समुद्री दीवार*: मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
(4 सितम्बर 1923- 20 जून 2018)

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

* कराची में समुद्र तट पर स्थित सुन्दर बस्ती सीव्यू (Sea View) की सी वॉल (Sea Wall) अर्थात समुद्री तट को काटने से बचाव के लिए डेढ़ फ़ुट मोटी दीवार का पुश्ता।

उर्दू साहित्य के महानतम हास्य एवं व्यंग्य लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी द्वारा लिखित यह लेख उनकी अंतिम रचना “शाम-ए-शेर-ए-याराँ” (2014) से लिया गया है। यह लेख मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने पाक अमरीकन कल्चरल सेंटर  (PACC) में 20 अक्टूबर 1993 ई. में पढ़ा था। उत्कृष्ट हास्य व व्यंग्य और हमदर्दी व करुणा से ओतपोत इस लेख का मुख्य विषय कराची शहर का समुद्र तट और समुद्र का बढ़ता प्रदूषण है। लेखक ने कराची के समुद्र को ‘लोक-सागर’ कहा है और उसकी बढ़ती दुर्दशा का इस प्रकार चित्रण किया है कि समुद्र आम जनता का प्रतीक बन गया है। बार-बार विषयांतर के द्वारा यूसुफ़ी साहब समुद्र तट के विभिन्न दृश्यों का चित्रण करते हैं—तट पर चहलक़दमी करने वाले मर्द और औरतें, आवारा कुत्ते, सफ़ाई-कर्मचारी, ग़रीब बच्चे, बूढ़ियाँ और मछुआरे, पाकिस्तानी सियासत, इलेक्शन, अंतरिम सरकार, राजनितिक भ्रष्टाचार (अगर नाम, स्थान और समय को हटा दिया जाए तो लगता है वर्तमान भारतीय राजनीति पर टिप्पणी की जा रही है)। पाकिस्तान के तानाशाहों अर्थात याहिया ख़ान, अय्यूब ख़ान और ज़ियाउलहक़ पर लेखक की टिप्पणियाँ अत्यंत पैनी हैं। विषयांतर में ही साहित्य-सृजन व साहित्य की वर्तमान दशा पर भी चटपटी टिप्पणियाँ हैं। कुछ  ऐसे सन्दर्भों, घटनाओं व  व्यक्तियों का ज़िक्र या संकेत भी है जिनसे हम पाठक परिचित नहीं हैं । लिहाज़ा ऐसे अंशों को समझना और उनसे लुत्फ़अन्दोज़ होना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है।  विषयांतर यूसुफ़ी की रचना शैली की अहम विशेषता है। हालाँकि इसके कारण उनकी रचनाओं में नैरन्तर्य का अभाव होता है, लेकिन यह उनकी रचनाओं को गहरा, रंगारंग, और सशक्त भी बनाता है। इस लेख में भी यूसुफ़ी की रचना शैली की चमक-दमक, बुद्धिमत्ता, काट और करुणा अत्यंत आनंददायक है। दूसरी रचनाओं की तरह इसमें भी ‘मिर्ज़ा अब्दुल वदूद बेग’ को बार-बार उद्धृत किया गया है, जो यूसुफ़ी के मित्र या हमज़ाद (छायापुरुष) के रूप में उनकी अधिकतर रचनाओं में मौजूद होते हैं। यह पात्र अपने ऊटपटांग विचारों और विचित्र तर्क-शैली के लिए जाना जाता है। यूसुफ़ी अपनी अकथनीय, उत्तेजक, गुस्ताख़ाना और प्रतिक्रिया-जनक बातें मिर्ज़ा की ज़ुबान से कहलवाते हैं। यह किरदार हमें मुल्ला नसरुद्दीन की याद दिलाता है।
बात से बात निकालना, लेखनी के हाथों में ख़ुद को सौंपकर मानो केले के छिलके पर फिसलते जाना अर्थात विषयांतर, हास्यास्पद परिस्थितियों का निर्माण, सुन्दर भाषा, अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन, किरदारों की सनक और विचित्र तर्कशैली, एक ही वाक्य में असंगत शब्दों का जमावड़ा, शब्द-क्रीड़ा,  अनुप्रास अलंकार, हास्यास्पद उपमाएँ व रूपक, अप्रत्याशित मोड़, कविता की पंक्तियों का उद्धरण, पैरोडी और मज़ाक़ की फुलझड़ियों व  हास्य रस की फुहारों के बीच साहित्यिक संकेत व दार्शनिक टिप्पणियाँ, प्रखर बुद्धिमत्ता और आम इंसानों और सारी प्रकृति के प्रति गहन प्रेम व करुणा आदि यूसुफ़ी साहब की रचना शैली की विशेषताएँ हैं। उनके फ़ुटनोट भी अत्यंत दिलचस्प होते हैं। इस निबंध में यूसुफ़ी साहब की रचना शैली की अनेक विशेषताएँ विद्यमान हैं। (अनुवादक)

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देवियो और सज्जनो,

हफ़ीज़ जालंधरी का एक शेर हमारे हाल व हुलिए के अनुरूप है:

परी रुख़ों की ज़ुबाँ से कलाम सुनके मेरा

बहुत से लोग मेरी शक्ल देखने आए

हफ़ीज़ साहब यह बात साफ़-साफ़ गोल कर गए कि देखने के बाद क्या हुआ? अगर कुछ सकारात्मक नतीजे निकले होते तो दूसरा शेर बल्कि दो-तीन ग़ज़लें इस मनभावन विषय पर ज़रूर कहते जो नहीं कहा। जब न हो कुछ भी तो धोखा खाएँ क्या।

मैं अक्सर कहता हूँ कि लेखक को सिर्फ़ किताब के आईने में देखना चाहिए। उसके और पाठक के बीच एक सतर्क दूरी यानी किताब भर की दूरी बहुत ज़रूरी है। और अगर पाठक या फ़ैन कोई महिला है तो उसके और लेखक के बीच पति भर का फ़ासला रहना चाहिये। यह और बात है कि मिर्ज़ा ऐसे पतियों को Marital Obstacle यानी क़ाज़ी या पुजारी के द्वारा निर्मित वैवाहिक वर्जनाएँ या दांपत्य बम्पर्ज़ कहते हैं।

देखिये, हफ़ीज़ साहब भी कैसी चिकनी-चुपड़ी ज़मीन (छंद) में शेर कह गए हैं कि हम पहले ही क़दम पर फिसले तो फिसलते ही चले गए। हम भूमिका यह बाँध रहे थे कि cold print (ठंडे, जमे हुए अक्षर) से पढ़ने वाले की तृप्ति नहीं होती। वह तो हाड़-मांस के आदमी यानी ग़लती के पुतले को देखना, उससे हाथ मिलाना, उसकी मनोदशा और गुप्त व घोषित रोगों की हालत मालूम करना चाहता है। उसकी जितनी ज़्यादा इंसानी व ग़ैर-इंसानी कमज़ोरियों पर से पर्दा उठता है, उतना ही वह पढ़ने वाले के दिल के नज़दीक होता जाता है।  बक़ौल मिर्ज़ा, फ़रिश्तों की ऑटो-बायोग्राफ़ी फ़रिश्ते ही पढ़ सकते हैं, बशर्तेकि पहले कोई कातिब (सुलेखक) लिखने और पब्लिशर छापने पर तैयार तो हो। पाठक, लेखक की कृति को उसकी ज़ुबानी सुनना और उसे टीवी स्क्रीन पर देखना भी चाहता है। परिणामस्वरूप भाषा व अभिव्यक्ति की ग़लतियों में ग़लत उच्चारण और स्वर की थरथराहट एवं लड़खड़ाहट का भी इज़ाफ़ा हो जाता है। फिर किसी के मुताबिक़, लेखक की सूरत से भी नफ़रत हो जाती है। ‘ताबिश’ देहलवी साहब जो धीमे स्वर और कोमल अभिव्यक्ति के क़ायल हैं, इस नुक्ते को यूँ बयान करते हैं कि आजकल बड़े शायरों की सूरत भी ख़ास क़िस्म की हो जाती है! हमने उनका यह कथन पढ़ा तो ख़याल आया कि शायद लिखाई की ग़लती से ‘बुरे’ की बजाय ‘बड़े’ छप गया है। लेकिन मिर्ज़ा ने यक़ीन दिलाया कि मेरा ख़याल ग़लत है। मैंने लेखकों के चाल-चलन से अन्तरंग जानकारी का ज़िक्र जानबूझकर नहीं किया। आर्टिस्टों, कवियों और लेखकों को, जहाँ तक चाल-चलन के नंबरों का संबंध है, शून्य ही मिलता है। इसके अलावा, व्यावहारिक जीवन उनसे जितने भी सवाल करता है, वे हर एक का जवाब ग़लत देते हैं। भोले पाठक और प्रशंसक इन्हीं ग़लत जवाबों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी ढालने की कोशिश करते हैं। और जब इस अनुसरण व प्रयास के नतीजे में उनका जीवन पूरी तरह नाकाम व निरर्थक हो जाता है तो स्वयं भी आर्टिस्ट, कवि, या लेखक बनकर हम जैसों का परलोक सुधारने में जुट जाते हैं।

