पत्रात्मक शैली और अमरकांत की कहानियाँ

प्रदीप त्रिपाठी

- प्रदीप त्रिपाठी

सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक
ईमेल: tripathiexpress@gmail.com; चलभाष: +91 892 811 0451

हिंदी कहानी के इतिहास में नई कहानी का दौर काफी सशक्त एवं समृद्ध रहा है। वास्तव में नई कहानी स्वाधीनता के पश्चात भारतीय जनमानस के बदलते हुए समय-बोध, चेतना संपन्न संवेदना से उठा हुआ आंदोलन है। नई कहानी आंदोलन के लगभग सभी कहानीकार मध्यवर्गीय जीवन से ही संबंध रखते हैं। इस दौर की कहानियों का सरोकार स्वाधीन भारत की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थितियों से है। स्वाधीनता के बाद बौद्धिक स्तर पर मूल्यों के विघटन, संत्रास, हताशा एवं मोहभंग को इस दौर के लेखकों ने अपनी रचनाओं में प्रमुखता से रेखांकित किया है। एक प्रकार से देखें तो नई कहानी का निकष स्वाधीनता के पश्चात भारतीय जीवन के यथार्थ की चेतना है। नई कहानी को समृद्ध करने में इस दौर के कई महत्त्वपूर्ण कहानीकारों का सार्थक हस्तक्षेप रहा है। प्रेमचंद की परंपरा से आने वाले ऐसे कई महत्त्वपूर्ण रचनाकार मसलन अमरकांत, शेखर जोशी, मारकंडेय, भीष्म साहनी, रेणु आदि  रहे हैं जिन्होंने न सिर्फ कहानी विधा को समृद्ध किया बल्कि उसे नई दिशा एवं गति प्रदान करने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण एवं सक्रिय भूमिका निभाई है। बावजूद इसके नई कहानी की चर्चा के क्रम में वे हमेशा हाशिये पर ही रहे हैं। इनमें से एक प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में अमरकान्त का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

पाठकीय नजरिये से देखें तो अमरकांत की कहानियों की परतें बहुत ही धीमी गति से खुलती हैं। कहानी पढ़ने के क्रम में सतत जिज्ञासा एवं रचना के प्रति जिजीविषा को बरकरार रखना, अमरकांत का कौशल है। अमरकांत की कहानियों से गुजरते हुए यह महसूस होता है कि उनकी कहन-शैली में एकरूपता का पुट हावी है। उनकी ज़्यादातर कहानियों में बात को रखने का सलीका एक जैसा है, यह रचनाकार की अपनी कमजोरी है। कहानी तत्त्वों के आलोक में अमरकांत की कहानियाँ भले ही तमाम समीकरणों में फिट बैठती है, किंतु समग्रता में देखा जाय तो अमरकांत के यहाँ कहानी प्रस्तुतिकरण की ढांचीय संरचना में वैविध्य नहीं हैं। अमरकांत की रचनाशीलता की खामी यह है कि उनके यहाँ विषय वस्तु का विस्तार नहीं है। उनकी ज़्यादातर कहानियाँ एक ही ढर्रे पर लिखी गई हैं। नई कहानी की शिल्पगत रचनाशीलता से गुजरते हुए देखें तो अमरकांत ने अपनी कहानियों में कई नए प्रयोग किए हैं। अक्सर यह देखने को मिलता है, कहानियों की प्रभावशीलता को उत्कृष्ट करने हेतु रचनाकारों द्वारा कहानियों में यदा-कदा पत्र-शैली के रूप में पत्रांशों का प्रयोग किया जाता रहा है। गौरतलब है, अमरकांत ने इस पद्धति को विशेष महत्त्व दिया। उनकी कई ऐसी कहानियाँ हैं जो पूर्णतया पत्र-शैली में ही बुनी गई हैं।   

