नागार्जुन की कहानियों में दलित चेतना

दयानिधि सा

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग प्रमुख, महात्मागांधी स्नातक महाविद्यालय, भूक्ता-768045,
जिला–बरगढ़, (ओड़ीशा)
चलभाष: +91 917 828 1452 ईमेल: sa.dayanidhi2011@gmail.com

शोध सारांश - आंचलिक हिन्दी उपन्यास के जन्मदाता बाबा नागार्जुन एक कुशल कहानीकार के रुप में भी प्रतिष्ठित हैं। आपने उत्तरी बिहार के दरभंगा जिला के ग्रामांचल को लेकर न सिर्फ उपन्यास लिखे हैं, अनेक कहानियाँ भी लिखी हैं। आपकी कहानियों में ग्राम जीवन की विसंगतियाँ, विषमताएँ, विद्रुपताएँ बड़ी मार्मिकता से चित्रित हैं। आपके द्वारा रचित ममताकहानी एक मातृहीन बालक का अभावग्रस्त जीवन चित्र खींचता है। माँ की ममता से वंचित बुलो अपनी चाची पदमसुन्दरी की गोद में पलता-बढ़ता है, अपनी चाची से ही अपार स्नेह पाता है। बुलो दस वर्ष का बालक है। बचपन में वह माँ की ममता के लिए तरसता रहता है। अपने बाल सुलभ आचरण से वह चाची के दिए हुए पैसों से अपने लिए चीजें खरीद लेता है तो चाची के क्रोध का भाजन बनता है।
      बाबा नागार्जुन की दूसरी प्रमुख कहानी जेठाभी मातृ स्नेह से वंचित एक बच्चे की त्रासदीमय जिन्दगी को उद्घाटित करती है। कहानी का नाायक जेठानन्द माँ की ममता के लिए तड़प उठता है। वह मातृहीन है, बचपन से ही उनकी माँ उसे छोड़कर चली गई। चार साल की उम्र में ही माँ के चले जाने से जेठानन्द मौसा-मौसी के पास रहता है। बाप के मर जाने के बाद उनकी माँ ने एक बनिये से दूसरी शादी कर ली और जेठा को छोड़कर चली गई। वह अपनी माँ से नफरत करता है, उसे गालियाँ देता है, क्योंकि उसकी माँ ने उसे़ छोड़कर अपने सुख के लिए दूसरे मर्द से शादी कर ली। माँ ने जेठा की जिन्दगी धूलिसात कर दी उसे बर्बाद करके रख दिया। भूख मर गई थीनागार्जुन की तीसरी प्रमुख कहानी है जो ग्राम जीवन की त्रासदी चित्रित करती है। ग्रामीण परिवेश की गरीबी-बेबसी एवं लाचारी का नग्न रुप यहाँ पूरी मानवीय संवेदना से चित्रित हुई है। एक गरीब बूढ़े व्यक्ति की अभावग्रस्त जिन्दगी के चित्रण में कहानीकार पूर्णतः सफल हुआ है।

बीज शब्द- नागार्जुन, उपन्यास, दलित, चेतना, ग्राम्य जीवन।

प्रस्तावना- बाबा नागार्जुन स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी आंचलिक कथा साहित्य के सफल कथाशिल्पी हैं। उनके द्वारा रचित कथाकृतियाँ बिहार प्रदेश के गाँव परिवेश की मार्मिक तस्वीर खींचती हैं। आसमान में चन्दा तैरेनामक कहानी संग्रह में संगृहित आपकी कहानियाँ आज के समाज के विविध परिदृश्य को शब्दचित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। यहाँ ममता’, ’जेठाऔर भूख मर गई थीतीनों कहानियों की चर्चा करेंगे और जानने की कोशिश करेंगे कि ग्राम जीवन किस तरह से रुपांकित हो सके हैं।

