महात्मा गांधी के आर्थिक-विचार, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में

राजेश मौर्य

- राजेश मौर्य (सहा. प्रा. अर्थशास्त्र), शासकीय नेहरू महाविद्यालय, सबलगढ़

- जे. पी. मित्तल (प्राचार्य), शासकीय नेहरू महाविद्यालय, सबलगढ़



सार: महात्मा गांधी जी जिनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 में गुजरात राज्य के पोरबंदर नामक क्षेत्र में हुआ था। एक सच्चे देश भक्त] समाज सुधारक] सामाजिक-आर्थिक दार्शनिक और आध्यात्मिक व मानवतावादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत थे] उन्होंने न केवल देश को आजाद करने में अपना अमूल्य योगदान दिया था बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से एक समाज सुधारक व अपना आर्थिक दृष्टिकोण प्रदान करके देशवासियों को प्रोत्साहित एवं जागरूक करने में भी अपनी अहम भूमिका अदा की थी।

जे. पी. मित्तल
 जब हम उनके आर्थिक दृष्टिकोण पर नजर डालते हैं तो देश की आर्थिक समस्याएँ (गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, भुखमरी) ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूंजीवादी प्रणाली का विरोध स्वदेशी आदि आर्थिक घटकों की स्पष्ट झलक दिखाई देती हैं। उनका आर्थिक दर्शन राष्ट्रवादी भावना और मानवतावादी दृष्टिकोण पर आधारित हैं। वे साधा जीवन और उच्च सोच वाली धारणा में विश्वास करते थे इसीलिये उन्होंने सर्वप्रथम भारतीय ग्रामों की काया पलट करने हेतु ग्राम स्वराज की अवधारणा पर जोर दिया था। उनका कहना था कि जब तक हम ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु उनको सत्ता का अधिकार प्रदान नहीं करेंगे तब तक सच्चे अर्थों में राष्ट्र का विकास असंभव हैं। इस हेतु उन्होंने पंचायती राज जैसी अवधारणा पर जोर दिया और एक आदर्श ग्राम की परिकल्पना के अन्तर्गत ग्रामों में शिक्षा हेतु स्कूल स्वच्छ आवास व पानी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ बिजली यातायात हेतु सड़के बांध व सिंचाई के साधन इत्यादि गांधी जी के अनुसार - मेरा आदर्श ग्राम बुद्धिमान इंसानों से लड़ेगा वे जानवरों की तरह गंदगी और अंधेरे में नहीं रहते हैं बल्कि सभी प्रयुक्त रूप से जागरूकता प्राप्त करके आदर्श ग्राम की संरचना करते हैं।(3) गांधी जी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करने एवं एक आर्थिक रूप में आत्मनिर्भरता प्रदान करने हेतु लघु व कुटीर उद्योगों को पुर्नजीवित करने की वकालत की थी। उन्होंने श्रम को महत्व देते हुये कहा था कि - देश में पर्याप्त मात्रा में मानव संसाधन अर्थात श्रम उपलब्ध होने के कारण हमें ऐसी अर्थव्यवस्था का पालन करना चाहिये जिसमें अधिक से अधिक श्रम का प्रयोग हो और वह तभी संभव हैं जब हम श्रम गहन प्रौद्योगिकी को अपनाएंगे।(8)

 गांधी जी द्वारा कारखानों में कार्यरत श्रमिकों की समस्याओं तथा स्वदेशी जैसी अवधारणा पर प्रस्तुत किये गये विचार एक आध्यात्मिक एवं मानवतावादी दृष्टिकोण की छवि पेश करते हैं। जिसमें जहाँ एक तरफ उन्होंने श्रमिकों के कल्याण एवं अधिकारों को सुरक्षित बनाये रखने के लिये श्रम संगठनों की मान्यता को जायज ठहराया वही दूसरी तरफ स्वदेशी संबंधी अवधारणा के अंतर्गत स्वयं द्वारा उत्पादित की गयी वस्तुओं के उपयोग को उचित ठहराया था। स्वदेशी के अन्तर्गत उन्होंने पड़ोसी को महत्व देते हुये कहा था कि - “हम केवल अपने समीप के पड़ोसियों द्वारा तैयार की गयी वस्तुओं का ही उपयोग करें तथा उद्योगों को कार्यक्षेत्र बताकर एवं जहाँ वे अपूर्ण हो वहाँ उन्हें पूर्ण बनाकर उन उद्योगों की सेवा करें।”(18)

 गांधी जी द्वारा प्रस्तुत किये गये आर्थिक विचार आज भी प्रासंगिक हैं। ग्रामों में पंचायती राज व्यवस्था के अन्तर्गत दिन-प्रतिदिन जो विकास के अंश (स्कूल, स्वच्छ आवास व पानी, बिजली, सड़कें, सिंचाई सुविधाएँ) दिखाई दे रही हैं वह सब उन्हीं के विचारों की देन हैं।

 इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गांधी जी द्वारा प्रस्तुत किये गये आर्थिक विचार वर्तमान संदर्भ में सही व सटीक साबित होते हैं।

फोकस क्षेत्रः- ग्राम स्वराज ग्रामीण एवं लघु उद्योग तथा खादी सतत विकास उत्पादन श्रम समस्याएँ स्वदेशी।

प्रस्तावना:- श्री मोहनदास करमचंद गांधी, जिनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर नामक क्षेत्र में हुआ था, एक सच्चे देश भक्त समाज सुधारक, सामाजिक, दार्शनिक और भारतीय स्वतंत्रता में अपना अमूल्य योगदान देने के साथ-साथ मानवतावादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत थे। उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन काल में मानव जाति की गरिमा तथा राष्ट्र को सुदृढ़ बनाये रखने के लिये कार्य किये थे। इस हेतु उनके द्वारा दिये गये सिद्धांत जैसे- सत्य अहिंसा एवं उपरिग्रह मनुष्य के कार्यक्षेत्र में यर्थाथवाद और एक सच्चे मनुष्य का वर्णन करने में सहयोग करते हैं।

  गांधी जी ने मानव की भलाई, उनके हितों तथा राष्ट्र को सुरक्षित बनाये रखने के लिये अपनी रचनात्मक गतिविधियाँ लोगों के सामने पेश करके उन्हें जागरूक एवं प्रोत्साहित किया था। उनकी रचनाएँ न केवल सामाजिक राजनीति क्षेत्र से संबंधित थी बल्कि आर्थिक, शैक्षिक एवं चिकित्सकीय क्षेत्र से भी संबंधित थी, उन्होंने देश के नागरिकों को सत्य एवं अहिंसा के बल पर राष्ट्र को गुलामी से आजाद कराने का पाठ सिखाया था। यही कारण था कि आज उन्हें अनेक नामों जैसेः- राष्ट्रपिता महात्मा तथा बापू आदि नामों से संबोधित किया जाता हैं।