मिर्ज़ा कहते हैं कि “काव्य-रसिक व साहित्य-पारखी पाठक बनने के लिए व्यापक अध्ययन, अंतर्दृष्टि, काव्य एवं साहित्य मर्मज्ञता और एक उम्र की तपस्या चाहिए, जबकि इससे आधी मेहनत में आदमी तुम जैसा लेखक बन जाता है!” ध्यान देने लायक़ बात यह है कि जब दोनों ही स्थितियों में खखेड़ उठानी पड़ती है तो फिर हमें समझदारी से काम लेना चाहिए, जैसा कि उस व्यक्ति ने किया जो एक पहुँचे हुए गुरु जी के पास नारियल, लड्डू, सिन्दूर और गुरु दक्षिणा लेकर गया और हाथ जोड़कर निवेदन किया कि गुरुदेव, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। गुरूजी ने कहा कि बच्चा, शिष्य बनना तो बहूत कठिन काम है। तिस पर उसने कहा कि तो फिर मुझे गुरु ही बना लीजिए।

इसके बाद शायद यह स्पष्टीकरण इतना ज़रूरी न हो कि इस फ़क़ीर ने इसी आधार पर लेखक बनने को प्राथमिकता दी।

हमें तो प्रबुद्धों व प्रज्ञा-पुरुषों ने यक़ीन दिलाया था कि कविता और साहित्य-सृजन पूर्ण रूप से ईश्वर प्रदत्त व सहजानुभूति की क्रिया है, जिसमें अनुभूतिकर्ता को कोई परिश्रम या प्रयास नहीं करना पड़ता। शायरों को तो इसीलिए ‘तलामीज़ुर्रहमान’ यानी प्रभु के शागिर्द कहा जाता है, जिस पर मौलवियों तक ने कभी ऐतराज़ नहीं जताया। एक महफ़िल में मुंशी एहसानुल्लाह ख़वेशगी ने कलाम (कविता) के सहजानुभूति होने के सबूत में अपनी नई ग़ज़ल तरन्नुम से (गाकर) पढ़ी। यह कहना बहुत कठिन था कि कलाम ज़्यादा ख़राब है या तरन्नुम। हमें तो दोनों एक-दूसरे से ज़्यादा ख़राब लगे! मक़ता के बाद उपर्युक्त विचार के समर्थन एवं सत्यापन के तौर पर ग़ालिब का एक फ़ारसी शेर तहतुल-लफ़्ज़1 में सुनाया। ज़ाहिर हुआ कि उनका तहतुल-लफ़्ज़ तो तरन्नुम से भी ज़्यादा ख़राब है। शेर का अर्थ कुछ ऐसा था कि मानो काव्य-सृजन का सारा काम श्रुतिवाहक करता है। रचनाकार के रूप में आपका काम तो श्रुति के अंतःकरण में प्रस्फुटन के दौरान अक्षरशः डिक्टेशन लेना और तत्पश्चात कला की उत्कृष्टता की दाद समेटना होगा। बस एंटीना (antenna) की तरह मुँह आसमान की तरफ़ और कान भी उसी तरफ़ ट्यून करके “आराम-आराम” से खड़े हो जाइए। फिर देखिये शून्यलोक से नए-नए विषय आप ही आप कैसे उतरते हैं।

सो इसका इंतज़ार करते-करते शाम का झुटपुटा सा हो चला!  उधर से न कुछ आना था न आया। एंटीना कभी का ज़ंग से काला पड़ चुका। तेज़ हवाओं ने इसकी दिशा तक बदल दी। अब इस पर सिर्फ़ दूसरों के आला नस्ल के कबूतर आन बैठते हैं और कुछ देर गुटुरगूं करके उड़ जाते हैं। अगर नामुमकिन को मुमकिन मान लें, और हम उन्हें पकड़ के अपने काबुक में बंद करना चाहें भी तो स्वयं साहित्यिक चोरी के जुर्म में पकड़े जाएँगे। अंततः benefit of doubt (मुलज़िम को संदेह के लाभ) और हुस्न-ए-तवारुद2 (भाव-साम्य) के आधार पर बहुत बेइज़्ज़ती के साथ बरी कर दिए जाएँगे।

हास्यपूर्ण और अत्यंत रोचक उपन्यास Three Musketeers के लेखक अलेक्सान्देर ड्यूमा Alexander Dumas का एक चुटकला बहुत मशहूर है। एक डिनर में उसे एक जनरल के पहलू में बिठाया गया, जिसका ताल्लुक़ तोपख़ाने से था। उसे इस बात से बड़ी मायूसी हुई कि इतने लम्बे भोजन के बावजूद ड्यूमा ने कोई ऐसी बात नहीं कही जिसपर पेट पकड़कर हँसना तो दूर की बात है, धीरे से मुस्कुराया भी जा सके। जनरल ने कहा, इतनी देर हो गई, आपने एक भी चुटकला नहीं सुनाया। इस पर ड्यूमा ने कहा जनरल साहब, मैंने तो आपसे एक बार भी तोप चलाने को नहीं कहा। फिर आप मुझसे चुटकले दाग़ने की उम्मीद कैसे रखते हैं?

हास्य-लेखक के कुछ और भी हैंडीकैप हैं। उससे उम्मीद की जाती है कि गंभीर से गंभीर विषय पर भी हास्यपूर्ण अंदाज़ में गुफ़्तगू करेगा। ज़्यादा  समय नहीं हुआ, मुझे एक बहुत प्रतिष्ठित संस्थान की ओर से इस्लामी बैंककारी पर हास्यपूर्ण गुफ़्तगू करने का निमंत्रण मिला। मगर मैंने इस विषय पर अपनी समझ से बहुत गंभीर आलोचनात्मक लेख पढ़ा जिसे हास्यपूर्ण समझकर श्रोताओं ने ख़ूब तालियाँ बजाईं। इसी तरह दो शोकाकुल रेफ़रेन्सेज़ की अध्यक्षता के लिए मेरा नाम चुना गया। समारोह आयोजकों और मित्रों के पुरज़ोर आग्रह पर वहाँ भी मुझे अपने ख़ास अंदाज़ में शोक मनाना पड़ा, जिससे वहाँ मौजूद लोग बहुत आनंदित हुए। स्वर्गवासियों की आत्मा पर क्या बीती इसका ज्ञान सिर्फ़ ईश्वर को होगा। असल बात यह है कि शेक्सपियर का fool अगर सिर पर शाही  ताज  या ग़ालिब वाली कुलाहे-पपाख़ (लम्बी टोपी) भी पहन के आ जाए तब भी देखने वालों को उसके सिर पर मुर्ग़े की कलग़ी वाली fool’s cap ही नज़र आएगी। बल्कि उसमें लटकी हुई घंटियाँ भी सुनाई देंगी! 

