लघुकथा विधा संबंधी उलझी गुथियों को सुलझाती पुस्तक - परिन्दे पूछते हैं

- राधेश्याम भारतीय

परिन्दे पूछते हैं 

लेखक: डॉ अशोक भाटिया
प्रकाशक: लघुकथा शोध केन्द्र, भोपाल म.प्र
पृष्ठ: 144
मूल्य: ₹100.00


लघुकथा विमर्श की पहली पुस्तक ‘परिन्दे पूछते हैं’का प्रकाशन इस विधा के लिए शुभ संकेत ही माना जा सकता है क्योंकि इस विधा पर विमर्श बहुत कम पढ़ने-सुनने में आया है। इसके बावजूद कुछ लेखक, समीक्षक अपने ही नियम गढे़ जा रहे हैं। ऐसे में नवलेखकों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। उनके समक्ष यहीं प्रश्न मुँह बाये खड़े रहते हैं कि लघुकथा के लिए शब्द सीमा कितनी हो, पात्र कितने हों, कालदोष किसे माने या ना माने, कल्पना का समावेश कितना हो, यथार्थ और आदर्श का तालमेल कैसे बने, संवाद लिखते समय किन बातों का ध्यान रखें, भाषा शैली और शीर्षक तक में उलझन हो तो ऐसे में बेहतर रचना कैसे हो? अब विधा के पारखियों का दायित्व बन जाता है उन नवलेखकों को भटके हुए राहगीर की भांति सही मार्ग दिखाएँ ताकि वे बिना किसी उलझन के अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें।
राधेश्याम भारतीय

 लघुकथा के उन राहियों के लिए ही यह पुस्तक प्रकाश में आई। इसके लिए अह्म भूमिका निभाई लघुकथा विधा को समर्पित कांता राय ने, जिन्होंने नवलेखकों की समस्या को गहरे से समझा और इस समस्या को डॉमालती महावर बसंत के सामने रखा। उन्होंने इस तरह की पुस्तक के लिए लघुकथा शोध केन्द्र के माध्यम से प्रकाशित करवाने का आश्वासन दिया। पुस्तक प्रकाशन के आश्वासन मिलने उपरांत यही समस्या कांता राय ने वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ अशोक भाटिया के सामने रखी।

डॉ अशोक भाटिया लघुकथा विशेषज्ञ हैं। इन्होंने इस विधा के बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। चार दशक से इस विधा की जड़ों को अपनी साहित्यिक साधना-जल से पल्लवित-पुष्पित करते रहे हैं। राज्य-विशेष से लेकर वैश्विक परिदृश्य तक का चित्रण करते हुए लघुकथाओं का कोना-कोना झांका है। कॉलेज स्तर पर अघ्यापन करते हुए विधा की गहराइयों को समझा, गोष्ठियों, सम्मेलनों, एवं लघुकथा विद्वानों के साथ गहन विचार मंथनकर इस विधा के लिए कुछ सार्वभौमिक तथ्य तय किए हैं। अतः नवलेखकों की जिज्ञासा को शांत करने का पूरा प्रयास किया गया इस पुस्तक के माध्यम से।

‘परिन्दे पूछते हैं’ पुस्तक में परिन्दे नवलेखक हैं और उन द्वारा उठाए गए अस्सी सवालों का जवाब बहुत ही सरल, सहज रूप में हरिशंकर परसाई, विष्णु प्रभाकर, विष्णु नागर, रवीन्द्र वर्मा, इब्ने इंशा, समीरा मइने, पृथ्वीराज अरोड़ा, असगर वजाहत, रमेश बतरा, सतीश दुबे, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, हरभजन खेमकरणी, श्याम सुन्दर दीप्ति, अमर गोस्वामी, रामेश्वर काम्बोज‘हिमांशु’ अशोक भाटिया की श्रेष्ठ लघुकथाओं के उदाहरण देने के साथ-साथ अन्य प्रसिद्ध लघुकथाकरों की लघुकथाओं के नाम बताकर हल करने का प्रयास किया गया।

 नवलेखकों द्वारा लघुकथा के आकार बारे पूछने पर डॉ अशोक भाटिया लिखते हैं- छोटे आकार की लघुकथाओं का एक साँचा नए लेखकों के मन में बन गया है। वह बड़ा गलत है, ऐसा साँचा सृजन का शत्रु है। लघुकथाएँ यदि विषय की मांग के अनुसार लम्बी हो रही हैं तो उन्हें जान-बुझकर छोटा मत करें। रचना की मांग को, उसकी पूर्णता को देखें, आकार को भूल जाए। मन को खुला करें, लघुकथा में खुलापन आने दें। मन बड़ा बनाए, लघुकथा भी बड़ी होती जायेगी।

