आई. ए. रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत का आलोचनात्मक मूल्यांकन

ऋतु राजपूत

अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
शोधार्थी- दिल्ली विश्वविद्यालय

 नई समीक्षा को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने वाले आलोचकों में ईवर आर्मस्ट्रांग रिचर्ड्स अग्रणी माने जाते हैं। रिचर्ड्स 20वीं शदी के सर्वाधिक प्रभावशाली अंग्रेजी आलोचकों में से एक हैं, उनका वर्तमान यूरोपीय काव्यशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान है। रिचर्ड्स साहित्य से पूर्व मनोविज्ञान एवं अर्थविज्ञान के क्षेत्रों में भी कार्यरत रहे चुके हैं तो उन्होंने मनोविज्ञान एवं अर्थ विज्ञान को भी साहित्य में कार्यान्वित किया है।
रिचर्ड्स का रचनाकाल पूरी आधी शताब्दी तक फैला है रिचर्ड्स का मुख्य रूप से महत्व इस बात में है कि उन्होंने अपने युग की विभिन्न आलोचना पद्धतियों का जो कला के निरपेक्ष संसार पर आस्था रखती थी, युक्ति युक्त खंडन करके आलोचना को एक वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया है 'कला के लिए कला', 'कविता कविता के लिए' तथा सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाओं के प्रचार-प्रसार से ऐसे वातावरण का निर्माण हो रहा था जिसमें कला को जीवन से काटकर देखने की प्रवृत्ति बलवती होती जा रही थी ऐसी परिस्थिति में रिचर्ड्स ने मनोविज्ञान के सहारे काव्य के भाव पक्ष की व्याख्या की तथा काव्य के मनोवैज्ञानिक मूल्य का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
रिचर्ड्स ने दो प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या की है-
* मूल्य सिद्धांत
*संप्रेक्षण सिद्धांत

