'दिमाग वालों सावधान': प्रवासी भारतीय की व्यंग्य रचनाएँ

समीक्षक: नीलोत्पल रमेश


दिमाग वालों सावधान  (व्यंग्य संग्रह)

व्यंग्यकार: धर्मपाल महेंद्र जैन
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी- 322201
मूल्य: ₹250, पृष्ठ: 176, वर्ष: 2020
ISBN: 9789389352634


व्यंग्य का जन्म अपने समय की विद्रूपताओं के भीतर से उपजे असंतोष से होता है। व्यंग्य में व्यंग्यकार जीवन की विसंगतियों, खोखलेपन और पाखंड को दुनिया के सामने उजागर करता है। हम भी चाहते हैं कि ये स्थितियाँ बदले लेकिन हम उन्हीं स्थितियों के बीच जीने को विवश होते हैं। वह अपनी रचनाओं में ऐसे पात्रों और स्थितियों का निर्माण करता है जिससे पाठक यथास्थिति से परिचित हो सके। व्यंग्य साहित्य में व्यंग्यकार अपनी बातें सीधे-सीधे न कहकर व्यंजना के माध्यम से कहता है। इसीलिए व्यंग्य में मारक क्षमता अधिक होती है, जो सीधे-सीधे पाठकों तक बात पहुँचा देती है। हिंदी में व्यंग्य साहित्य का प्रारंभ भक्ति काल से ही माना जाता है। कबीर हिंदी साहित्य के प्रथम व्यंग्यकार माने जाते हैं। सबसे पहले इन्होंने ही समाज में व्याप्त बुराइयों पर प्रहार किया था। इन्होंने जाति-प्रथा, हिंदू-मुसलमानों के आडंबर, अमीरी-गरीबी, रूढ़िवादिता आदि पर बहुत ही मारक ढंग से अपनी बातें कही हैं। जैसे - 'जो तू बामन-बमनी जाया, आन बाट काहे नहीं आया।'

धर्मपाल महेंद्र जैन
कबीर के बाद आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सामाजिक विषमताओं के प्रति व्यंग्य-साहित्य को हथियार बनाया। इन्होंने अपने व्यंग्य में गुलाम भारत की विडंबनाओं तथा अंग्रेजों के अत्याचार और शोषण के प्रति आक्रोश व्यक्त किया। भारतेंदु के साथ-साथ बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', प्रताप नारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त ने भी सामाजिक विषमताओं पर तीखे व्यंग्य किए हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षिक आदि क्षेत्रों में विसंगतियाँ बढ़ी हैं, नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आजादी के पूर्व देखे गए स्वप्न तो बीसवीं शताब्दी के छठे-सातवें दशक तक आते-आते खंडित हो गए थे। व्यक्ति निजी स्वार्थ तक सीमित होते गया। निरंतर बढ़ती सामाजिक विषमताओं से विक्षुब्ध होकर करुणा-पूर्ण व्यंग्य लेखन की लंबी परंपरा रही है, जिसके प्रतिनिधि व्यंग्यकार हैं हरिशंकर परसाई। इनकी रचनाओं को 'आजाद भारत का सृजनात्मक इतिहास' कहा जाता है। हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्य में स्वतंत्र भारत के सकारात्मक-नकारात्मक सभी पहलुओं की बखूबी पड़ताल की है। परसाई जी अपने व्यंग्य में सृजन और संहार दोनों कार्य करते हैं। उनका व्यंग्य जब शोषक वर्ग के प्रति होता है तो वह उसके प्रति घृणा और आक्रोश उत्पन्न कर देता है, लेकिन जब वही व्यंग्य अभावग्रस्त व्यक्ति पर होता है तो वह करुणा उत्पन्न कर देता है। हरिशंकर परसाई के बाद हिंदी व्यंग्य साहित्य को जिन व्यंग्यकारों ने समृद्ध किया है उनमें से प्रमुख हैं शरद जोशी श्रीलाल शुक्ल, लतीफ घोंघी आदि।

