पढ़ने के लगाव ने लेखन में भी रुचि पैदा की: अनीता कपूर

साक्षात्कर्ता: दीपक पाण्डेय

अनीता कपूर कैलीफोर्निया, अमेरिका में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की समृद्धि के प्रयत्न में निरंतर कार्य कर रही हैं। अनीता जे बहुमुखी प्रतिभा की रचनाकार हैं और कवयित्री, अनुवादक, कहानीकार, निबंधकार, भेंटवार्ताकार के रूप पहचान रखती हैं। आप ‘विश्व हिंदी ज्योति’ संस्था की संस्थापिका एवं जन-संपर्क निदेशक हैं। इस संस्था द्वारा आप भारतीय संस्कृति के प्रसार-प्रसार में लगी हुई हैं। कविता के संबंध में उनकी स्वीकारोक्ति है – “कविता मेरे अंदर खुलने वाली खिड़की रही, जिसके आर-पार झाँककर मैंने भीतर-बाहर की दुनिया को देखा, परखा, समझा और कागजों पर शब्दों के द्वारा खुद को जोड़ा... और फिर चल पडी एक नई सुबह की तरफ।” अनीता जी की कविताओं में स्त्रीमन की कोमल संवेदनाएँ, अंत:स्थल का चिंतन, अंतर्द्वंद्व, संबंधों के प्रति गंभीर अनुभूतियाँ, जीवन संघर्ष, प्रवास की पीड़ा और वेदना, प्रकृति के सौंदर्य चित्रण का अद्भुत संयोजन है। आप ‘विश्व हिंदी ज्योति’ संस्था की संस्थापिका एवं जन-संपर्क निदेशक के रूप से जुडी हैं।


दीपक पाण्डेय

1.  अनीता जी आप अमेरिका में रहते हुए हिंदी लेखन के माध्यम से हिंदी-साहित्य को समृद्ध कर रही हैं। कृपया बताइए आपके जीवन में हिंदी का क्या महत्त्व है?

अनीता कपूर: वैश्विक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में आज हिंदी भाषा की जब चर्चा होती है, तो पाते हैं कि, भारत में हिंदी की ऐतिहासिक परंपरा, जो हमारे समाज और संस्कृति का प्रतिबिंब है, उसे विश्व के स्तर पर महत्त्व और अब व्यापक स्वीकृति भी मिल रही है। उदाहरण के तौर पर कुछ समय पहले अचानक रास्ते में बे-ट्रांसिट (अमेरिका) की बस पर मेक्डोनाल्ड का विज्ञापन हिंदी में लिखा हुआ पाया, पहले तो एकदम से ही आँखों पर जैसे यकीन ही नहीं हुआ, पर दूसरे ही क्षण मन जैसे गर्व से भर उठा, हिंदी में विश्वभाषा होने की और बहुत संभावना और सामर्थ्य है पर उससे पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा कहकर भी राष्ट्र में पूरी जगह दिलवानी होगी। भारतीयों के विदेशों में जाकर बस जाने से हिंदी भी साथ-साथ चली आई और इस तरह इसे विश्वभाषा कहा गया पर अभी बहुत काम होना बाकी है। मैं बहुत सकारात्मक सोच की हूँ। जो भाषा चीन की भाषा मैंडरिन को भी पीछे छोड़ रही है वो पूर्णरूप से विश्वभाषा बन सके इसके लिए अपनी भाषा को और साहित्य को ही नहीं, हिंदी मानसिकता को भी और समृद्ध करना होगा।

 

2.  भारत से अमेरिका आने की क्या कहानी है और आप यहाँ किन-किन क्षेत्रों में व्यस्त हैं?

अनीता कपूर: अमेरिका प्रवास के बारे में इसे एक संयोग ही कहूँगी। जो भाग्य में लिखा होता है वो न चाहते हुए भी हो जाता है। बस कुछ ऐसे ही मेरे साथ भी हुआ। मेरी बहन यहाँ रहती थी तो प्रथम बार जब उनसे मिलने आई तो कभी नहीं सोचा था की कभी यहाँ मुझे भी रहना पड़ेगा। पर कुछ ऐसा हुआ की बार-बार आते-जाते आखिरकार यहीं रहना ही भगवान को मंजूर हुआ। और मैंने अपना एक छोटा सा भारत यहीं बना लिया। हाँ शुरू-शुरू में यहाँ कम भारतीय दिखते थे तो अपने देश की बहुत याद आती थी। पर अब तो जैसे की मैंने कहा, हमने अपना एक छोटा भारत यहाँ बना लिया है तो कोई कमी महसूस नहीं होती। उसका कारण एक यह भी है अब भारत यात्रा बहुत आसान है जब मन चाहे तो बस देर नहीं लगती और भारत की यात्रा शुरू। मन में भारत हमेशा है और रहेगा।