बस कुछ इसी क़िस्म के असमंजस और अनिष्ट के अंदेशे हैं जो अब मेरे और ऐसे समारोहों के बीच में बाधा बनने लगे हैं। प्रोफ़ेसर हारून रशीद का आग्रह मेरे असमंजस व अनिश्चय को अपनी गर्मजोशी में बहा ले गया। मैं इस सम्मान-वर्धन के लिए पाक अमरीकन कल्चरल सेंटर, इसके सदस्यों और इस सभा को सुशोभित करने और गरिमा प्रदान करने वाले माननीय श्रोताओं का दिल की गहराई से आभारी हूँ। प्रोफ़ेसर हारून रशीद इतनी विनम्रता, सौम्यता और तपाक से मिले कि मुझे यक़ीन हो चला कि इस इलेक्शन में नेशनल असेम्बली की सीट के लिए आज़ाद उम्मीदवार के रूप में खड़े हो रहे हैं। मैं अनुगृहीत हूँ कि उन्होंने मेरी इस गुज़ारिश पर अमल किया कि इस समारोह में मेरे परिचय या प्रशंसा में कोई लेख नहीं पढ़ा जाएगा। देखा गया है कि लोग बचत के विज्ञापनों से इतने प्रभावित हो गए हैं कि प्रशंसा में भी, बल्कि सिर्फ़ प्रशंसा में, किफ़ायत व कृपणता से काम लेने लगे हैं। इसलिए जितनी प्रशंसा मुझे चाहिए वह मैं हीले-बहाने से ख़ुद कर लेता हूँ। 

जवाब में हारून रशीद साहब ने प्रोफ़ेसराना अर्थात स्नेहपूर्ण मगर निर्णयात्मक अंदाज़ से यह शर्त लगा दी कि वर्तमान परिस्थितियों पर कोई नया लेख ज़रूर सुनाइएगा। चाहे वह दो पन्ने का ही क्यों न हो। देवियो और सज्जनो, मुझ पर तो ये दो पन्ने भी भारी हैं। मैं अक्सर कहता हूँ कि मेरे नज़दीक सभ्य आदमी की एक पहचान यह भी है कि वह समकालीन परिस्थितियों पर तैयारी के बिना दो मिनट गुफ़्तगू गाली दिए बग़ैर कर सके! हमारे वर्तमान परिस्थितियों की दूसरी विशेषता यह है कि ये पचीस-तीस वर्ष से वैसी ही चली आ रही हैं और आइन्दा भी वैसी ही रहेंगी जैसी कि हैं। यानी वैसी-की-वैसी ही! 

पिछले दिनों नवाब अकबर बुगती ने वर्तमान परिस्थितियों की मुँह बोलती तस्वीर एक शब्द में खींच दी। फ़रमाया कि पाकिस्तान में बड़ी ‘दबड़-घूँस’ मची है। हमें यह शब्द किसी भी डिक्शनरी में नहीं मिला। मगर क्या कहने! सुबहान-अल्लाह! वाह! वाह! यह इस लायक़ है कि इसका शुमार उन कर्णप्रिय onomatopoec शब्दों में किया जाए, जिनकी ध्वन्यात्मक संरचना अर्थात केवल ध्वनि ही से सम्पूर्ण अर्थ फटा पड़ता है! 42 राजनीतिक पार्टियों ने इलेक्शन में भाग लिया। महारथियों ने ऐसे चीख़ते-चिंघाड़ते और उस्तूखुद्दुस (नज़रे-बद दूर! यह भी उसी श्रेणी का शब्द है) घोषणापत्र जारी किये कि देखते-देखते और सुनते-सुनते आँखें और कान दुखने लगे। बहुतों की राजनीतिक अंतरात्मा पर सूजन आ गई। जनता शिष्टाचार के नए नियम, नई लगन और नए चेहरे देखने की इच्छुक थी। इलेक्शन से कैसी-कैसी उम्मीदें जुड़ी थीं। 

देखिये इस बहर (समुद्र) की तह से उछलता है क्या

लेकिन न तो मोती भरी सीपियों से हमारा दामन भरा, न तूफ़ानी समुद्र ने कोई हरा-भरा टापू उछाला। किसे मालूम था कि इस समुद्र की तह से ख़ुद लीडर साहिबान एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हुए बरामद होंगे! मक़सद सब का एक है। इनमें फटीचर से फटीचर लीडर भी प्रकट रूप से प्राइम मिनिस्टर से कम बनने के लिए तैयार नहीं।

अनोखा लाडला खेलन को मांगे ताज

कैसी अनोखी बात रे

अल्हम्दुलिल्लाह, अंतरिम सरकार सुर्ख़रू होकर रुख़सत हुई। अंतरिम प्रधानमंत्री जनाब मोईन क़ुरैशी जहाँ से आनंदित व आह्लादित आए थे, वहीं रोते-बिलकते वापस चले गए। इलेक्शन के दौरान हम नारों, वादों और भिड़ंतों से ऐसे क्षुब्ध हुए कि टीवी देखना छोड़ दिया। रेडियो सुनने लगे। इसलिए कि और कुछ न हो, कम-से-कम उन सूरतों को तो नहीं देखना पड़ता जिनके देखे से मुँह पर रौनक़ के बजाय कुछ और एक्सप्रेशन आता है, जिसे दुबारा अपने चेहरे पर लाकर आपको क्षुब्ध करना मेरे अध्यक्षीय दायित्यों में शामिल नहीं। शाम के अख़बारों में अलबत्ता दिल-पिशोरी (ख़ुश) करने वाली ख़बर का इंतज़ार करते रहे। आख़िरकार, इलेक्शन से एक हफ़्ते पहले एक छोटी सी मगर चटपटी ख़बर देखी कि भूतपूर्व चीफ़ मिनिस्टर स्वर्गीय जाम सादिक़ अली के सुपुत्र जाम माशूक़ अली ने अपने इलेक्शन कैंपेन के लिए ख़ास तौर पर परी चेहरा एक्ट्रेस रीमा को टंडो-आदम बुलाया था, मगर रावलपिंडी के शेख़ रशीद ने बीच में टंगड़ी (कुश्ती में टांग का दाँव लगाकर गिराना या टांग मारकर गिरा देना)  मार के सारा मज़ा मिट्टी में मिला दिया। हमें भी दुःख हुआ हालाँकि   

हम सुख़न-फ़हम हैं रीमा के तरफ़दार नहीं3

हम तो इस इलेक्शन में इस हद तक निष्पक्ष रहे कि अगर हमारा नाम संबद्ध क्षेत्र के वोटरों की सूची में होता तो हम अपना क़ीमती वोट न जाम माशूक़ अली को देते, न उनके विरोधी को। बल्कि धड़ल्ले से रीमा को देते। रीमा को वोट देने का एक ख़ास और तर्कसंगत कारण है, वह यह कि जाम माशूक़ अली को देखा है, रीमा को नहीं देखा। मगर न देखने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ईमान की बात यह है कि हम उम्र और दृष्टि-दुष्टता के उस नाज़ुक मुक़ाम से गुज़र रहे हैं, जब सभी एक जैसी लगती हैं! मतलब यह कि अच्छी लगती हैं। मिर्ज़ा कहते हैं कि रीमा जी का कमाल यह है कि जब वे एक्टिंग करती हैं तो महसूस होता है कुछ और भी कर रही हैं! हमारे ख़याल से शो-बिज़नेस और सियासत में फ़र्क़ यह है कि सियासतदान बेहतर एक्टिंग करते हैं!

