कोविड-19 का वैश्विक मुद्दा: एक अवलोकन

नीरज कुमार आज़ाद


              चीन के गर्भ से निकलकर कोरोना आज विश्व को समस्या के गहरी सागर में गोते लगाने पर मजबूर कर दिया है। दुनिया के तमाम महाशक्तिशाली राष्ट्र घुटनों के बल चलने को मजबूर है। इसके ठोकरें ने विश्व के प्रगतिपथ को काफी हद तक नुकसान पहुँचाया, एक तरफ कोरोना ने विश्व को मरणासन्न के तट पर लाकर खड़ा कर दिया वहीं दूसरी ओर वैश्विक मुद्दे को भी पोषित किया है।
              विश्व के सम्मुख वर्तमान समय में दो महत्वपूर्ण प्रथमिकताएँ उभरकर सामने आया है, जिसमें एक तो वायरस के तेजी से हो रहे फैलाव पर अंकुश लगाना और दूसरा इससे उत्पन्न अन्य वैश्विक मुद्दों को चिन्हित करना। इस अवलोकन में महामारी के दौरान वैश्विक शक्तियों द्वारा विश्व व्यवस्था के परिणाम के कुछ कार्यों, निर्णयों, इसे रोकने के लिए किए गए प्रयासों को संग्रहित करने का प्रयास किया गया है। यह अवलोकन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कोविड-19  ने  पहले ही वैश्विक व्यवस्था को विकलांगता की राह पर लाकर खड़ा कर दिया है और जितनी देर तक यह रहेगी वैश्विक व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति सहित अन्य क्षेत्रों को भी उतनी ही नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी। यह आलेख वैश्विक महामारी के बीच अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों के कुछ महत्वपूर्ण कार्यों का अवलोकन है।

(1) अर्थव्यवस्था 

(संयुक्त राज्य अमेरिका)
        अगर हम अमेरिका की बात करें तो ताजा आँकड़ों के मुताबिक कोविड-19 से ग्रसित लोगों की संख्या लगभग 20 लाख के आँकड़े को पार कर गया है और कुल मौतों की संख्या लगभग 1 लाख 50 हजार के आसपास है। अमेरिका में कोरोना के केंद्र रहे न्यूयॉर्क राज्य में सबसे अधिक मामले सामने आये हैं जिनकी संख्या 4 लाख से है जबकि अकेले इस राज्य में मरनेवालों की संख्या 40 हजार के ऊपर है।
                 अमेरिकी समाज पर कोविड-19 के प्रकोप के सबसे महत्वपूर्ण प्रभावों में से एक अर्थव्यवस्था पर होगा, मुख्य रूप से सामाजिक-अर्थशास्त्र पर। लगभग 95% अमेरिकियों के घर पर रहने से, बेरोजगारी और छँटनी एक अभूतपूर्व उच्च स्तर पर पहुँच गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार 17 मिलियन से ज़्यादा लोगों ने अमेरिकी बेरोज़गार दावे दायर किये हैं। अगर हम 2008 के वित्तीय संकट से तुलना करें तो हम पाते हैं कि तत्कालीन समय में 90 लाख बेरोज़गारी की तुलना में वर्तमान कोरोना काल ने 70 लाख अधिक बेरोज़गारी को जन्म दिया है। रेस्तराँ, आतिथ्य उद्दोग, विनिर्माण, निर्माण और स्वास्थ्य सेवाएँ, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, मिशिगन और फ्लोरिडा जैसे राज्यों में अधिकतम प्रभावित हुई हैं। यद्यपि इस विपदा में अमेरिकी कांग्रेस ने श्रमिकों और व्यवसायों की मदद के लिए $ 2.3 ट्रिलियन कोरोनावायरस सहायता बिल के रूप में अबतक का सबसे बड़ा अमेरिकी आर्थिक प्रोत्साहन विधेयक पारित किया है जिसके सहारे अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास कर रही है, लेकिन इससे होने वाला लाभ का दर्शन शेष है।

