साक्षात्कार: मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

भारतीय मूल की अमेरिका निवासी साहित्यकार, सम्पादक, और प्रकाशक मुक्ता सिंह-ज़ौक्की से अनुराग शर्मा की विस्तृत वार्ता। मुक्ता सिंह-ज़ौक्की ईकल्पना पत्रिका की सम्पादक, तथा ईकल्पना किताब की प्रकाशक हैं। इनका सबसे हाल का उपन्यास “ठग” ऐमेज़ौन पर उपलब्ध है


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अनुराग: मुक्ता जी, सेतु साक्षात्कार में आपका स्वागत है। अपने बचपन, परिवेश के बारे में कुछ बताइये। उन दिनों की कोई खास बात? परिवार में कोई लेखक, सम्पादक, पत्रकार? आपकी शिक्षा-दीक्षा, व्यवसाय?

मुक्ता: आपने मुझमें रुचि दिखाई, मेरे लिये सम्मान की बात है। बहुत धन्यवाद।
मैं दिल्ली में बड़ी हुई, मेरे पापा आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर रहे हैं। अब सोच कर लगता है कि हमारा वह परिवेश भावी लेखकों को तैयार करने के लिये काफी अनुकूल था।
कहते हैं कहानीकार ज़िन्दगी की परेशानियों से वाकिफ़ होता है। निजी जीवन में मैंने किसी तरह की परेशानियाँ नहीं देखी हैं। फिर भी कुछ परेशानियाँ ढूंढ ही लें... क्योंकि हम दिल्ली में रहते थे, हमारा घर रिश्तेदारों का अड्डा बना रहता था... हमेशा खाना बनता रहता था। हर दम चाय। शायद ये उस समय में हर मध्यवर्गीय परिवार का स्टैंडर्ड सीन था, फिर भी एक प्रोफैसर का घर बड़ा ही होता है, और हमारे यहाँ ऊपर-नीचे, अंदर-बाहर जहाँ जाओ कोई न कोई हमेशा मौजूद रहता था ... ये था हमारी परेशानियों का लैवल – नो प्राईवैसी।
नहीं, हमारे यहाँ कोई पत्रकार या लेखक नहीं था। उल्टे, पढ़ाई पर इतना ज़ोर दिया जाता था कि नावल वगैरह पढ़ना सख्त मना था, ये सब हम छिप कर पढ़ते थे। मैंने आईआईटी लाइब्रेरी का पूरा फिक्शन सैक्शन पढ़ डाला था, और मेरी माँ को भनक भी नहीं पड़ी थी।
फिर आगे टीनेज आई – ज़ाहिर है, वो दौर सहेलियों के बीच एक ही तरह की बातचीत करने का था ... अपने-अपने क्रशिज़ का। मेरे अंदर की लेखिका यह गूढ़ विश्वास रखती है कि एक प्रेम कहानी जीने की सबसे उचित उम्र यही है – टीनेज।
तो, क्लास के सहपाठी से ले कर इमरान खान तक, कोई भी मेरी सहेलियों को अपने सम्मोहन के जाल में फंसाने का सामर्थ्य रखता था। मेरी एक सहेली हमारे एक सहपाठी के साथ घर छोड़कर भागने की योजना बना रही थी। हम भी ठोंक-ठोंक कर उसकी योजना में उसे वीक-पॉइंट्स गिनाने में लगे रहते थे। एक मैं बेवकूफ़ हाड़-मांस वाला कोई क्रश नहीं पाल पाई। मेरे जो भी क्रश थे वे सब के सब उपन्यासों में किसी किरदार का रूप लिये निवास करते थे। तब भी, “मेरा मन लिखने को भी करेगा!” ऐसा नहीं लगता था।
मैं फ़िज़िक्स में पीऐचडी करने यूऐस आई। तब मैं 23 साल की थी। विज्ञान तब मेरा पैशन था,  अब भी है। 1990s से मिड-2000 का दौर रिसर्च का रहा। मैंने इन सालों चार नए शहरों – शिकागो, पैरिस, बर्लिन और कौपनहैगन - में काम किया। नई जगहें, नए अनुभव। अनुभवों के कुछ उदाहरण देती हूँ – जैसे, हर वीकैंड जब मैं बरलिन से ट्रेन पकड़ कर अपने पति और बेटे से मिलने कौपनहैगन आती थी, तो उस 6 से 8 घंटे की यात्रा में कोई न कोई रुचिकर किस्सा सामने आ ही जाता था। जैसे कि एक बार प्राग से आता हुआ एक चैक लड़की और ज़ाम्बियन लड़के का जोड़ा, दोनों मैडिकल स्टूडैंट, कौपनहैगन शादी करने आ रहे थे। उन 8 घंटों में मुझे उनकी प्रेम कहानी के बारे में मालूम चला, उनकी कठिनाइयों से अवगत हुई, पता नहीं कब लड़के ने मुझे अपनी बहन बना लिया। खूब रायें मांगी गईं। ऐसे ही एक और बार जब मैं ओवरनाइट ट्रेन ले रही थी, तो मेरी कैबिन में नार्थ पोल के पास फैरो आयलैंड का निवासी भी यात्रा कर रहा था। मैं भारतीय, शायद उसके लिये दिलचस्प व्यक्ति थी। उसके सवाल खत्म ही नहीं हो रहे थे। फिर मुझे भी लगा कि अपने जीवनकाल में फैरो आयलैंड शायद ही जाऊँ। तो उस रात हम सोए नहीं। यात्रा भर बातें होती रहीं ... इस तरह बिना जाने या तैयारी किए अपने जीवन के अगले 15-20 साल फ़िज़िक्स के साथ-साथ कहानियों का भंडार भरते हुए बिताए। एक वक्त आया जब भंडार ओवरफ़्लो होने लगा। शायद तब जा कर मैंने लिखना शुरू किया होगा।
तो मेरे चारों तरफ़ लिखने का जाल काफ़ी सालों से बिछना शुरू हो चुका था। देख उसे मैं बहुत बाद में ही पाई।


अनुराग: आपको क्या लिखना पसंद हैं?