इतना लिखने के बाद डान अख़बार के एक मशहूर इश्तेहार से हमें यह मालूम करके ख़ुशी हुई कि रीमा भी वही साबुन इस्तेमाल करने लगी हैं जो अर्ध-शताब्दी से हमारी त्वचा और रंग की मौजूदा सूरतेहाल का ज़िम्मेदार है। हम उस साबुन का नाम अदालत और क़ानून के डरके कारण नहीं बता सकते। अगर संबोधन के जोश या बेध्यानी में उसका नाम ज़बान पर आ जाए तो उसके बनाने वाले यानी लीवर ब्रादर्ज़ झट से हम पर libel (बदनाम करने) और हर्जाने का मुक़दमा दायर कर देंगे कि हम अपनी सूरत को विज्ञापित करके लक्स साबुन को बदनाम करने की कामयाब कोशिश कर रहे हैं!

दूसरी ख़बर जिसने तवज्जो को गुदगुदाया और हमारी महफ़िल को गरमाया यह थी कि तहमीना दुर्रानी ने अपने नामदार पति व भूतपूर्व स्वामी मुस्तफ़ा खर (हमने My Feudal Lord का स्वतन्त्र अनुवाद करने की कोशिश की है) के ख़िलाफ़ थाने में FIR कटवाई है कि “पूर्वोक्त ने उनका बेडरूम बग़ैर इजाज़त के इस्तेमाल किया।” हमने FIR नहीं देखी। हमारा विचार है कि रिपोर्टर ने “The aforesaid misused my bathroom.” का हमारी तरह स्वतन्त्र अनुवाद कर दिया है। यह तो सभी जानते हैं कि ड्राइंगरूम का सही इस्तेमाल यह है कि वहाँ प्रिय मुलाक़ाती से गले मिलें और उसके जाने के बाद लाउन्ज में बैठकर उसकी बुराई करें। किचन में चटोरपन की तृप्ति और उदर रोगों की बढ़ोतरी की सामग्रियाँ होती हैं। बाथरूम का प्रयोजन व उपयोग विस्तृत व्याख्या का मोहताज नहीं। अब रहा बेडरूम, वह असेम्बली की तरह एक बहुउद्देशीय व उपद्रव स्थल है। जहाँ बंदा जिस तरह चाहे ऐश करे या तैश में बिता दे। चुपका और दुबका बैठा रहे या जो बात ज़ेहन से पहले ज़बान पर आ जाए वह भड़ से कह दे और अपनी फ़ज़ीहत कराये। अख़बार की रिपोर्टिंग से पता नहीं चलता कि महोदय घर में बाक़ायदा इजाज़त लेकर दाख़िल हुए या सिर्फ़ बेडरूम में अकारण चोरी-छुपे घुसे और बाद में सटक गए? यह भी स्पष्ट नहीं कि बेडरूम के किस ख़ास हिस्से को कैसे इस्तेमाल किया? क्यों किया? क्या किया? कैसे किया? संक्षेप में यह कि रिपोर्ट इस बारे में ख़ामोश है कि आख़िर महोदय वहाँ क्या करने गए थे!

इस पर हमें माजिद अली साहब बहुत याद  आए। वे बयान करते हैं कि एक दिन वे अपनी बेगम, मशहूर कवित्री ज़हरा निगाह के साथ एक उर्दू फ़िल्म देख रहे थे और रोमांटिक लेकिन हास्यास्पद डायलॉग पर रनिंग कमेंटरी करते जाते थे। बेगम ने ठहोका देके कहा भी कि लोग डिस्टर्ब हो रहे हैं, मगर वे अपनी हँसी और टिप्पणी रोक न पाए। कुछ देर बाद एक सीन में हीरोइन की अंग-प्रदर्शक अठखेलियों पर उन्होंने ज़ोरदार ठहाका लगाया और बुलंद आवाज़ में फब्ती कसी तो पिछली पंक्ति से किसी दिलजले ने बड़े ग़ुस्से में डांटा “तुसी---”

माजिद साहब ने पलटकर जवाब दिया, हम तो “की करने” आए हैं!

यह सबक़पूर्ण कहानी हमने यह दिखलाने के लिए बयान की है कि हमारी असेम्बलियों में मेम्बरों की बड़ी तादाद सिर्फ़ “ की करने” जाती है।  

मैं समझता हूँ कि अंतरिम सरकार और मोईन क़ुरैशी साहब की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार बैंक के बड़े defaulters (बक़ायादारों) की मुकम्मल सूची बिना किसी झिझक के, लेकिन पूरी छानबीन के बाद अपमान के नए कीर्तिमानों के साथ प्रकाशित करदी। और यह सारी कार्यवाही नव्वे दिन के अन्दर-अन्दर पूरी हो गई! बिज़नेस की दुनिया के इन दिग्गजों व महारथियों की सूची की लम्बाई कर्मों के उन लेखों-जोखों के बराबर है जो क़यामत के दिन बैंकरों के बाएँ हाथ में पकड़ाए जाएँगे। उनकी रोशनाई अभी पूरी तरह सूखी नहीं। लोग अभी तक उनका अध्ययन ग़म  व ग़ुस्से और हसद (ईर्ष्या) व जलन के साथ कर रहे हैं। ‘हसद व जलन’ को हमें मिर्ज़ा अब्दुलवदूद बेग के सबब जोड़ना पड़ा। वे कहते हैं कि बैंकों में हमारे बीसियों दोस्त, हमदर्द और शुभचिंतक बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त हैं। मगर साहब, यह कैसी दोस्ती और कहाँ का प्यार है कि किसी एक ने भी संकेतों, इशारों या हाव-भावों से भी नहीं बताया कि लुट्टस मची है। बाढ़ पर आई गंगा में तुम भी हाथ धो लो। मतलब यह कि क़र्ज़ लेलो। मगर दस करोड़ से कम न हो। इससे कम रक़म को बैंक बट्टे-खाते में write-off करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं! पाकिस्तान के कमोबेश 2/3 प्रतिष्ठित और अत्यंत समृद्ध सज्जनों के शुभनामों से यह सूची सुसज्जित थी। इतनी लम्बी सूची में अपना नाम न पाकर शुरू-शुरू में मिर्ज़ा को बड़ी शर्मिंदगी हुई। दुश्मन कहेंगे कि लो इन्हें किसी बैंक ने बक़ायादारों की सूची तक के लायक़ न समझा! बक़ायादारों के ज़िक्र पर याद आया कि ज़्यादातर पार्टियों के मैनिफ़ेस्टोज़ में किये गए वादे उर्दू ग़ज़लों से चुराए गए थे। मतलब यह कि ग़ज़ल की माशूक़ (प्रेमिका) के मिलन, चुंबन व आलिंगन के वादों की तरह, जिन्हें न निभाया जाता है न बयान किया जा सकता है। पार्टी मैनिफ़ेस्टोज़, मक़रूज़ (क़र्ज़दार) और माशूक़ का वादा कभी पूरा नहीं होता! फ़ारसी कवि ‘उर्फ़ी’ ने अपने एक मशहूर शेर में कहा है कि अगर विलाप से माशूक़ का मिलाप मुयस्सर हो जाए तो मैं उसकी तमन्ना में सौ वर्ष तक लगातार रो सकता हूँ। फ़ारसी में डींगें मारते वक़्त ‘उर्फ़ी’, उस्ताद ‘जौक़’ की तरह, “‘शेर’ के नशे में अभिमान व अहंकार से चूर4” होगा। उसे ज़रा भी ख़याल न आया कि सौ वर्ष तक बिलक-बिलककर इस तरह रोने के बाद जैसे बच्चा दूसरे के खिलौने के लिए मचल-मचलकर रोता, रो-रोकर मचलता और पिट-पिटकर चुपका होता है, या मक्कारों की तरह टेसुए बहाने के बाद, उसकी अपनी “वर्तमान परिस्थितियों”, यानी ग़ैरहाज़िर होशोहवास का हाल क्या होगा? ज़रा ध्यान दें--- गरदन लगातार इनकार के अंदाज़ में हिल रही है। दांत एक-एक करके गिर चुके। एकाध जो महज़ उत्पीड़न के लिए बाक़ी है, वह बुरी तरह हिल रहा है। इत्तिफ़ाक़ से गन्ना या रस भरी गंडेरी मिल भी गई तो ख़ाक चूस पाएँगे! गूदे वाली नली या मांसल चाँप और चिकन-लेग को सिर्फ़ चचोड़ते और पोपले मुँह से पपोलते ही रह जाएँगे ! इधर हाथों की थरथरी है कि थमने का नाम नहीं लेती। अगर छुरी से नीबू काटने को कहा जाए तो ज़ुलैख़ा की सखियों की तरह अपना ही हाथ काट बैठेंगे। और चीरा भी ऐसा कि मानो किसी ने फूहड़पने से ऊबड़-खाबड़ दांतों जैसे शिलंगे (दूर-दूर मोटे टाँके) भरे हों। अलबत्ता कुछ अंग ऐसे भी हैं जिनमें थरथरी नहीं है। ये वो अंग हैं जो फ़ालिज के सबब सुन्न हो गए हैं। ख़ुद अपनी याददाश्त की यह दशा कि वादा-फ़रामोश माशूक को यह तक याद न दिला पायेंगे कि