कहानी में बतौर टूल्स भाषा और शैली का विशेष महत्त्व है। कहानीकार द्वारा प्रयुक्त भाषा जितनी सशक्त होती है, उसका कथा-साहित्य उतना ही प्रभावशाली होता है। ‘शैली’ भी कहानी का विशिष्ट उपकरण है। विद्वानों ने शैली के महत्त्व को व्याख्यायित करते हुए उसे लेखक के रचना-कौशल का अभिन्न हिस्सा बताया है। शैली का महत्त्व कहानी लेखक के व्यक्तित्व की मौलिक प्रतिभा का द्योतक है। यह बात उल्लेखनीय है कि हिंदी के अनेक रचनाकार केवल शैली की पृथकता से ही पहचाने जाते हैं। डॉ. प्रताप नारायण टंडन ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी कहानी कला’ में कहानी की  शैली के संदर्भ में डॉ. गुलाब राय के मंतव्य को उद्धृत किया है, जो उल्लेखनीय है-  “शैली का संबंध कहानी के किसी एक तत्त्व से नहीं वरन् सब तत्त्वों से है और उसकी अच्छाई और बुराई का प्रभाव पूरी कहानी पर पड़ता है। कला की प्रेषणीयता अर्थात दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति शैली पर ही निर्भर करती है। किसी बात के कहने या लिखने के विशेष प्रकार को शैली कहते हैं। इसका संबंध केवल शब्दों से ही नहीं है वरन् विचार और भावों से भी है।”  सैद्धांतिक दृष्टिकोण के आधार पर यदि कहानी की विभिन्न शैलियों के वैविध्य एवं स्वरूप पर विचार करें तो गुलाब राय के उक्त उद्धरण की पुष्टि होती है कि कहानियों में प्रयुक्त शैलीगत अभिनवता प्रभाव की दृष्टि से उपयोगी है। साहित्य जीवन जगत की अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्याक्ति है और साहित्यिक कृति अनुभूतियों के कलात्मक आलेख के रूप में एक स्वतंत्र इकाई है, इस इकाई का रचनात्मक आधार इसकी संरचना है। यह संरचना भाषा व शिल्प की बुनावट पर टिकी होती है। उक्त तथ्य के आलोक में यह स्पष्ट है, नई कहानी न केवल अपने कथ्य बल्कि अपनी संरचना में भी नई थी।

शैलीगत स्तर पर देखें तो पत्रात्मक शैली रचनात्मक संवेदना की दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण पद्धति है। इस तरह की शैली में लेखक पत्रों के माध्यम से कहानी की सृष्टि करता है। कहानी में रोचकता के साथ कथा-विस्तार करने एवं संवेदना के स्तर को और अधिक प्रभावी बनाने हेतु कहानियों में पत्रात्मक शैली का प्रयोग कई जगहों पर हुआ है। प्रयोग के स्तर पर इस तरह की शैली का विकास एवं विस्तार नई कहानी के दौर में अधिक हुआ। डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी कहानियों की शिल्प विधि का विकास’ में पत्रात्मक शैली के अंतर्गत लिखी जाने वाली प्रणालियों का उदाहरण सहित विस्तृत विवेचन किया है- “इस शैली में रूप विधानात्मक दो सीमाएं उपस्थित होती हैं जिनके फलस्वरूप कहानी में अस्पष्टता आ खड़ी होती है। प्रथम, विभिन्न पत्रों में कहानी की संवेदना बिखरी होने के कारण कहानी की एकसूत्रता नष्ट हो जाती है और कहानी में वातावरण का निर्माण नहीं हो पाता है, जिससे कहानी आकर्षण शून्य हो जाती है। द्वितीय, कहानी के विभिन्न इकाइयों में बंट जाने के कारण उसका सम्यक विकास नहीं हो पाता। अतएव इसमें प्रभाव की शक्ति नष्ट हो जाती है। इस शैली के अंतर्गत कहानी लिखने की तीन प्रणालियाँ हैं, यथा- 1. कई पात्रों के माध्यम से कहानी की सृष्टि की जाती है; चंद्रगुप्त विद्यालंकार का ‘एक सप्ताह’, उपेंद्रनाथ अश्क का ‘नरक का चुनाव’। 2. एक ही पत्र के माध्यम से समूची कहानी का निर्माण; जैसे विनोद शंकर व्यास की ‘अपराधी’ इलाचंद्र जोशी की ‘चौथे विवाह की पत्नी’। 3. आरंभ और विकास भाग की अभिव्यक्ति विभिन्न पत्रों के द्वारा की जाती है और कहानी का अंतिम भाग स्वतंत्र विवेचन, विश्लेषण और वर्णनों द्वारा सम्पन्न होता है। जैसे अज्ञेय की ‘सिगनेलर’ और उपेंद्रनाथ अश्क की ‘मरीचिका’।”  उक्त तीनों प्रणालियों को विश्लेषित करने के क्रम में डॉ. लक्ष्मीनारायण ने प्रभाव की दृष्टि से तीसरी पद्धति को अपेक्षाकृत दोनों प्रणालियों से उत्कृष्ट माना है। निश्चित रूप से डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने पत्रात्मक शैली के विविध स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इस बात की ओर संकेत किया है कि हिंदी कहानी के इतिहास में इस तरह के शैली की सुदीर्घ परंपरा रही है।
   