मुक्ता: लिखने में मेरी मुख्य रुचि ऐतिहासिक कहानियों में है। शायद इसलिये कि मैं खंडहरों के शहर दिल्ली में बड़ी हुई हूँ। मैंने पुस्तकालयों में प्राचीन व मध्कालीन यात्रियों के वृत्तांत पढ़ने में बहुत समय गुज़ारा है। मेरी एक कहानी “Fire of Desire” को 2007 में अमेरिका में एक क्रियेटिव राईटिंग कॉन्टैस्ट में प्रथम स्थान मिला। कहानी का हादसा मैंने ऐसे ही एक सोलहवीं शताब्दी के सफरनामे से लिया था। यह कहानी मेरी पहली प्रकाशित कहानी भी थी। इसके बाद मैंने कई कहानियाँ लिखीं जिनमें से कुछ प्रकाशित हुईं, कई और - बहुत सारी - लिखी पड़ी हैं, प्रकाशित होने का इंतज़ार कर रही हैं।


अनुराग: क्या लेखन ने आपके जीवन का कोई नया द्वार खोला?

मुक्ता: मेरी पहली नॉवल “The Thugs and a Courtesan” 2014 में प्रकाशित हुई। उसके बाद एक नया पहलू अपने आप खुल कर मेरे सामने आने लगा। मेरे पास बॉलिवुड मूवी प्रड्यूसर, नैटफ्लिक्स टीवी सिरियल व मूवी के प्रस्ताव ले कर आने लगे। 2017 में मैंने अदनान सामी की फिल्म, “Afghan, in search of a home” का कथानक लिखा।


अनुराग: वाह, यह तो बहुत बड़ी सफलता है। अंग्रेज़ी की इस सफल लेखिका ने हिंदी में लिखना कैसे शुरू किया?

मुक्ता: मैं पूर्णतः अंग्रेज़ी में ही लिखती थी। फिर एक दिन ऐसा आया जब मैंने अपनी माँ के लिये अपनी एक कहानी “Routes of Escape” का हिन्दी में अनुवाद किया। मुझे कहानी का हिन्दी संस्करण इतना पसंद आया कि मैंने उसे कई सारी पॉपुलर हिन्दी मैगज़ीनों (कादम्बिनी, सरिता, आदि) को भी भेज डाला।  अंततः मेरी माँ ने मेरी कहानी पढ़ कर नहीं दी, लेकिन जल्द ही दिल्ली प्रैस से मेरी कहानी के लिये हामी आ गई। मैंने तुरंत अपनी सब कहानियाँ हिन्दी में अनुवाद करनी शुरू कर दीं। 2009 से 2011 के दौरान मेरी 4 या 5 कहानियाँ सरिता मैगज़ीन में प्रकाशित हुईं (मेरी वैबसाइट से प्रकाशित हिन्दी कहानियों के लिंक)। मैंने भी ज़ोर-शोर में हिन्दी में लिखना शुरू कर दिया। इस दौरान मैंने दिल्ली प्रैस के लिये ऐनआरआई संबंधी अनेक लेख भी लिखे।


अनुराग: तो इस तरह से आप पूरी हिंदी लेखिका बन गईं?

मुक्ता: नहीं, 2014 को मेरा पहला नौवल “The Thugs and a Courtesan” (Srishti Publication, Delhi) प्रकाशित हुआ। लेकिन अब तक मेरा पूरा रुझान हिन्दी लेखन पर आ गया था। फिर 2016 को मैंने अमैरिकन लिटरैरी मैगज़ीन के स्टायल में हिन्दी की ई-कल्पना शुरू की। उस वक्त मुझे हिन्दी राइटिंग सीन के बारे में कुछ नहीं मालूम था। धीरे-धीरे हिन्दी कहानीकारी का अंदाज़ा होने लगा। कुछ निष्कर्षों पर पहुँच पाई, अब काफ़ी स्पष्टता से सीन समझ आ रहा है। इस का एक नतीजा ई-कल्पना किताब प्रकाशन है।



II

अनुराग: ईकल्पना तथा ईकल्पना किताब के बारे में कुछ और बताइये?