रचना की शर्तें रचना के भीतर से ही निकलती हैं, बाहर से थोपी नहीं जातीं। बाहर से तो रचनात्मक अनुशासन और मर्यादा ही चाहिए।

ऋता शेखर मधु और उषा भदौरिया प्रश्न उठाती हैं कि लघुकथा में कल्पना का प्रयोग कहाँ तक उचित है? इस प्रश्न पर भाटिया जी विस्तार से चर्चा करते हैं और अपनी बात को और मजबूत करने के लिए प्रेमचंद का उदाहरण देते हैं। उनका मानना है कि एक काल्पनिक यथार्थ भी होता हैं। अर्थात कल्पना का प्रयोग इस तरह किया जाए कि वह यथार्थ लगे।

डॉ भाटिया लिखते हैं- कल्पना का रचनात्मक होना जरूरी है अर्थात, हवाई कल्पना नहीं, ऐसी कल्पना जो रचना के सृजन में सहायक हो, उसके उद्देश्य को पूरा करे। कल्पना एक साथ कईं काम करती है। यदि कल्पना से सृजित लघुकथा देखनी है तो बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘नदी को बचाना’ देखी जा सकती है।

अशोक भाटिया इस विधा के लिए नए-नए प्रयोग के पक्षधर रहे हैं, वहीं इसमें आ रही कमजोरियों की ओर भी इंगित करते हैं- अधिकतर हिंदी लघुकथाएँ कल्पना से दूर रहती हैं। इसलिए वे घटित तक ही सीमित रहती हैं। उसे ‘कहन’ में बदलने का उपक्रम वहाँ नहीं मिलता। इस कारण वे घटना कथा तथा कथा प्रसंग या भाव -कथा बनकर रह जाती हैं।

रवि प्रभाकर,पूनम डोगरा, सुनीता त्यागी, नेहा नाहटा, सीमा भारती, शिवनाथ शर्मा, अरविना गहलोत, सुभाष जोनवाल पूछते हैं कि किसी भी विधा में रचना किसके लिए की जानी चाहिए, पाठक के लिए या वरिष्ठ साहित्यकारों की स्वीकृति के लिए। उनके प्रश्न का उतर वे इस प्रकार देते हैं - रचना यथासंभव बड़े से बड़े पाठक-वर्ग को ध्यान में रखकर लिखनी चाहिए। पाठक ही रचना की अंतिम कसौटी है।

लघुकथा की रचना प्रक्रिया पर विचार हैं - लिखना एक बच्चे के जन्म की-सी प्रक्रिया है। लेखक लेखन के लिए विषय का, कथ्य का बीज लेकर मन में रखता है, अपनी संवेदना से, सोच से उसे पोसता है, उसके रूप-आकार की कल्पना करता है, फिर मन में उसको पूरा बना लेने के बाद कागज पर उतारता है। इसके साथ-साथ श्रेष्ठ रचनाएँ पढ़ने से श्रेष्ठ लिखने की प्रेरणा भी मिलती है।

कालदोष के लिए डॉ भाटिया अपनी ही लघुकथा ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ और मधुदीप की लघुकथा ‘समय का पहिया घूम रहा है’ का उदाहरण देते हैं। साथ में लिखते हैं - लघुकथा केवल क्षण की विधा नहीं है, वह केवल एक समय की विधा नहीं है। काल निरन्तर प्रवाहमान है। ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ लघुकथा तीन पीढ़ियों पर आधारित है। वहीं मधुदीप की लघुकथा बड़े कालखंड पर आधारित हैं। लघुकथा में नाट्य शैली का प्रयोग है।

और अंत में लघुकथा के लिए क्या चाहिए-लघुकथा भी नदी की तरह होती है जिसके लिए दो किनारे चाहिए उसी तरह लघुकथा के लिए संवेदना और ज्ञान के हैं। ये किनारे भाषा और शिल्प के हैं। इन सबके साथ रचना नदी की भांति बहे-ऐसा प्रयास करना चाहिए। इन सबके साथ रचना सीधे पाठक के हृदय रूपी समुद्र में समा जाए, चेतना को झकझोर दे, ऐसा प्रयास होना चाहिए।

उन प्रश्नों के सटीक उत्तर पढ़कर कहा जा सकता है-यह पुस्तक लघुकथा के लिए संस्कार पुस्तक है। यह जहाँ नवलेखकों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगी वहीं पुराने लघुकथाकारों के लिए सहायक सिद्ध होगी। इसी आशा और उम्मीद के साथ डॉ साहब को बधाई।

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