रिचर्ड्स कला को साधारण मूल्यों का सिद्धांत कहते हैं उनकी धारणा है कि कला अनुभूति अथवा सौंदर्य अनुभूति किसी प्रकार की अलौकिक विशिष्ट एवं कथा पूर्ण नहीं होती और उस पर निरपेक्ष रूप से विचार किया जाना मूर्खता होगी वे लिखते हैं - "काव्य जगत की शेष जगत से किसी भी अर्थ में कोई प्रथक सत्ता नहीं है,न उसके कोई विशेष नियम है और न कोई अलौकिक विशेषताएं। उसका निर्माण भी बिल्कुल इसी प्रकार के अनुभवों से हुआ है जैसे अनुभव हमें अन्य क्षेत्रों में हुआ करते हैं"(प्रिंसिपल ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म) अनुवादक-महेन्द्र चतुर्वेदी, पाश्चात्य काव्यशास्त्र की परंपरा।
वस्तुतः है वह कला के मूल्यवादी समीक्षक है एवं 'कला कला के लिए' सिद्धांत के विरोधी है। इसी संदर्भ में वह लिखते- हैं कि यदि "कला मानव- सुख की अभिवृद्धि में भी हो,पीड़ितों के उद्धार या हमारी पारस्परिक सहानुभूति के विस्तार में सलंग्न हो अथवा हमारे अपने विषय में या हमारे और वस्तु जगत के परस्पर संबंध के विषय में ऐसे नूतन या पुरातन सत्य का आख्यान करें जिससे उक्त भूमि पर हमारी स्थिति और सुदृढ़ हो तो वह भी महान कला होगी" (वही)
हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल रिचर्ड्स के सिद्धांतों के समर्थक एवं प्रशंसक हैं वस्तुतः दोनों में काफी दूर तक समानता भी है।
डॉ बच्चन सिंह ने लिखा है " रिचर्ड्स और शुक्ल जी दोनों ही काव्य को नैतिकता से संबद्ध करके देखते हैं दोनों के विचार से वह मन को विशदीभूत और परिष्कृत करता है किंतु शुक्ल जी की तरह वह कविता को आचार से संबंध नहीं करता और न कविता को पुलिस की क्रूरता दूर करने की दवा मानता है।... फिर भी मानवीय संवेदना के विस्तार में वह उनका महत्व मानता है"(आलोचक और आलोचना,डॉ बच्चन सिंह)
रिचर्ड्स की आलोचना का व्यावहारिक पक्ष अधिक सुदृढ़ और पुष्ट है।इसके साथ ही सिद्धांत पक्ष में उनकी कुछ मान्यताओं ने काव्य और कवि को गिराया है।उनके अनुसार काव्य सत्य का सत्यापन नहीं कर सकता,विज्ञान कर सकती है। जहां अरस्तू ने काव्य सत्य को अत्यंत महत्ता प्रदान की वहीं पर रिचर्ड्स कविता को सत्य एवं ज्ञान के क्षेत्र से काटकर देखते हैं। ज्ञान के मामले में काव्य को वह विज्ञान के बाद द्वितीय स्थान पर भी नहीं रखते। उनका मानना है कि कविता ज्ञान के क्षेत्र की वस्तु ही नहीं है, क्योंकि उसका प्रयोग मात्र रागात्मक और भावात्मक ही होता है।
रिचर्ड्स ने आधुनिक जीवन में कविता की संदर्भता पर प्रकाश डाला और संपूर्ण और स्वस्थ मानव जीवन में काव्य के महत्व और मूल्य पर भी विचार किया है। मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में कविता की सार्थकता और महत्ता पर इनके मौलिक विचार है। उनका मत था कि आज के युग में जब प्राचीन परंपराएं और जीवन मूल्य विघटित हो रहे हैं तब कविता का मूल्य उसके मन को प्रभावित करने की क्षमता पर निर्भर करता है।
"रिचर्ड्स के विचार से मन में संवेगों का उतार-चढ़ाव होता रहता है, जिससे उसमें तनाव या विषमता उत्पन्न होती रहती है। काव्य और कला इन संवेगों में संगति और संतुलन स्थापित करती है। वे संवेगों को स्थापित करती है तथा स्नायु व्यवस्था को सुख पहुंचाती है। सौंदर्य मूल्यवान इसलिए है क्योंकि वह विरोधी समूहों से उत्पन्न विषमता में व्यवस्था और संतुलन स्थापित करता है।"(पाश्चात्य काव्यशास्त्र:अधुनातन संदर्भ, सत्यदेव मिश्र) यह संतुलन और सामंजन भी रिचर्ड्स के अनुसार दो रूपों में घटित होता है अपवर्जन के द्वारा और समावेशन के द्वारा।
रिचर्ड्स ने अपने मूल्य सिद्धांत में जिस मनोविज्ञान का उपयोग किया है वह मनोविज्ञान की दो सर्वथा भिन्न शाखाओं का मिश्रण है वे शाखाएं हैं - व्यवहारवादी मनोविज्ञान तथा मनोविश्लेषणवादी।
रिचर्ड्स के अनुसार सामरस्य और संतुलन ही मूल्य है। इस मूल्य को वे आनंद और शिक्षा के ऊपर रखते हैं।यह अनुभव मूल्यवान हैं और अन्य अलौकिक अनुभव से भिन्न है। आलोचक चूंकि इस अनुभव का विश्लेषण करता है, इसलिए रिचर्ड्स ने इसे मूल्यों के न्यायाधीश का दर्जा दिया है।
