हृदय परिवर्तन की अलख जगाती हैं प्रेमचंद की कहानियाँ

प्रवीण कुमार

- प्रवीण कुमार

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, इ. गां. रा. जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक, म.प्र.-484887, ईमेल: pravinkmr05@gmail.com; चलभाषः +91 975 291 6192


सारांशः 
हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रेमचंद न केवल कथा सम्राट हैं बल्कि वे अपने आप में एक प्रतीक की तरह है । उन्होंने कथा साहित्य को आसमान से जमीन पर उतारा है। इस संदर्भ में उन्होंने साहित्य को कुलीन दरोदीवार से बाहर निकालने का प्रयत्न किये और इसमें वे सफल रहे हैं। उनकी कहानियाँ पठनीय के साथ-साथ विचारोत्तजक बहस की मांग करती हैं। इस बहस में उनकी कहानियाँ व्यवस्था से लगातार मुठभेड़ करती हैं और व्यवस्था से बाहर जीवन जी रहे मानव के लिए साहित्य में जगह बनाती हैं। इस शोध पत्र में यह समझने का प्रयास किया है कि उनकी कहानियाँ हाशिये पर जीवन जी रहे जनसमुदाय के लिए कितना स्थान प्रदान करती हैं, इसका विश्लेषण-विवेचन करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रस्तुत शोध पत्र में ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘घासवाली’, ‘दूध का दाम’, ‘शूद्रा’ कहानियों के माध्यम से प्रेमचंद की संवेदना और सरोकारों को समझने का एक प्रयास है, जबकि अधिकतर लोग सद्गति, पूस की रात, कफन आदि के माध्यम से ही प्रेमचंद की बहुजन संवेदना को समझने का प्रयास करते हैं। इस शोधपत्र में दलित या अछूत की जगह बहुजन शब्द का प्रयोग किया है।

बीजशब्द: प्रेमचंद, बहुजन, संवेदना, बहुजन वैचारिकी, सौन्दर्य, यथार्थवाद, आदर्शवाद, अनुभूति, प्रमाणिकता, प्रतिबद्धता, दलित, सुधारवादी दृष्टि, सामाजिक परिवर्तन, पितृसत्ता, हृदयपरिवर्तन

विषय विस्तारः 
प्रेमचंद का कथा साहित्य विवेचन-विश्लेषण एवं मूल्यांकन के लिए खुली आँखों से देखने का आग्रह करता है। हालांकि यह बात किसी भी साहित्य के अध्ययन-विश्लेषण के लिए अनिवार्य शर्त की तरह होती है। बिना किसी शर्त साहित्य का अधययन ही साहित्य से नए विजन को सृजित करता है और प्रेमचंद ने ऐसा ही किया। इसलिए उनका साहित्य निरंतर युगबोध के साथ नए सौन्दर्य को स्थापित कर जाता है। जब वे सन् 1936 में साहित्य की सुन्दरता को बदलने की बात करते हैं तो साहित्य की संवेदना और लेखक-पाठक से नए विषयवस्तु की चयन और पुराने की त्याग का अनुरोध कर रहे होते हैं, और अपने आसपास के वातावरण और परिवेश को समझने का आग्रह कर रहे थे। भाषा-साहित्य को कुलीनतावादी मानसिकता से मुक्त करने का आह्वान रहे थे। उनके इस आह्वान में ईमानदारी, सच्चाई के साथ विश्वदृष्टि का बोध निहित है। गाँव से लेकर शहर का सफर है। समाज के सबसे नीचे के पायदान पर जीवन जी रहे मानुष से लेकर सबसे ऊँचे पायदान पर जीवन का आनंद ले रहे ‘लघुमानव’ पर उनकी दृष्टि गई है कि किस प्रकार दिनरात मेहनत करने के बाद भी भूखे-नंगे जीवन जीने के लिए मजबूर रहते हैं। इस जीवन से वे जितना परिचित थे, उसे गहराई से महसूस भी करते थे उतना ही वे भारतीय सामाजिक व्यवस्था की असमानता, विषमता को भी समझते थे। यही कारण है कि उनकी रचना में युगधार्मिता की जो संवेदना समाहित है और साहित्यकारों से जिसकी वे उम्मीद करते थे। लेकिन यह उम्मीद एक इतफाक ही बन कर रह गई। जब तक कि हाशिये का समुदाय खुद कलम चलाने की स्थिति में नहीं आ गया। इसी से प्रेमचंद की दृष्टि को समझा जा सकता है और उनके साहित्य को भी तसदीक किया जा सकता है। डा. शिवकुमार मिश्र ने सही ही लिखा है कि ‘‘जितना नजदीक से, जितनी गहराई से उन्होंने ग्रामीण जीवन को देखा था, नागरिक जीवन की विषमताओं से भी वे उतना ही वाकिफ़ थे। नगरों तथा ग्रामों में ईमानदारी से श्रम करते हुए, फिर भूख से तड़पते तथा एक अच्छे जीवन के लिए संघर्ष करती मानवता भी उन्हें दिखाई पड़ी थी और दूसरों के श्रम पर मौज उड़ाते ऐश-आराम करते मनुष्य कहे जाने वाले लोग भी। निचले वर्ग की जनता के भी अनेक रूप उनके सामने से गुज़रे थे और तथाकथित सफे़दपोश, सम्पन्न समाज भी अपनी बहुरंगी शक्ल लिए उनकी आंखों के सामने आया था। उन्होंने अपने देखे गये इस जीवन को पूरी ईमानदारी तथा एक सच्चे कलाकार की सारी संवेदना के साथ अपनी कृतियों में उभारा और इस प्रकार उन्हें एक नई प्रखरता दी।’’