वही वादा यानी निकाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो 5

साहिबो,  हर सरकार का कार्यकाल समाप्त होते-होते, वादों पर जीने वालों की हालत भी कुछ ऐसी ही हो जाती है। दरअसल इलेक्शन के संकल्प व सौगंध और वादे व आश्वासन रात गई बात गई की श्रेणी में आते हैं। ख्रुश्चेव ने ग़लत नहीं कहा था कि राजनीतिज्ञ किसी भी देश के हों, उनकी दुष्कार्य-पद्धति समान होती है।  वे उस जगह भी पुल बनाने का वादा करते हैं जहाँ कोई नदी-नाला नहीं होता! कुछ लीडरों और उम्मीदवारों के भाषण और संबोधन तो इस योग्य थे कि उन्हें ज्यों का त्यों हास्य-कालमों की जगह छाप दिया जाता। हास्य की काटदार मार से जनरल ज़ियाउलहक़ भी बख़ूबी वाक़िफ़ थे। अतः हमारे दोस्त ब्रिगेडियर स्वर्गीय सिद्दीक़ सालिक के सैन्य-कर्तव्यों में जनरल साहब के घोर-गंभीर भाषण में मिज़ाह (हास्य) डालना भी था। 

मिज़ाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़रीरें 6

यह और बात है कि जनरल साहब अपनी चंगेज़ी पठन-शैली से हास्य का नास मार देते थे! क्योंकि मिज़ाह (हास्य) उनके मनसब, मूँछ, सिरी जैसी उबलवाँ आँखों और वर्दी से लग्गा नहीं खाता था। लेकिन ताली फिर भी बजती। सुबहान अल्लाह! वाह वाह! फिर भी होती थी। बक़ौल जौन एलिया:

बोल कर दाद के फ़क़त दो बोल

ख़ून थुकवा लो शोबदागर से

इस इलेक्शन ने कुछ नई, मज़ेदार, और अर्ध-गालियुक्त शब्दावली भी प्रदान की है। मसलन हॉर्स-ट्रेडिंग, डार्क-हॉर्स, लिफ़ाफ़े, लोटे। हम तो इतना जानते हैं कि जबसे राजनेता मैदान में उतरे हैं घोड़ों की ख़रीद-फ़रोख़्त ख़त्म हो गई है। जहाँ तक माल-दौलत  बारबरदारी, दुलत्ती, राजनीतिक छलांग, कुनेतृत्व और घुड़दौड़ का ताल्लुक़ है, अरबी घोड़े की जगह गधों और गधा-चालकों ने ले ली है। रहा लोटा तो हम इसे बहुत उपयोगी वस्तु समझते आए हैं। इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है कि घोड़े और निर्जीव व निर्दोष लोटे पर मानवीय गुण आरोपित करके उन्हें अपमानित किया गया है। एक दिन हमने मिर्ज़ा से फ़रमाइश की कि हमें किसी लोटे के दर्शन कराओ। उन्होंने दूसरे ही दिन एक नक़्क़ाशीदार लोटे से परिचय कराया तो हमें आश्चर्य हुआ और उस पर तरस भी आया।

लोटा-लोटा लोग कहे हैं लोटा क्या ऐसा होगा

मिर्ज़ा: तुमने इससे मिलने में बड़ी देर करदी। अब तो इसकी टोंटी झड़ चुकी है। 

लेखक: यह तो बुरा हुआ। टोंटी का काम तो लोटे को किफ़ायत करना सिखाना है। मगर यह हुआ कैसे?

मिर्ज़ा: इसकी टोंटी misuse की ज़्यादती से झड़ी है। 

लेखक: भला वह कैसे?

मिर्ज़ा: इलेक्शन से पहले प्रतिद्वंदी ग्रुपों ने टोंटी पकड़-पकड़कर अपनी ओर खींचा ताकि उनकी गिनती में शामिल हो जाए। 

लेखक: लोटों को गिना करते हैं, तोड़ा नहीं करते। 7

मिर्ज़ा: जब पकड़ाई देने के लिए टोंटी न रही तो गुमनामी की डस्टबिन में फेंक दिया गया। 

लेखक: झेंपा-झेंपा सा लगता है।

मिर्ज़ा: तुम उसे तीन महीने पहले देखते! पहले उसमें लचक कम-कम और लटक ज़्यादा थी। अब सिर्फ़ लटकन रह गई है! चार इलेक्शन और चार पार्टियाँ भुगता चुका है। चार पर शायद इसलिए रुक गया कि शरई निषेध का ख़याल आ गया होगा। 

मैं रोज़ाना सूर्योदय से कुछ देर पहले Sea View काम्प्लेक्स के सामने समुद्र तट पर चहलक़दमी करने, जिसे अंग्रेज़ constitutional कहते हैं, जाता हूँ। उस समय समुद्र के किनारे सूरज निकलने का समाँ देखने वाले पाँच-छह से ज़्यादा नहीं होते। एक घंटे बाद लौटता हूँ तो तादाद बारह-तेरह हो जाती है। बाबर ने अपनी तुज़ुक में बड़े दुःख के साथ लिखा है कि हमारी हिन्दुस्तानी सेना जब दरिया किनारे ख़ेमा लगाती है तो पीठ दरिया की तरफ़ कर लेती है! मतलब यह कि ख़ेमे ऐसे रुख़ पर लगाते हैं कि दरिया नज़र न आए! कुछ ऐसा ही रवैया हम कराची वासियों का है। हमने बाबरी सेना के आचरण का अनुसरण करते हुए अपनी पीठ समुद्र की ओर करली है। समुद्र को हम bottomless dustbin (बे पेंदे का कूड़ेदान) के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, जिसमें लम्बे समय से सारे शहर का “मैला, कूड़ा, कचरा, गन्दगी, फ़ैक्ट्रियों का अपशिष्ट और विषैले पानी फेंकते रहे हैं। वह सुन्दर समुद्र, वह शीतल शांत सागर जिसे शांतचित्त शहरियों का जगमगाता नीला जलनिधि होना चाहिए था, उसे हमने एक उपेक्षित शहर के कचरा-स्थल में तब्दील कर दिया है। 