नई कहानी के दौर में भी पत्रात्मक शैली को कई रचनाकारों द्वारा अपनाया गया है। इस कोटि में राजेन्द्र यादव की कहानी ‘पुराने नाले पर नया फ्लैट’, मन्नू भण्डारी की ‘यही सच है’, कमलेश्वर की ‘मेरी प्रेमिका’ आदि कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। पत्रात्मक शैली का प्रयोग अमरकांत ने भी अपनी कई कहानियों में प्रमुखता के साथ किया है। इस क्रम में अमरकांत की कहानी ‘बीबी के खत’ अन्य कहानियों के अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त है कारण यह कि इस कहानी का पूरा ताना-बना पत्रात्मक शैली में है। ‘बीबी के खत’ कहानी में मुख्य पात्र (एक पत्नी) द्वारा अपने पति को भेजे गए कुल नौ पत्र हैं। शिल्पगत स्तर पर अमरकांत की इस कहानी का मूल्यांकन करें तो संवेदना एवं कला दोनों स्तरों पर यह कहानी बहुत ही उत्कृष्ट है। उदाहरण के रूप में इस कहानी की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य है-

“क्या कहते हैं, छुट्टी नहीं मिलती। आपका दफ्तर दुनिया से ऊपर है क्या? पापी छाती फाड़कर काम लेते हैं और छुट्टी देने के नाम पर नानी मरती है। आप मालिक से क्यों नहीं कहते, साहब, नौकरी का मतलब यह नहीं कि अपने बाल-बच्चों के पास कोई जाए ही नहीं। कोढ़ पड़ेगा हरामियों के।
दो दिन पहले आपको पत्र डाल चुकी हूँ।... देखिए जी, जरा ठीक से रहिएगा। मैं तो बहुत डर गई हूँ। आज घर के सामने दो रिक्शा वालों में बात-बात में लड़ाई हो गई और एक ने दूसरे को छूरा मार दिया।  वह फौरन वहीं तड़प-तड़प कर मर गया। मैं तो एकदम घबरा गई। इसी मारे आपको चिट्ठी लिख रही हूँ। जमाना बड़ा खराब आ गया है। आप किसी से लड़िएगा-झगड़िएगा मत। कोई दो बात बोल भी दे तो चुप हो जाइयेगा। लोग छोटी-छोटी बात पर छुरा डंडा चला देते हैं। आजकल झुककर चलने में ही भलाई है। इसकी कसम इसका ध्यान रखिएगा।” 

शैलीगत स्तर पर यह कहानी बहुत ही बेजोड़ है। पत्रात्मक शैली के संदर्भ में विद्वानों का यह मंतव्य कि इस तरह की शैली के प्रयोग से कहानी की संवेदनात्मक शक्ति, गति एवं प्रवाह में बाधा आती है, जैसी धारणा को यह कहानी खारिज करने में समर्थ है। अमरकांत की कहानियों की यह खूबी रही है कि उनकी कहानियों में विविध प्रकार की शैलियों के प्रयोग के बावजूद कहीं भी कहानी की कथावस्तु और संवेदना में लचीलापन महसूस नहीं होता। ‘शुभचिंता’ कहानी में भी अमरकांत ने पत्रात्मक शैली का बखूबी प्रयोग किया है-

“प्रिय मंजु
मुझे अचानक पटना जाना पड़ा, इसलिए तुमको कोई सूचना न दे सकी। छुट्टियों में मामाजी आए और मुझको लेते आए। मैंने भी सोचा कि स्थान बदलने से तबीयत बहल जाएगी। इस बीच कई बार तुमको पत्र लिख-लिखकर फाड़ दिए। आखिर में यह भेज रही हूँ....त्रुटियों का ध्यान देना।” 

यह कहानी शिल्प एवं संवेदना दोनों स्तरों पर अत्यंत सशक्त है। उक्त उद्धरण में कहानी चरित्र और घटना दोनों से बहुत ही गहरे रूप में जुड़ी हुई है। अमरकांत की यह खूबी है कि वह अपनी रचनाओं में संवेदना के स्तर पर कलात्मकता को हावी नहीं होने देते, इसी मायने में अमरकांत प्रायः अपने समकालीन कहानीकारों में सर्वथा अलग खड़े नजर आते हैं।         