1 अर्थात प्रेमचंद ने ईमानदारी से भारतीय समाज की विभिन्न परिस्थितियों और संघर्ष को देख-समझ रहे थे। और वही उनके साहित्य में उनकी संवेदना बन कर उभरी है। उनकी संवेदनात्मक दृष्टि में जितना सामाजिक व्यवस्था का चित्रण है उतना उसको बदलने की जद्दोजहद की बेचैनी नहीं है। वे सामाजिक व्यवस्था की असामानता और भूख की तड़प को समझते हुए व्यवस्था और नीति में सुधार चाहते थे लेकिन सम्यक परिवर्तन की आहट कम ही सुनाई पड़ती है। वह पाठक वर्ग पर छोड़ देते हैं। यही वजह है कि पाठक वर्ग सबकुछ समझते हुए भी सामाजिक परिवर्तन की ओर रूख नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे खुद ही नई परिस्थिति में जकड़ा हुआ होता है और उदारमना से परिवर्तन की उम्मीद कर बैठता है। उनकी बहुजन विषयक कहानियों में ऐसा ही चित्रण हुआ है यही वजह है कि वे कहानियाँ बहुजन वैचारिकी पर नहीं उतरती हैं और बहुजन चिंतक उसे लगातार सवाल के कठघरे में खड़ा करते हैं। डा. राम चंद्र के अनुसार ‘‘प्रेमचंद जिन कहानियों में खुले रूप में समस्या का समाधान नहीं सुझाते, हृदय परिवर्तन नहीं कराते, बल्कि शोषण एवं दमन को अद्वितीय कथादृष्टि और संवेदना के साथ यथार्थपरक ढंग से अभिव्यक्त और चित्रित करते हैं- वे कहानियाँ शोषण और दमन से मुक्ति के लिए ‘व्यवस्था-परिवर्तन’ की मांग करती हैं। जिन कहानियों में वे समस्या का समाधान हृदय परिवर्तन के आधार पर प्रस्तुत करते हैं, वे सुधारवादी दृष्टि की ओर संकेत करती हंै। ‘सद्गति’ और ‘घासवाली’ के आधार पर इन फ़र्कों को समझा जा सकता है। ‘व्यवस्था’ के प्रति संदेह और पात्रों द्वारा उठाए गए सवाल पुरुष पात्रों की अपेक्षा ज्यादातर स्त्री पात्रों में ही मुखरित हुए हैं; मसलन ‘ठाकुर का कुआँ’ की ‘गंगी’ और ‘घासवाली’ की ‘मुलिया’ के व्यक्तित्व देखे जा सकते हैं। ‘गोदान’ उपन्यास की ‘धनिया’ और ‘सिलिया’ तक आते-आते बहुजन-स्त्री का तेवर और भी विद्रोही बन जाता है। यह बहुजन-चेतना और ख़ास तौर से बहुजन स्त्री चेतना का सशक्त उदाहरण है। इन तमाम दृष्टियों के मद्देनज़र बहुजन विषयक कहानियों का विश्लेषण अपेक्षित है।’’2 अर्थात प्रेमचंद की कहानियाँ अपनी युगधर्मिता में कितना बहुजन चिंता और चिंतन को उठाती हैं। जिसका फिर से मूल्यांकन, विवेचन-विश्लेषण की जरूरत है।

प्रेमचंद की बहुजन विषयक कहानियों में ‘ठाकुर का कुआँ’ सबसे महत्वपूर्ण कहानी है। हिंदी आलोचना के सभी स्कूल ने इस काहनी का मूल्यांकन अपने-अपने दृष्टिकोण से किया है। मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में, यह ‘केवल एक कुआँ नहीं है, बल्कि पूरा हिन्दू समाज ठाकुर का कुआँ है, जिसमें अछूतों को डूब मरने की तो सुविधा है, पीने के लिए पानी लेने की सुविधा नहीं।’3 एक बहुजन दम्पत्ति गंगी और जोखू के माध्यम से प्रेमचंद ने एक बड़े व्यापक सामाजिक समस्याओं की ओर संकेत करते हैं। जोखू बीमार है और प्यास से तड़प रहा है। घर में रखा पानी गंदा-विषाक्तयुक्त है और इस कारण से बीमारी कहीं बढ़ न जाए गंगी वह पानी जोखू को नहीं देना चाहती है और ठाकुर के कुएँ से पानी लाने के लिए चल देती है। जोखू जो कि सामाजिक समस्याओं की भयवता को समझता है। इस भयवता की आंतरिक पीड़ा को भी महसूस करता है। इसलिए वह कहता है कि ‘हाथ पाँव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा। बैठ चुपके से। ब्राह्मण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेंगे, साहूजी एक के पांच लेंगे। गरीबी का दर्द कौन समझता है। हम तो मर भी जाते हैं, तो कोई दुआर पर झाँकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगे?’4 जोखू के इस कथन के माध्यम से प्रेमचंद ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर बहुत बड़ा व्यंग्य करते हैं। डा. राम चंद्र के शब्दों में यह न केवल प्रेमचंद की कहानी कला है बल्कि देवता मनवाकर शोषण प्रपंच करने वाले प्रतीक के रूप में ब्राह्मणवाद पर प्रहार है।5 अर्थात प्रेमचंद ने जीवन की मूलभुत आवश्यकता पानी की समस्या को लेकर जो चित्रण किया है वह आज भी 21वीं सदी में बनी हुई है। इसमें प्रतीकात्मक रूप में ही सही ब्राह्मणवाद पर जो प्रहार किया गया है। वह उस युग की सीमा है और बहुजन वैचारिकी की ओर संकेत भी है। लेकिन यह सीमा प्रेमचंद क्यों बनाते हैं जबकि पानी को लेकर आंदोलन चरम सीमा पर था?