मुक्ता: ईकल्पना एक लिटरैरी पत्रिका है। कहानियों को बढ़ावा देने के लिये है। हम केवल कहानियाँ प्रकाशित करते हैं। प्रभावशाली भाषा शैली वाली कहानियों को हम ज़्यादा पसंद करते हैं। इन दो-ढाई सालों में हमें इतनी सारी बढ़िया कहानियाँ प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, मुझे इस बात की उम्मीद नहीं थी। वर्तमान हिन्दी साहित्य के आकाश में इतने सारे चमकते सितारे हैं, मेरे लिये यह ज्ञान बहुत संतोषजनक था। इस बात से भी संतुष्टि मिलती है कि हम ऐसा प्लैटफार्म सामने ला पाए जहाँ अच्छे दर्ज़े का काम प्रस्तुत किया जा सकता है।
ई-कल्पना किताब का मकसद इसी प्लैटफार्म को और बड़ा बनाना है, जिससे ज़्यादा पाठकों को आज के हिन्दी लेखकों के कामों को पढ़ने का मौका मिले। हम चुने हुए लेखकों के काम प्रकाशित करेंगे, उन्हें मार्किट में उपलब्ध करेंगे। फरवरी 2018 को हमने हिन्दी की चार प्रबल महिला लेखिकाओं की कहानियों के संकलन प्रस्तुत किए थे। इन चारों लेखिकाओं की रुझानें व आवाज़ें एक दूसरे से एकदम अलग हैं। हमें लगता है कि हिन्दी लेखन के आसमान में ये चारों सबसे चमकदार तारों में हैं। हमारी लिस्ट में और लेखक हैं, जिनके काम हम आने वाले महीनों में प्रस्तुत करने जा रहे हैं। क्योंकि हमारी प्राथमिक रुचि पैसा कमाना नहीं, वरन उच्च कोटि की रचनाओं को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों में लाना है, हमें यकीन है कि इस कोशिश में हम सफल रहेंगे। हाँ, शायद ये एक लंबा सफर हो।


ठग, हिंदी में
अनुराग: हिंदी और अंग्रेज़ी लेखन परिदृश्य / परिवेश में आपने क्या अंतर पाया?

मुक्ता: अच्छे लेखक पढ़ते ही पहचान में आ जाते हैं। अच्छे लेखक दोनों भाषाओं में हैं। अंतर, अच्छे और मंजे हुए लेखकों में है। एक अच्छा लेखक होने के लिये पैदाइशी अच्छा लेखक होना काफी है। मंजे हुए लेखक बनाए जाते हैं, स्कूलों में, और अभ्यास से। लगभग हर अंग्रेज़ी लेखक जो अपनी कहानी प्रकाशनार्थ भेजता है (यूऐस में), मंजा हुआ होता है। ये बात मुझे कम हिन्दी लेखकों में दिखती है। ये सब मैं सिर्फ़ अस्थापित लेखकों को ले कर कह रही हूँ।
दूसरा, अंग्रेज़ी कहानी के पाठक कथानक में कल्पना का इस्तेमाल हो, ताज़गी हो और कहानी उन्हें चकित कर देने वाली हो, हो सके तो कुछ पल के लिये किसी और काल्पनिक संसार में ले जा पाए – इन सब की उम्मीद करते हैं। तो वहाँ लेखक का फ़र्ज़ बन जाता है कि ऐसी ही कहानियाँ प्रस्तुत करे। हिन्दी सीन में हम ये पाते हैं कि अधिकांश कहानियाँ उन कथानकों में फंसी रहती हैं जो लेखक शायद अपने आसपास, या बाहर समाज में पाते हैं, उदाहरण के तौर पर, महिलाओं के साथ ज़्यादतियों को लेकर, या वैवाहिक जीवन में पत्नी की घुटन पर, ग्रामीण जीवन के खो जाने पर ... ये विषय जीर्ण हो चुके हैं। कुछ लोग मानते हैं कि कहानी को पाठकों में चिंतन जगाना चाहिये। लेकिन वो चिंतन काफी अरसे से शुरू हो तो चुका है। हम क्यों उन्हीं थीमों पर कहानियाँ लिखते जा रहे हैं।
तीसरा, दोनों भाषाओं के प्रकाशक क्राइसिस मोड में हैं। वजहें उल्टी हैं। हिन्दी के प्रकाशक लेखकों के कामों में पैसा लगाने से कतराते हैं, इसलिये उनकी मिनिमम पबलिसिटी भी नहीं करते। अंत में साहित्य भुगतता है। ऐसा दशकों से हो रहा है। तभी आम पाठक समकालीन हिन्दी साहित्य से अपरिचित है। उधर दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ी पब्लिशिंग हाऊसिस ने लेखकों को सैलेब्रिटी बनाने के चक्कर में इतना पैसा लगाना शुरू कर दिया था कि अब किसी भी लेखक को प्रस्तुत करना बहुत कीमती पड़ गया है,


अनुराग: क्या आप अपने को आप्रवासी लेखक कहलाना पसंद करेंगी?

मुक्ता: अप्रवासी लेखक? … मैं लेखक हूँ, अप्रवासी हूँ (हँसती हैं) ... क्यों नहीं? मेरी कहानियों के परिवेश भारत में हैं, या भारत से उत्पन्न होकर किसी काल्पनिक जगह में है। मेरा माइंड-सैट भारतीय परिवेश में तैयार हुआ है ... तो प्राथमिक पाठक तो भारत में ही होने चाहिये


अनुराग: क्या आप्रवासी लेखकों को हिंदी में उनका उचित श्रेय मिला है? यदि नहीं तो क्यों?

मुक्ता: उचित श्रेय खुद-ब-खुद कहाँ मिलता है? आप अच्छे लेखक हों, यही काफी नहीं है। लक पहली आवश्यकता है। नेटवर्क ज़रूरी आवश्यकता। आपके कंट्रोल में बस दो चीज़ें हैं - आपका लेखन और आपकी नैटवर्किंग। अगर आप वाकई श्रेय चाहते हैं तो देश से दूर बैठ कर भी दोनों हासिल कर सकते हैं।


अनुराग: आप्रवासी हिंदी लेखकों के लिये एक कठिनाई हिंदी पत्रिकाओं से सम्पर्क और सम्वाद की है। नियमित पत्रिकाएँ कम हैं, कुछ की वैबसाइट नहीं हैं, कुछ के ईमेल नहीं हैं, जिनके हैं भी वे बहुत रिस्पॉन्सिव नहीं हैं। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का आपका अनुभव कैसा रहा? 

