बुराई का प्रतिरोध भी अहिंसा है

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


हिंसा और अहिंसा की बहस में प्रायः यह सुनने में आता है कि हिंसक लोग ज्यादा फलते-फूलते हैं पर यह एक गलतफ़हमी है। सच्चाई तो यह है कि हिंसा करने वाला व्यक्ति और हिंसक सोच रखने वाला व्यक्ति स्वतः भले यह सोच ले कि उसने धन संचय कर लिया है, या अपने भौतिक संसाधनों व ज़रूरत के साधनों को इकट्ठा कर लिया है और उसकी आने वाली पीढ़ियाँ भी इससे उस यश-वैभव को प्राप्त करती रहेगी जिसकी प्रायः लोग इच्छाएँ करते रहते हैं, पर यह सच नहीं है। देखने में ऐसा भले प्रतीत हो कि उसके पास सब कुछ है लेकिन उसके पास सच में कुछ नहीं होता। इससे अधिक सुखी तो आदिवासी इलाके में रहने वाला अंतिम पंक्ति का व्यक्ति होता है। उसका सुख लोग नहीं जान पाते पर प्रकृति की आँचल में उसके जैसा सुख भोगने वाला कोई और नहीं। जंगल में उसका अपना मंगल है। प्रकृति के साथ उसके जुड़ाव से उसका स्वस्थ जीवन तो होता ही है, उसके पास किसी प्रकार के तनाव भी नहीं होते। उसको प्रकृति से जो मिले, उस थोड़े में ही अपना जीवन-यापन करना उसकी सबसे बड़ी ख़ुशी है। 

अब चीजें बदली हैं तो हिंसक सभ्यता के लोग जंगल की ओर भागने लगे हैं। पूरी दुनिया में ग्रीन इकॉनॉमी पर साम्राज्यवादी देशों, कॉर्पोरेट घरानों और उन संचयवादी ताकतों की निगाहें हैं जो देशज लोगों की ज़िन्दगी को तबाह करने के लिए काफी होंगी। दुनिया में जंगल के भाग में कमी आई है। बढ़ती जनसंख्या ने यह अनुपात कम किया लेकिन मुट्ठीभर देश और कॉर्पोरेट जगत के लोग इस पूरी धरती के जल, जंगल और जमीन पर जिस प्रकार काबिज हुए हैं उससे चिंताएँ बढ़ी हैं। जंगल का जीवन अब वैसे सुकून का नहीं रहा जैसा पहले था। अकादमिक बहस और स्टेट की बहस में ऐसी बातें सुनी जा रही थीं कि मूल्यगत जीवन स्तर में घटोतरी और संसाधनों पर काबिज होने की सनक से दुनिया जल युद्ध के करीब जा रही है पर यह बात अब अलग हो चुकी है। आने वाले समय में ग्रीन बेल्ट और ग्रीन इकोनॉमी के लिए युद्ध हों, इसकी ज्यादा आशंका है। इस बात की ज्यादा प्रत्याशा है कि अधिग्रहण और साम्राज्य की भूख मनुष्यता को खतरे में डाल दे क्योंकि ऐसे में पॉवर पॉलिटिक्स के शिकार स्टेट परमाणु अस्त्र चलाने से नहीं चूकेंगे। सामाजिक स्तर पर पूरी दुनिया में हो रहे ध्रुवीकरण ने बच्चों, महिलाओं और निःशक्त लोगों के जीवन स्तर को खतरे में डाल दिया है तो इसकी वजह केवल कुछेक राष्ट्रों का आत्म-मोह और शक्ति-संपन्न बने रहने की सनक है।