कहानी की नायिका गंगी अपने जीवन साथी के जीवन को बचाने के लिए डरी सहमी स्वच्छ पानी लेने की ताक में बैठी है। उसे यह भी डर है कि कहीं कोई पानी लेते देख लिया तो जोखू की चेतावनी सच साबित हो जाएगी जो उन्हें स्वच्छ पानी लाने के लिए जिदद के वक्त दी गई थी। लेकिन हिम्मत और चेतना के बल ही वह मुखर स्त्री की तरह आगे बढ़ने की कोशिश करती है। प्रश्न और दुविधा के बीच अपने आप से सवाल करती हैं जो उस समय बहुजन आंदोलन में चल रहा था कि ‘‘हम क्यों नीच हैं और ये क्यों ऊँच हैं? इसलिए कि ये गले में तागा डाल लेते हैं?’ यह सवाल अपने आप में बहुजन चेतना को रिफ्लैक्ट करती है। सामाजिक विषमता को पहचानती है। इसी के साथ गंगी श्रेष्ठता को भी चुनौती देती है और उसका इस प्रकार बयान करती है कि ‘अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिये की एक भेड़ चुरा ली थी और बादमें उसको मार कर खा गया। इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिला कर बेचते हैं। ...किस-किस बात में हैं हमसे ऊँचे? हाँ, मुँह से हमसे ऊँचे हैं।...बेचारे महंगू को इतना मारा कि महीनों खून थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी। इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं?’’6 अर्थात गंगी के माधयम के साथ प्रेमचंद एक सजग स्त्री की चेतना को रेखांकित करते हैं जो भारतीय समाज की हिंदू व्यवस्था एवं उसकी अमानवीयता को सहजता के साथ उकेरती है, उसे समझती है और कहती है कि उनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है। वे सिर्फ मुँह के कारण ही हमसे ऊँचा है। अर्थात जुबान के कारण ही श्रेष्ठता है। स्पष्टतः कहानी में प्रेमचंद ने ‘ठाकुर और उसका कुआँ दोनों को ही भय के प्रतीक’ के रूप में चित्रित किए हैं। डा. राम चंद्र के शब्दों में, ‘‘कहानी में गंगी द्वारा ब्राह्मण, ठाकुर और साहू के बारे में उठाए गए प्रश्न वर्ण-जाति व्यवस्था पर तीखा वार करने जैसा हैं । गंगी के प्रश्न कोई सामान्य प्रश्न नहीं हैं। बल्कि वे सभी प्रश्न आज भी अम्बेडकरवादी आंदोलनों में सुने जा सकते हैं। प्रेमचंद द्वारा अछूत स्त्री पात्र में भरी गई चेतना का विकास हिंदी कहानी की विकास-यात्रा में दुर्लभ है। अंततः इसकी गूंज बहुजन कहानियों में ही सुनाई देती है। इस हकीकत से टकराये बिना कोई भी साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श अधूरा है।’’7 वहीं नीलकांत ने  लिखा है कि ठाकुर का कुआँ न केवल सामाजिक न्याय की मांग करता है बल्कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था की क्रूरतम एवं विभाजनकारी स्वरूप को स्पष्ट करता है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘ठाकुर का कुआँ सामाजिक विभाजन का एक मूर्त बिम्ब है जो सवर्ण और अछूत को न केवल पृथक करता है, बल्कि दोनों की सामाजिक स्थितियों के गहरे भेद को भी प्रतिबिम्बित करता है।’’8 इस भयावह तनावपूर्ण जीवन के बीच गंगी की स्थिति को सहज ही समझा जा सकता है कि वह कैसी निडरता को भी जी रही है और कितना कमजोर भी है। इसे इस संदर्भ में और स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है कि गंगी साहस कर कुएँ तक पहुँच जाती है और घड़े से भरा हुआ पानी कुएँ से खींचती है। तभी शेर के मुँह से भी भयानक ठाकुर का दरवाज़ा खुलता है - उसके हाथ से रस्सी छूटती है और भाग कर घर पहुँचती है और देखती है कि ‘‘जोखू लोटा मुँह से लगाए वही मैला गंदा पानी पी रहा है।’’9 अर्थात जिसके डर से गंगी साहसी कदम उठाती है भारतीय सामाजिक व्यवस्था की वजह से वही घटित होता है। यहाँ प्रेमचंद ने गंगी के माधयम से यह स्थापित किया है कि बहुजन समाज की दयनीय स्थिति भारतीय सामाजिक व्यवस्था की असमानतापरक संरचना और समाज में उसकी स्वीकार्यता के कारण है।