(चीन)
            यह कौन जानता था कि चीन की गलती का नतीजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ेगा। आज चीन के बचकाना हरकत ने मानव जाति को समस्या के आग में झुलसने के लिए छोड़ दिया है। हम चीन की बात करें तो निसन्देह कह सकते हैं कि वर्तमान समय में चीन की अर्थव्यवस्था 2020 में लगभग तीन दशकों में पहली बार सिमटती नजर आ रही है। चीन में, महामारी के कारण सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव विनिर्माण और आपूर्ति शृखला पर पड़ा है। चीन में संगरोध की घोषणा ने औद्योगिक उपकरण निर्माता (JCB) और कार निर्माताओं की आपूर्ति शृंखला को प्रभावित किया है। आर्थिक क्षेत्र में चीन दुनिया के लिए ठप्प आपूर्ति के साथ एक घटक अवरोह बिंदु सिद्ध हुई है। चीन ने अपनी गरिमा को वैश्विक स्तर पर कलंकित किया है। कभी पड़ोसी देश भारत तो कभी वियतनाम के साथ तनावपूर्ण स्थिति को बढ़ावा देने में चीन की अहम भूमिका रही  है। आज चीन वैश्विक विनिर्माण के लगभग 30-35% रुग्णता के लिए जिम्मेदार है और चीन अपनी गिरती अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए जिम्मेदार एवं चिंतित है।

(यूरोप)
       चीन की नासमझी ने दुनिया के लगभग 777 करोड लोगों को घर में कैद कर दिया है। लोगों को समस्या के घनघोर अंधेरी जंगलों में भटकने के लिए छोड़ दिया है, न जाने चीन की क्रूरता ने कितने मासूमों का गला घोंट दिया। आज कोविड-19 ने यूरोप को भी अपनी मजबूत बाँहों में जकड़ लिया है। देश चीन की पहुँच, निवेश और उनपर निर्भरता के स्तर की जाँच के लिए छटपटा रहे है। स्पेन, इटली और जर्मनी जैसे पश्चिमी यूरोपीय देशों ने कोविड-19 के कारण संघर्षरत फर्मों के चीनी अधिग्रहण पर अंकुश लगाने के लिए (FDI) नियमों को कड़ा किया है। पुनरुत्थानशील चीन ने यूरोप की सहायता करने और संकट में एक अवसर बनाने के लिए खुद को तैयार किया है। यूरोप के लिए चीन की योजना कोविड-19 का झुकाव तीन प्राथमिकताओं पर आधारित है, जिनको यूरोप के लिए चीन के मार्शल प्लान के रूप में देखा जा सकता है। महामारी के दौरान यूरोप को चिकित्सा सहायता, एक तकनीक आधारित गहरी सहायक प्रविष्ट और यूरोप के बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है, खासकर जबसे ज़्यादातर परियोजनायें महामारी में ठप हो गई है। इस प्रकार से यूरोप में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास किया जा रहा है।

(2) भू-राजनीति

        महामारी के बाद देशों की व्यापार और ख़र्च करने की प्राथमिकता से प्रेरित होने की सम्भावना है। चीन के साथ सौदा करने के लिए प्रमुख देश कैसे सामने आते हैं और सबसे पहला प्रश्न यह कि क्या अमेरिका न केवल चीन के खिलाफ, बल्कि उन संस्थाओं और संस्थानों के खिलाफ भी जबाबी रणनीति अपनाता है जिन्हें वह चीनी हितों के लिए प्रतिबद्ध मानता है। हाल में ही ट्रम्प शासन ने (WHO) की फंडिंग पर रोक लगा दिया है, उन्होंने यह आरोप लगाया कि WHO “अपने मूल कर्तव्य में विफल रहा और इसे जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए” और झूठी ख़बर” फैलाने के लिए संगठन को जिम्मेदार ठहराया गया, जिससे सम्भवतः वायरस का व्यापक फैलाव हुआ। उधर ताईवान ने भी WHO पर आरोप लगाया है कि चीन को खुश करने के लिए कोरोना के प्रसार की गम्भीरता को आँका। इस वायरस ने ऐशियाई समुद्री क्षेत्र में चीन की आक्रामक भू-राजनीति की रफ्तार पर अंकुश नहीं लगाया, इसके अलावा उसने सभी आरोपों का मुकाबला करने के लिए एक सोशल मीडिया अभियान प्रारंभ किया है। महामारी के बीच चीन ने दक्षिण चीन सागर में दो अनुसन्धान केन्द्रों को स्थापित किया है और एक मछली पकड़ने वाली वियतनामी नाव को डूबो दिया। इसके अलावा, चीन ने 16 काफ़िले ताइवान के तट पर “अभूतपूर्व” नाईट-एयर ड्रिल आयोजित की और एक छः जहाजों का बेड़ा भेजा जिसका नेतृत्व लियाओनिंग विमान वाहक ने किया जो ताईवान के उत्तरी सिरे के पूर्व कियाको स्ट्रेट के माध्यम से रवाना हुआ था। ताईवान के समर्थन में, अमेरिका 25 मार्च से क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य विमानों की कम से कम 11 बार उपस्थिति के प्रदर्शन के साथ कड़ी निगरानी रख रहा है। यह एक ऐसी दुनिया के लिए अच्छा नहीं है जो एक महामारी के भँवर जाल में फँसा हुआ है।