मैं सुबह इस तट पर चहलक़दमी के लिए जाता हूँ। चहलक़दमी यानी चालीस क़दम जिससे यहाँ मेरा आशय चार मील है। लेकिन कुछ महिलाएँ जिस अंदाज़ से चहलक़दमी करती हैं, उसे चुहलक़दमी कहना  ज़्यादा मुनासिब होगा। शाम को कुछ दृष्टा न तो डूबते सूरज की लालिमा देखने जाते हैं, न समुद्री ozone को फेफड़ों में पम्प करने के लिए यह कष्ट उठाते हैं, बल्कि वे अपनी आँखों और काली ऐनक से वह ठुमक-चाल देखने जाते हैं, जिसकी ओर अभी हमने अपने आँख मारते जुमले में इशारा किया है। मिर्ज़ा कहते हैं कि चाल की ख़ूबी से ही चाल-चलन की ख़राबी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह अंदाज़ा इससे नहीं लगाया जा सकता कि किस रफ़्तार से कितनी दूरी तय की। बल्कि यह देखा जाता है कि दूरी तय न करने के दौरान, यानी हर दो क़दम के बीच क्या क़यामत ढाई! इस क़यामत का नज़ारा किसी को सामने से आता देखकर नहीं होता, बल्कि भरा-भरा पछाया पीछे से देखकर ही खुलता है कि चाल की चाप, छब-छाप कैसी है। एक ख़ूबी हो तो बयान करें: लटक, मटक, ठुमक, लपक, झपक, नितम्ब का सी-सा ( see-saw) या पेंडुलम की मानिंद दायें-बाएँ इस अदा से wiggle करना और दायें-बाएँ लहराके चलना कि बिल्कुल उसी अंदाज़ व रफ़्तार से दिलों पर आरी सी चल जाए। अब वह ज़माना तो रहा नहीं कि बक़ौल शायर, कोई छड़े को कड़े से बजाती, क़यामत ढाती सामने से गुज़र जाए। फिर भी इस आभूषणी और पाज़ेबी संगीत के बिना भी सुन्दर चाल से क़यामत ढाने के अनगिनत अंदाज़ हैं: लचकती, मचलती, लहराती, लजाती, झिझकती, झूमती, गजगामिनी, इतरौनी, नख़रही, पिंगपांग की गेंद की मानिंद हर क़दम पे टप्पा खाती, पीछे मुड़-मुड़के यह देखती चाल कि अब भी कोई घूर रहा है या सभी मर गए? लेकिन पीछे मुड़के देखना ज़रूरी तो नहीं। इसलिए कि जवान और सुन्दर औरत की गुद्दी में बेहद संवेदनशील और नज़र पहचानने वाला स्त्रियोचित रडार (redar) होता है। उसे साफ़ नज़र आता है कि पीछे कौन कैसी नज़र से देखता आ रहा है। यही नहीं, पछाये पर उसकी आरपार होती नज़र की ताब व तपिश से आगा और उस पर खिंची कमानें तक जल उठती हैं! नज़ीर अकबराबादी ने क्या ख़ूब तस्वीर खींची थी: 

आगा भी खुल रहा है पीछा भी खुल रहा है

याँ यूँ भी वाह वा है और वूँ भी वाह वा है

“खुल रहा है” की बजाए “जल रहा है” पढ़ा जाए तो उस जलते बदन पर लफ़्ज़-लफ़्ज़, नज़र-नज़र सच साबित होगा। लेकिन हम इस पर वाह वाह नहीं करेंगे। वाह वाह तो हम “वूँ” के प्रयोग पर करेंगे, जिसको ज़ालिमों ने अप्रचलित तो क़रार दे दिया, लेकिन लाख सर मारें इसका विकल्प न ला सकेंगे। हम भी तो अभी “तईं”8 और “तिस पर” ही के मातम से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए! ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझसा कहें जिसे। 

मिर्ज़ा ने हमें “archaic (प्राचीन शब्दों ) का शोकग्रस्त” और “पूर्वगामियों की दरगाह का सज्जादा-नशीन व अप्रचलित शब्दों का संरक्षक व धरोहरी” की ईर्ष्या-अयोग्य उपाधि से यूँही तो नहीं सम्मानित किया है। 

एक दिन हमने झुंझलाते हुए कहा कि मिर्ज़ा, शब्दों की उपेक्षा और उनके स्वभाव से अज्ञानता की हद होती है! अगर तुम मेरी लिखाई में किसी भी अप्रचलित या प्राचीन शब्द की जगह कोई बेहतर शब्द लाके दिखा दो तो मैं प्रचलित शब्दों की मानहानि की क्षतिपूर्ति के तौर पर एक हज़ार रूपये प्रति शब्द के हिसाब से चुकाने के लिए तैयार हूँ। मगर एक शर्त है। अगर तुम वैकल्पिक नगीना लाने में नाकाम रहे, जिसकी बहुत अधिक संभावना व आशा है तो या उस्ताद! कहके दोनों कान (अपने) पकड़ोगे और हमारे चरण-चुंबन के बाद दो सौ रूपए प्रति शब्द मेरी भेंट करोगे। 

अपने ही दोनों घुटने छूकर फ़रमाया, “ठीक, मगर एक बात है। बल्कि दो। पहली यह कि मैं तुम्हारी गद्य की पली-पलाई जुएँ मेहनताना लेकर भी नहीं निकालूँगा। इतनी जीव-हत्या का पाप मैं अपनी गर्दन पर नहीं ले सकता। दूसरी यह कि शर्त लगाकर मैं कलात्मक ऐबजूई (छिद्रान्वेषण) में जुए और उर्दू आलोचना में जुएबाज़ी की विधर्मिता का इज़ाफ़ा नहीं करना चाहता।”

हम तो अपना शुमार उन लोगों में करते हैं जिनके बारे में कवि ने कहा है:

टुक देख लिया, दिल शाद किया, ख़ुशवक़्त हुए और चल निकले

संभवतः क्या, निश्चित रूप से हमारी चाल हमारी लेखन-शैली से भी गई गुज़री होगी। हम तो सीधे सुभाव “वाक” करने जाते हैं। अफ़सोस कि walking का कोई उचित और ढंग का पर्यायवाची कम-से-कम मेरी लेखनी की पहुँच में नहीं। “टहलना” के अर्थ वारिस सरहिन्दी द्वारा संकलित शब्दकोष “इल्मी लुग़त” में “आहिस्ता-आहिस्ता तफ़रीह (सैर) के वास्ते फिरना। जुदा होना। मर जाना” बताए गए हैं। आशा है हमारे प्रतिष्ठित व प्रज्ञावान श्रोता इस निष्कर्ष पर तो आसानी से पहुँच गए होंगे कि हमने यह शब्द समुद्र तट पर अपने मर जाने के बारे में प्रयोग नहीं किया। तरक़्क़ी उर्दू बोर्ड द्वारा संकलित बाईस जिल्दों पर आधारित सबसे प्रामाणिक “उर्दू लुग़त” में टहलने के अर्थ “आहिस्ता-आहिस्ता चलना फिरना। मटरगश्त करना” दर्ज हैं। और सनद में यह विशुद्ध वाक्य लिखकर प्रामाणिकता को प्रतिष्ठा प्रदान की गई है:

“इस्तिंजा9 करते हुए टहलते और खुले बाज़ारों में चक्कर लगाते फिरते हैं।”

एक बार फिर यह स्पष्टीकरण ज़रूरी मालूम होता है कि हम न तो मटरगश्त करते हैं, न इस तरह गुप्तांग गश्त। और न अंग्रेज़ी मुहावरे के अनुसार खुले समुद्र तट पर एक ढेले से दो चिड़ियाँ मारते फिरते हैं। मतलब यह कि टहलते ज़रूर हैं, मगर चलने का ढंग व हाव-भाव वह नहीं होता जिसका उपर्युक्त सनद में अविस्मरणीय और अप्रकाशनीय चित्र खींचके रख दिया गया है। खुले आम यह नामाक़ूल हरकत और उसको प्रतिबिंबित करती सनद के अर्थ व भाव तीनों प्रकट रूप से अक्षम्य लगते हैं। लेकिन यह ध्यान रहे कि टहलने, तफ़रीह और तहारत (शुद्धता) का यह अननुकरणीय संयोग कुछ अगले वक़्तों के लोगों को ही शोभा देता था। कल्पना-दृष्टि के सामने जो दृश्य प्रकट होता है उसके बारे में संक्षेप में इतना ही निवेदन कर सकते हैं: 

आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं!