21वीं सदी में ‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी के निहितार्थ को समझने के लिए बदले हुए शोषण और अत्याचार के परिष्कृत स्वरूप को समझना होगा, तभी प्रेमचंद की लेखकीय संवेदनशीलता के सामयिक अर्थ ध्वनित होंगे। इस कहानी में अस्पृश्य गंगी के अलावा प्रेमचंद स्पृश्य स्त्रियों के शोषण तथा उनकी स्थिति को भी चित्रित करते हैं। एक अर्थ में बहुजन तो स्त्रियाँ भी हैं। अतः उक्त प्रसंग बहुत महत्त्वपूर्ण है। पानी भरने आईं दो स्त्रियों का वार्तालाप द्रष्टव्य है- ‘खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताज़ा पानी भर लाओ। घड़े के लिए पैसे नहीं हैं।’ ‘हम लोगों को आराम से बैठे देख कर जैसे मरदों को जलन होती है।’ ‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताज़ा पानी लाओ, जैसे हम लौंडिया ही तो हैं।’ ...‘दिन भर आराम करने को जी तरस कर रहा जाता है।’’10 इन वक्तव्यों से स्त्रियों की सामाजिक-पारिवारिक स्थिति का आभास होता है। पुरुष वर्चस्व के प्रति उनके मन में आक्रोश भी है। उन स्त्रियों की सामाजिक पहचान भले ही खुल न पाई हो, परंतु गाँवों में यही स्थिति है। प्रेमचंद की बहुजन जीवन पर लिखित कहानियों की खास विशेषता यह है कि उपेक्षणीय और किसी के लिए सामान्य बात या घटना इनके यहाँ विशिष्ट बन जाती है। उन्होंने आत्मवाची तकनीक के माध्यम से वर्ग चेतना और सजगता को प्राथमिकता देते हुए प्रतिपक्ष के प्रति सहानुभूति भी पैदा किए हैं। सामाजिक-आर्थिक विवशताओं ने मनुष्य की मानसिक स्थिति पर कितना प्रभाव डाला है; इसका चित्रण कहानी के कथ्य और संवेदना में देखा जा सकता है।

उनकी ‘घासवाली’ कहानी गांधी के ‘हृदय-परिवर्तन’ के सिद्धांत पर केंद्रित है। इस कहानी में सामंती प्रवृत्ति के युवक चैन सिंह का हृदय परिवर्तन बहुजन स्त्री मुलिया की फटकार से दिखाया गया है। क्या औपनिवेशिक भारत में ऐसा संभव था! क्या यह प्रेमचंद की आदर्शवादी दृष्टि की मजबूरी है या फिर हकीकत कि एक गरीब तांगे वाले महावीर की पत्नी मुलिया की फटकार से सामंती समाज का युवक नेक आदमी बन जाएगा जो उस स्त्री की बेबसी का तार-तार करने की मनसा रखता हो। यह एक कोरी आदर्शात्मक स्थिति है जो यथार्थ में संभव नहीं है। ठाकुर चैन सिंह द्वारा मुलिया की इज्जत लूटने का प्रयास किया जाता है। इस परिस्थिति को प्रेमचंद अपनी कलात्मकता से उसे बेबसी में तब्दील करता है। और मुलिया से माध्यम से उसे व्यक्त करता है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘अगर वह इतनी गरीब न होती, तो किसी की मजाल थी कि इस तरह उसका अपमान करता। वह रोती जाती थी और घास छीलती जाती थी।’’11 अर्थात प्रेमचंद मुलिया के माध्यम से यह स्थापित करना चाहते हैं कि गरीबी ही बहुजनों की बेबसी और मजबूरी है। साथ ही यह मुलिया की बहुत कुछ ज़ब्त करने की प्रवृत्ति की ओर संकेत नहीं करता है; अपितु जाति प्रथा, अन्याय, अपमान, विपन्नता और अधिकारविहीन बहुजन स्त्री की विवशता है। क्योंकि मुलिया सिर्फ ग़रीब ही नहीं है, अपितु वह बहुजन भी है, जिसकी सामाजिक स्थिति या हैसियत यह है कि जातिप्रथा की वर्चस्वशाली शीर्ष जातियाँ उसे खिलौना की तरह समझती हैं। इसी भावना से चैन सिंह मुलिया की दया चाहता है, लेकिन मुलिया का विद्रोही तेवर, उसका अभिमान और साहस देखकर चैन सिंह को दिन में तारे दिखने लगता है। जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। वह चैन सिंह को धमकाती है कि ‘जाओ, अब मुझे कभी न छेड़ना, नहीं तो अच्छा न होगा।’