मुक्ता: हमें अमरीकी प्रौफैश्नलिज़्म की आदत पड़ गई है। हम कोई भी क्वैरी लिखें, जवाब की उम्मीद करते हैं, जवाब आ भी जाता है।
लेकिन ये तरीके हर जगह प्रचलित हों, ज़रूरी नहीं हैं। मेरे अनुभव में भारतीय प्रकाशक या निर्माता ज़्यादा अप्रोचबल नहीं होना चाहता। वो अपने दफ़्तर में अकेले बैठ कर खुद के सामने पूरे प्रौजैक्ट के डैलिवरेबल या रचना रखता है, प्रौजैक्ट में उसका समय कितना लगेगा, प्रौजैक्ट में पैसा कितना है, इन तरहों के नफे-नुक्सान के हिसाब के बाद पत्रव्यवहार (और अन्य व्यवहार) कितना मीठा या रूखा बनाएँ तय करता है। कुल मिला कर अगर उसे प्रौजैक्ट में खुद का कोई फायदा नहीं नज़र आता तो वो रिस्पौंस करने की सोचता भी नहीं है।
प्रकाशन में तो पैसा भी इक्वेशन में नहीं आता। वहाँ मुख्यतः नेम-रैकगनिशन को तूल देते हैं।


अनुराग: हिंदी के नाम पर अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी, बहु-सरकारी, निजी संस्थान बने हैं। इनमें काफ़ी लोगों को रोज़गार भी मिला है और हर साल इनके द्वारा दिये गये पुरस्कारों की खबर भी आती हैं। लेकिन इनमें से कितनी वेबसाइटें अक्सर डाउन होती हैं, सामग्री पुरानी और अशुद्धियों से भरी होती है। प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिलता। पुरस्कार प्रक्रिया के बारे में पारदर्शिता का अभाव है। इनकी क्षमता और उपयोगिता सवालों के दायरे में है। हिंदी के लिये ज़िम्मेदार संस्थानों को वास्तव में ज़िम्मेदार कैसे बनाया जाए?

मुक्ता: इस बारे में मैं बस इतना कह सकती हूँ कि इन सब संस्थाओं को बनाने की वजहें अलग-अलग हैं ... जैसे सरकार के संस्कृति के बढ़ावे के लिये उपक्रम, या किसी फाऊंडेशन के मिशन में ऐसी संस्था के संयोजन की ज़रूरत, वगैरह।
यदि ये सही तरह से निर्देशित न हों तो इनमें इनैफिशैंसी आना हैरानी की बात नहीं है। जब ज़्यादातर संस्थाएँ यों अप्रभावी होने लगती हैं तब स्तर भी गिरने लगते हैं। वो सब बातें होती हैं जिनकी बात आप कर रहे हैं।
तो इनको बनाने वाले (सरकार, फाउंडेशन्स आदि) ही इन्हें फिर से ज़िम्मेदार बना सकते हैं।
या फिर अगर कोई नई जोशीली और ऐफिशंट संस्था सीन पर उतर कर आए, तब भी ऐसा हो सकता है। नया कौम्पटीशन भी कमज़ोर निष्पादन वाली संस्थाओं में जान डाल सकता है। ऐसे कई इनिशियेटिव हाल में लिये गए हैं ... जैसे रेख्ता संस्था, जयपुर लिटरैरी फैस्ट वगैरह ... लेकिन ऐसे उत्सव वैनटी फेयर बन कर अपना उद्देश्य खो बैठने की सम्भावना भी रखते हैं। देखा न कैसे बार-बार कोई भी अच्छा प्रयास आखिरकार सिलैब्रिटी-केंद्रित कोशिश बन जाता है, फिर हम भी नैटवर्किंग के ज़रिये खुद को भी इन प्रयासों में शामिल करना चाहते हैं ... असल में ये नैटवर्किंग की लत हमारे साहित्यिक सीन के लिये एक श्राप साबित हो रही है।
फिर भी सवाल के जवाब में मैं संक्षेप में कहूँगी कि देश में जितने ज़्यादा इस तरह के पौज़िटिव इनीशियेटिव पनपेंगे उतना ही मौजूदा संस्थाएँ चौकस रहेंगी और अच्छा परफौर्म करेंगी।


III

अनुराग: गूगल में पुराने देवनागरी अंक हैं, जबकि भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को मान्यता दी है। हिंदी के कई महारथियों को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और रोमन का अंतर तक नहीं पता। हिंदी के अंकों पर सहमति कैसे बनाई जाए?

मुक्ता: जहाँ तक अंकों की बात है, मुझे रोमन अंकों को अपनाने में कोई आपत्ति नहीं है। लिपि आँखों पर सहज पड़े, मैं प्राथमिकता इस बात को देती हूँ। पूर्ण विराम के लिये भी मेरा झुकाव बिंदु की तरफ़ है, न कि खड़ी पाई (।)। यह एक व्यवहारिक चुनाव है। हाँ, हम जो भी कनवैनशन अपनाएँ उसमें दृढ़ बने रहें। कोशिश करें जो प्रचलन है, उसके हिसाब से चयन करें। वैसे, हिन्दी के कई बहुचर्चित प्रकाशन अब रोमन अंक और बिंदु का इस्तेमाल कर रहे हैं। मैंने भी यह कनवैनशन दिल्ली प्रैस में काम करने के दौरान अपनाया।


अनुराग: दिल्ली प्रेस ने विराम की जगह बिंदु अपनाकर कुछ स्याही अवश्य बचाई होगी लेकिन पूर्णविराम को अल्पविराम से भी छोटा कर देना मुझे नहीं जँचता। खैर, अगले प्रश्न पर चलते हैं - विश्व की अन्य भाषाओं की अपेक्षा हिंदी साहित्य क्यों पिछड़ रहा है? हिंदी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ बिकती क्यों नहीं हैं?