  जब हम महात्मा गांधी जी के द्वारा दिये गये आर्थिक विचारों पर दृष्टि डालते हैं तो हमें उनके विचारों में देश की आर्थिक समस्याएँ (गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, भुखमरी) अर्थव्यवस्था का स्वरूप और देश का सर्वांगीण विकास आदि आर्थिक घटकों की स्पष्ट झलक दिखाई देती हैं। उनका मुख्य आर्थिक दर्शन मानव जाति की भलाई तथा राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित हैं। गांधी जी देश तथा मानव जाति की सेवा करके आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं जिसे उन्होंने अपनी रचनात्मक गतिविधियों संगठनों एवं आन्दोलनों के माध्यम से पूर्ण किया था। गांधी जी के अनुसार - “एक व्यक्ति तथा राष्ट्र के लिये आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य हैं।”(1) हालांकि उनके बारे में यह कहा जाता हैं कि वे न तो अर्थशास्त्री थे और न ही उन्होंने अपने आपको कभी अर्थशास्त्री माना था वे पढ़ाकू नहीं थे लेकिन फिर भी उनके दिये गये आर्थिक सिद्धांत आज भी एक राष्ट्र के संदर्भ में सटीक एवं उचित साबित होते हैं। ग्राम स्वराज ग्रामीण अर्थव्यवस्था, लघु एवं कुटीर उद्योग, विकेन्द्रीयकरण की अवधारणा श्रम समस्याएँ आदि सभी आर्थिक घटकों में उनके द्वारा प्रस्तुत किये गये आर्थिक दृष्टिकोण न केवल प्राचीन भारत बल्कि वर्तमान भारत के संदर्भ में भी सटीक तथा सही साबित होते हें। यदि गांधी जी न होते तो आज हम जिन लघु एवं कुटीर उद्योगों को देख रहे हैं वह अस्तित्व में नहीं होते क्योंकि आज जैसे-जैसे सम्पूर्ण विश्व एक वैश्वीकरण की अवधारणा में प्रवेश कर चुका हैं वैसे-वैसे बड़े एवं विशाल उद्योगों की महत्ता बढती जा रही हैं या हम यह कह सकते हैं कि वृहत व विशाल उद्योगों का तेजी से विकास होता जा रहा हैं जिसमें श्रम के स्थान पर मशीनों एवं नवीनतम तकनीकी का प्रयोग किया जाता हैं। गांधी जी के आर्थिक विचार भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में प्रस्तुत किये गये थे। जिनमें मशीनों के लिए कोई जगह नहीं थी क्योंकि उनका मानना था कि इस प्रकार (मशीन) की व्यवस्था से भारत जैसे विकासशील देश में श्रमिकों का शोषण, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं इसलिये वे मशीन के स्थान पर श्रम को महत्व देते थे। उनका मानना था कि इससे सम्पूर्ण मानव जाति का हित सुरक्षित रहेगा और प्रत्येक देशवासी आसानी से अपना जीविकोपार्जन कर सकेगा, गरीबी का समापन होगा तथा देश उत्तरोत्तर रूप से प्रगति के सोपानों को प्राप्त कर सकेगा।

गांधी जी के आर्थिक विचारः- गांधी जी का आर्थिक दर्शन उस समय की स्थिति का वर्णन करता हैं जब देश अंग्रेज़ों का गुलाम था और भारत अनेक प्रकार की समस्याओं (भुखमरी, बेरोजगारी, गरीबी) से जकड़ा हुआ था इसीलिये उनके आर्थिक विचारों में न केवल ग्राम स्वराज स्वदेशी कुटीर एवं पारिवारिक उद्योग विकेन्द्रीयकरण जैसे आर्थिक घटकों का समावेश मिलता हैं बल्कि संरक्षणवाद तथा राष्ट्रवादी भावना के भी लक्षण दिखायी देते हैं जो उनके द्वारा दिया गया प्रिय सिद्धान्त अहिंसा पर आधारित थे। गांधी जी मानव की आवश्यकता के अनुसार अर्थशास्त्र का प्रयोग करने की सलाह देते थे उनके जीवन में फैशन तथा भौतिकवादी या विलासितापूर्ण जीवन यापन के लिये कोई स्थान नहीं था। यही कारण हैं कि उन्हें साधा जीवन उच्च विचार नामक कहावत की परिधि में देखा जाता हैं। 'गांधी वादी अर्थशास्त्र' शब्द गांधी जी के मित्र व समर्थक जे.सी. कुमारण्या द्वारा गढ़ा गया था।** (2)
 
गांधी जी के आर्थिक विचार निम्नलिखित आर्थिक घटकों पर आधारित हैं।

1. ग्राम स्वराजः- महात्मा गांधी जी ग्रामों के पक्ष में थे उनका कहना था कि सच्चा भारत ग्रामों में निवास करता हैं और जब तक हम ग्रामों का विकास नहीं करेंगे तब तक देश का विकास अधूरा हैं इसलिये उन्होंने ग्राम स्वराज की बात पर विशेष जोर दिया था।

  यदि हम ग्राम स्वराज को ध्यान पूर्वक देखे तो हमें यह पता चलता हैं कि ग्राम और स्वराज दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं ग्राम या ग्रामीण क्षेत्र वे क्षेत्र होते हैं जो शहर से बाहर या अलग थलग छोटे-छोटे भू-खण्डों में स्थित होते हैं तथा यहाँ के लोगों का अधिकांश व्यवसाय कृषि या कृषि से संबंधित कार्यो में संलग्न होना पाया जाता हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य या सेवा प्रशासन के अनुसार - “ग्रामीण क्षेत्र वे क्षेत्र होते हैं जो जनसंख्या, आवास, तथा भौगोलिक दृष्टि से शहर में शामिल नहीं होते हैं।” (4) जबकि स्वराज का अभिप्राय स्व-शासन तथा स्वयं नियंत्रण से लगाया जाता हैं। गांधी जी के अनुसार - “स्वराज एक वैदिक शब्द हैं। जिसक अर्थ स्व-शासन एवं स्वयं संयम से हैं लेकिन कुछ लोग संयम को स्वतंत्रता से जोड़ते हैं जो कि उचित नहीं हैं। वास्तविक स्वराज कुछ के द्वारा प्राधिकरण के अधिग्रहण से नहीं बल्कि सभी के द्वारा क्षमता के अधिग्रहण से प्राप्त किया जायेगा दूसरे शब्दों में स्वराज के प्राधिकरण को नियंत्रित करने और नियंत्रित करने की उनकी क्षमता के बारे में जनता को सशक्त बनाने के लिये प्राप्त किया जाना चाहिये”(3) अर्थात उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि जनता को स्वयं शासन एवं नियंत्रित करने के लिये अपनी आध्यात्मिक शक्तियों की क्षमता को जागरूक करना होगा और वह शिक्षा प्राप्त करके ही संभव होगा। शिक्षा वह हथियार हैं जिससे मानव स्वयं को अनैतिक कार्यो के प्रति नियंत्रित कर सकेगा तथा सतत रूप से स्व शासन में संलग्न हो सकेगा।