पत्र शैली में लिखी गई कहानियों में लेखक एक या अनेक पात्रों के एक या एक से अधिक पात्रों के माध्यम से कहानी की पूरी कथा को प्रस्तुत करता है। अमरकांत की कहानियों में इस तरह के प्रयोग बहुधा द्रष्टव्य है। उदाहरण के तौर पर अमरकांत की कहानी ‘मित्र-मिलन’ में शिवनाथ द्वारा उमाशंकर के प्रति लिखे गए पत्र को देखा जा सकता है-

“प्रिय उमाशंकर,
राम-राम! मेरा यह खत देखकर तुम अचंभा करोगे। मुझे जानकर यह खुशी हुई कि प्रभु की दया से तुम मजे में हो, पचास साल की वे बातें तुमको याद हैं न? सचमुच उमाशंकर, मुझे बड़ी खुशी हुई। तुम जानना चाहोगे कि मैंने यह चिट्ठी कैसे लिखी, मैं कुछ साल से रिटायर्ड होकर यहां पटने में अपने लड़के के साथ रहता हूँ। यहां मिस्टर जयनारायण भूटिया मेरे मिलने-जुलने वालों में हैं, उनके लड़के की शादी में एक नौजवान से मुलाक़ात हो गई। बात-बात में पता चला कि वह तुम्हारे साहबजादे हैं, मैंने बहुत सारी बातें पूछ डाली और तुम्हारा पता भी ले लिया, मेरी उम्र इस समय इकहत्तर साल से ऊपर ही है। तुम मुझसे एकाध साल छोटे थे। याद है न? यूनिवर्सिटी से निकलने के बाद मैंने कुछ दिनों तक लाहौर में काम किया। उसके बाद बंगलूर में एक फर्म में मैनेजर हो गया। शंकर भगवान की दया से सब ठीक है। मेरे साहबजादे सेक्रेट्रिएट में सुपरिटेंडेंट हैं। तुम अपना पूरा हाल-चाल देना, चिट्ठी जरूर लिखना।
तुम्हारा पुराना दोस्त
      शिवनाथ”

निश्चित रूप से अमरकांत ने अपनी कहानियों में पत्रों का प्रयोग इतनी बारीकी एवं सजगता के साथ किया है कि कहानी अपने किसी स्तर पर अर्थवत्ता नहीं खोती। इस कड़ी में अमरकांत की कई और भी ऐसी कहानियाँ है जिसमें पत्रात्मक शैली का प्रयोग है अथवा पत्र की चर्चा है। अमरकांत की कहानी ‘संत तुलसीदास और सोलहवां साल’ और ‘जिंदगी और जोंक’ जैसी अन्य और भी कहानियों इस तरह की शैली का प्रयोग हुआ है।  शैलीगत स्तर पर यह कहानियाँ बहुत ही बेजोड़ है। पत्रात्मक शैली के संदर्भ में विद्वानों का यह मंतव्य कि इस तरह की शैली के प्रयोग से कहानी की संवेदनात्मक शक्ति, गति एवं प्रवाह में बाधा आती है, जैसी धारणा को अमरकांत की कहानियाँ खारिज करने में समर्थ है। अमरकांत की कहानियों की यह खूबी रही है कि उनकी कहानियों में विविध प्रकार की शैलियों के प्रयोग के बावजूद कहीं भी कहानी की कथावस्तु और संवेदना में लचीलापन दृष्टिगत नहीं होता।   


संदर्भ ग्रंथ सूची
1. टंडन, डॉ. प्रताप नारायण.(1970). हिन्दी कहानी कला. पृ. 383
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4. अमरकांत. (2013). शुभचिंता. अमरकांत की संपूर्ण कहानियाँ, पहला खंड. पृ. 129
5. अमरकांत. (2013). मित्र-मिलन. अमरकांत की संपूर्ण कहानियाँ, पहला खंड. पृ. 289

सहायक ग्रंथ सूची 
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9. शीतांशु, पाण्डेय शशिभूषण. (1974). नई कहानी के विविध प्रयोग. इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाशन.
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11. यादव, वीरेंद्र सिंह. (2009). नई कहानी : प्रवर्तन और प्रकृति.
(http://www.rachanakar.org/2009/09/blog-post_03.html)


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