12 मुलिया अपनी ‘इज्ज़त’, ‘मर्यादा’ की रक्षा निडरता से करती है। मुलिया का विद्रोही तेवर और साहस बहुजन युवतियों को ताकत देता है और उनमें प्रतिरोध की चेतना पैदा करता है। बहुजन की इज्जत को खिलौना समझने वालों और अपनी इज्जत पर गर्व करने वालों को मुलिया बड़े-बड़े घरों का हाल बता कर उनकी हैसियत बता देती है कि ‘बड़े-बड़े घरों का हाल जानती हूं। मुझे किसी बड़े घर का नाम बता दो, जिसमें कोई साईस, कोई कोचवान, कोई कहार, कोई पंडा, कोई महराज न घुसा बैठा हो? यह सब बड़े घरों की लीला है।’13 मुलिया बहुजन की इज्जत और पति के विश्वास को स्थापित करते हुए कहती है कि ‘मेरे आदमी के लिए संसार में जो कुछ हूं, मैं हूं।’14 मुलिया नारी चेतना की प्रतीक है। अपने पति के मनमानी करने पर वह चुप नहीं बैठ सकती, कहती है कि ‘हाँ, वह अपने मन की करने लगे, मेरी छाती पर मूंग दलने लगे, तो मैं भी उसकी छाती पर मूंग दलूंगी।’15 लेकिन मुलिया की सारी चेतना अपनी सास के आगे क्षीण लगती है। उसकी सास में पुरुष वर्चस्व का संस्कृतिकरण हो गया है। वह पुरुषवर्चस्व का व्यवहार करती है। यह स्थिति मुलिया की ही सास की नहीं है बल्कि भारत की अधिकतर स्त्रियाँ सास बनकर वर्चस्व का वही रूप धारण करती हैं कि ‘यह हमारे समाज की विडंबना है। लगता है। जैसे सास बनकर वह स्त्री के दुःख-दर्द की वेदना को भूल जाती है। मुलिया की सास डाँटते हुए उससे कहती है - तो यहाँ मेरे घर में रानी बन के निबाह न होगा।... उठा झाबा और घास ला।’16 अर्थात ‘घासवाली’ कहानी न केवल दो बहुजन स्त्रियों की मनःस्थितियों को भी उभारती है बल्कि वर्चस्वशाली वर्ग के कुचरित्र को भी उभर कर सामने लाती है। यह प्रतिरोध और चेतना से परिवर्तित हो रही मनःस्थितियों की भी कहानी है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपने आदर्श को स्थापित करने के लिए मनःपरिवर्तन को एक सूत्र की तरह इस्तेमाल किया है। इस कहानी में बहुजन समाज और बहुजन नारी की स्थिति का वर्णन करते हुए हृदय परिवर्तन को स्थापित किया गया है।

इसी कड़ी में उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘दूध का दाम’ का विवेचन अपेक्षित है। यह एक नवोदित बहुजन बालक के जिंदा लाश में परिवर्तन की कहानी है, जिसमें प्रेमचंद इस बात को उद्घाटित करते हैं कि बहुजनों की सेवा का मूल्य जूठी और सूखी रोटी से ज्यादा कुछ नहीं है। यू कहें कि वह जूठन है। गाँव के जमींदार, बाबू महेशनाथ के घर में तीन पुत्रियों के बाद पुत्र पैदा हुआ है। हमेशा की तरह दाई का काम भूंगी भंगिन ने किया है। उनकी पत्नी को दूध नहीं उतरता है। अंततः भूंगी दाई और धाय दोनों की भूमिका निभाती है। लेकिन जातधर्म वाले देश में कुछ समय बाद ही उसे अपने इस कर्म का रीजल्ट मिल गया। और भूंगी को यह गद्दी बहुत महंगी पड़ी। दूध तो मालिक का बच्चा डकार गया और उसका अपना बच्चा मंगल उपेक्षित दुर्बल और रोगी सदृश हो गया। मालिक के बेटे सुरेश के सामने पिद्दी-सा लगता था।’ भूंगी और गूदड़ दम्पत्ति के मरने के बाद उसका मंगल अनाथ हो गया। प्रेमचंद लिखते हैं कि ‘मंगल अब अनाथ था। दिन-भर महेश बाबू के द्वार पर मंडराया करता। घर में जूठन इतना बचता था कि ऐसे-ऐसे दस-पाँच बालक पल सकते थे। खाने की कोई कमी न थी।... कोई उसे अपने साथ खेलाता भी न था। यहाँ तक कि जिस टाट पर वह सोता था, वह भी अछूत था।... एक फटा-सा टाट का टुकड़ा, दो मिट्टी के सकोरे और एक धोती, जो सुरेश बाबू की उतरन थी।... बस उसका कोई अपना था, तो गाँव का कुत्ता, जो अपने सहवर्गियों के जुल्म से दुखी होकर मंगल की शरण में आ पड़ा था। दोनों एक ही खाना खाते, एक ही टाट पर सोते, तबियत भी दोनों की स्थिति एक-सी थी, और दोनों एक दूसरे के स्वभाव को जान गए थे। कभी आपस में झगड़ा न होता।’