इसके अलावा, हमें तो इस सनद में किताबत की एक घोर ग़लती भी नज़र आई। कातिब ने ग़लती से या चश्मपोशी (आँखें ढकने) व इज़ारपोशी के लिए ‘खुले इज़ारबन्दों’ की जगह ‘खुले बाज़ारों’ लिख दिया!  “ख़ुदा रहमत कुनद ईं कातिबान-ए-पाक तीनत रा”  (प्रभू इन पवित्र स्वभाव वाले कातिबों पर कृपा करे)।

मैं “वाकिंग” का अनुवाद “सैर या हवाख़ोरी करने के भी पक्ष में नहीं। क्योंकि उनकी मंदगति बल्कि “गतिहीनता” की तस्वीर सामने आती है और वह ज़माना याद आता है जब अमीर, रईस और कुलीन लोग पालकी, डोली, हवादार, तामझाम में या ख़ुद से बेहतर नस्ल के घोड़े पर सवार, हवाख़ोरी के लिए निकलते थे। अमीर और रईस लोग सारी ज़िन्दगी में निजी टाँगें सिर्फ़ शौचालय तक जाने या “आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-फ़रार” तो युद्ध-भूमि से बगटुट भागने के लिए इस्तेमाल करते थे। हवाख़ोरी की शब्दावली मुझे इसलिए भी नहीं भाती कि ध्यान अनायास “ख़ोरी” और “ख़ोर” के दूसरे रूपों और प्रकारों की ओर जाता है जो सब की सब वाहियात हैं। मसलन रिश्वतख़ोर, चुग़ुलख़ोर, आदमख़ोर, शराबख़ोर, सूदख़ोर, मुरदारख़ोर, हरामख़ोर। हलालख़ोर का ज़िक्र मैंने जानबूझकर नहीं किया। इसलिए कि इससे आशय एक बेहद मेहनती, आज्ञाकारी, ख़िदमती और ग़रीब वर्ग से है। यानी मेहतर और भंगी। 

कभी आपने ग़ौर किया कि हमारे यहाँ किसी और professonal (पेशेवर) को हलालख़ोर यानी हक़ हलाल की रोज़ी कमाने और हलाल करके खाने वाला हरगिज़ नहीं कहते! वाह! क्या बात ध्यान में आई! 

इस तफ़रीही समुद्र तट पर क़दम रखते ही कुत्ते, जिनके झुंड के झुंड छुटे फिरते हैं, बेहद शोर व गुलगपाड़ा मचाते हुए मुझे दुष्टतापूर्ण गार्ड ऑफ़ आनर पेश करते हैं। अधिकतर कुत्ते असली और शुद्ध नस्ल के  हैं। यानी सौ पुश्त से स्ट्रीट-डॉग (बाज़ारी) हैं। शक्ल व आदतों व दुष्टाचार के लिहाज़ से भी। सौ पुश्त से इनके पुरखों का  धंधा रहा है पहले काटना, फिर भौंकना, भंभोड़ना, चचोड़ना, रास्ता चलते को खदेड़ना, भभकी देना वग़ैरह। दूसरी विशेषताएँ: पिंडली के गोश्त से रूचि। रोटी का टुकड़ा देने वाला हाथ, दूसरी गली के कुत्ते के आगमन और बिजली का खंभा देखकर उसी क्रम से दुम, सिर और टांग उठाना! आवारा कुत्ते को ख़ुद से भी ज़्यादा आवारा लौंडों के हाथ में पत्थर, या बुज़ुर्ग के हाथ में डंडा, या किसी खूँख्वार रक़ीब (प्रतिद्वंदी) कुत्ते को देखकर दुम दबाकर भाग जाना: 

नली तुमने कहा था हम तो दुनिया छोड़े जाते हैं

(मूल पंक्ति: गली तुमने कहा था, हम तो दुनिया छोड़े जाते हैं।)

इनके अलावा कुछ कुत्ते ऐसे भी हैं जो देखने में तो अमीरों और रईसों के pedigree यानी आला नस्ल के कुत्ते लगते हैं। लेकिन ये अगर सौ डेढ़ सौ वर्ष पहले नवाबी काल और सामंती समाज में मनुष्य योनि में पैदा हुए होते तो बाज़ारी ज़बान में रंडी-बच्चे और लौंडी-ज़ादे (दासी-पुत्र) कहलाते और गाली-गलौज, जूतम-पैज़ार के दौरान हराम-पिल्ले! मानो सिर्फ़ पिल्ला होना पर्याप्त नहीं! आशा है अब और स्पष्टीकरण की ज़रुरत नहीं रही कि हमारा इशारा साफ़-साफ़ दोग़ले कुत्तों की तरफ़ है। 

मेरे चलने की शैली, गति और गरिमा, पूर्णरूप से इस पर निर्भर होती है कि कुत्तों के कमान्डोज़ कैसे वीर-काव्य के कोर्स की ताल पर, किस गति से मेरे पीछे आ रहे हैं। मैं उनकी ताल से चाल और चाल से चाल मिलाता कभी दुलकी (घोड़े और कुत्ते की एक चाल जिसमें उछल-उछलकर चलता है और एक वक़्त में तीन पाँव उठते हैं) , कभी सरपट (घोड़े की एक तेज़ रफ़्तार चाल जिसमें वह सिर ऊपर उठाकर पैर एक साथ ऊपर उठाकर दौड़ता है।),  और कभी शहगाम (बादशाहों का अंदाज़। घोड़े की उम्दा चाल जो आम चाल से तेज़ होती है मगर दौड़ने से कम। )  चलता हूँ। मगर कहना पड़ता है कि ये कुत्ते बहुत तमीज़दार हैं। गंदे भी नहीं। और न कृशकाय व खाजग्रस्त। तमीज़दार इस कारण से कहा कि काटने से पहले ख़ामख़ाह नहीं भौंकते। बल्कि बेहद अदब से, पीछे से पंजों के बल आकर पिंडली पकड़ लेते हैं। गंदे और खाजग्रस्त इसलिए नहीं कि दिन में दो-तीन दफ़ा समुद्र में स्नान कर लेते हैं। फिर जब फुरहरी ले-लेकर जिस्म से पानी झटकते और झड़झड़ाते हैं तो उसका स्प्रे सीधा सैर और जॉगिंग करने वालों के मुँह तक पहुँचता है, जिससे पता चलता है कि समुद्र का पानी बेहद नमकीन और बदबूदार है। ये कुत्ते मोटे इस वजह से हैं कि शाम को सैर के लिए आने वाले रेस्तोरानों और खुमचे वालों के गाहक जो बचा हुआ खाना समुद्र तट और घूरों पर फेंक देते हैं, उसे ये कुत्ते खाते हैं। कुत्तों से जो कुछ बच रहता है उसे दिन चढ़े बिल्लियाँ और वे बच्चे और बूढ़ी औरतें खाती हैं जो कूड़े के ढेरों में कोहनी तक हाथ डाल-डालकर वह आजीविका ढूंढती हैं, जो उनकी क़ौम ने उनके लिए सुनिश्चित की है। रेस्तोरानों में खाने वालों को अक्सर फ़ूड-पाइज़निंग की शिकायत हो जाती है, लेकिन उन बिल्लियों, बुढ़ियों और बच्चों को कुछ नहीं होता। ये बिला नाग़ा आते और चटपटा मलबा खाकर रब का शुक्र अदा करते हैं। देखादेखी ये कुत्ते भी इतने सभ्य हो गए हैं कि समुद्र तट पर गन्दगी नहीं फैलाते बल्कि बेघर लोगों का अनुसरण करते हैं। यानी समुद्र तट के उस हिस्से को ओपन-एयर-लैट्रीन के तौर पर इस्तेमाल करते हैं जहाँ से ज्वार-भाटे की लहरें उसे बहाकर ले जाती हैं और समुद्र के सीने में तिराती रहती हैं।  हर क़दम पर एक अलग बदबू सैर करने वालों का स्वागत करती है। कई बार लाउडस्पीकर से ऐलान किया गया कि अगले इतवार कुत्ते-मार मुहिम का बड़े ज़ोरों से आग़ाज़ होगा। कुत्तों को ज़हर खिलाया जाएगा। अतः आप अपने डोमेस्टिक पेट्स को बाँधकर रखें। बहुत सी पत्नियाँ अपने पतियों को उस दिन घर से बाहर नहीं निकलने देतीं। सारी पब्लिसिटी के बावजूद हमने आज तक कोई मुर्दा कुत्ता नहीं देखा। जीवित कुत्तों की संख्या में हमेशा इज़ाफ़ा ही देखा। मिर्ज़ा कहते हैं कि इन कुत्तों को जो ज़हर दिया जाता है उसमें अमृत की मिलावट होती है।

