण कृति ‘भारत भारती’ (1931) है। पुनः डॉ. बच्चन सिंह ने इस सुकृति की प्रशंसा करते हुए लिखा है, ‘‘हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रा में इतने व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना जगाने का जो काम अकेले ‘भारत-भारती’ ने किया, उतना अन्य पुस्तकों ने मिलकर भी नहीं किया।”7

                    गुप्त जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कलाकार हैं। उनकी रचनाओं में उपदेशात्मक वाणी मिलती है। कवि का कथन द्रष्टव्य है, ‘‘नर हो न निराश करो मन को, यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप ही सदा चरे, वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे’। अतएव गुप्त जी युगीन महत्त्व के कवि थे। वे युगधर्मी साहित्यकार थे। एक आलोचक ने उनके व्यक्तिव की प्रशंसा करते हुए कहा है, “वे उदार हँसमुख मिलनसार, सहृदय एवं मृदुभाषी है।” प्रो. नलिन विलोचन शर्मा ने गुप्त जी के संबंध में कहा था, “गुप्त जी उन कवियों में नहीं है जिन पर लिखते हुए इतिहासकार आलोचक बन जाने और आलोचक इतिहासकार हो जाने की खतरनाक स्थिति में अपने को पावें।” गुप्त जी की काव्य-कृतियाँ इसके लिए प्रमाणस्वरूप हैं कि संख्या और परिमाण का आधिक्य साहित्येतिहास में व्यर्थ नहीं जाता। भारतेंदु युग में जिस स्वदेश प्रेम और जातीय गौरव की भावना का सूत्रापात हुआ, उसके भावी विकास के सूत्राधार गुप्त जी डॉ. उमाकांत गोयल ने ठीक ही कहा है, ‘‘भारतीय संस्कृति के प्रवक्ताके साथ ही मैथिलीशरण जी राष्ट्रकवि भी हैं। इनकी प्रायः रचनाएँ राष्ट्रीयतासे ओत-प्रोत हैं। उत्तर भारत राष्ट्रीयता के प्रचार-प्रसार में ‘भारत-भारती’ केयोगदान को भुलाया नहीं जा सकता। निःसंदेह कहा जा सकता है कि विराट् भावों, महान चरित्रों तथा मानवतावादके प्रति अमर विश्वास के लिए गुप्त जी सदैव याद किये जाएँगे।

संदर्भ
1.मैथिलीशरण गुप्त ‘भारत-भारती’ प्रकाशक: साहित्य-सदन, झाँसी, पृ. सं.-142.वही, पृ. सं.-953.वही, पृ. सं.-1264.वही, पृ. सं.-1635
2.लेखक डॉ. आर.एन. गौड़ ‘राजहंस’ हिंदी निबंध राजहंस प्रेस, रामनगर मेरठ, पृ. सं.-886
3.लेखक बच्चन सिंह हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास...........
4.वही, पृ. सं.-313       

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