गांधी जी कहते हैं कि, “यदपि स्वराज शब्द का अर्थ स्व-शासन हैं लेकिन इस स्व-शासन को प्राप्त करने के लिये उन्होंने इसे एक अभिन्न क्रांति की संज्ञा दी हैं जो जीवन के सभी क्षेत्रों को समाहित करती हैं व्यक्तिगत स्तर पर स्वराज व्यापक रूप से स्व-मूल्यांकन, निरंतर आत्म शुद्धि और बढ़ती स्वदेशी या आत्मनिर्भरता की क्षमता के साथ जुड़ा हुआ हैं” (5) चूंकि इस शोध पत्र में आर्थिक रूप से स्वराज का अभिप्राय स्पष्ट किया गया हैं इसलिये इसके अन्तर्गत - “मेहनत कशो के लिये आर्थिक प्रणाली, देश के नागरिकों के लिये स्वतंत्रता और व्यक्तियों के स्वराज का कुल योग आदि शामिल किये गये हैं(6) गांधी जी आगे कहते हें कि स्वराज सभी संयमों से स्वतंत्रता से कही अधिक हैं स्वराज एक स्वशासन तथा संयम हैं। (6) गांधी जी ने इन्हीं दो अवधारणाओं के आधार पर अपना ग्राम स्वराज नामक आर्थिक अवधारणाओं को प्रस्तुत किया हैं। वे ग्राम स्वराज के माध्यम से एक ऐसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का गठन करना चाहते थे जिससे एक आदर्श ग्राम की संरचना का निर्माण हो सके तथा स्वतंत्रता व आत्म निर्भरता प्राप्त हो सके गांधी जी के अनुसार - मेरा आदर्श ग्राम बुद्धिमान इंसानों से लड़ेगा, वे जानवरों की तरह गंदगी और अंधेरे में नहीं रहते हैं बल्कि सभी संयुक्त रूप से जागरूकता प्राप्त करके आदर्श ग्राम की संरचना करते हैं।(3) उन्होंने कहा कि एक आदर्श ग्राम होगा जिसमें एक पाठशाला, औषधालय, शौचालय, सामुदायिक भवन (सभागृह जिसमें ग्राम के लोग एकत्रित होकर ग्राम की समस्याओं पर विचार विमर्श करेंगे), बेहतर साफ-सफाई, बच्चों के लिये उचित खेल का मैदान, पर्याप्त एवं अच्छे परिवहन साधन, सभी प्रकार की खाद्य या भोज्य सामग्रियों की उपलब्धता, ग्राम की साफ-सुथरी सड़कें, बच्चों की शिक्षा हेतु पर्याप्त सुविधाएँ और पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएँ आदि। गांधी जी इन सब सुविधाओं के द्वारा ग्रामों के आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे ताकि ग्राम किसी अन्य जैसे- शहरों पर निर्भर नहीं रहे, उनका मत व्यक्तिगत तथा पारिवारिक आत्मनिर्भरता का नहीं था बल्कि सामुदायिक आत्मनिर्भरता का था।

  गांधी जी ने आदर्श ग्रामों को व्यवस्थित तथा सतत रूप से संचालित करने के लिये विकेन्द्रीयकरण की अवधारणा के माध्यम से ग्रामों में समान्तर राजनीतिक संस्थाओं और आर्थिक स्वायत्तता की इकाइयों के रूप में ग्राम गणराज्यों की संस्थानों का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि विकेन्द्रीयकरण की प्रणाली के द्वारा ग्राम राजनीतिक रूप से इतना छोटा होना चाहिये जिससे कि सभी ग्रामीण वासियों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो सके इसके लिये उन्होंने एक ऐसी अवधारणा का विचार प्रस्तुत किया जिसमें सभी लोगों की भागीदारी शामिल हो सके


और वह थी पंचायती राज, जिसमें प्रत्यक्ष मतदान प्रक्रिया के माध्यम से एक छोटी सी राजनीतिक संस्थान की रचना की जाती हैं। गांधी जी का कहना था कि जब तक हम ग्रामों को राजनीतिक रूप से सत्ता का अधिकार प्रदान नहीं करेंगे तब तक ग्रामों को सामुदायिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना संभव नहीं हैं। महात्मा गांधी जी के अनुसार - “स्थानीय संसाधनों का प्रयोग पंचायतीराज प्रणाली के विकास के लिये काफी मौलिक हैं ग्राम पंचायतों के साथ पंचायती राज को संबंधित किया जाना चाहिये ताकि स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों या स्थानीय तथा औद्योगिक क्षेत्रों में विकास की पहचान की जा सके, ग्राम पंचायतों द्वारा प्रतिवर्ष चुने गये वयस्क ग्रामीणों (पुरुष, महिला) द्वारा न्यूनतम निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के साथ ग्राम की सरकार का संचालन करेगी, गांधी जी ने ग्राम के श्रमिकों के मार्ग-दर्शन के लिये नियमों को प्रस्तावित किया था।(7)

  गांधी जी के ग्राम से संबंधित विचारों की जब हम वर्तमान के संदर्भ में देखते हैं तो हमें यह पता चलता हैं कि आज ग्रामों में जो पंचायती राज दिखाई दे रहा हैं वह उन्हीं के विचारों की देन हैं। ग्रामों में सड़क का विकास, ग्रामीण स्वच्छता बनाये रखने के लिये शौचालयों का निर्माण, स्कूल, बिजली, सामुदायिक भवन और जहाँ तक कि इंटरनेट जैसे क्षेत्रों का विकास उन्हीं के विचारों की देन हैं जिनकी कल्पना गांधी जी लगभग 250 वर्ष पूर्व कर चुके थे। उनके इन विचारों की ही देन हैं कि आज ग्राम सम्पूर्ण विकास की दृष्टि से फलफूल रहे हैं। अतः हम कह सकते हैं कि गांधी जी की आदर्श ग्राम की परिकल्पना आज सार्थक सिद्ध हो रही हैं।

2. ग्रामीण एवं लघु-उद्योग और खादीः- गांधी जी अपनी आदर्श ग्राम की परिकल्पना के अन्तर्गत यह महसूस करते थे कि ग्रामों का आर्थिक विकास और ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त गरीबी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान करना हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में लघु व कुटीर उद्योग स्थापित होना चाहिये क्योंकि ये ऐसे उद्यम हैं जिसके लिये बहुत कम पूंजी की आवश्यकता होगी और ग्राम का प्रत्येक परिवार इन व्यवसायों में संलग्न होकर आसानी से अपनी आर्थिक समस्याओं का समाधान करने के साथ-साथ जीविकोपार्जन कर सकता हैं। लघु व कुटीर उद्योग की बात करके उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये एक उपयोगी माडल प्रस्तुत किया था क्योंकि गांधी जी देश की आर्थिक स्थिति को जमीनी स्तर से समझते थे वे जानते थे कि यदि हमने मशीनी औद्योगीकरण पर बल दिया तो देश में व्याप्त गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ कभी भी हल नहीं होगी। बड़े एवं विशाल उद्योग जहाँ एक तरफ मशीनों का उपयोग करके बेरोजगारी उत्पन्न करेंगे वही दूसरी तरफ आय एवं धन के केन्द्रीयकरण को भी बढ़ावा देंगे। जिससे श्रमिकों के साथ-साथ आम नागरिकों का भी शोषण होगा। उनका कहना था कि भारत की ये समस्याएँ अभी भी धरातल स्तर पर हैं और आगे जाकर ये बहुत उग्र रूप धारण कर सकती हैं इसीलिये हमें सरल तकनीकों, जिसमें श्रम एवं कम पूंजी निवेश की जरूरत हैं, का उपयोग करके श्रम तथा कृषि की ग्राम अर्थव्यवस्था को उत्तेजित करके गरीबी को कम किया जा सकता हैं।