विषय प्रवेश-  ममताकहानी एक मातृहीन बालक का अभावग्रस्त जीवन चित्र खींचता है। माँ की ममता से वंचित बुलो अपनी चाची पदमसुन्दरी की गोद में पलता-बढ़ता है, अपनी चाची से ही अपार स्नेह पाता है। बुलो दस वर्ष का बालक है। बचपन में वह माँ की ममता के लिए तरसता रहता है। अपने बाल सुलभ आचरण से वह चाची के दिए हुए पैसों से अपने लिए चीजें खरीद लेता है तो चाची के क्रोध का भाजन बनता है। बुलों के बालसुलभ आचरण के बारे में कहानीकार लिखते हैं, “दशसाला, समझाए, संजीदा अपनी उम्र के और लड़कांे की अपेक्षा कुछ विलक्षण प्रकृति का कभी किसी ने बुलो को उधम या शोरगुल मचाते नहीं देखा।”01 बुलो अपनी चाची द्वारा दी हुई इकन्नी को तीन पैंसे में बेच डालता हे। उनमें से दो पैंसों का नमक लाता है और एक पैसे का दो कटहल कौआ ले आता है। वह बड़े ही चाव से कटहल- कौए को खाता है। जबकि चाची ने उसे काली मिर्च के लिए पैसे दिए थे। घर आने पर जब चाची उसे काली मिर्च के बारे में पूछती है तो वह भूल जाने का बहाना बनाता है। चाची भड़क गई और बुलो को दो चपत लगा बैठीं। बुलो रोने लगता है।
      बुलो अपने दोस्तों के साथ खेलता है, कहीं बाहर घुमने फिरने जाता है, मेलाउत्सव देखने जाता है। दूसरे बच्चों की भाँति वह भी कुछ खरीदना चाहता है, अपना शौक पूरा करना चाहता है, पर आर्थिक तंगी के चलते कुछ खरीद नहीं पाता। उसका दोस्त नरेन्द्र बाजार से बहुत सारी चीजें खरीदता है। उसे देखकर बुलो का मन भी बहुत कुछ खरीदने को तड़प उठता है। लेकिन गरीबी और अभाव के कारण वह कुछ भी खरीद नहीं पाता। वह अपनी गरीबी से तंग आकर नरेन्द्र से कहने लगता है, “यार मेरा भी बाप पूरब-पश्चिम कहीं कमाता होता और प्रत्येक महीने मनीआर्डर भेजता होता तो मैं भी संढी की तीर-कमान लेकर रामलीला के रावण को मारे जाता ही।”02
      बुलो अपनी चाची पदमसुन्दरी के साथ अभावग्रस्त जीवन जीता है। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि बुलो के लिए कुछ भी खरीद नहीं पाते। बुलो बच्चा है, उसका मन करता है कि दूसरे बच्चों की तरह वह भी कुछ खरीदे, पर उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पाती। चाची पदम सुन्दरी की इन बातों से उनकी आर्थिक दुरावस्था का आकलन लगाया जा सकता है, “पदमपुरी को पीछे भारी अफसोस हुआ दूसरे लड़के की कहीं ऐसी दुर्गति की जाती है? सो भी क्या तो एक घिसी और बहरी इकन्नी के लिए? हा नारायण?”03 चाची और बुलो दोनों ही यहाँ पाई-पाई के मोहताज हैं।
      स्वयं नागार्जुन को मातृस्नेह से वंचित होना पड़ा था। बचपन में ही उनकी माता स्वर्ग सिधार गई थी, इसीलिए चाची की गोद में उनका लालन-पालन हुआ था। उन्होंने माँ के आँचल की ममता, प्यार, दुलार के लिए बचपन में तरसा था, इसीलिए इस कहानी में लेखक ने अपना जीवन अनुभव प्रत्यक्ष रुप से हमारे सामने सेयर किया है। कहानी में एक जगह पर माँ के बारे में बुलो की मानसिक दशा का चित्रण करते हुए लेखक ने लिखा है, “माँ की सकल सूरत याद आते ही फिर बुलो का कलेजा फटने लगा। माथे को घुटनों के बीच डालकर बुलो फिर रोने लगा।”04