      आज हिंदी विश्व में तीसरे स्थान पर तो है फिर भी यहाँ लोग ज्यादा अँग्रेजी बोलते है। तो कहीं हम हिंदी से दूर न हो जाएँ इसी सोच के चलते ग्लोबल हिंदी ज्योति” संस्था बनाई और लोगो को जोड़ा। हिंदी के हवनकुंड में, हिंदी प्रेमियों को जोड़ कर, थोड़ी आहुति देने की कोशिश है। जो अब परवान चढ़ रही है। इसके लिए हमारी संस्था कवि-सम्मेलनों का आयोजन, कम्यूनिटी, मंदिर तथा स्कूलों में हिंदी पढ़ाना और हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु बच्चों में निबंध और कविता प्रतियोगिता करवाती है। कुछ एनजीओ के साथ जुड़कर जरूरतमन्द महिलाओं की हर संभव मदद करती है। तथा भारतीय कम्युनिटी सेंटर में समय-समय पर सेवाएँ, हिन्दू मंदिरों और सांस्कृतिक केन्द्रों में योगदान तथा मैं यहाँ बे-एरिया इमिग्रेशन एवं लीगल सर्विसेसके लिए अनुवादिका का कार्य भी करती हूँ।

3.  आपने हिंदी, अंग्रेजी में उच्च शिक्षा हासिल की है, कृपया अपनी शिक्षा-दीक्षा से जुडी परिस्थियों की जानकारी दीजिए, साथ ही यह भी बताइए कि हिंदी-लेखन में आपकी रुचि कैसे बनी और इस आपके प्रेरणा स्रोत कौन रहे?

अनीता कपूर: शिक्षा और लेखन में रुचि तो शुरू से ही रही पारिवारिक परिस्थिति तथा पृष्ठभूमि की बात करें तो मैं ऐसे परिवार से आती हूँ, जहाँ माता-पिता को दोनों को पढ़ने का बेहद शौक था। घर में किताबों को बचपन से देखा और मुझे भी पहले तो पढ़ने का शौक हुआ और लेखन भी शुरू हो गया। मेरी भावनाओं ने कब रचना-प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की कूँची पकड़ शब्द रूपी रंगों में डुबोकर लिखना शुरू किया, पता ही नहीं चला! माँ कहती है कि, जब बहुत छोटी ही थी, तब पहली छोटी-सी कविता गुड़ियालिखी थी। फिर ज्यों-ज्यों बड़ी होने लगी और समझ आने लगी तो देखा की हमेशा खुद को किताबों में घिरा पाती। पढ़ने के लगाव ने धीरे-धीरे लेखन में भी रूचि पैदा कर दी थी। स्कूल-कॉलेज की पत्रिकाओं में रचना भी छपती रही। फिर धीरे-धीरे पत्र-पत्रिकाओं में तथा समाचारपत्रों में भी मेरी लिखी रचनाएँ, खास कर कविताएँ प्रकाशित होने लगी। इससे हिम्मत और बढ़ी तथा लिखने से प्यार और जुड़ाव और बढ़ता गया। लेखन एक नैसर्गिक प्रतिभा है। लिखने के बीज इंसान के अन्दर होते हैं, परिवेश, हालात-परिस्थितियाँ और अनुभव जब उन्हें खाद पानी देते हैं तो वे फूट पड़ते हैंमेरे साथ भी ऐसा ही हुआ।


4.  जैसा आप जानती हैं कि भारतीय अपनी लगन और परिश्रम के कारण विश्व-बाजार में अपनी विशेष उपस्थिति बनाए हुए हैं। क्या सुनहरे भविष्य की आस में प्रवास को अपनाने वालों को किन्हीं परेशानियों को सहन पड़ता है?