मुक्ता: ये दो अलग सवाल हैं। पहले के जवाब में –
हम ने अपने निर्माणात्मक सालों में गणित पढ़ा, अंग्रेज़ी पढ़ी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, इतिहास पढ़ा, लेकिन हिन्दी साहित्यिक अध्ययन को उपयुक्त समय नहीं दिया। हम यही बातें अपने बच्चों के साथ भी दोहरा रहे हैं। यूऐस में एक अच्छा शिक्षित हाई स्कूल विद्यार्थी अमेरिकन लिटरैरी मास्टर्ज़ की रचनाओं में माहिर हो कर ग्रैजुएट करता है। उसे क्रियेटिव राईटिंग 10-11 साल की उम्र से ही सिखाई जाने लगती है। कॉलिज तक ये शिक्षा चलती रहती है। साहित्य के दृष्टिकोण से यदि देखें तो अमरीकी (और यूरोपियन) स्नातक कहीं ज़्यादा शिक्षित हैं। तो साहित्य पिछड़ा इसलिये है क्योंकि हमने इसे कभी बढ़ाने की कोशिश ही नहीं की। हमारे यहाँ वही लेखक उभर कर आते हैं, जो पैदाइशी अच्छा लिखते हैं। और वे भी खुद को खुद ही तराशते हैं।
अंग्रेज़ी पुस्तकों के मुकाबले हिन्दी पुस्तकें इसलिये नहीं बिक रहीं क्योंकि हमने पुस्तकों को मारकिट के सामने ही नहीं रखा। उन्हें वैसे नहीं प्रमोट किया जैसे अंग्रेज़ी पुस्तकों को किया जाता है। असल में अगर आप सीन को ग़ौर से देखें, तो हिन्दी पुस्तकें भावी पाठकों के सामने ही नहीं आ पातीं। प्रकाशक और हिन्दी लेखक आपस में पुस्तक ‘प्रिंट’ करने की बिज़नस डील करते हैं, अकसर प्रकाशक महज़ प्रिंटर होता है, लेखक वैनिटी पबलिशर, अपने ही पैसे देकर कुछ गिनती की किताबें छपवाता है, फिर वे किताबें अपने मित्रों और साहित्यिक ‘नैटवर्क’ (अकादमी के सदस्य आदि) में बाँट देता है। इस पूरे सिलसिले में पाठक का नामोनिशान तक नहीं होता। तो हिन्दी पाठकों को यही नहीं मालूम होता के वर्तमान लेखक हैं कौन और उनका काम उपलब्ध कहाँ होगा।
दूसरी बात यह भी सच है कि भारत में किताबें खरीदने का रिवाज़ कम है। आम आदमी सैकड़ों चीज़ों में पैसे फूँकने को तैयार रहता है, लेकिन सौ-दो सौ रुपए की किताब खरीदने से पहले काफी सोच-विचार करता है। उन्हीं किताबों को खरीदने की सोचता है जिनकी मीडिया में चर्चा हो रही होती है। यह स्थिति भारत में अंग्रेज़ी किताबों की है। हिन्दी किताबों का हाल तो और भी बुरा है।


अनुराग: हिंदी कमज़ोर क्यों है? यह कब तक अंग्रेज़ी को चुनौती देने योग्य हो सकेगी?

मुक्ता: नहीं, हिन्दी कमज़ोर नहीं है।
मुझे नहीं मालूम था कि हम अंग्रेज़ी को चुनौती देने का इरादा रखे हुए हैं। हम ऐसी चुनौती देना भी क्यों चाहेंगे। भाषा तो केवल संचार का माध्यम है। वो रूखी सूखी भी हो सकती है, निहायत खूबसूरत भी। अंत में (आगे के सालों में) शायद सबसे ऐफिशियंट भाषा बची रहे। लेकिन हिन्दी खूबसूरत होने के अलावा, ऐफिशियंट भी है। इस बात का प्रमाण कुछ वक्त किसी अच्छे हिन्दी शब्दकोश में बिताने पर मिल जाता है। हम किस खूबसूरती से भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, ये कोई हमारी ज़रूरत नहीं है, ये तो बस हमारे दिमाग के चोंचले हैं।
मुझे लगता है कि अगर कभी किसी समय हिन्दी विलुप्त होगी, तो वो इसलिये नहीं कि हिन्दी भाषा में कमज़ोरी है, वरन इसलिये कि हिन्दी भाषी अपने व्यवहार में खरे नहीं उतरे, उन्होंने अपनी भाषा को जीवित रखने का खेल चतुरता से नहीं खेला। स्कूलों में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर से ही यदि हिन्दी के अध्यापक ज्यादा सक्षम व प्रभावशाली हों, तो विद्यार्थी भी हिंदी में दक्ष निकल कर आएंगे और दक्ष हिंदी भाषियों की पीढ़ी ही हिंदी का भविष्य तय कर पाएगी।


IV

अनुराग: आपकी कुछ प्रिय पुस्तकें? प्रिय साहित्यकार? ऐसी किताब जिसने आपके जीवन की दिशा बदली हो?