17  यहाँ प्रेमचंद ने यह स्पष्ट दिखाया है कि श्रम का मूल्य जूठन क्यों? यह कौन सी श्रेष्ठता एवं पवित्रता है कि जब बालक के लिए दूध की जरूरत थी तब भंगी नहीं, लेकिन भोजन की बात होती है तो वह दीवार बन खड़ा हो जाता है। जिस खाने से किसी का जीवन पल सकता है, वह खाना क्यों बर्बाद किया जाता है? इसी के साथ यह भी स्पष्ट होता है कि व्यवस्था कितनी निर्मम और संवेदनहीन है कि मंगल का कोई दोस्त भी है तो वह एक कुत्ता है, इससे बड़ी सामाजिक विडम्बना और क्या हो सकती है। इस प्रकार प्रेमचंद वर्चस्वशाली और तथाकथित ऊँची जाति के लोगों की बदनीयती का पर्दाफाश करते हैं। 21वीं सदी में भी बहुजन समाज ऐसे जीवन जीने को अभिशप्त हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में आने के बाद भी मंगल की अधिकार और विद्रोह की भावना मरी नहीं है। सवार-सवार के खेल में महेश नाथ का लड़का सुरेश उसे बराबर घोड़ा ही बनाना चाहता है। ‘‘सुरेश ने कहा ...’ तू घोड़ा बनेगा, हम लोग तेरे ऊपर सवारी करके दौड़ाएंगे। मंगल ने शंका की- मैं बराबर घोड़ा ही रहूंगा कि सवारी भी करूंगा? यह प्रश्न थोड़ा टेढ़ा था। किसी ने इस पर विचार न किया था। सुरेश ने एक क्षण विचार करके कहा - तुझे कौन अपनी पीठ पर बैठाएगा, सोच? आखिर तू भंगी है कि नहीं? मंगल भी कड़ा हो गया। बोला - मैं कब कहता हूं कि मैं भंगी नहीं हूं, लेकिन तुम्हें मेरी ही माँ ने दूध पिला कर पाला है। जब तक मुझे भी सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोड़ा न बनूंगा। तुम लोग बड़े चघड़ हो। आप तो मज़े से सवारी करेंगे और मैं घोड़ा ही बना रहूंगा।’18 मंगल की इस यथार्थमूलक एवं विद्रोहात्मक प्रतिक्रिया के कारण उसे जीवन की बदतर स्थिति से गुजरना पड़ा। उसे बाबू महेश नाथ के घर से बेघर और निर्वासन की जिंदगी जीना पड़ा। घर क्या नीम के पेड़ के नीचे जाड़ा-गरमी-बरसात में महेश नाथ के परिवार के जूठन पर पलता है। उस जूठन से भी हाथ धो बैठता है। लेकिन भूख की बेचैनी से उसके पुनः लौट कर न आने का संकल्प टूट जाता है। आज भी ऐसी यथार्थवादी सिजूएशन से बहुजनों को कई बार गुजरना पड़ता है। इस दरम्यान मंगल-टामी के संवाद में निरीहता, लाचारी और परावलम्बन का भाव उभरकर आया है। ‘टामी ने कूं-कूं करके मंगल से जो कहा, उसमें व्यक्त वेदना द्रष्टव्य है, ‘इस तरह का अपमान तो जिन्दगी भर सहना है। यों हिम्मत हारोगे, तो कैसे काम चलेगा? मुझे देखो न, कभी किसी ने डण्डा मारा, चिल्ला उठा, फिर जरा देर बाद दुम हिलाता हुआ उसके पास जा पहुँचा। हम-तुम दोनों इसीलिए बने हैं, भाई!’19 प्रेमचंद के इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि जातिप्रथा ने बहुजन समाज को इतना निरीह और मृतप्राय बना कर रखा है कि वह उठने का प्रयास भी करता है तो जातिप्रथा द्वारा पैदा की गई परिस्थिति उसकी कमर तोड़ देती है। उसे बेबस कर देती है लेकिन इसके बावजूद भी यह उम्मीद की ही जा सकती है कि जिसदिन बहुजन समाज को उसकी दासता, बेबसी और गुलामी का अहसास होगा उसी दिन वह दासता, गुलामी, विद्रोह और प्रतिरोध की चेतना बनकर उभरेगी। समाज को बहुजनों की सेवा की कीमत चुकानी पड़ेगी। इस कहानी में सुरेश की माँ ‘देवी जी’ की नारी संवेदना सिर्फ अपने पुत्र तक सीमित रही है। व्यवस्था ने स्त्री के ममत्व को भी मार दिया है। यही बात ‘सद्गति’ में पंडिताइन के व्यवहार के माध्यम से दिखायी गयी है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में रची बसी स्त्री भी दमन और शोषण में सहभागी हो गई है। यह कहानी इसी ओर संकेत करती है। जाति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की इसी संवेदना का विस्तार प्रेमचंद की दूसरी कहानी ‘शूद्रा’ में देखने को मिलती है।