अनीता कपूर: यह प्रश्न पूछ कर तो आपने एक पुरानी दुखती नस पर जैसे हाथ रख दिया हो। भाषा की समस्या नहीं थी, हिंदी और अँग्रेजी दोनों में पकड़ थी पर दिल पकड़ में नहीं रहता था। जैसा की आप भी सहमत होंगे कि अपने-अपने हिस्से का संघर्ष तो हम सभी को करना होता है चाहे देसी धरती हो या विदेशी। पर आजकल तो बहुत कुछ बदल गया है और और उतना कठिन नहीं रहा जितना कई वर्षों पहले जब हम लोग आए थे। नई जगह, नए लोग, नया समाज, नई हवा जन्मभूमि की खुशबू से वंचित, सभ्यता, संस्कृति और वहाँ की यादें परछाईं सी पीछा करती रहती थी पर एक विश्वास था कि यहाँ भी एक छोटा भारत बना ही लेंगे, जिसके चलते वतन से अपने हिस्से कीजो जमीन मैं अपने साथ ले आई थी उस पर कुछ-कुछ विदेशी बीज भी बो दिये है और एक नई फसल तैयार करने में जुट गयी थी। बावजूद इसके निरंतर यही एहसास होता रहता थे की कोई वतन वापसी की पुकार लगा रहा है। पैर तो एक जगह थे पर मन दो हिस्सों में बंटा रहता था। वक्त ने फिर पीठ थपथपाई और आज सब ठीक है।

5.  आप लंबे समय से अमेरिका में रह रही हैं, जब आप पहली बार अमेरिका आईं थीं तब और आज वर्तमान में हिंदी की स्थिति में क्या परिवर्तन पाती हैं?

अनीता कपूर: वर्तमान में हिंदी की स्थिति पहले से बेहतर है जिसका मूल रूप से श्रेय अमरीका की तमाम हिंदी-समितियों को जाता है। सामाजिक संस्थाओं और स्कूलों को भी जाता है, जो हिंदी के प्रचार-प्रसार में जी जान से जुटी हैं। जिसमें एक मेरी संस्था “ग्लोबल हिंदी ज्योति” का भी योगदान है। विदेशी विश्वविद्यालयों ने हिंदी को एक महत्त्वपूर्ण विषय के रूप में अपनाया है। जहाँ हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थियों में सिर्फ भारतीय मूल के ही नहीं, वरन् स्थानीय मूल के और अन्य देशों के विद्यार्थी भी हैं। अभिभावकों से निवेदन किया जाता है कि घर में वो बच्चों से अधिकतर हिंदी में ही वार्तालाप करें, जिससे उन्हें हिंदी में बोलने में मदद मिलेगी। बच्चों में हिंदी के प्रति रूचि पैदा करने के लिए हिंदी फिल्मों और गीतों का भी उपयोग किया जाता है जैसे गायन और नृत्य प्रतियोगिता। बहुत से अहिंदी भाषी परिवारों के बच्चे भी हिंदी क्लासों में प्रवेश लेने लगे हैं।

सोशल मीडिया ने तो हिंदी को विश्व के कोने-कोने तक फैलाया है। सोशल मीडिया की ही देन है कि पूरे विश्व के हिंदी प्रेमी, पाठक और साहित्यकार आपस में जुड़ पाए हैं। प्रवासी साहित्यकारों को तो इससे बहुत लाभ हुआ है। उनके लेखन की पहुँच और पहचान दूर-दूर तक हो पाई है। इतना सब होने पर भी यह बात आज कचोटती है की अंग्रेज़ी पाठकों के आँकड़े देखें तो लगता है कि हिंदी के पाठक कम हो गए हैं। विश्व की अन्य भाषाओं के प्रति यहाँ के लोगों की जो प्रतिबद्धता है, वह हिंदी वालों की अपनी भाषा के प्रति नहीं है। इस यज्ञ में लगातार हमें आहुति देते रहते की अभी और आवश्यकता है।

6.  अनीता जी आपके बारे में मालूम चला कि आप समाजसेविका के रूप में भी सक्रिय हैं, आपकी यह सक्रियता आपकी साहित्यिक रचनात्मकता में कैसे सहायक है?