मुक्ता: प्रिय साहित्यकार ... कई हैं। हिन्दी की लगभग सब रचनाएँ जो अब क्लासिक मानी जाती हैं, उन्हें कोई भी पढ़े तो उसका दिल छू जाए। मुझे तीन साहित्यकार खास पसंद हैं। इनकी हर कहानी, उपन्यास मुझे पसंद है। इनकी रचनाओं ने अलग-अलग तरह से मुझे प्रभावित किया है – शिवानी के उपन्यासों ने मुझे पंख चढ़ा कर उड़ान भरना सिखाया है, अपने संसार को सपनीले अंदाज़ में देखने का महत्व सिखाया है;
फिर दूसरे पसंदीदा लेखक मण्टो हैं। जो तथ्य हमें स्कूल की इतिहास की किताबों में नहीं मिल पाए, वो हमें जा कर मण्टो की कहानियों में खोजने पड़े। उनकी कहानियों को दस्तावेज़ कहें? उनका उद्दंड दृष्टिकोण, उनका सूक्ष्म व निर्भीक निरीक्षण, उनकी पैनी कलम और उनकी आक्रोश से लबलबाती अनुशासित भाषा के मैं शुक्रगुज़ार हूँ।
कहानियाँ सपनों या भयावनी जगहों में ही नहीं छिपी मिलती हैं। कहानियाँ हमारे आसपास, रोज़मर्रा जीवन में लगातार घट रही हैं। उन्हें खूबसूरती के साथ सुनाना मोहन राकेश को आता है। मैं उनके ऑब्जैक्टिव अप्रोच और संवेदनशीलता की फैन हूँ। तीनों लेखकों के अंदाज़ अलग हैं।


अनुराग: क्या आप हिंदी भाषा तथा हिंदी साहित्य की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं?

मुक्ता: हिन्दी भाषा की स्थिति ईर्ष्या योग्य है। ये तथ्य कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, इस बात का एक प्रमाण है।
हिन्दी साहित्य संतोषजनक जगह पर नहीं है। इसकी वजह प्रकाशकों का पाठकों तक साहित्य पहुँचाने की पूर्ण असमर्थता है। लेखक से पाठक का रास्ता बनाना प्रकाशकों का काम है। ये रास्ते या तो हैं ही नहीं, या फिर बहुत टेढ़े हैं। ऐसा होना ज़रूरी नहीं है।


अनुराग: वर्तमान हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

मुक्ता: हिन्दी साहित्य के संसार में भले ही बहुत अच्छे साहित्यकार हों, मगर हिन्दी पाठक उन के दायरे के बाहर ही हैं। आज हिन्दी साहित्यकार केवल अवार्ड चाहता है। अपने इर्द-गिर्द प्रशंसक चाहता है। उनके काम को आम जनता में ख्याति मिले, इस कामना को लेखक कब का त्याग चुका है। इसमें लेखक की कोई गलती नहीं है। आम जनता में लेखक के काम का प्रसार बहुत ही मुश्किल काम है। और ये काम लेखक का नहीं वरन प्रकाशक का है। प्रकाशक को ये काम करने के लिये - अच्छे-खासे इनवैस्टमेंट करने के लिये और रिस्क उठाने के लिये तैयार रहना चाहिये। एक तरह से यह एक कलैक्टिव फिनौमिनन है। इसे समझना इतना मुश्किल नहीं है जितना कि इसे कामयाबी से अंजाम दे पाना है।


अनुराग: हिंदी के विकास में बाधा क्या है? इसे सुधारा कैसे जा सकता है?

मुक्ता: अच्छा साहित्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उपलब्ध हो, तो विकास ज़रूर होगा। लेकिन पाठकों ने भी किताबें खरीदना बंद कर दिया है। तो किसी तरह पाठकों को साहित्य पढ़ने को राज़ी कर पाना भी ज़रूरी है ... आप यह काम उन्हें हिपनोटाईज़ करके हासिल कर सकते हैं (हंसतीं हैं)। एक कामयाब प्रकाशक प्रमोशन के ज़रिये ये अंजाम हासिल करने की कोशिश करता है। अंततः विकास तब होगा जब पढ़ने वालों की संख्या अधिक होगी।
ये सच है, जितना हम इस प्रयास में देरी कर रहे हैं उतना ही ज़्यादा मुश्किल पाठकों को आकर्षित करना हो रहा है। मूवी और इंटरनैट बेस्ड मीडिया तेज़ी से आगे बढ़ चुके हैं, नए माध्यम सामने आ रहे हैं और प्रिंट मीडियम इन सब के सामने फीका ही लगता है। बाज़ी जीतने वाली नहीं लग रही है।


अनुराग: हिंदी में पाठक भले न हो, लेखक और प्रकाशक तो हैं, इस विषय में आपका क्या विचार है?

