संस्मरण: दृश्य–संवाद–पात्र

शशि पाधा

- शशि पाधा


मेरे मध्यवर्गीय माता पिता के घर में प्रत्येक वस्तु अपने स्थान पर करीने से लगी रहती थी। छोटा सा आँगन, गुलाब-गेंदा आदि सभी मौसमी फूलों से शोभित छोटी सी बगिया। उसी के एक भाग में संतरे, अमरुद के पेड़ और अँगूरों की बेल। तुलसी का चौबारा, धूप-दीप तथा फूलों से सुगन्धित ठाकुर द्वारा। घर में चाहे कमरे तो और भी थे लेकिन सारा परिवार माता पिता के शयन कक्ष में ही उठता–बैठता था। घर की बैठक (जिसे आज लोग ड्राइंग रूम कहते हैं) तो केवल मेहमानों के लिए थी।

शयन कक्ष की बड़ी सी अलमारी में साहित्यिक पुस्तकें ही रखी रहती थीं। बाकी के समाचार पत्र व पत्रिकाएँ कोने की मेज़ पर रखी जाती थी। यानी पूरा का पूरा घर व्यवस्थित था। पिता कहते थे स्वच्छ घर में लक्ष्मी का निवास होता है। वैसे माता-पिता दोनों शिक्षक थे। अत: लक्ष्मी से अधिक सरस्वती का निवास ही था हमारा घर।
घर सदैव इतना साफ सुथरा रहता था कि प्रत्येक आने वाला अतिथि यही कहता, “यहाँ आकर बहुत सुखद अनुभव होता है। लगता है हर वस्तु आपके स्वागत में खड़ी हो।” सचमुच ऐसा ही था मेरा घर।

जब कोई भी लड़की विवाह के बाद विदाई के समय अपने घर की देहरी लाँघती है तो अपने साथ घर के संस्कार भी साथ ले जाती है। वैसा ही मेरे साथ हुआ। जब शादी के बाद अपना घर छोड़ा तो हर नये घर में यही प्रयत्न रहा कि जहाँ भी रहूँ, करीने से रहूँ। और यह संस्कार जीवन भर मेरे साथ रहा।

कुछ वर्षों के बाद मेरे माता पिता रिटायर्ड हो गए। धीरे-धीरे शरीर से भी अक्षम होने लगे। जब भी मैं वर्ष में एक बार उनसे मिलने के लिए जाती तो हर बार सब से पहले मेरा ध्यान उनके शयन कक्ष के बदले हुए दृश्य की ओर जाता। धीरे-धीरे उनका कमरा एक और ही रूप ले रहा था। पाँच सात वर्षों के बाद देखा तो उनका कमरा कुछ ऐसा था ---- चारपाइयों के दोनों ओर रखी मेज़ों पर बहुत सारी पुस्तकें–पत्रिकाएँ, बिना खोल के दो-दो चश्मे (एक दूर के लिए, एक पास के लिए), पानी पीने का चाँदी का गिलास तथा ताँबे का पानी भरा लौटा। दोनों का अपना-अपना दवाइयों का प्लास्टिक का डिब्बा। पिता जी की तरफ खिड़की की सिल पर पंचांग, कल्याण के नये पुराने अंक, पत्र लिखने के लिये उनके नाम का पैड, तथा पेन। पास ही ऊनी टोपी, जुराबें हाथ-पाँव पोंछने के लिये छोटा सा तौलिया, चश्मे के खोल, कुछ नये पुराने पोस्ट कार्ड आदि-आदि, न जाने कितनी छोटी मोटी चीज़ें।

माँ की चारपाई के पीछे की खिड़की की सिल पर बिस्तर गर्म करने के लिये रबर की पानी वाली बोतल, छोटा सा ट्राँसिस्टर, कुछ भजनों की कैसटें। पास पड़ी मेज़ पर शरतचन्द्र, वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास, एक छोटा सा बटुआ जिसमें यहाँ-वहाँ देने के लिये कुछ पैसे, हाथ-पाँव मे दर्द के लिये लगाने वाली कोई टयूब, आदि। यानी उनका सारा वैभव, सारा संसार, सारी आवश्यकताएँ सिमट कर उनकी चारपाइयों के इर्द-गिर्द समा गईं।

मैं जब भी मायके जाती तो प्रयत्न करती कि उनकी चीज़ें करीने से लगा दूँ। कभी-कभी मुझे इतना सामान देख कर खीज आती थी तो मैं कह भी देती थी, “इतनी अनावश्यक चीज़ों को चारपाइयों के आस–पास रखने की क्या आवश्यकता है? अलमारी में रख दीजिए, जब आवश्यकता हो तो वहाँ से ले लीजिए। अलमारी कोई दूर थोड़ी है।”

धैर्य की मूर्ति मेरे पिता मन्द-मन्द मुस्कुरा कर कहते, "सुविधा रहती है, किसी को आवाज़ नहीं देनी पड़ती। वैसे भी शारदा जी (मेरी कर्तव्य परायणा प्रिय भाभी) को घर का कितना काम रहता है।”

मैं चुप रहती। सोचती थी अगर इन दोनों को यही ठीक लगता है तो रहने देते हैं। वैसे ही ठीक है। क्या फ़र्क पड़ता था।