अनीता कपूर: जी हाँ हम जैसे संवेदनशील लेखक समाजसेवा से कैसे मुँह मोड़ सकते हैं। भारत में भी बहुत से संस्थाओं से जुड़ी रही। लाइंस क्लब की अध्यक्ष होने के नाते मजदूर/ गरीब और बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत कार्य किए। पुलिस में महिला कोर्ट में पीड़ित महिलाओं के लिए कार्य किया। और आज भी अमेरिका में रहते हुए भी भारत में कुछ वृद्धाश्रम में आर्थिक सहायता करती हूँ। यहाँ अमेरिका में मेरी अपनी जिसके चलते यहाँ भी कम्यूनिटी कार्य से जुड़ी हूँ। यहाँ पर अनुवादिका के तौर पर भी अपनी सेवाएँ देती रही हूँ। फिर चाहे वो कोर्ट कचहरी हो, इमिग्रेशन हो या मेडिकल से जुड़ी कोई जरूरत हो। कहते हैं की कहानियाँ और अभिव्यक्ति और अनुभूति हमारे आस पास ही बिखरी होती हैं। बस मेरी यही सामाजिक सक्रियता मेरे लेखन में मुझे नए किरदारों से भी मिलवाती रहती हैं। पश्चिमी जीवन मूल्यों और भारतीय जीवन मूल्यों के बीच जीवन दर्शन का यह मूलभूत अन्तर हिंदी साहित्य में लेखन के द्वार खोलता रहता है। ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ की सदैव अपनी कृपा बनाए रहे ताकि मैं समाज के कुछ काम आ सकूँ।

7.  आप साहित्य की विविध विधाओं में सृजन कर रही हैं, आपकी पसंदीदा विधा कौन सी है और क्यों?

अनीता कपूर: आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न पूछा लेखन विधा के बारे में। साहित्य समाज का दर्पण है। मैं सिर्फ लिखती हूँ। मुझे स्वच्छंद लेखन रास आता है। मीटर में बंध कर लिखने से मैं अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी खोने लगती हूँ। लेखन विचारों, विषय और मूड पर निर्भर करता है। ऐसे में विचार विधाएँ स्वयं ही ढूँढ लेते हैं।


8.  आपके साँसों के हस्ताक्षर, बिखरे मोती, कादम्बरी, अछूते स्वर, आदि अनेक काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। आपके विचार में कविता क्या है और उसकी रचना प्रक्रिया कैसे प्रस्फुटित होती है?

अनीता कपूर: हम सब को समाज का अंग बन कर रहने के लिए कई तरह की नैतिक और कर्त्तव्यपूर्ण ज़िम्मेदारियों को पूरा करना पढ़ता है, परिस्थितियाँ भिन्न होने के बावजूद भी, भीतरी या बाह्य, दबाव तो सभी झेलते हैं। जिसके चलते अधिक संवेदनशील व्यक्ति की भावनाएँ किसी भी माध्यम द्वारा बहाव का रास्ता खोज लेती हैं। पाठ्यपुस्तक की कविताएँ हमसे सबसे पहले रूबरू होती हैं। वहीं से रूचि-सुरुचि की भूमिका जाने-अनजाने बनती है। मेरी भावनाओं ने कब रचना-प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की कूँची पकड़ शब्द रूपी रंगों में डुबोकर लिखना शुरू किया, पता ही नहीं चला ! माँ कहती है कि, जब बहुत छोटी ही थी, तब पहली छोटी-सी कविता गुड़ियालिखी थी। फिर ज्यों-ज्यों बड़ी होने लगी और समझ आने लगी तो देखा की हमेशा खुद को किताबों में घिरा पाती। पढ़ने के लगाव ने धीरे-धीरे लेखन में भी रूचि पैदा कर दी थी। स्कूल-कॉलेज की पत्रिकाओं में रचना भी छपती रही फिर धीरे-धीरे पत्र-पत्रिकाओं में तथा समाचारपत्रों में भी मेरी लिखी रचनाएँ, खास कर कविताएँ प्रकाशित होने लगी। इससे हिम्मत और बढ़ी तथा लिखने से प्यार और जुड़ाव और बढ़ता गया। संवेदनशील मन की छटपटाहट, जिंदगी का कभी मुस्कराना और कभी रूठना, जीवन की लकीरें-कभी पूर्णविराम, कभी अर्धविराम, कभी प्रश्नवाचक-सभी को कलम की नोंक से भावनाओं की स्याही में डुबोकर लेखन करती रही। कभी बेबसी का बगावत करना और आँधी का अंधी गलियों से गुज़रना रफ्ता-रफ्ता साहित्य के मैदान में ले आया। दबाव की पीड़ा मेरी रचनाओं में आत्मसात होकर अनेक रूपों और रसों में बिखरी हुई है। पर किसी भी रस की अभिव्यक्ति में मैंने अपने अंदर की नारी के आत्मसम्मान और स्वाभिमान का साथ नहीं छोड़ा। दबाव कैनवास बनते गए और दर्द रंग बन शब्दों की कूँची से अभिव्यक्त होते रहे हैं। सिलसिला आज तक जारी है।