  गांधी जी उद्यमों की दृष्टि से भारत को पुनः नीचे से संगठित करना चाहते थे इसीलिये उन्होंने उन ग्रामों को संगठित किया जिनमें आत्मनिर्भरता के गुण विद्यमान थे। उनका कहना था कि यदि हम विशाल एवं बृहत उद्योगों पर बल देंगे तो देश में विपणन एवं प्रतिस्पर्धा की समस्याएँ उत्पन्न हो जायेगी और श्रमिकों तथा ग्रामवासियों का शोषण होगा। गांधी जी का मूल दृष्टिकोण राष्ट्रीय जरूरतों, स्वतंत्र ग्रामीणों की आवश्यकताओं के आधार पर ग्राम व समाज के निम्न, दबे कुचले लोगों तथा विशेष रूप से एस.सी/ एस.टी./ ओ.बी.सी जैसे समूहों का सामाजिक-आर्थिक विकास करना था।

गांधी जी के अनुसारः- देश में पर्याप्त मात्रा में मानव संसाधन अर्थात श्रम उपलब्ध होने के कारण हमें ऐसी अर्थव्यवस्था का पालन चाहिये जिसमें अधिक से अधिक श्रम का प्रयोग हो और वह तभी संभव हैं जब हम श्रम गहन प्रौद्योगिकी का उपयोग करेंगे(8) गांधी जी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिये लघु उद्योगों के साथ ग्रामीण केन्द्रित विकास का समर्थन किया था क्योंकि वे जानते थे कि इस प्रकार के उद्यमों द्वारा बेरोजगारी की समस्या को हल किया जा सकता हैं। वे मानते थे कि यदि सभी उद्यम निजी हाथों में केन्द्रित होते हैं तो श्रमिकों का शोषण होना निश्चित हैं इसीलिये उन्होंने उद्यमों की स्थापना हेतु सामाजिक नियंत्रण की बात की थी अर्थात सभी प्रकार के उद्यम सरकार द्वारा संचालित और नियंत्रित होना चाहिये ताकि धन एवं सत्ता के केन्द्रीयकरण को रोका जा सके।

गांधी जी का मानना था कि भारत की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या बेरोजगारी की समस्या को उत्पन्न कर सकती हैं और यदि हमें इस समस्या का समाधान करना हैं तो लघु व कुटीर उद्योगों को महत्व देना होगा क्योंकि ये उद्योग मशीन के स्थान पर श्रम को अधिक महत्व देते हैं जो कि बेरोजगारी की दृष्टि से एक उत्तम पहल कही जा सकती हैं। लघु व कुटीर उद्योगों में न केवल रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने की क्षमता हैं बल्कि नवाचार एवं आकर्षित करने की भी अधिक क्षमता हैं।

  गांधी जी ने लघु व कुटीर उद्यमों के क्षेत्र में खादी को भी एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में प्रस्तुत किया था क्योंकि वे मानते थे कि यदि हम विदेशी कपड़ों और परिधानों का प्रयोग करते हैं तो ब्रिट्रिश शासन को समाप्त करना संभव नहीं हैं इसीलिये हमें चरखों के माध्यम से सूत बनाकर कपड़ों का उपयोग करना चाहिये। इस हेतु गांधी जी ने सन 1918 में खादी के लिये अपना आन्दोलन प्रारंभ किया था। उनका कहना थ कि खादी उत्पादन के माध्यम से देश को न केवल अंग्रेज़ों की गुलामी से आजाद कराया जा सकता हैं बल्कि देश को एक स्वतंत्र मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता हैं। उनका खादी का उत्पादन करने के पीछे मूल उददेश्य - “भारत की सतायी गयी लाखों खोपड़ियों को, जिसे यहाँ से अन्यायपूर्ण अवैध तथा अत्याचार पूर्ण उपायों के द्वारा निकाला गया था, फिर से स्थापना करना था” (9) गांधी जी मानते थे कि - “चरखा सामान्य जनता की आशा का प्रतीक था। अगर ग्रामवासियों को अपनी उपयुक्त स्थिति प्राप्त करनी हैं तो इसका सबसे सीधा और उपयुक्त प्रयास यही हैं कि चरखे को उसके सारे फलितार्थों के साथ फिर से जीवित किया जाये”(10) गांधी जी कहते थे कि चरखा लोगों की गरीबी को स्वाभाविक, व्यवस्थित तथा अत्यंत सरल रूप से समाप्त करने की शक्ति एवं क्षमता रखता हैं। चरखे के माध्यम से सूत काटने के लाभों को गिनाते हुये उन्होंने कहा था कि थोड़े से पैसों का उपयोग करके इसे शुरू किया जा सकता हैं जो लोगों की रोजगार संबंधी समस्या का समाधान करने में मदद साबित होगा।

  गांधी जी का चरखे के माध्यम से खादी का उत्पादन करने का सपना एक अनूठी पहल कही जा सकती हैं क्योंकि यह न केवल विदेशी कपड़ा खरीदने से राहत प्रदान करेगा बल्कि उस आय की, जो कि देश से बाहर अर्थात इंग्लैण्ड में जा रही थी, को रोकने में भी मदद साबित होगा और इस बची हुयी आय को गरीबी में बाँटकर एक सामाजिक न्याय-प्रदान किया जा सकता सकेगा।

  गांधी जी ने ग्रामीण आधारित लघु एवं कुटीर उद्योगों के रूप में हथकरघा, सेरीकल्चर, हस्तशिल्प और ग्रामीण स्तर के पारिवारिक उद्यमों की स्थापना के संबंध में कहा था लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता हैं कि गांधी जी ने विशाल एवं वृहद उद्योगों का भी समर्थन किया था। उनका कहना था कि राज्य या सत्ता के हस्तक्षेप के माध्यम से दीर्घ स्तरीय उद्योग स्थापित किये जा सकते हैं।

गांधी जी के अनुसारः- “कुल विशाल उद्योग जैसेः- बिजली, यातायात, लोहा एवं इस्पात, संचार और टेलीग्राफ किसी भी देश के विकास हेतु अपरिहार्य हैं। यदि ऐसे उद्योगों का निर्माण निजी हाथों के स्वामित्व में होता हैं तो श्रमिकों एवं आम जनता का शोषण होना निश्चित हैं इसीलिये इन उद्योगों का गठन कुछ इस प्रकार से करना होगा। जिससे की पूंजीवादी प्रणाली के दोष समाप्त हो जाये। ऐसा करते समय इन उद्योगों का सामाजीकरण सेवा के आधार पर उनका संचालन कर इसके लाभ प्रोत्साहनों को पूरा निरस्त करना चाहिये और हमेशा इस बात के प्रति सावधानियाँ बरती जानी चाहिये कि उसका अस्तित्व मौन सहमति तथा आपसी समझौते पर हो। यह कार्य हमेशा हमें सावधान रखेगा तथा हम किसी की बुराई को प्रारंभ में ही समाप्त करेंगे।”(11)