वर्तमान में हिंदी व्यंग्य साहित्य को परिष्कृत करने का कार्य करने वाले प्रमुख व्यंग्यकार हैं नरेंद्र कोहली, प्रेम जनमेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, शंकर पुणतांबेकर, आलोक पुराणिक, सुशील सिद्धार्थ, सुभाष चंदर, अरुण अर्णव खरे, नवेंदु उन्मेष आदि। इन्हीं व्यंग्यकारों में एक नाम धर्मपाल महेंद्र जैन का भी है, जिन्होंने अपने व्यंग्यों में भारत के समसामयिक परिवेश की बखूबी पड़ताल की है।

'दिमाग वालों सावधान' धर्मपाल महेंद्र जैन का दूसरा व्यंग्य संग्रह है जो हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसके पहले इनका एक व्यंग्य संग्रह 'सर, क्यों दाँत फाड़ रहा है?' प्रकाशित हो चुका है। इनका एक कविता संग्रह 'इस समय तक' भी प्रकाशित है। व्यंग्यकार की पैनी नज़र से भारत की हर एक बुराई उजागर हो गई है। कहीं कुछ छूटने न पाए, इसलिए व्यंग्यकार अपनी रचनाओं में पूरी तरह सतर्क नजर आता है। 'दिमाग वालों सावधान' शीर्षक व्यंग्य से ही अपनी बात प्रारंभ करता हूँ। इस व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने राजनेताओं द्वारा देश की जनता को मूर्ख बनाने की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया है। ये ऐसे जीव हैं जो सिर्फ जनता के दिमाग को चाटते रहते हैं, क्योंकि वे पूरी तरह वाकिफ हैं कि जनता के पास दिमाग नहीं होता है। इसीलिए व्यंग्यकार ने जनता को सचेत करते हुए कहा है कि ओ दिमाग वालों सावधान हो जाओ, सतर्क हो जाओ, नहीं तो ये राजनेता ऐसे ही देश की जनता को मूर्ख बनाते रहेंगे। व्यंग्यकार का व्यंग्य देखिए - 'बिना दिमाग के लोग शुद्ध आदमी होते हैं, वे दूसरों का दिमाग खाते हैं और धीरे-धीरे खाली कर देते हैं। फिर वे नया दिमाग पकड़ते हैं, दीमक जैसे चिपकते हैं और उसको भी खाली कर देते हैं।' राजनेता रूपी चाटक बहुत अनुभवी होते हैं, क्योंकि वे जनता का दिमाग और सरकार का खजाना चाट जाते हैं। व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्य के माध्यम से नेताओं जैसे अनेकों चाटकों पर भी पाठकों का ध्यान दिलाया है ताकि पाठक सचेत रहें। वे चाटक हैं – बोलनेवाले, गानेवाले, लिखनेवाले, व्हाट्सऐपवाले, फेसबुकवाले आदि। व्यंग्यकार ने चाटन को कला और विज्ञान की संज्ञा दी है।

'सबकी हो सबरीमाला' व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने स्पष्ट कहा है कि सबरीमाला मंदिर में सबका प्रवेश हो। यह नहीं कि माहवारी आयु वर्ग की महिलाओं के लिए मंदिर में प्रवेश निषेध हो। इनका मंदिर में प्रवेश रोकना घटिया मानसिकता के लोगों की उपज है। व्यंग्यकार कहता है कि 'हमें तलाशना होगा कि वाकई स्त्री की देह अपवित्र है या गंदगी पुरुष के दिमाग में भरी है। रजस्वला स्त्री की देह गंदी होती तो भगवान ने जो बहुतेरे अवतार लिए हैं वे कथित गंदी जगह से क्यों लिए? रजस्वला को अपवित्र घोषित करने वाले ये पवित्र लोग कहाँ से जन्मे?' पुरुषों ने स्त्रियों को जैसा चाहा वैसा बना दिया। उसे संभोग से समाधि का साधन भी माना और उसकी इच्छा हुई तो देवी भी बना दिया। उसका दिमाग विकृत हुआ तो स्त्री उसके लिए भोग्या बनकर रह गई। इसलिए व्यंग्यकार ने स्पष्ट लिखा है कि 'सबरीमाला में प्रवेश सबके लिए खुला हो, राजनीति के दलदल में आस्था को न घसीटा जाए। सबकी हो अर्चना, ध्यान की माला, सबकी हो सबरीमाला।'