 

9.  आपके द्वारा प्रेषित हाइकु-संग्रह “दर्पण के सवाल” और “आधी आबादी का आकाश” मिले, आपका आभार। हाइकु के बारे में कुछ बताइए और आपने 62 कवयित्रियों की कवितायें संकलित की हैं क्या हाइकु लेखन की ओर लोगों के रुचि से आप संतुष्ट हैं?

अनीता कपूर: इस साक्षात्कार से बस कुछ दिन पहले ही एक और हाइकु- संग्रह “बोंजाई” भी प्रकाशित हो चुका है जिसमें 20 हाइकुकारों के हाइकु संग्रहीत हैं, इससे यह तो तय हुआ की हाइकु लेखन में लोगों की रुचि तो बढ़ रही हैं पर अभी कुछ नवोदित लेखकों को इस विधा पर और बहुत काम करने और समझने की जरूरत है। हाइकु साधना की कविता है। सिर्फ 17 अक्षर और 3 पंक्तियाँ नहीं है। एक नन्हे हाइकु में पूरा काव्य समा सकता है। इसीलिए मैं हमेशा हाइकु को 17 पत्तों वाला बॉनसाई (छोटा वृक्ष) की संज्ञा देती हूँ, जिसके छोटे से फल में खूब मिठास तो चाहिए साथ ही गूदे की कमी भी नहीं रहनी चाहिए।

 

10. मैंने पढ़ा है कि अमेरिका के हिंदी-लेखन के क्षेत्र में महिला रचनाकारों का वर्चस्व है, इस विषय पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

अनीता कपूर: अमेरिका में हिंदी लेखन तो पहले भी होता रहा था पर गिनी चुनी लेखिकाएँ, सीमित साधन और पत्रिकाओं का पाठकों तक सहजता से न पहुँचना शायद इस का एक कारण रहा हो। गत कुछ वर्षों में नौकरी और व्यवसाय के चलते जैसे-जैसे भारतीय मूल के लोग यहाँ ज्यादा आने लगे वैसे-वैसे अंतरजाल, सोशल मीडिया द्वारा अमरीका में बसी महिला साहित्यकारों का लेखन ज्यादा सामने आने लगा। लेखन के विषय भी इसी समाज से मिलने लगे जैसे चुनौतियाँ, विदेशी समाज के सरोकार प्रवासी भारतीयों की मानसिकता को उकेरने वाला, दो संस्कृतियों के टकराव में टूटते जीवन मूल्यों, रिश्तों की बारीकी को चुनता, प्रवास के अकेलेपन से लेखन और निकलने लगा तो लेखन ने वर्चस्वता ओढ़ ली आज लेखन जो बन बैठा है एक पुल, दो संस्कृतियों को जोड़ने वाला। देश से बाहर रहने से अपना माटी प्रेम और हिंदी के लिए कुछ करने की चाह सब कुछ करवा देती है। रूह का एक कोना अपनी धरती के खूँटे से जो बंधा रहता है। 

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परिचय: अनिता कपूर
जन्म: भारत के हरियाणा राज्य के रिवाड़ी शहर में
शिक्षा: एम.ए., (हिंदी एवं अँग्रेजी), पी-एच.डी (अँग्रेजी), सितार एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा। 
कार्यरत: अमेरिका से प्रकाशित हिंदी समाचारपत्र “यादें” की प्रमुख संपादिका