ऐसे में, शांति के लिए बढ़ते खतरे को कम करने की जिम्मेदारी एक चुनौती है। यह किसी भी राष्ट्र की निजता और उसकी संप्रभुता के लिए ललकार है। तीसरी दुनिया के लोग गरीबी और भुखमरी के शिकार हैं। बहुत से राष्ट्रों के पास अपने देश की अर्थव्यवस्था को संचालित करने की चुनौतियाँ इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के अंतिम चरण में दिखने लगे थे, भले ही तब पूरी तरह से समझ में न आये हों। अनेक देशों के वित्त-संस्थान तब दिवालिया होने लगे थे। पूरी बहस ही अर्थ-व्यवस्था को लेकर शुरू हो गई थी पर अब जो बहस होने वाली है वह ग्रीन बेल्ट और ग्रीन इकोनॉमी को लेकर होगी और उसमें सामरिक महत्त्व की जो चीजें हैं वह न केवल अर्थ-व्यवस्था को चुनौती देंगी बल्कि पूरी सामाजिक संरचना, स्वतंत्रता और गरिमा को भी चुनौती देने को तैयार होंगी। सह-अस्तित्व के लिए बढ़ती दरार है इस सभ्यता का पनपना। ऐसे में, जो राष्ट्रों के बीच एक दूसरे के लिए जो संवेदनाएँ थीं वह भी समाप्त हो जायेंगी और कोई भी राष्ट्र एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर सकेगा। राष्ट्रों के बीच केवल व्यापार के रिश्ते बचेंगे। व्यापार से कितने अच्छे रिश्ते विकसित हो सकते हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दुनिया में शांति के लिए प्रतिबद्ध संयुक्त राष्ट्र को गतिमान रखने के लिए दी जाने वाली आर्थिक मदद से अब वे देश कतराने लगे हैं जिन्हें उस निवेश में कोई लाभ नहीं दिखता है। यदि वे मदद के लिए सहयोग की हाँ भी किये हुए हैं तो वे चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र उनकी बात को अक्षरशः मानता रहे। यानी वे संयुक्त राष्ट्र की स्वायत्तता नहीं चाहते हैं। जब इस स्तर पर भी अपनी प्रभुसत्ता की चाहत है तो ग्रीन बेल्ट पर अपनी संप्रभुता की चुनौती को वे कैसे सह सकेंगे? वे उस रिश्ते को मजबूती कैसे दे सकेंगे? यह बड़े सवाल हैं जो आज नहीं तो कल दुनिया के सामने आना ही है।

यह वर्ष बहुत ही महत्त्वपूर्ण साल के रूप में माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा-पत्र के सत्तर वर्ष पूरे हो चुके हैं। भारत अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मोत्सव की 150वीं जयंती मना रहा है। सत्रह सूत्रीय धारणीय विकास कार्यक्रम की दृष्टि से भी यह वर्ष महत्त्वपूर्ण है। कई मायने से और भी महत्त्वपूर्ण वर्ष में खतरों को भी अगर हम देखें तो यह समझ में आता है कि दुनिया में जलवायु-परिवर्तन को लेकर हो रही चिंता और दुनिया के लगभग बीस देशों में निरंतर अशांति की बहस में फँसी दुनिया कम से कम शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी रही है। गरीबी और भुखमरी की समस्या से जूझती एक बड़ी आबादी तो है ही, शरणार्थियों की समस्याएँ और हिंसा की शिकार हो रही आबादी ने अशांति को अवसर दिया है। ये सभी समस्याएँ किसी अन्य की उपज नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा निर्मित हैं। और इस बीच कतिपय कारणों से जब राज्यों को यह दिख रहा है कि हमारी आने वाले समय में संप्रभुता किन विशेष चीजों पर आधिपत्य से बनेगी तो निःसंदेह उनका अतिक्रमण और आधिपत्य एक नई हिंसा को जन्म देगा। प्रकृति के साथ जुड़ाव की जगह अब प्रकृति पर आधिपत्य की सोच जो पनप रही है उसे कम से कम रोकने का वक्त आ गया है।