      बाबा नागार्जुन की दूसरी प्रमुख कहानी जेठाभी मातृ स्नेह से वंचित एक बच्चे की त्रासदीमय जिन्दगी को उद्घाटित करती है। कहानी का नाायक जेठानन्द माँ की ममता के लिए तड़प उठता है। वह मातृहीन है, बचपन से ही उनकी माँ उसे छोड़कर चली गई। चार साल की उम्र में ही माँ के चले जाने से जेठानन्द मौसा-मौसी के पास रहता है। बाप के मर जाने के बाद उनकी माँ ने एक बनिये से दूसरी शादी कर ली और जेठा को छोड़कर चली गई। वह अपनी माँ से नफरत करता है, उसे गालियाँ देता है, क्योंकि उसकी माँ ने उसे़ छोड़कर अपने सुख के लिए दूसरे मर्द से शादी कर ली। माँ ने जेठा की जिन्दगी धूलिसात कर दी उसे बर्बाद करके रख दिया।
      जेठा अपनी भगौड़ी माँ के प्रति आक्रोश भरे स्वर में कहता है- राक्षसी, चुडैल कहीं की। पिछले पन्द्रह वर्षों से वह अपना जीवन अपमान और लांछन, ग्लानि और विषाद में जी रहा है। उसे लगता है कि उसे ऐसा जीवन जीने के बजाय अब तक आत्म हत्या करनी चाहिए थी, पागल हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतने सारे जीवन के अभावों और समस्याओं के बीच भी वह अपना जीवन जी रहा है।”05
      जेठा की माँ जब दूसरी शादी कर लेती है, जेठा उनसे अलग हो जाता है। दोनों माँ बेटे के बीच दूरियाँ बढ़ जाती हैं। जेठा की माँ एक बनिए से शादी करके सुखद जीवन जीती है। उसके इस अनैतिक आचरण के लिए जेठा अपना सम्बन्ध उनसे तोड़ देता है। माँ-बेटे दोनों अलग हो जाते हैं, परिवार टूट जाता है। जब जेठा की माँ की मौत हो जाती है, तब भी जेठा को दुख नहीं लगता। क्योंकि माँ के अनैतिक व्यवहार के चलते पिछले पन्द्रह वर्षों से वह शर्मनाक जीवन जी रहा है। वह अन्दर ही अन्दर घुटन भरा जीवन जी रहा है। समाज के इस विकृत जीवन प्रसंग को वही समझता है, जिस पर बीतती है। यहाँ एक माँ अपनी ममता और प्रेम के अन्तद्र्वन्द्व में फँस गई है। दाम्पत्य जीवन के सुख के लिए उसे अपनी ममता का गला घोटना पड़ता है।
              ‘भूख मर गई थीनागार्जुन की तीसरी प्रमुख कहानी है जो ग्राम जीवन की त्रासदी चित्रित करती है। ग्रामीण परिवेश की गरीबी-बेबसी एवं लाचारी का नग्न रुप यहाँ पूरी मानवीय संवेदना से चित्रित हुई है। एक गरीब बूढ़े व्यक्ति की अभावग्रस्त जिन्दगी के चित्रण में कहानीकार पूर्णतः सफल हुआ है। उस बूढ़े व्यक्ति की जिन्दगी इतनी दयनीय है कि उदरपूर्ति के लिए वह किसी भी हदतक नीचे गिरने को तैयार है। वह अपनी दहशत भरी जिप्दगी से हमें अवगत कराता हुआ कहता है, “मजबूरियों में पहले तो हम खुद ही जमीन बेच-बेचकर खाते रहे, बाद में धरती माता भी हमेशा के लिए रुठ गए। ऋतुओं ने धोखा देना शुरु कर दिया, आकाश से मेघ एकदम गायब हो गये।”06
      कहानी-नायक बृद्ध ब्राह्मण परिवार से ताल्लूक रखता है। एक जमाने में उनके पास धन संपत्ति भरी हुई थी। उसके पिताजी दस बीघा जमीन छोड़ गए थे। लेकिन उस व्यक्ति ने धीरे-धीरे करके अगले पन्द्रह-बीस वर्षांे में सारी जमीन बेच डाली। उसका बेटा पुलिस विभाग में नौकरी करता है, जो दुर्भाग्य से डाकुओं की मुड़भेठ में मारा जाता है। रोजी रोटी का कोई जरिया ने होने के कारण वह व्यक्ति जमीन बेचकर भरण-पोषण करने लग है। आखिर सारी जमीन-जायदाद खत्म हो जाने के बाद उसे अपने मृत बेटे की पत्नी यानी बिधवा बहू को देह व्यवसाय के दल-दल में धकेलना पड़ता है। गरीबी और बेबसी से वह इतना तंग आ जाता है कि अपने घर की इज्जत को सरे आम बाजार में बेचने के लिए मजबूर हो जाता है।