  महात्मा गांधी जी के उद्यम संबंधी विचारों को जब हम वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखते हैं तो यह स्पष्ट रूप से प्रतीत होता हैं कि किस प्रकार इस वैश्वीकरण की अवधारणा ने लघु एवं कुटीर उद्योगों का अस्तित्व समाप्त कर दिया हैं जबकि विभिन्न प्रकार के किये गये शोधों से यह स्पष्ट हो गया हैं कि लघु एवं कुटीर उद्योग विशाल उद्योगों के लिये एक सहायक कच्चा माल प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता हैं कि दीर्घ स्तरीय उद्योग आज के संदर्भ में लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में मददगार साबित हो रहे तथा लोगों का जीवन स्तर पहले की तुलना में कही अधिक बेहतर साबित हुआ हैं जैसा कि एम कुरियन ने अपने लेख में स्पष्ट किया हैं कि - “आज के इस वैश्विक युग में भारी एवं बड़े पैमाने के उद्योग वैश्विक बाजार प्रदान करने के अलावा रोजगार एवं जीवन स्तर को बढ़ाया हैं जिससे भारत का औद्योगिक विकास उन्नति के शिखर पर पहुँच गया हैं(12) यह भी विचार व्यक्त किया जा रहा हैं कि वैश्वीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी कंपनियों के आगमन से उन्नत तकनीक का प्रादुर्भाव हुआ हैं और संचार व सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार होने से रोजगार की नयी-नयी संभावनाओं का सृजन हुआ हैं लेकिन असली तस्वीर बिल्कुल अलग हैं दरअसल यह एक तरह का विकास हैं इस तरह का विकास तकनीकी युक्त क्षेत्र में रोजगार के अवसर तो बढ़ायेगा परन्तु यह अन्य लोगों, जैसा कि हम जानते हैं कि भारत एक विशाल आबादी वाला लोकतांत्रिक देश हैं, के लिये रोजगार के नये अवसरों की संभावना बहुत ही नगण्य हैं। इसमें असंख्य ऐसे लोग शामिल हैं जो तकनीकी ज्ञान की दृष्टि से कोसो दूर हैं या हम यह सकते हैं कि इस प्रकार के ज्ञान से अनभिज्ञ हैं। ऐसी परिस्थितियों में पूंजी प्रधान तकनीकी के स्थान पर श्रम प्रधान तकनीकी कहीं अधिक सहायक सिद्ध होगी जो कि लघु एवं कुटीर उद्योगों में ही संभव हैं। आज सम्पूर्ण विश्व जनसंख्या में वृद्धि के कारण बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हैं उसका केवल और केवल एक ही कारण हैं और वह हैं तकनीकी विकास, वास्तव में हमने इस तकनीकी और आधुनिक युग की दौड़ में गांधी जी के इन विचारों को भुला दिया या अनदेखा किया हैं। जिसका परिणाम आज हमारे सामने एक विकराल बेरोजगारी की समस्या के रूप में खड़ा हैं। जिसका समाधान करने में आज हम अक्षम प्रतीत हो रहे हैं। यदि हमें इन समस्याओं का समाधान खोजना हैं तो हमें यह केवल और केवल महात्मा गांधी जी के लघु एवं कुटीर उद्योगों संबंधी अवधारणा में ही दिखाई देगा।

3- सतत विकासः- जब हम गांधी जी द्वारा दी गयी सतत विकास की अवधारणा पर दृष्टि डालते हैं तो हमें उनकी इस अवधारणा में प्रकृति या प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संबंधी विचारों के गुण दिखाई देते हैं। जिससे यह प्रतीत होता हैं कि गांधी जी प्रकृति प्रेमी या पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में थे जबकि यह सर्वविदित हैं कि वे न तो पर्यावरण शास्त्री थे और न ही वे पर्यावरण या पारिस्थितिकीय तंत्र में निपुण थे लेकिन फिर भी पर्यावरण के प्रति उनका झुकाव इस बात की ओर संकेत देता हैं कि हमें प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग एक स्थिर प्रणाली के माध्यम से किया जाना चाहिये अर्थात हमें इस तरीके से इन संसाधनों का उपयोग करना चाहिये जिससे कि वह समाप्त न हो और भावी पीढ़ी के लिये बचे रहे। गांधी जी के अनुसारः- “भावी पीढ़ी की जरूरतों के साथ समझौता किये बिना वर्तमान जरूरतों को पूरा करना ही पर्यावरण की दृष्टि से सतत विकास हैं।” (13) गांधी जी ने दुनिया के सामने अपने आपको इस प्रकार से पेश किया था कि वह सम्पूर्ण दुनिया के लिये एक मिशाल बन गये थे इसीलिये सम्पूर्ण जगत ने उन्हें आत्म निर्भर विकास का उद्धरण माना था। उनकी सतत विकास की अवधारणा एक प्रकार से बहु-उददेश्यीय या बहु-मॉडल युक्त थी।

  यदि हम सतत विकास की अवधारणा के ऐतिहासिक पक्ष पर दृष्टि डाले तो हमें यह पता चलता हें कि - “यूरोप में औद्योगिक क्रांति के आगमन के साथ ही सतत विकास का युग प्रारंभ हुआ था(14) तब से अब तक मनुष्य लगातार रूप से आर्थिक विकास हेतु प्राकृतिक संसाधनों का सतत रूप से उपयोग करता आ रहा हैं। भौतिकवादी युग की भूख ने मानव को इतना लालची बना दिया हैं कि उसके सामने उसे पर्यावरण के विनाश का अस्तित्व नजर नहीं आ रहा हैं। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में वह लगातार रूप से पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा हैं, हाँ जरूरी हैं कि एक देश के आर्थिक विकास हेतु इन संसाधनों का समुचित दोहन आवश्यक हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं हैं कि हम प्राकृतिक संतुलन या पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान ही न दें, आज जिस प्रकार से इनका उपयोग किया जा रहा हैं उस दृष्टि से महात्मा गांधी जी के विचारों की याद आती हैं। जिसमें यह कहा गया हैं कि मानव को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना चाहिये जिससे आवश्यकता और उपभोग के बीच संतुलन बना रहे और पर्यावरण का संरक्षण के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिये से संसाधन बचे रहे।

गांधी जी के अनुसार - “प्रकृति हमारी इच्छा के लिये पर्याप्त उत्पादन करती हैं और अगर हर कोई स्वयं के लिये पर्याप्त लेता हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं हैं, तो कोई आर्थिक तथा उपभोक्तावाद नहीं होगा जो कि आर्थिक दासता का दूसरा नाम हैं।” (15) गांधी जी ने अपनी सतत विकास की अवधारणा के अन्तर्गत देश के नागरिकों को यह समझाने का प्रयास किया हैं कि एक व्यक्ति को केवल उतना ही उपभोग करना चाहिये जितना कि उसके लिये आवश्यक हैं क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा सीमित हैं, उसे बढ़ाया नहीं जा सकता हैं। यदि ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति व्यर्थ या असीमित मात्रा में संसाधनों का उपभोग करता हैं तो हमारी भावी पीढ़ी के लिये खतरा उत्पन्न हो जायेगा और पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जायेगा जो कि किसी भी स्थिति में उचित नहीं हैं। गांधी जी ने अपने इन विचारों के माध्यम से एक ऐसी अवधारणा की रचना पर दृष्टि डाली जो सर्व कल्याणकारी, नैतिकता पर आधारित हो, अर्थात उनका उददेश्य समाज के सबसे निचले तबके के लोगों से लेकर उच्च वर्ग के लोगों की आवश्यकताओं को पूर्ण करना था।