समय बीतता गया। अपने सैनिक जीवन में बड़े-विशाल, सरकारी, सुसज्जित भवनों (जिनके साथ अति सुन्दर बाग-बगीचा भी होता था) में ही हमारा अधिकांश जीवन बीता। उन घरों की सफ़ाई तथा देख-रेख के लिये हमारे साथ बहुत से सहायक रहते थे। यानी घर की सुई के लिये भी निश्चित स्थान। सारा घर सजा-सजाया, साफ़ सुथरा। जैसा कभी मेरा पीहर होता था।

अत्यन्त रोमांचक, शौर्य पूर्ण कार्यों से भरा पूरा जीवन जीने के बाद अब मेरे सैनिक अधिकारी पति रिटायर्ड हो गए थे। अब हम अपने बच्चों के साथ अमेरिका में रहने के लिये आ गए। भरा-पूरा परिवार था, बड़ा सा घर भी था। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि मेरे छोटे पोते-पोतियाँ सारा समय हमारे शयन कक्ष में ही बिताते हैं थे। रात को अपना कमरा होते हुए भी चुपचाप स्लीपिंग बैग लेकर वहीं सोने के लिए आ जाते हैं थे। अच्छा लगता था। विदेश में भी यह घर, घर जैसा ही लगता था।

मैं पूरे घर के साथ-साथ अपना शयन कक्ष बहुत ही करीने से रखती। लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा। अब हमारे शयन कक्ष का दृश्य कुछ ऐसा था ----
कक्ष में क्वीन साइज़ बेड के पास नाइट स्टैंड पर एक-एक टेबल लैम्प, दोनों की मेज पर दो-दो चश्मे, (एक पास के लिए और एक दूर देखने के लिए) नीचे के दराज़ों में मेरी तरफ़ एक छोटी डिबिया जिसमें में रात को सोने से पहले अँगूठी आदि रखती थी, वैस्लीन का जार, पीठ दर्द के लिये लगाने वाली दवाई की ट्यूब, फोन का चार्जर, टिशु पेपर का रोल, मेरी पूर्ण-अपूर्ण रचनाओं की डायरियाँ, कुछ नई-पुरानी हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ। लिखने के पैड, पेन-पेंसिलें, पानी की बोतल, आदि-आदि न जाने छोटी-मोटी कितनी चीज़ें। एक छोटी टेबुल पर छोटा सा सी.डी सिस्टम जिसके साथ ही पड़ी रहती हैं, गुलज़ार, फ़रीदा खानुम, आशा भोंसले, मुकेश, जगजीत आदि की प्रसिद्ध सीडीज़ के संग्रह। साथ ही रखा रहता था दिन भर का साथी – मेरा लैप टॉप।

मेरे पति की टेबल पर दो चश्मे, हाथ की घड़ी, टेलीफोन के नम्बरों की डायरी। नीचे की दराज़ के एक खाने में दवाइयों का प्लास्टिक का डिब्बा, चश्मों के खोल, पेन और वालेट, व पानी की बोतल। दूसरे खाने में हाथ-पाँव पोंछने का तौलिया (क्योंकि पेपर टावल रखना उन्हें पर्यावरण के सिद्धान्तों के विरुद्ध लगता है), एट्लस, कुछ नक्शे, कुछ नए-पुराने बिल। पास ही छोटी टेबुल पर उनका लैपटॉप, अमेरिका की पत्रिकाएँ, विश्व के प्रसिद्ध सेनानियों की जीवनियाँ, योग-ध्यान की पुस्तकें आदि, यानी दिनचर्या की न जानें कितनी चीज़ें।

इस देश में हर काम स्वयं ही करना पड़ता है। कोई बाई या सहायक नहीं होते। काम करते-करते जब भी मुझे समय मिलता, मैं हर चीज़ झाड़ पोंछ कर करीने से अपनी-अपनी जगह रख देती थी। लेकिन धीरे-धीरे सब छूटता जा रहा था। बहुत कोशिश के बाद भी कमरा अस्त-व्यस्त ही लगने लगा। लगा कि जैसा है वैसा ही रहने दो, क्या फर्क पड़ता है।

कुछ दिन पहले मेरा बेटा मेरे कमरे में आया। आते ही कमरे को व्यवस्थित करने लगा। और फिर बहुत धीमे स्वर में उसने कहा, “माँ ! इतनी सारी चीज़ें क्यूँ बिस्तर के आस-पास रखी हैं। आपके पास तो अलमारी भी है। उसमें रखा कीजिये।”

मैंने उसकी ओर देखा और फिर उतनी ही धीमी आवाज़ में कहा, “बेटा! किस चीज़ की कब आवश्यकता पढ़ जाए, पता नहीं। और फिर कहाँ ढूँढती रहूँगी। जैसा है, वैसा ही ठीक है।”

मैं जब उससे ऐसा कह रही थी तो अचानक स्मृतियों में कुछ कौंधा। जैसे मैं लौट गई हूँ अपने अतीत में, अपने माता-पिता के घर। सब कुछ एक चलचित्र के समान मेरी आँखों के सामने घूमने लगा। और ऐसा आभास हुआ जैसे रंगमंच के पर्दे के पीछे से सूत्रधार ने पर्दा गिराने से ठीक पहले कहा ---कुछ भी तो नहीं बदला। वही सामान, वही दृश्य, वही संवाद। बदले हैं तो केवल पात्र ------।

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