'साहित्य की सही रेसिपी' व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने साहित्यकारों को सचेत करने का कार्य किया है। वह कहता है कि साहित्यकारों को हलवाई से सीखना चाहिए क्योंकि हलवाई को मिठाई बनाते समय चीजों की मात्रा का ज्ञान होता है और वह उसी के अनुरूप अपना कार्य करता है, तब जाकर उसकी मिठाई ग्राहकों को आकर्षित करती है। उसी प्रकार साहित्यकारों को अपनी रचना रचते समय शब्दों, रसों और भावों का सम्यक ज्ञान होना चाहिए नहीं तो वह साहित्य कबाड़ की ही शोभा बढ़ाएगा। इसलिए साहित्यकारों को मास्टर शेफ बनने की आवश्यकता है। व्यंग्यकार का व्यंग्य देखिए - 'साहित्य में देसी या विलायती नशीले पदार्थों का स्थान गुप्त है। ये साहित्येतर रस हैं। ये सम्मेलनों और गोष्ठियों को अखाड़ा बना देते हैं। वैसे ही साहित्य में बहुत अखाड़े हैं, इनके पहलवान गुजर गए हैं पर भौतिक अखाड़े बचे हैं। साहित्य तो प्रेम का संवाहक है, प्रेम की जरा-सी आँच मिले तो हृदय पिघल जाता है। इसलिए मुझे लगता है, साहित्य का स्थाई भाव आइसक्रीम जैसा बनना है। इसलिए आइसक्रीम को हमारे महत्तर साहित्य का अंग होना चाहिए।'

'चुनाव के बसंत में' व्यंग्य के माध्यम से धर्मपाल जी ने राजनेताओं के चुनावी बसंत का चित्रण किया है। चुनाव आम आदमी के लिए बसंत से कम नहीं है। बसंत में प्रकृति का श्रृंगार देखते ही बनता है और चुनाव में राजनेताओं का। व्यंग्यकार ने लिखा है कि 'हे सखि! बिन मौसम का बसंत जैसा लगे तो तय मान लो, यह चुनावी बसंत है, जनतंत्र का बसंत है। यह आम लोगों के लिए खुशियाँ लेकर आता है, किसी के लिए दाम, किसी के लिए जाम, किसी के लिए भत्ता, किसी के लिए सत्ता।' भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसमें कई तरह की विसंगतियां व्याप्त हो गई हैं जिसकी ओर व्यंग्यकार ने ध्यान दिलाया है। वह कहता है 'दो प्रतिशत आबादी के पास दौलत हो तो क्या अठानवे प्रतिशत आबादी के पास वोट हैं, वह चाहे तो अपनी ताकत दिखा सकती है। सखि! राजनेता चाहते हैं, कामधेनु जनतंत्र के लिये जनता गरीब हो और गरीब बनी रहे, अन्यथा हर देश अमेरिका जैसा विकसित हो जाएगा।'

'साहब का दिमाग़' व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने देश के बड़े साहबों पर कटाक्ष किये हैं जो सब कुछ देखते ही भाँप लेते हैं। उन्हें इतनी समझ विकसित हो गई है कि 'वे लोगों को देखते ही पहचान जाते हैं कि कौन मुफ्तखोर है या दुधारू। मुफ्तखोर उनके लिये जयकारा लगवाते हैं और दुधारू उन्हें माल दिलवाते हैं।' साहब बनने के लिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की थी, यानी कान्वेंटी और देसी संस्कृति का हाइब्रिड। व्यंग्यकार कहता है कि 'सच है राजनीति और नौकरशाही में आपसी समझदारी हो तो प्रजा को टोपी पहनाना सरल हो जाता है। साहब के इतने दूरदर्शी दिमाग की प्रशंसा हमेशा होना चाहिए। धन्य है साहब का दिमाग, साहब नहीं होते तो प्रजातंत्र में न कोई राजा होता और न कोई प्रजा होती, दुनिया अजायबघर बन गई होती।' यानी देश का शासन नौकरशाही और राजनेताओं के दिमाग की ही उपज है। इस संकलन में सारा टैक्स जाता कहां है, साहब का दिमाग, हम संप्रदाय से ऊपर उठ गए, ‘स्पीड डेटिंग: नो नमूने प्लीज’, ‘हाईवे इज माय वे’ आदि रचनाएं विदेशी पृष्ठभूमि पर आधारित हैं।