  लेकिन आज के इस भौतिकवादी युग ने उनके इन विचारों को भुला दिया हैं जबकि वर्तमान संदर्भ में एक विकासशील देश के लिये जहाँ पर कई समस्याएँ जैसे- पूंजी एवं बचत का अभाव, गरीबी, बेरोजगारी आदि हैं, वहाँ उनके ये विचार सार्थक सिद्ध होते हैं जो कि न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिये जरूरी हैं बल्कि मानव के अस्तित्व को भी कायम रखने के लिये अति-आवश्यक हैं।

4- उत्पादनः- जैसा कि हमने गांधी जी की सतत विकास संबंधी अवधारणा के अन्तर्गत यह समझा था कि वे किस प्रकार प्रकृति प्रेमी या प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के पक्ष में थे। ठीक उसी प्रकार उन्होंने अपने विचार उत्पादन प्रणाली पर दिये थे। प्राकृतिक संसाधनों के बचाव और भावी पीढ़ी के लिये संरक्षित करने हेतु गांधी जी ने कहा था कि - “किसी भी वस्तु का उत्पादन केवल उपभोग के लिये करना चाहिये न कि विनिमय या लेनदेन करने हेतु” (1) इसके लिये हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कितनी वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन की आवश्यकता हैं और उसी के अनुसार उत्पादन करना होगा, यदि हम इसी प्रकार से अपनी उत्पादन प्रक्रिया जारी रखेंगे तो अर्थव्यवस्था लाभ के स्थान पर आम लोगों की सेवा करने हेतु प्रवाहित हो जायेगी। गांधी जी के इन विचारों से यह साफ स्पष्ट होता हैं कि वे प्राकृतिक संसाधनों का सीमित मात्रा में ही उपभोग करने के पक्षधर थे। जिससे न तो पर्यावरण पर किसी भी प्रकार का घातक प्रभाव पड़ेगा और न ही ये संसाधन कभी समाप्त होंगे।

  गांधी जी एक ऐसी उत्पादन प्रणाली पर जोर देते थे जो केवल और केवल मानवता के हित में प्रयोग हो, मानव की जरूरतें पूर्ण हो तथा लोगों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो सके इसीलिये उन्होंने ऐसी वस्तुओं के उत्पादन का विरोध किया था जो समाज व राष्ट्र के लिये हानिकारक हैं अर्थात वे नशीले पदार्थ (शराब, धूम्रपान, तम्बाकू) तथा मानव का अहित करने वाली वस्तुओं आदि क्योंकि उनका कहना था कि ये पदार्थ मानव मस्तिष्क को विकृत करके हिंसा को जन्म देते हैं। जिससे ऐसे लोगों का शोषण होता हैं जो पूर्ण तथा निर्दोष हैं। उन्होंने कहा कि - “उत्पादन शोषण और हिंसा से मुक्त होना चाहिये।”(1) ताकि समाज व राष्ट्र में विभिन्न लोगों के समुदाय के बीच किसी भी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न न हो तथा अवश्यकतानुसार प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादन करके आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सके।

  गांधी जी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिये ऐसी उत्पादन प्रणाली का समर्थन किया था जो सरल व स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर उत्पन्न हो, ऐसा करने के पीछे उनका यह मानना था कि इससे एक तरफ तो उन क्षेत्रों का विकास होगा जो संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद पिछड़े हुये हैं और दूसरी तरफ सीमित मात्रा में उत्पादन करके अर्थात केवल उपभोग के लिये उत्पन्न करके प्राकृतिक संसाधनों का बचाव किया जा सकता हैं। गांधी जी उत्पादन इकाइयों को जनता के घरो, विशेष रूप से ग्रामों में ले जाना चाहते थे। जिससे लघु व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिले तथा ग्रामीण वासियों को नियमित रूप से रोजगार प्राप्त हो सके। गांधी जी के अनुसार - “बड़े पैमाने के उद्योगों में कई समस्याएँ जैसेः- प्रतिस्पर्धा, विपणन आदि हैं जो ग्रामों का निष्क्रिय या सक्रिय शोषण करती हैं इसीलिये हमें मुख्य रूप से उपभोग के लिये स्व-निहित ग्राम विनिर्माण पर ध्यान केन्द्रित करना होगा”(1) तभी भारत के सम्पूर्ण ग्राम औद्योगिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो सकेंगे।

5. श्रम समस्याएँ- महात्मा गांधी जी की श्रम संबंधी समस्याओं पर दृष्टि एक उच्च मानवतावादी एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति की ओर संकेत देती हैं। वे सच्चे अर्थों में मानव का कल्याण करने के लिये हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने जब यह देखा कि कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों से एक जानवर की तरह काम किया जाता हैं और मजदूरी के नाम पर बहुत कम या अत्यंत निम्न मात्रा में प्रदान की जाती हैं तो उन्होंने तुरंत कारखानों में कार्यरत श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु धावा बोला तथा कहा कि मजदूरों को उनकी गरिमा को व्यवस्थित रूप से संचालित करने हेतु उचित मजदूरी दी जानी चाहिये। गांधी जी ने 9 जून, 1946 को प्रकाशित अपनी पुस्तक “हरिजन” में लिखा हैं कि - “कारखानों में सर्वप्रथम उपयोगी कार्य यह होना चाहिये कि सभी श्रमिकों को एक समान मजदूरी के रूप में कम से कम इतना भुगतान किया जाना चाहिये जिससे कि वह स्वयं और अपने परिवार का आसानी से भरण-पोषण कर सके”(1) उन्होंने श्रमिकों की स्थिति को बेहतर एवं गुणवत्ता पूर्ण जीवन यापन के लिये न्यूनतम जीवित मजदूरी का दावा पेश किया था ताकि संयुक्त परिवार प्रथा के अन्तर्गत जीवन यापन करने वाले 4 से 6 सदस्य आसानी से अपना जीविकोपार्जन कर सके।

  गांधी जी के श्रम समस्या संबंधी विचार उसी प्रकार हैं जिस प्रकार के कार्ल-मार्क्स ने अपनी वर्ग संघर्ष संबंधी अवधारणा में प्रस्तुत किये हैं अन्तर केवल इतना हैं कि कार्ल-मार्क्स श्रमिकों का शोषण समाप्त करने के लिये पूंजीवादी प्रणाली को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात करते हैं जबकि गांधी जी अपने प्रिय सिद्धांतों सत्य एवं अहिंसा के माध्यम से श्रमिकों की समस्याओं को हल करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने अपने इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर सन 1920 में पुनः लिखा था कि - “श्रमिकों को अधिक मजदूरी कम काम के साथ प्राप्त होनी चाहिये जिससे कि वह निम्नलिखित चार चीजें जैसेः- स्वच्छ घर, स्वच्छ शरीर, स्वच्छ मन और एक स्वच्छ आत्मा की गारंटी प्राप्त हो सके।”(1)