मुक्ता: हिन्दी में पाठक हैं। हम हिन्दी पाठक को एक अरसे से इगनोर मारे जा रहे हैं। हवा, पानी, खाना और छत के बाद रैकगनिशन और इंटलैक्चुएल स्टिमुलेशन इंसान की ज़रूरतें हैं। रैकगनिशन ने हमें सोशल मीडिया के चंगुल में फंसा दिया है - यहाँ हर जना खुद को प्रमोट कर सकता है। बचा इंटलैक्चुएल स्टिमुलेशन। इस स्टिमुलेशन की ज़रूरत हर हिन्दी बोलने वाले इंसान को हिन्दी पाठक में बदलने की ताकत रखती है।
तो पाठक हैं। वो तो प्रकाशक और लेखक का अद्भुत लूप है जिसमें पाठक शामिल ही नहीं है।
हम अब लैंड ऑफ डैस्पराडो में पहुँच चुके हैं –
लेखक पाठक को भूल गया है, बस नाम के पीछे भाग रहा है, उसे बस अवार्ड चाहिये, जिसके लिये उसे लगातार अकादमियों और साहित्यिक संस्थाओं से नैटवर्किंग करनी है, प्रकाशक से वास्ता रखना है।
प्रकाशक भी पाठक को नहीं जानता। उसे तो बस पैसा चाहिये, वो उसे लेखक दे रहा है।
बेचारा भुलाया हुआ इंटलैक्चुअल स्टिमुलेशन का मारा पाठक या तो किताबों की तलाश में दर-दर भटक रहा है, या फिर कम्प्यूटर के सामने पड़ा अपनी फिज़ूल की फोटो शेयर करे जा रहा है।


अनुराग: इस दशक में सामने आये नए प्रकाशकों और पीढ़ियों से स्थापित पुराने प्रकाशकों में मूल अंतर और समानताएँ क्या हैं?

मुक्ता: मेरे ख्याल से दुनिया में सब प्रकाशक – नए, पुराने, भारतीय, विदेशी - अब कोई नया बिज़नैस मॉडल ढूंढ रहे हैं। रिस्क लेना बहुत दूभर हो गया है। तभी अगर आप पिछले सालों में जितने भी कामयाब टायटल (भारत में अंग्रेज़ी टायटल) देखेंगे, उनकी मारकिटिंग में किसी न किसी तरकीब का इस्तेमाल किया गया है। फिर आने वाले अगले प्रकाशन वही तरकीब काफी बार उपयोग कर ऐगज़ौस्ट कर देते हैं, फिर कोई नई तरकीब सूझनी पड़ती है, और जब तक वह न सूझे, कई अच्छी कृतियाँ आती हैं, चुपके से गुमनामी के धुंध में घुस जाती हैं। बड़े प्रकाशन हाऊस नेम-रिकौगनिशन के आधार पर ही लेखक चुनते हैं। फिर उन्हें कामयाब बनाने के लिये उनकी मारकेटिंग जो करते हैं वो भी उनके बिज़नस प्लान का एक ज़रूरी भाग है।
किसी भी कामयाब किताब की चढ़ाई कोई मामूली चढ़ाई नहीं है कि होनहार लेखक ने एक अद्भुत पुस्तक लिखी, स्वाभाविक रूप से रिव्युअर ने उसे सराहा, रिव्यू पढ़कर अनेकों पाठकों ने उसे खरीदा, अंततः वह एक बैस्टसैलर हुई। नहीं, प्रकाशक द्वारा सूझी इस चढ़ाई की हर सीढ़ी पैसों से रिसी हुई है, अपने आप में एक बिज़नैस प्लान है। प्रकाशक ने किसी एक सीढ़ी पर कम ध्यान लगाया, पूरा का पूरा प्लान बिगड़ा!
पाठक यह सोचकर खुश होता है कि हमने अपने युग की सब बेहतरीन रचनाएँ पढ़ लीं हैं। जबकि मारकिट में सिर्फ वो माल आता जिसकी छँटाई उसकी मैरिट के आधार पर नहीं वरन प्रकाशक के कौनफिडंस के आधार पर होती है। अंत में पाठक वो पढ़ता है जो प्रकाशक उसे पढ़ाना चाहता है।
हिन्दी प्रकाशक - नए या पुराने - ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। हिन्दी प्रकाशकों (नए और पुराने) में एक बात कॉमन है – लेखक से ऐडिटिंग या प्रिंटिंग के पैसे की उम्मीद लगभग सब करते हैं। पाठकों को किताबें कैसे पढ़वाएँ, इस समस्या का समाधान इनके पास नहीं है।


अनुराग: क्या नए (मूलतः सेल्फ़-फ़ाइनेंस्ड पब्लिशिंग) प्रकाशन मॉडल में मीडियॉक्रिटी को बढ़ावा मिला है?

मुक्ता: ई-कल्पना के सम्पादन ने मुझे यह दिखाया है कि लिखने का शौक रखने वालों में मीडियॉक्रिटी की कमी नहीं है। अगर मैं अनुमान लगाना चाहूँ, तो आज के लेखकगणों के ग्रुप में केवल 5 से 10 प्रतिशत मोहन राकेश स्तरीय लेखक होंगे, बाकी अच्छा लिखने के बावजूद केवल मिडियॉकर प्रौडक्ट डैलिवर कर रहे हैं। और मिडियॉकर रचनाओं को कोई नहीं पढ़ना चाहता। ये बात मद्देनज़र में रखते हुए मैं यही कहूँगी कि फ़्री सोसाइटी है, कोई सैल्फ-पब्लिशिंग करना चाहता है तो करे, प्रकाशक भी तो सही तरह से अपनी सेवाएँ प्रदान नहीं कर पा रहे हैं।


अनुराग: एक अच्छे लेखक, प्रकाशक, और सम्पादक के क्या गुण हैं? इस पैमाने पर आप खुद को कहाँ पाती हैं?