प्रकाशन: बिखरे मोती, कादम्बरी, अछूते स्वर, ओस में भीगते सपने, साँसों के हस्ताक्षर (काव्य-संग्रह) और दर्पण के सवाल (हाइकु-संग्रह) अनेक भारतीय एवं अमरीका की पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, कविता, कॉलम, साक्षात्कार एवं लेख प्रकाशित। प्रवासी भारतीयों के दुःख-दर्द और अहसासों पर एक पुस्तक शीघ्र प्रकाशीय।

गतिविधियाँ:
• संस्कार पत्रिका की अमरीका से विशेष प्रतिनिधि 
• अमरीका में हिंदी संस्था "विश्व-हिंदी-ज्योति", की संस्थापक एवं 
• जन-संपर्क निदेशक, मीडिया डायरेक्टर (उ प माँ), उत्तर प्रदेश मंडल ऑफ़ अमरीका
• AIPC (अखिल भारतीय कवयित्री संघ) की प्रमुख सदस्या
• भारत में लेखिका संघ की आजीवन सदस्या
• वोमेन प्रेस क्लब दिल्ली की आजीवन सदस्या
• अमरीका में भारतीय मूल्यों के संवर्धन एवं संरक्षण हेतु प्रयत्नशील
• नारिका (NGO) तथा भारतीय कम्युनिटी सेंटर में समय-समय पर सेवाएँ 
• फ्रेमोंट हिन्दू मंदिरों और सांस्कृतिक केन्द्रों में योगदान हेतु अनेक बार पुरस्कृत 
• हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी-अध्यापन और सम्मेलनों का आयोजन
• अमरीका में हिंदी भाषा एवं साहित्य की गरिमा को बढ़ाने हेतु संकल्पबद्ध 
• कवि-सम्मेलनों में कविता पाठ
• अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और भारत के अदिसंख्य पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब-पत्रिकाओं के लिए विविध विधाओं पर लेखन
• अनेक विश्वविद्यालयों में पत्र-वाचन 
• ज्योतिष-शास्त्र में विशेष रुचि।

पुरस्कार एवं सम्मान:
जोधपुर में “कथा-साहित्य एवं संस्कृति संस्थान” द्वारा “सूर्य नगर शिखर सम्मान” (वर्ष 2012), 
• “कायाकल्प साहित्य-कला फ़ाउंडेशन” सम्मान (वर्ष 2012), 
• “कवयित्री सम्मेलन”, आगरा द्वारा विशिष्ट सम्मान (वर्ष 2012), 
• महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी और कथा यूके द्वारा प्रवासी हिंदी सेवी सम्मान (2012), 
• दसवाँ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी उत्सव, नयी दिल्ली, प्रदत्त "अक्षरम प्रवासी साहित्य सम्मान", (2012) 
• अखिल भारतीय कवयित्री सम्मलेन प्रदत्, "प्रवासी कवयित्री सम्मान" (2012), 
• हिंदी विभाग, हुबली विश्वविद्यालय, हुबली प्रदत्, “साहित्य भूषण सम्मान”, (वर्ष 2012), 
• महात्मा फुले प्रतिभा संशोधन अकादमी, नागपुर एवं अग्रवाल कॉलेज, कल्याण, ठाणे द्वारा “अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता अवार्ड” से सम्मानित (2012), 
• “पॉलीवूड स्टार मीडिया अवार्ड, (वर्ष 2011)
• अमरीका में फ्रेमोंट कम्यूनिटी सेंटर प्रदत्त समाज सेवा सम्मान (वर्ष 2010 एवं 2009), 
• फिल्म एंड सिटी सेंटर, नोयडा प्रदत्त "ग्लोबल फैशन अवार्ड", (2006) 
• अमरीका एवं दिल्ली, द्वारा महिलाओं के उत्कर्ष के लिए किए गए विशिष्ट योगदान फलस्वरूप, बहाई इंटरनेशनल कम्युनिटी पुरस्कार (वर्ष 2005), 
• उत्कृष्ट सामजिक कार्यों के लिए लायंस क्लब प्रदत्त सम्मान, 
• हिंदी विद्यापीठ मथुरा, की परीक्षा 'साहित्य भास्कर' के पाठ्यक्रम में रचनाएँ शामिल 

संपर्क: कैलिफोर्निया, अमेरिका
ईमेल: anitakapoor.us@gmail.com
फोन: +1-510-894-9570
***

सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, भारत

ईमेल –dkp410@gmail.com
चलभाष +91 89 29 40 89 99

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