  गांधी जी ने पूंजी और श्रम के बीच होने वाली संघर्ष को जायज ठहराया और कहा कि यदि इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना हैं तो श्रम यूनियन या श्रम संगठनों को मान्यता दी जानी चाहिये जिससे श्रमिक इन संगठनों के माध्यम से पूंजीपतियों के खिलाफ हड़ताल करके अपने अधिकारों जैसेः- न्यूनतम मजदूरी, काम के कम घण्टे, बोनस, अवकाश प्राप्त करने की स्वतंत्रता तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ आदि आसानी से प्राप्त कर सके।

  गांधी जी कहते हैं कि श्रमिकों के पास कम अवसर लागत तथा उत्पादन का कोई अन्य साधन उपलब्ध न होने के कारण उनकी सौदेबाजी की शक्ति बहुत कमजोर हैं जिससे उद्योगपति उनका लगातार शोषण करता रहता है। वह अपने लाभ को अत्यधिक करने हेतु मजदूरों से अतिरिक्त काम लेकर कम मजदूरी का भुगतान करता हैं जिसके परिणामस्वरूप् पूंजीपतियों तथा श्रमिकों के बीच विवाद या संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। बी.ए. घोष (2007) के अनुसार - “गांधी जी ने अपने राजनीतिक-आर्थिक लेख में यह स्पष्ट किया हैं कि पूंजीवाद मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता और समानता को विकृत करती हैं, इसीलिये श्रमिक अमानवीय, वंचित एवं निराश हैं।”(16) पूंजीवादी की इसी अमानवीय व शोषक प्रवृत्ति के कारण ही उन्होंने श्रमसंघों की स्थापना पर जोर दिया था ताकि श्रमिकों के हित सुरक्षित रहें।

  गांधी जी ने श्रम समस्या संबंधी विचार वर्तमान परिवेश में सार्थक सिद्ध होते हैं। आज हम कारखानों में किसी न किसी दिन होने वाली हड़तालों के बारे में सुनते व देखते हैं जो कि उनके द्वारा दिये गये श्रम संगठनों की मान्यता का ही परिणाम हैं।

6. स्वदेशीः- सामान्य शब्दों में स्वदेशी का अभिप्राय हैं स्वयं या खुद द्वारा बनाये गये नियमों, कानूनों व शर्तों का पालन करने हुये अपने साधनों का उपयोग करना। यदि हम स्वदेशी शब्द की उत्पत्ति या जन्म पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होता हैं कि यह शब्द - “संस्कृत भाषा के दो शब्दों स्व और देष से मिलकर बना हैं। जिसमें स्व का अर्थ स्वयं या खुद तथा देष का अर्थ हैं देश, इस प्रकार स्वदेश का आशय हुआ अपने देश का साधन, स्वदेशी आदि (17) लेकिन आज इस शब्द का अधिकांश उपयोग आत्मनिर्भरता के रूप में किया जा रहा हैं।

भारत के महान सामाजिक-दार्शनिक तथा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने इस शब्द के प्रयोग द्वारा देश को आजाद कराने में अपनी अहम भूमिका अदा की थी। उन्होंने स्वदेशी शब्द को एक रणनैतिक केन्द्र एवं स्वराज की आत्मा के रूप में वर्णित किया था।

यदि हम गांधी जी द्वारा उपयोग की गयी स्वदेशी संबंधी अवधारणा का विश्लेषण करें तो हमें एक अनूठी या अभिनव बात प्राप्त होती हैं और वह हैं भारत देश की परतंत्रता से आजादी, वास्तव में उन्होंने देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आजाद कराने के लिये स्वदेशी शब्द का प्रयोग किया था। ब्रिटिश शासन, जिसने सन 1600 ई. पू. में भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से कदम रखा था, के द्वारा भारतीय लोगों एवं उद्योगों का शोषण किया जा रहा था। देश से कच्चा माल इंग्लैण्ड में भेजकर और वहाँ से तैयार कपड़ा भारत के बाजारों में निःसंकोच व धड़ल्ले से विक्रय किया जा रहा था। जिससे भारतीय उद्योग, विशेष रूप से पारिवारिक श्रम पर आधारित उद्यम (लघु व कुटीर उद्योग) विनाश के कगार पर पहुँच गये थे। ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी जी ने अपने सत्य व अहिंसा के सिद्धान्तों द्वारा विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया था और देशवासियों को सलाह दी थी कि विदेशी कपड़ों के स्थान पर हम अपने ही देश में बने हुये कपड़ों का प्रयोग करेंगे इसके लिये उन्होंने सर्वप्रथम चरखे के माध्यम से सूत काटने की सलाह दी थी और कहा था कि इस बने हुये सूत के द्वारा कपड़ा तैयार करके उनका प्रयोग करेंगे ताकि विदेशी कपड़ों की बिक्री को रोका जा सके तथा अंग्रेज़ों के व्यापार को हानि पहुँचाकर देश को आजाद कराया जा सके। गांधी जी की इस अनूठी पहल ने आगे जाकर न केवल देश को आजाद कराया बल्कि उद्योगों, विशेष रूप से लघु व कुटीर उद्योगों को जीवनदान प्रदान करके उन्हें सुदृढ़ता भी प्रदान की थी।

गांधी जी ने स्वदेशी की तीन शाखाओं को देशवासियों के सामने पेश किया था। पहली- राजनैतिक, दूसरी धार्मिक और तीसरी आर्थिक, चूंकि मैने अपने इस लेख में गांधी जी के आर्थिक विचारों पर दृष्टि डाली हैं इसीलिये मैने इस शोध पत्र में आर्थिक रूप से स्वदेशी की अवधारणा पर दृष्टि डाली हैं। गांधी जी ने अपनी पुस्तक हरिजन (29-8-1936) में स्वदेशी को आर्थिक रूप से इस प्रकार परिभाषित किया हैं कि - “हम केवल अपने समीप के पड़ोसियों द्वारा तैयार की गयी वस्तुओं का ही उपयोग करें तथा उद्योगों को कार्यक्षेत्र बनाकर एवं जहाँ ये अपूर्ण हो वहाँ उन्हें पूर्ण बनाकर उन उद्योगों की सेवा करें।(18)

गांधी जी कहते थे कि स्वदेशी किसी भी व्यक्ति के के मन में दुर्भाव व घृणा नहीं रखती बल्कि यह एक प्रकार से मानव को किसी भी व्यक्ति, चाहे वह विदेशी क्यों न हो, निस्वार्थ सेवा का भाव पैदा करती हैं अर्थात व्यक्ति को मानवतावादी दृष्टिकोण के साथ अपने स्वधर्म का पालन करना चाहिये चाहे वह उसके लिये स्वयं की मौत क्यों न हो जाये, हमें हमेशा सत्य व ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिये। स्वधर्म के महत्व को समझाने के लिये गांधी जी ने गीता को उद्धृत करते हुये कहा हैं कि - “अपने कर्तव्य या स्वधर्म का पालन करते हुये मर जाना अच्छा हैं, परधर्म या दूसरे का कर्तव्य, खतरे से भरा हैं।” (19) आगे गांधी जी बताते हैं कि - “स्वधर्म के संबंध में गीता जो कहती हैं, वह स्वदेशी पर भी लागू होती हैं।”(19)