मुक्ता: लेखकों में मैं कहानीकारों की ही बात कर सकती हूँ। सबसे पहले जो भी लिखने की आकांक्षा रखता है, उसके लिये यह ज़रूरी है कि वह साहित्य से खुद को अवगत तो रखे ही, साथ में समकालीन स्थापित लेखकों की रचनाएँ भी ज़रूर पढ़े - अच्छे लेखन के स्तर का अंदाज़ा हर लिखने में रुचि रखने वालों को होना चाहिये. फिर आगे, मेरे हिसाब से एक अच्छा कहानीकार वो है जो अपनी प्रेरणा से कहानी लिखता हो, महज़ समय या समाज की माँग को देखते हुए नहीं; जो अपने भीतर मंडराती कहानी को लिखने को बेचैन हो रहा हो। जिसमें इतना आत्मसंयम हो कि वह कहानी के मुख्य पात्रों और कथानक के मुख्य मुद्दों का सही विकास करने में वक्त निकालने को तैयार हो, फिर उसे सही मूड में सही आवाज़ दे पाए, यदि कहानीकार अच्छा लेखक भी हो, तो कहानी में भाषा द्वारा कुछ जादू भी घोल पाए। अगर वो अच्छा लेखक नहीं है, तो भी वह यह जादू घोल सकता है, बस इस बात के लिये उसे ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इस सब के लिये ज़रूरी है कि लेखक संवेदनशील हो, चाहे जिस पात्र के दृष्टिकोण से कहानी लिख रहा हो, ओवरव्यू में उसे सब खास पात्रों के दृष्टिकोण समझ आने चाहिये। जब भी मैं कोई कहानी लिखती हूँ, तो लिखने से पहले कहानी से संबंधित काफ़ी चीज़ों के बारे में रिसर्च करती हूँ।
अच्छे कहानीकार को पाठक पढ़ते ही पहचान लेता है क्योंकि वो उस कहानी के काबू में आ गया होता है।
जब मैं ऐसे कहानीकार से अवगत होती हूँ, तब उसे हर हाल में प्रकाशित करना चाहती हूँ। मुझे उसके काम पर इतना यकीन होता है कि मैं बेझिझक उस पर पैसा लगाने को तैयार हो जाती हूँ। मेरा मकसद उन कहानियों को पाठकों के सामने लाना है। इसी बात को सोच कर उल्लासमय होती हूँ कि जब पाठक ये कहानियाँ पढ़ेंगे तब कितने संतुष्ट और प्रेरित होंगे। इस तरह की कहानियाँ पढ़कर शायद जो नहीं लिखते हैं, कहानियाँ लिखने को प्रेरित हों।
तीनों में सम्पादन सबसे मुश्किल काम है। एक सम्पादक का सहनशील होना ज़रूरी है।


V

अनुराग: अगले वर्षों में ई-कल्पना से आपकी से क्या अपेक्षाएँ हैं?

मुक्ता: शुरुआत से ही ई-कल्पना का मिशन उभरते लेखकों को अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का मंच देना है। जो लेखक स्थापित हो गए हैं उनके पास मौकों की कमी नहीं है। स्थापित लेखकों ने साहित्य का वर्तमान परिदृश्य रचा है। भविष्य उभरते लेखकों को बनाना है। तो आने वाले महीनों और वर्षों में हमारी यही कोशिश रहेगी कि हम ज़्यादा से ज़्यादा नए लेखकों के काम प्रकाशित करें।
हम ये भी मानते हैं कि कहानीकारों को कहानियों के लिये पारिश्रमिक मिलना चाहिये। इससे न केवल लेखक का अपने काम के लिये गर्व सुदृढ़ होता है, भावी लेखक लिखने को प्रेरित होते हैं। सामान्य तौर से उत्साह बढ़ता है।


अनुराग: सेतु के पाठकों के लिये आपका क्या संदेश है?

मुक्ता: सेतु और ई-कल्पना हम-उम्र पत्रिकाएँ हैं। ज़रूर 2016 में कुछ ऐसा सायत रहा होगा जब रचनात्मक बयारों का बोलबाला रहा होगा। मैं यही चाहूंगी कि पाठकों के समक्ष ऐसे और, कई-कई साहित्यिक निकास हों, पाठक इन्हें खूब पढ़ें, पसंद आने पर अपने मित्रों को भी सुझाएँ, रचना पसंद आने पर अपनी राय दें, लेखक का अभिनंदन करें – क्योंकि पाठक के मुँह से तारीफ़ एक लेखक के लिये हज़ार रुपए पाने समान है। पाठकों के लिये मेरा यह भी संदेश है कि अच्छी रचना पढ़ने से यदि उनका भी लिखने का जी करे, तो तुरंत (या जितनी जल्दी हो सके) लिखने बैठ जाएँ। पढ़ना और लिखना मन को उन्मुक्त करता है। जीवन की उलझनें कम करता है।


अनुराग: मुक्ता जी, बातें बहुत हैं, और समय कम। अपने अन्य प्रश्नों को भविष्य के लिये बचाते हुए मैं आपके समय के लिये आभार व्यक्त करता हूँ।

मुक्ता: आपका भी धन्यवाद!

2 comments :

  1. बहुत शानदार, स्पष्ट और ग्राह्य बातचीत। जैसा कि प्रिय अनुराग ने कहा--'अपने अन्य प्रश्नों को भविष्य के लिए बचाते हुए', तो यह अंतराल बहुत लंबा न हो। यह एक बड़ी सचाई है कि 'मिडियॉकर रचनाओं को कोई नहीं पढ़ना चाहता'। बहुत-सी बातें लेखक बातचीत में ही कह पाता है। मुक्ता जी से वे मौके लेते रहिए। मेरी ओर से बधाई और शुभकामनाएँ, आप दोनों को।

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  2. बहुत अच्छा रहा। सवालों के जवाब बहुत गहराई लिए हुए हैं। यह जवाब देने वाले की सोच की गहराई बतलाते हैं।

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