      जीवन के अन्तिम पड़ाव में अपनी बहू को पापाचार के लिए धकेलनेवाला एक मजबूर ससुर अपनी विवशता इन शब्दों में व्यक्त करता है, “बहू के बारे में क्या बताऊँ बाबू जी। मैंने ही उसे कुकर्म के लिए प्रेरित किया। हाँ, मैंने जान बूझकर पड़ोस के एक युवक से उसका संपर्क बढ़ने दिया। बुभुक्षितं किं न करोति पापं। भूखा व्यक्ति क्या नहीं करता। चार-चार बेटों में भट्ठी सुलग रही थी।”07 परिवार में बूढ़े व्यक्ति की बुढ़िया बहन, पोते-पोती और विधवा बहू-कुल मिलाकर चार लोग रहते हैं। सातवीं क्लास में पढ़ाई कर रहा एक पोता अपनी माँ की ओछी हरकत बर्दाश्त नहीं कर पाता और घर छोड़कर भाग जाता है। वृद्धावस्था में वह अपने पोते को ढ़ूंढ़ता फिरता है, पर कहीं भी उसका पता नहीं चल पाता। उसकी गरीबी ने ही उसे इस हालत में लाकर खड़ा कर दिया है। वह हालात के सामने मजबूर होकर पारिवारिक जीवन का सन्ताप बुढ़ापे की अवस्था में भोगने को मजबूर हो रहा है।
      पारिवारिक-सामाजिक संबन्धों में अर्थ की निर्णायक भूमिका इस कहानी में स्पष्ट हुई है। एक बूढ़े ससुर के सामने गरीबी इस कदर हावी हो जाती है कि अपनी ही बेटी समान बहू को पर-पुरुष के साथ शारीरिक संबन्ध रखने का आग्रह करना पड़ता है। पेट की भूख उसे इस कदर पशुतुल्य बना देता है कि अपनी ही बहू की इज्जत आबरु बेचने के लिए वह कुण्ठित नहीं होता। वह खुद इस घृणित विषय का खुलासा करता हुआ कहता है, “पड़ोसी युवक जमसेदपुर से पन्द्रह दिनों की छुट्टी में गाँव आया था। ओवर्सियर है, बीस-पचीस हजार तो पीट ही चुका है। हमारी पुत्रवधू और उसमें भाभी-देवर का रिश्ता तो था ही। मगर इस महंगाई और अकाल ने रिश्ते में गाढ़ा रंग घोल दिया। मैं गूंगा और अपंग बनकर जमाने का करिश्मा देखता रहा और वह बेचारी अपनी इज्जत का सौदा करती रही, चार-चार मुँहों के हवन-कुण्ड में जैसे-तैसे अनाज की समिधा डालती रही।”08
      सामाजिक व्यवस्था-दोष की चपेट में आकर यह परिवार दहशत भरी जिन्दगी जीने के लिए मजबूर है। घर के कमाउ जवान बेटे की मौत से परिवार की धुरी इतनी खराब हो जाती है कि विधवा औरत को अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध रखना पड़ता है, ताकि उसके परिवार की गाड़ी आगे बढ़ सके। एक अंधा-नंगा बूढ़ा व्यक्ति अपनी जिन्दगी से तंग आकर कह उठता है, “सरकार मुझको क्या होगा? मैं बड़ा कठजीव हूँ। यम राज को मुझसे भय लगता है। मृत्यु मुझसे दूर-दूर भागती फिर रही है। लेकिन मैं इन्हें छोड़ूंगा नहीं। पिछले ग्यारह महीनों से मैं मृत्यु के पीछे पड़ा हूँ, उसे पकड़ना चाहता हूँ। वह चालाक बाघिन की तरह बार-बार मुझे धोखा दे जाती है।”09 एक वयोवृद्ध व्यक्ति अपने जीवन-संग्राम में हार मानकर मौत को गले लगाने को कब से मौत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, पर उसे मौत नसीब नहीं हो पा रही है।
      बाबा नागार्जुन की कहानियों की उत्कृष्टता सिद्ध करते हुए डॉ. तेजा सिंह कहते हैं, “प्रगतिशील चेतना संपन्न कथाकार नागार्जुन कविता, उपन्यास की भाँति कहानियों में समाज का व्यापक चित्रण नहीं कर सके हैं और न ही व्यापक स्तर पर सामाजिक विषमताओं, अन्ध्विरोधों को ही अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति कर सके हैं। विषयवस्तु की दृष्टि से इनकी कहानियाँ कमजोर और साधारण है। समाज में हो रहे व्यापक बदलाव को और उनमें अन्तर्निहित अन्र्तविरोधों को व्यापकता और गहराई से वे दिखा नहीं पाए हैं। कुछ कहानियाँ सामाजिक समस्याओं को स्पर्श मात्र करके रह जाती हैं ”10