गांधी जी ने आर्थिक दृष्टि से स्वदेशी सिद्धान्त का पालन करते हुये कहा था कि - “यह आपका कर्तव्य और मेरा कर्तव्य होगा कि हम ऐसे पड़ोसियों का पता लगा सकें जो हमारी इच्छा को पूरा कर सके और उन्हें यह सिखा सके कि उन्हें आपूर्ति करना हैं जहाँ वे आगे बढ़ना नहीं जानते हैं यह मानते हुये कि ऐसे पड़ोसी हैं जो स्वस्थ व्यवसाय चाहते हैं। तब भारत का प्रत्येक ग्राम लगभग स्व-सहायक और आत्मनिर्भर इकाई होगा, केवल अन्य ग्रामों के साथ ऐसी आवश्यक वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं होगा जहाँ वे स्थानीय न हो”(20)

यदि हम वर्तमान संदर्भ में महात्मा गांधी जी की स्वदेशी संबंधी अवधारणा पर दृष्टि डाले तो हमें यह प्राप्त होता हैं कि आज भी उनकी इस अवधारणा का उपयोग किया जा रहा हैं, हाँ यह जरूर कह सकते हैं कि इसका रूप परिवर्तित हो गया हैं जो कि आधुनिक एवं भौतिकवादी युग का परिणाम हैं। आज हम जब टी.बी. विज्ञापन, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में पढ़ते और सुनते हैं कि ये उत्पाद मेड इन चाईना, मेड इन जापान आदि का हैं तो मेरे ख्याल से ये भी एक स्वदेशी का उदाहरण हैं, अन्तर केवल इतना हैं कि गांधी जी ने स्वदेशी के अन्तर्गत केवल स्वयं के उपयोग हेतु उत्पादन करने की सलाह दी थी जबकि आज के इस मेड शब्द के अन्तर्गत वस्तुओं का उत्पादन स्वयं के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार हेतु भी किया जा रहा हैं। वर्तमान में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा देश का औद्योगिक विकास, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तथा विदेशी कंपनियों के भारत में अपने उद्योग लगाने हेतु संचालित किया गया “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम भी एक प्रकार से स्वदेशी की पहचान को इंगित करता हैं। मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अन्तर्गत अब सभी प्रकार के उत्पादों का विनिर्माण देश में ही किया जायेगा और उस उत्पाद पर मेड इन इंडिया का ब्रांड लगा होगा। मेरे ख्याल से मोदी जी द्वारा आरंभ किया गया मेक इन इंडिया कार्यक्रम एक प्रकार से गांधी जी द्वारा दी गयी स्वदेशी संबंधी अवधारणा का ही एक रूप हैं।

निष्कर्षः

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी जी एक सामाजिक दार्शनिक, मानवतावादी, ईमानदार, और एक सच्चे देश भक्त के रूप में जाने जाते हैं। जिन्होंने न केवल सत्य व अहिंसा के बल पर अंग्रेज़ों से देश को आजाद कराया बल्कि एक समाज सुधारक के रूप में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करके मानव के हितों एवं भलाई का भी कार्य किया था, उनकी रचनाएँ देशवासियों को देश-भक्ति के साथ-साथ एक सच्चे व ईमानदार, मानवतावाद तथा आध्यात्मिकता का पाठ सिखाती हैं।

महात्मा गांधी जी का आर्थिक दर्शन देश की आर्थिक समस्याओं (गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी) तथा राष्ट्र के सर्वांगीण विकास को सूचित करता हैं और यह बताती हैं कि अपने संसाधनों के बल पर इन समस्याओं को किस प्रकार हल किया जाये चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या फिर शहर या राष्ट्र, सभी में व्याप्त आर्थिक समस्याओं का समाधान उन्होंने बड़े सटीक व उचित रूप से प्रस्तुत करके एक सच्चे देश भक्त तथा मानवतावादी का परिचय दिया था। गांधी जी ने जहाँ एक तरफ देश के ग्रामीण क्षेत्रों को अहम बताते हुये ग्राम स्वराज का उल्लेख किया हैं। जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करने हेतु लघु व कुटीर जैसे उद्योगों पर दृष्टि डाली हैं वही दूसरी तरफ स्वदेशी शब्द का उपयोग करके एक राष्ट्रवादी भावना प्रस्तुत की हैं।

गांधी जी राष्ट्रवादी भावना के साथ-साथ एक उच्च मानवतावादी दृष्टिकोण भी रखते थे इसीलिये उन्होंने अपने आर्थिक विचारों में श्रमिकों की समस्याओं को भी स्थान दिया था। उनका कहना था कि मजदूर अधिनियम या कानून के अभाव में पूंजीपति किस प्रकार श्रमिकों का शोषण करता हैं। श्रमिकों के हितों एवं अधिकारों के संरक्षण के लिये गांधी जी ने श्रम संघों या श्रम यूनियनों की वकालत की थी और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का समर्थन किया था ताकि उनके अधिकारों की सुरक्षा प्रदान की जा सके और समान वेतन व समान कार्य के आधार पर उनको मजदूरी प्रदान करके एक प्रकार का सामाजिक न्याय प्रदान किया जा सके।

जब हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गांधी जी के आर्थिक विचारों पर दृष्टि डालते हैं तो यह पता चलता हैं कि आज भी उनके विचार भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सटीक व उचित साबित होते हैं। आज ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से जो विकास के अंश दिखाई दे रहे हैं वे उन्हीं के विचारों की देन हैं। एक आदर्श ग्राम की परिकल्पना जिसमें यह कहा गया था कि ग्राम की पाठशाला, बच्चों के लिये उचित शिक्षा की व्यवस्था, स्वच्छ घर व पानी, बिजली, सड़कें, बांध आदि होना चाहिये, सत्य सिद्ध हो रही हैं। शहरों में स्थापित बड़े-बड़े उद्योगों में श्रमिकों के कल्याण व अधिकारों के लिये श्रम संगठनों की स्थापना जिसके माध्यम से श्रमिक उद्योगपतियों से अपनी शर्तें मनवाने के लिये सफल हुये हैं, स्वदेशी, जिसके अन्तर्गत यह कहा गया हैं कि किसी भी वस्तु का उत्पादन स्वयं के द्वारा और अपने उपभोग के लिये करना चाहिये इत्यादि उन्हीं के विचारों की देन हैं। आज स्वदेशी की अवधारणा के अन्तर्गत जो मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम हमारे सामने प्रकट हो रहे हैं, गांधी जी के द्वारा की गयी पहल का ही नतीजा हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आज भी गांधी जी के आर्थिक विचार भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उचित प्रतीत हो रहे हैं।

संदर्भ ग्रन्थ-सूची
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14- Mahatma Gandhi and Sustainable Development (www.greenubuntu.com), 31 May 2018. by:- Satya narayana sahu
15- Mohandas Karamchand Gandhi:- Ministry of information and Broadcasting Government of India. Publication Divison (1958-1982). The Colected work of Mahatma Gandhi
16- Ghosh, B.N., Gandhian Political Economy (Alternative Voices in contemporary economics) Chapters:- 5 and 6, pp. 115-174, Ashgate publishers (TD, Hamshiri England), 2007
17- Swadeshi. (www.mettacenter.org)
18- हरिजन, 29-8-1936
19- M.K. Gandhi, From Yervada Mandir. Ahmedabad Navjivan. 2007. p35
20- R.K. Prabhu and U.R. Rao (ed), op cit, p. 411

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