ऐसे में, प्रतिरोध आज की आवश्यक आवश्यकता है। यह हिंसक सभ्यता रोकने का एक मार्ग है। क्योंकि अहिंसा की अवधारणा यह बताती है कि बुराई का प्रतिरोध न करना हिंसा है। मनुष्य समाज को आज यह विचार करने की आवश्यकता है कि हमारा भविष्य कहाँ सुरक्षित है और इसके लिए हमें क्या करना आवश्यक है। मानव समाज को अहिंसक समाज के निर्माण के लिए अपनी आवाज़ को मुखर करने की आवश्यकता है वरना आधिपत्य और अतिक्रमण से साम्राज्य के भूख में निमग्न लोग पूरी मनुष्य की सौन्दर्य क्षमता-करुणा, दया, प्रेम और सह-अस्तित्व के लिए ख़तरा खड़ा कर देंगे। यह सच है कि कुछेक आवाजों से कुछ नहीं होना है पर यह सामूहिक आवाज़ इस आशय को समझकर कि हिंसा सहना भी और हिंसा के बदले चुप हो जाना भी हिंसा का पोषक होना है, अपनी आवाज़ को आंदोलन में बदल लेंगे तो निश्चित रूप से मनुष्यता को बचाया जा सकेगा। उन राज्यों को भी संगठित होने की आवश्यकता है जो भयानक हिंसा के शिकार होने वाले हैं। एक प्रकार से यह अपने मनुष्य समाज को बचाने की प्रतिबद्धता है न कि किसी का विरोध। समस्या यह है कि अपने छोटे-छोटे हित राज्य के नेतृत्त्वकर्ताओं को बौना बना देते हैं। ऐसे राज्य दुनिया में उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं जो अपने छोटे हितों के लिए साम्राज्यवादी ताकतों के पिछलग्गू बने हुए हैं। वे भयानक क़र्ज़ में हैं। अपने राज्य के परिसीमा में रहने वाले लोगों के साथ वे धोखा कर रहे हैं पर उनके लिए तत्कालीन परिस्थितियों में वही सही कदम लग रहा है। आने वाले समय में वे वर्षों इस क़र्ज़ में रहेंगे। उनकी आबादी क़र्ज़ में रहेगी। उनका संविधान और उनकी नीतियाँ भी अपनी नहीं हैं पर वे मुखर हो नहीं सकते हैं क्योंकि उनका अस्तित्व ही ऐसा है कि उनमें प्रतिरोध का नैतिक साहस ही नहीं है तो प्रतिरोध होगा कैसे। पर ऐसे में मानवतावादियों को यह मानकर शांत रहने की ज़रूरत नहीं है कि केवल राज्य इस दिशा में कदम उठाएँगे। बात उठनी चाहिए चाहे वह किसी भी ओर से उठ रही हो। राज्य तो अपने उत्तरदायित्त्वों को पूरा करने से रहे क्योंकि उन्होंने किसी व्यवस्था के सामने घुटने टेक रखे हैं। यदि यह आवाज़ वैयक्तिक से सामूहिक बन जाएगी तो भी काफी परिवर्तन के आसार हैं। अहिंसक सभ्यता के निर्माण में आज उन आवाज़ों की तलाश है जो युद्धों को सदा के लिए समाप्त कर शांति का मार्ग प्रशस्त करें। जल-जंगल-जमीन पर आधिपत्य, निजता और स्वतंत्रता पर आधिपत्य के खिलाफ उठाई गई आवाज़ अहिंसक सभ्यता की रौशनी है। इससे उन मूल्यों की स्थापना होगी जिससे मनुष्यता बची रहेगी। बहुत सामान्य सी बात काफी देशों में फ्रेज के रूप में प्रयोग की जाती है कि कौन बढ़ाएगा पहला कदम? इस फ्रेज को फ्रेज बने रहने देने से तो कोई भी दिशा मिलने की संभावना नहीं है पर यदि शुरुआत हो जैसा कि विभिन्न मसलों को लेकर प्रतिरोध दुनिया में देखा जा रहा है, वैसी शुरुआत भी हो अहिंसक समाज के निर्माण के लिए तो निश्चित ही सुखद प्रकृति और सुन्दर मानव सभ्यता की चिरंतन जीवन की उम्मीद की जा सकेगी।

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