‘शूद्रा’ में प्रेमचंद ने एक लांछित, बेबस, उपेक्षित और बहुजन माँ-बेटी के जीवन की कहानी को रेखांकित किया है। गंगा विधवा है। उसे अपनी बेटी गौरा की शादी की चिंता खाये जा रही है। परिवार में और कोई नहीं है, भारतीय समाज की यह कैसी मानसिकता है कि उस माँ-बेटी के परिवार को लोग शक की नज़र से देखते हैं। प्रेमचंद लिखते है कि ‘यह स्त्री कोई धंधा नहीं करती, फिर भी माँ-बेटी आराम से रहती है, किसी के सामने हाथ नहीं फैलातीं। इसमें कुछ न कुछ रहस्य है।’20 इस कथन के माध्यम से प्रेमचंद ने न केवल भातरीय समाज की सामंती-पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर किया है बल्कि स्त्री जीवन की विडम्बनाओं की ओर भी संकेत किया है कि एक बार जब जीवन में भ्रांति पैदा हो जाती है तो उससे मुक्त होना आसान नहीं है। भारतीय समाज में जातिवादी मानसिकता ने इसी सोच को पैदा कर बहुजन समाज को मानसिक गुलाम बनाया है। गौरा की शादी में भी बाधा इसी मानसिकता के कारण उत्पन्न होती है। कोई बिरादरी वाला उससे शादी करने के लिए तैयार नहीं होता। अंत में प्रेमचंद ने ‘शूद्रों की बिरादरी’ में कहार से इनकी पहचान कराई है। इसे प्रेमचंद का बहुजन समाज के निकट सांस्कृतिक संबंध के रूप में भी देखा जा सकता है। इतिहास में बहुजन समाज का सामाजिक-सांस्कृतिक एवं वैचारिक संबंध ‘क्लोज रिलेशन’ का रहा है। जिसे आज बहुजन आंदोलन में स्वीकार्य करने की जरूरत है।

संयोग से एक दूसरे गाँव के ‘परदेशी’ युवक मंगरू कहार से शादी होती है और वह गौरा के साथ ससुराल में ही रहने लगता है। धीरे-धीरे गाँव के लोग उसका कान भरने लगते हैं, जिससे वह पितृसत्तात्मक मूल्यों का शिकार हो जाता है और अंततः गौरा को छोड़कर मंगरू चला जाता है और ऐसी जगह जा फंसता है, जहाँ स्त्रियों का मानसिक-शारीरिक शोषण होता है। वहाँ से चाहकर भी वह बाहर नहीं निकल सकता। एक बुजुर्ग ब्राह्मण के झांसे में आकर गौरा भी मंगरू की तलाश में दुर्योग से वहीं पहुँच जाती है। वहाँ भी गौरा अपने स्त्रीत्व को बचाए रखती है, लेकिन मंगरू उस पर अविश्वास करता है। इस अविश्वास से उसे गहरा आघात पहुँचता है और वह नदी में कूद कर अत्महत्या कर लेती है। मंगरू को जब सच का पता चलता है तो उसे पश्चाताप होता है परंतु तब तक काफी देर हो चुकी होती है। गौरा को बचाने के लिए वह भी नदी में कूद पड़ता है, परंतु अगले दिन प्रातःकाल दोनों की तैरती लाश मिलती है। देह व्यापार के उस कुण्ड में उसी बूढ़े द्वारा एक विधवा ब्राह्मणी को भी धकेल दिया जाता है। सन्न्यासी के वेश में छल-प्रपंच का पर्याय बना एक कुपात्र के माध्यम से प्रेमचंद ने समाज में मौजूद अंधविश्वास और धोखे का सटीक वर्णन किया है। इसी के साथ प्रेमचंद ने हृदय परिवर्तन को एक नया आयाम दिया है। अंग्रेज एजेण्ट जो गौरा की इज्जत से खेलना चाहता है, परंतु उसका हृदय परिवर्तन गौरा के बुद्धि और विवेक द्वारा कराकर प्रेमचंद स्त्री की शक्ति और चतुराई का व्यवहारिक और विश्वसनीय चित्रण करते हैं, जो अपने जीवन साथी को बचाने के लिए अपनी अस्मिता को दांव पर लगा देती है। गौरा अंत तक अपने चारित्रिक आदर्श को स्थापित तो करती है, फिर भी अपने पति द्वारा स्वीकार्य न होने के कारण तथा विश्वास हासिल न कर पाने के कारण निराश हो जाती है। यहाँ पर प्रेमचंद ने उसकी आत्महत्या कर बहुजन चेतना को कमजोर किया है जबकि वह उसे और मजबूत कर सकते थे। दूसरी बात यह गौरतलब है कि भारतीय समाज में स्त्रियों की ही बार-बार अग्नि परीक्षाएँ क्यों देने पड़ती है? यह सवाल इस कहानी में बड़ा प्रश्न बन कर उभरता है। यह कहानी स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक सोच, स्त्रियों की खरीद-फरोख्त, शोषण और अविश्वास की कहानी है। यहाँ भी हृदय परिवर्तन को कहानी की मूल संवेदना से जोड़ा गया है। लेकिन बात यहीं तक नहीं है, इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की चेतना की ध्वनि जो सुनाई पड़नी चाहिए, वह न कहानी में है और न उस समय के आंदोलन में। यह फर्क क्यों? यह विचारणीय है।