निष्कर्ष - नागार्जुन द्वारा सृजित कहानियाँ बिहार प्रान्त के लोक जीवन की सच्ची तस्वीर खींचती हैं। ममताकहानी में बुलो नाम के एक मातृहीन बालक को माँ की ममता के तरसते हुए दिखाया गया है। वह अपनी माँ के स्नेह-दुलार के लिए हमेशा तरसता रहता है। जेठामें भी जेठानन्द माँ की स्नेह-छोह पाने के लिए आहें भरता रह जाता है। उस बदकिस्मत को अपनी माँ के आंचल का स्पर्श नसीब नहीं हो पाता है। भूख मर गई थीकहानी भुभुक्षितं किं न करोति पापंकी उक्ति चरितार्थ करती है। एक वृद्ध व्यक्ति अपने परिवार की क्षुधाग्नि शान्त करने हेतु अपनी ही विधवा बहू को देह व्यवसाय के नर्क में धकेलने लिए मजबूर हो जाता है। बाबा नागार्जुन की कहानियाँ ग्राम जीवन तथा दलित चेतना की जीवन्त दस्तावेज कही जा सकती हैं और इन कहानियों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व सदैव स्वीकार्य है। देहाती दुनिया में दुखद, अभिशप्त जिन्दगी जी रहे दलितों में जन जागृति पैदा करने में उपरोक्त कहानियाँ कारगर साबित हुई हैं।

कृतज्ञता ज्ञापन - इस शोध पत्र को तैयार करने में हमारे महाविद्यालय के प्राध्यापक श्री अन्तर्यामी साहू और श्री अनिल कुमार देवता तथा प्राध्यापिका श्रीमती कल्पना मिश्र का विशेष सहयोग रहा। गुरुदेव डॉ. बिहारीलाल साहू जी की प्रेरणा स्वरुप यह शोध पत्र संपूर्ण हो सका। हमारे महाविद्यालय की लाइब्रेरी से शोध विषयक सारी सामग्री जुटाने में मुझे सुविधा हुई। आप सभी के प्रति मैं कृतज्ञता ज्ञापन करता हूँ।

संदर्भ ग्रन्थ सूची -

01. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वि. संस्करण 1999, पृष्ठ -253
02. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -254
03. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -255
04. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -256
05. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -257
06. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -270
07. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -271
08. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -271
09. नागार्जुन: चुनी हुई रचनाएँ -1,सं. शोभाकान्त मिश्र, पृष्ठ -268-269
10. नागार्जुन का कथा साहित्य- तेजा सिंह, संभावना प्रकाशन, हापुड़. पहला संस्करण-1982, पृष्ठ-178

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