आनंद का निषेध करने के बावजूद आलोचकों की दृष्टि में रिचर्ड्स का मूल्य सिद्धांत 'बेंथम' और 'मिल' के सुख-कामना सिद्धांत पर आधारित है। अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक संतुष्ट करने की अपेक्षा करना कहीं न कहीं पाठकों के लिए सुख की कामना करना ही है। किंतु रिचर्ड्स उनकी तरह सुखवादी नहीं हैं। वृतियों के जिस सामरस्यऔर संतुलन को रिचर्ड्स मूल्य मानते है उसमें आनंद की कोई भूमिका नहीं है।इस अनुभव को समझाने के लिए रिचर्ड्स ने कही आनंद की अनुभूति का उल्लेख नहीं किया है।वह काव्यानुभूति को आनंदानुभूति नहीं मानते।देवेंद्रनाथ शर्मा इसी संदर्भ में लिखते हैं "काव्यानुभूति की व्यख्या के क्रम में रिचर्ड्स पहले मानव मन की क्रिया एवं प्रक्रिया की व्याख्या करते हैं।"(पाश्चत्य काव्यशास्त्र, देवेन्द्रनाथ शर्मा)
"The mind is a system of impulses"(principle of literary criticism)
रिचर्ड्स के विचार से हमारी मूल्यांकन संबंधी धारणाओं का संबंध हमारे मानसिक अवधारणाओं से हैं जो वस्तु हमारे मानसिक अवधारणाओं को संतुष्ट करती है उसी को सामान्यतः हम मूल्यवान समझने लगते हैं।
अतः वह नियम जो समाज के अधिकांश व्यक्तियों को बिना किसी पारस्परिक विरोध के उनकी प्रमुख परिणामों को तुष्ट करने का विधान करता है वही सबसे अच्छा नियम है उसी को हम नैतिक नियम भी कहते हैं। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वह सीधे नैतिकता के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं।
अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जिस नींव पर रिचर्ड्स अपने मूल्य सिद्धांत की इमारत खड़ी करते हैं वह बहुत कच्ची और कमजोर है एक तो मनोविज्ञान से विज्ञान का तकाजा पूरा नहीं होता क्योंकि वह सच्चे अर्थ में विज्ञान नहीं है। दूसरी चीज यह कि अभी वह निर्माण अवस्था में है। रोज-रोज नई मान्यताएं सामने आ रही है जो पुरानी मान्यताओं को झुठला देती है, और बहुत बार नकार भी देती है। इसलिए उनकी प्रमाणिकता और उपयोगिता संदिग्ध बन जाती है। ऐसी स्थिति में मनोविज्ञान की एकांगी एवं तत्कालिक मान्यताओं पर किसी स्थाई परिनिष्ठित आलोचना सिद्धांत का निर्माण दुष्कर है।
 रिचर्ड्स के इस मूल्य सिद्धांत का विरोध उनके समकालीन टी.एस इलियट ने भी किया।अपनी पुस्तक 'द यूज़ ऑफ पोएट्री' एंड 'द यूज़ ऑफ क्रिटिसिजम' की भूमिका तथा 'मॉडर्न माइंड' में अपना विरोध प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि "मैं इस प्रकार के किसी सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकता जो शुद्ध व्यक्तिक मनोविज्ञान की नींव पर टिका हो। उसके काव्यात्मक अनुभव का मनोविज्ञान जिस प्रकार खुद उसी के कार्यानुभव पर आधारित है,उसी प्रकार उसका मूल्य सिद्धांत उसके मनोविज्ञान पर।"
रिचर्ड्स ने स्वयं स्वीकार किया है कि अंतवृत्तियों का सामरस्य सौंदर्य शास्त्रीय अनुभव का परिणाम है किंतु इसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अंतवृतियों के संबंध में हम मनोविज्ञान के अपेक्षित विकास के अभाव में निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कह सकते।
"मनोवेगों के संतुलन के बारे में रिचर्ड्स ने यह भी स्वीकार किया है कि इसकी सूक्ष्म दृष्टि एवं जटिल क्रिया के सभी पक्षों को पूरी तरह समझ पाना सम्भव नहीं है।"( पाश्चात्य काव्यशास्त्र का इतिहास,तारकनाथ बाली)
 इस प्रकार रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के पश्चात स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उनके मूल्य सिद्धांत को स्वीकार करने पर कविता का संरचनात्मक विश्लेषण सर्वदा अनुपयोगी हो जाता है क्योंकि मूल्य सिद्धांत में पाठक पर कविता का पड़ने वाला प्रभाव ही सब कुछ है। कविता की वस्तु योजना, शब्द योजना, शब्द प्रयोग, शब्द अर्थ का व्यंजक, सहसंबंध, छंद, लय, तुक आदि का कोई महत्व ही नहीं रह जाता क्योंकि रिचर्ड्स के मत से कविता अनुभूति है, अतः अनुभूति के अतिरिक्त किसी वस्तु की चर्चा अप्रासंगिक और प्रसांगिक निरर्थक है।
यही कारण है कि परवर्ती आलोचना में रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत को विशेष मान्यता और अहमियत नहीं दी गई।

*संदर्भ ग्रंथ सूची-
1.प्रिंसिपल ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म) अनुवादक-महेन्द्र चतुर्वेदी, पाश्चात्य काव्यशास्त्र की परंपरा।
2.आलोचक और आलोचना,डॉ बच्चन सिंह)
3.पाश्चात्य काव्यशास्त्र:अधुनातन संदर्भ, सत्यदेव मिश्र
4.पाश्चत्य काव्यशास्त्र, देवेन्द्रनाथ शर्मा
5.पाश्चात्य काव्यशास्त्र का इतिहास तारकनाथ बाली
6.principles of literary criticism,I.A Richards.page no.23

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