निष्कर्षः अंततः कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने देशकाल और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की सीमा में बहुजन समाज की स्थितियों का जैसा चित्रण किया है वह मार्मिक और महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि भविष्य की रूपरेखा भी रही है। उन्होंने जिस ‘सुन्दरता की कसौटी’ को बदलने की बात कर रहे थे। उसका व्यवहारिक पक्ष उनकी रचनाओं में निहित है। यह दीगर बात है कि हिंदी साहित्य लेखन में उस संवेदना को जितनी जगह मिलनी चाहिए और प्रेमचंद को आने वाली पीढ़ी से जितनी उम्मीद थी वह नहीं हो सका। जिसकी आलोचना इतिहास करता रहा है और करता रहेगा। जरूरत है प्रेमचंद के साहित्य को उनकी युगधर्मिता के साथ समझा और परखा जाए। रचना की संवेदना युगसीमा को अतिक्रमित करती है। प्रेमचंद की रचना भी ऐसी ही रही है। यही कारण है कि आलोचना-समालोचना के बावजूद प्रेमचंद की रचना अपनी बात कह जाती है। रचना का सौन्दर्य अपनी प्रतिबद्धता बता देता है। जहाँ यह प्रतिबद्धता साहित्य के पुराने प्रतिमान को तोड़ती है, उसे कुलीनता से मुक्त करने की कोशिश करती है वहीं वह बहुजन समाज से जुड़ जाती है। जहाँ वह नहीं तोड़ पाती है वहीं वह पारंपरिकबोध से आबद्ध हो जाती है। उनके रचना का सौन्दर्य ‘हृदय परिवर्तन’ की कसौटी रही है। उपर्युक्त विवेचित कहानियाँ बहुजन समाज से जुड़ती हैं, उसके जीवन की कहानी कह जाती हैं लेकिन ‘हृदय परिवर्तन’ की जबरस्त अलख जगाती हुई ये कहानियाँ भारतीय समाज की दरोदीवार में कैद बहुजन जीवन की गुलामी को वैचारिक सौन्दर्य नहीं प्रदान कर पाती हैं। यहीं पर आकर प्रेमचंद की सीमा निर्धारित हो जाती है, जिसकी आलोचना बहुजन चिंतन में लगातार किया जाता है। इसके बावजूद इतिहास प्रेमचंद के द्वारा उठाए गए सवालों को समझने और उनके साहित्य सौन्दर्य को हमेशा अपनी कसौटी पर समझने का प्रयास करेगा, यही प्रेमचंद की रचना कालजयिता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची:
1. शिवकुमार मिश्र, 1997, ‘साहित्य और सामाजिक संदर्भ’, कला प्रकाशन, दिल्ली, पृ.185-186
2. डा.राम चंद्र, 2012, प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियाँ, आखर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.69
3. मैनेजर पाण्डेय, हंस, अक्टूबर, 1992, पृ. 71
4. प्रेमचंद, 1991, ‘मानसरोवर’, भाग-1, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 176
5. डा.राम चंद्र, 2012, प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियाँ, आखर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 71
6. प्रेमचंद, 1991, ‘मानसरोवर’, भाग-1, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 117
7. डा. रामचंद्र, 2012, प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियाँ, आखर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 74
8. उद्धृत, डा. राजेन्द्र कुमार (सं), 1993, प्रेमचंद की कहानियाँ: परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 72
9. प्रेचमचंद ‘मानसरोवर’, भाग-1, पृ. 118
10. वही
11. वही, पृ. 257
12. वही, पृ. 262
13. वही
14. वही
15. वही
16. वही, पृ. 260
17. प्रेचमचंद ‘मानसरोवर’, भाग-2, पृ. 145
18. वही, पृ. 177
19. वही, पृ. 178-179
20. वही, पृ. 283

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