भारत
    अगर हम भारत के बारे में बात करें तो कह सकते हैं कि वर्तमान समय में भारत का कोरोना संक्रमण के मामले में वैश्विक स्तर पर छठा स्थान है। अभी एक समाचार पत्र (दैनिकभास्कर) में पढ़ा था, कि अमेरिका, ब्राजील के बाद सबसे ज्यादा नए कोविड-19 रोगी भारत में मिले। भारत में कोरोना पॉज़िटिव मरीजों की संख्या लगभग ढाई लाख के ऊपर चला गया है और लगभग 7 हजार कोरोना मरीजों की जान जा चुकी है। अगर हम विश्व के बारे में कहे तो कोरोना संक्रमित मरीजो की संख्या लगभग 85 लाख आँकड़े को छू लिया है और लगभग 4 लाख 35 हजार इससे मौत हो चुकी है। भारत अबतक महामारी से उभरती चुनौतियों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के माध्यम से निपटने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है। घरेलू तौर पर, भारत ने देशव्यापी तालाबन्दी लागू करने के लिए तेजी से काम किया। क्षेत्रीय स्तर पर, यह विशेष रूप से कोविड-19 प्रकोप के लिए एक सामान्य फंड पुल बनाने के लिए सार्क के ढांचे को पुनर्जीवित करने के लिए आगे आया है। इसके अतिरिक्त बसुधैव कुटुम्बकम को ध्यान में रखते हुए इसमें मालदीव, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, भुटान, कुबेत, चीन, ब्राजील और अमेरिका जैसे क्षेत्रीय और गैर-क्षेत्रीय देशों में चिकित्सा दल, सहायता और आपूर्ति भेजी है।
      महान शक्तियों के बीच, भारत ने चीन और अमेरिका के मध्य एक अच्छी सन्तुलन बनाये रखा है। भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के अपने समकक्षों के साथ बात की, तो उन्होनें रुस और चीन को भी समान रूप से शामिल किया।
ऐसी स्थिति में भी भारत ने चीन को मास्क, दस्ताने और अन्य चिकित्सा उपकरण सहित 15 टन चिकित्सा आपूर्ति प्रदान की है, भारत ने अमेरिका को भी हैड्रॉक्सिकलरोक्विन (HCQ) के निर्यात को मंजूरी दे दी है। चीन और अमेरिका इस सहायता के लिए भारत को धन्यवाद दिया है। अफगानिस्तान को गेंहू उपलब्ध कराने के फैसले को वैश्विक घराना में भारत की तारीफ हो रही है।
     महामारी के बावजूद विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में समुद्री क्षेत्रों में चीन की लगातार आक्रामकता को देखते हुए भारत इंडो-पैसिफिक के समुद्री क्षेत्र में चीन की गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने को तैयार है।

(3) सामाजिक कीमत

        कोरोना महामारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)   ने भविष्यवाणी की है कि सभी देशों में से 90% देश इस वर्ष प्रति व्यक्ति वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में नकारात्मक वृद्धि होगी। इस महामारी में ज्यादातर देशों में दुर्भाग्य से नस्लीय और जातीय असमानतायें उभरकर सामने आई है।
           भारत में, कोरोना की ठोकरों ने प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों को सामाजिक आर्थिक संकट के दलदल में धकेल दिया है। जिससे उनके जिंदगी में अचानक बज्रपात के समान समस्या सामने आकर खड़ी हो गई है। वही भारत इस महामारी को अवसरों के रुप में देख रहा है जो आने वाली भविष्य में शायद भारत को विश्वगुरू का खोया हुआ सम्मान वापस दिला सके।

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