'अब मेरे घर में देवता रहते हैं' व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने भारतीय ग्रामीण संस्कृति को परिभाषित करने की कोशिश की है। संस्कृत में कहा गया है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः यानी जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता रहते हैं। लेकिन व्यंग्यकार को हमेशा महसूस होता है कि मेरे घर में भूत रहते हैं। कारण स्पष्ट है कि वे जहाँ चीजें रखते हैं वहाँ से गायब हो जाती हैं और मिलती कहीं और हैं। हमारे देश में तो जिंदा भूत-प्रेत हैं जो संसदों में विराजमान रहते हैं। जिन्हें देखने के लिए जनता को पाँच सालों तक का इंतजार करना पड़ता है। हमारे समाज में व्याप्त बुराइयों को व्यंग्यकार ने इस प्रकार लिखा है 'भारतीय अनपढ़ हो या सुशिक्षित, भूत-प्रेत भगाने के नींबू-मिर्ची के टोने-टोटके जानता है, पर घर के भूत ढीठ होते हैं, सस्ते में नहीं भागते। मैंने भूत-प्रेत विशेषज्ञ चिकित्सक से मदद ली। वे मान्य पद्धति से करंट लगाते हैं और भूत-प्रेत हों या न हों उनसे मुक्ति दिला देते हैं। कभी सरकारी या गैर-सरकारी भूत पीछे पड़ जाएँ तो वे गुप्त दान करने की सलाह देते हैं।' संस्कृत के श्लोक को थोड़ा  संशोधित करते हुए व्यंग्यकार अपनी पत्नी से कहता है 'अत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते अत्र देवताः।'

'चंद्रयान-3 से भारत' व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने भारत की असली तस्वीर पेश करने की कोशिश की है। चंद्रयान से व्यंग्यकार को बिहार के अस्पतालों में चमकी बुखार से मरते बच्चे दिख रहे हैं, जहाँ पर सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। फिर उसे उत्तर प्रदेश में रेप पीड़िता को कुचलवाने की तस्वीर दिखाई पड़ती है। फिर उसे बच्चे से रेप करके उसका गला काटकर फेंकने की तस्वीर दिखती है और अंत में जो उसे दिखाई पड़ता है वह है धनकुबेरों की हकीकत। व्यंग्यकार ने उसे यों लिखा है - 'देश की निन्यानबे प्रतिशत जनता के पास काला धन नहीं है सर। कुछ राजनेताओं के पास हजारों करोड़ों का काला धन दिख रहा है, सर कुछ बड़े अधिकारियों और उद्योगपतियों के नाम भी लुप-झुप हो रहे हैं।'

'दिमाग वालों सावधान' में 51 व्यंग्य शामिल हैं। धर्मपाल महेंद्र जैन की इन व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से हम भारत के समकालीन परिवेश को जान सकते हैं, समझ सकते हैं और महसूस कर सकते हैं। ये व्यंग्य रचनाएँ हमारे देश में व्याप्त विसंगतियों की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने में पूरी तरह सफल हुई हैं। कनाडा में रहते हुए भी धर्मपाल जी का दिल और दिमाग भारत में ही धड़कता है। यही कारण है इन व्यंग्यों में समकालीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, पारिवारिक आदि स्थितियों का हू-ब-हू चित्रण हुआ है। इसलिए इसे अप्रवासी भारतीय की भारतीय व्यंग्य रचनाएँ संज्ञा दी जा सकती है। पुस्तक की छपाई साफ-सुथरी है और प्रूफ की गलतियाँ नहीं हैं।


समीक्षक का पता
डॉ. नीलोत्पल रमेश
पुराना शिव मंदिर, बुध बाजार
पो. गिद्दी -ए, जिला - हजारीबाग, झारखंड -829108
चलभाष: 09931117537, 08709791120
ईमेल: neelotpalramesh@gmail.com     
लेखक का पता –
धर्मपाल महेंद्र जैन
1512-17 एनडेल ड्राइव, टोरंटो M2N2W7, कनाडा
दूरभाष: + 416 225 2415
ईमेल: dharmtoronto@gmail.com

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