कुत्ते किसी और नवागंतुक के गार्ड ऑफ़ आनर के लिए चले जाते हैं तो उभरते सूरज के पीले से प्रकाश में कैंटोनमेंट के लगाए हुए साइनबोर्ड पर नज़र पड़ती है, जिसपर चेतावनी व सूचना के लिए लिखा होता है:

“समुद्र में नहाने से परहेज़ करें।”

हम किसी को इसका यह मतलब समझने से कैसे रोक सकते हैं कि समुद्र में तैरने, सैर करते हुए दूर तक निकल जाने, सर्फ़िंग, वाटर स्पोर्ट्स और जल-कबड्डी खेलने पर कोई पाबंदी नहीं है। बस नहाना मना है! हमारा विचार है कि “परहेज़” का विकल्प या अनुवाद भी देना चाहिए, ताकि कल को लोग कुछ का कुछ समझकर कुछ और न करने लगें। अगर हमसे समय पर मशवरा कर लिया जाता तो हम यह साइनबोर्ड लगवा देते:

“यहाँ कुछ स्थानों पर गटर के पानी में थोड़े से समुद्री पानी की मिलावट हो गई है, जिसके लिए हम आपसे क्षमा याचना करते हैं।”

पुश्ते की दीवार पर लगभग हर तीस क़दम पर काले पेंट से लिखा यह बेमौक़ा दार्शनिक सा वाक्य चिंतन-मनन व फब्ती कसने पर उकसाता है:

“आग और पानी का कोई भरोसा नहीं।”

भाई मेरे, समुद्र किनारे आग कहाँ से आ गई? अगर तुम्हारे प्रशासक हमारी रचना शैली की पैरोडी करना चाहते हैं तो हाक्सबे, सैंड्सपिट और फ़्रेंच-बीच के प्राइवेट, पोर्च और एक्सक्लूसिव समुद्र तटों पर संभ्रांत व्यक्तियों और फ़ॉरेनर्ज़ यानी विदेशियों को इस तरह सचेत और सतर्क करना चाहिए:

तू बरा-ए- ग़ुस्ल करदन आमदी

न बरा-ए-वस्ल करदन आमदी 

(तू स्नान करने के लिए आया है

तू संभोग करने नहीं आया है)

टहलने वालों के हाथ में आम तौर पर छड़ी होती है। अलबत्ता महिलाओं में एक नया फ़ैशन चल निकला है। वे हाथ में तस्बीह (माला) लेकर चहलक़दमी करती हैं। ज़रा ग़ौर किया तो मालूम हुआ है कि मर्द तो कुत्तों को डराने, हंकाने और दूर रखने के लिए हाथ में छड़ी रखते हैं, जबकि महिलाएँ, मर्दों को परे हटाने और मनका पर “दुर-दुर, हुश-हुश” पढ़ने के प्रयोजन से तस्बीह हाथ में लटकाए घूमती हैं! जो दुखिया तस्बीह अफ़ोर्ड नहीं कर सकती या जिस कोमलांगना को तस्बीह के भार से कमर दोहरी या चाल बेढंगी होने का अंदेशा हो, वह अपने पति को साथ रखती है!

एक मटमैली, धुंधली सी सुबह का ज़िक्र है। एक ख़ातून ने जिनसे मेरा परिचय नहीं था, अचानक आगे आके मुझे रोका और बोलीं “सर, यह आप सन-राइज़ से घंटों पहले सन-ग्लासेज़ लगाके क्यों आते हैं?”

मैं हक्का-बक्का रह गया। जवाब न बन पड़ा। तीन दिन बाद उसने मुझे फिर रोका और वही सवाल दोहराया, मगर “सर” नहीं कहा, “आप सन-राइज़ से पहले डार्क-ग्लासेज़ लगाके क्यों आते हैं?” अबकी बार मेरा हियाव खुल गया। (हियाव खुलना अर्थात हिम्मत पड़ना, दिल का डर जाते रहना, झिझक मिट जाना।

ये सब ठीक। मगर वह 'हियाव खुलने' वाली बात कहाँ! आप ख़ुद जी कड़ा करके इंसाफ़ करें। जी साहब-ए-औलाद से फ़ौलाद तलब है।)  डार्क-ग्लासेज़ उतारकर जवाब दिया, “जो वजह आप समझ रही हैं, वह सही है!”

दूसरे दिन से यह अंतर पड़ा कि वे मेरे सामने से गुज़रतीं तो पल्लू से सिर वग़ैरह अच्छी तरह ढक-ढांक के गुज़रने लगीं। कुछ दिन बाद न जाने क्या दिल में आई कि डार्क-ग्लासेज़ लगाके आने लगीं। जी तो बहुतेरा चाहा कि--- मगर ख़ैर।

इसे घटना कहिए, मुचैटा कहिए या संवाद--- संक्षेप में जो कुछ भी था, इसके दो माह बाद उस ख़ातून को उसी जगह एक कुत्ते ने काटा (कुत्ते से यहाँ तात्पर्य कुत्ता ही है)। तमाशाइयों की भीड़ लग गई। मैं उन्हें अपनी कार में घर छोड़ने गया। उनका पति तो घाव देखते ही पागल हो गया और बुलंद आवाज़ में कुत्तों की माँ-बहनों के बारे में जिन कामनाओं को व्यक्त करने लगा उन्हें शुभकामनाएँ नहीं कहा जा सकता। सुनने में आया कि उसने रेंजर्ज़ से जो, समुद्र तट पर तैनात थे, कहा कि मैं उस कुत्ते को अपने पिस्तौल से शूट करना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि हम यहाँ फ़ायरिंग की अनुमति नहीं दे सकते। यह कुत्ते-मार कार्यवाही इतनी ही आवश्यक है तो क्लिफ़्टन कैंटोनमेंट बोर्ड से संपर्क करें। उसे फ़ोन किया तो जवाब मिला कि आप क्लिफ़्टन थाने से अनुमति लें। क्लिफ़्टन थाने ने कहा, “श्रीमान जी आपको मालूम होना चाहिए कि डिफ़ेन्स के जिस फ़ेज़ (Phase) में आवारा कुत्ते और आप, यानी कि दोनों तथाकथित रूप से निवास करते हैं वह इलाक़ा दरख़्शां पुलिस स्टेशन में लगता है।” मतलब यह कि श्रीमान जी वहीं मत्था-फोड़ी करें।

उस पुलिस स्टेशन को फ़ोन किया तो एक हेड-कांस्टेबल डपट के बोला “आप डिप्टी कमिश्नर साउथ को सार्वजनिक स्थान पर फ़ायर खोलने की दरख़्वास्त दें। और कल सुबह सवा ग्यारह बजे तक स्वयं हाज़िर होकर अपने पिस्तौल का बोर (bore) और लाइसेंस चेक कराएँ।”

यह सुनना था कि पति महोदय का सारा ग़ुस्सा ग़ायब हो गया। रक्तपात के इरादे से ख़ुद को रोका। उन्हें अचानक याद आया कि पाँच साल से लाइसेंस renew (नवीनीकरण)  नहीं कराया! कहीं काग़ज़ात में गुम हो गया है।

बौखलाहट में पूछने लगे कि अगर मैं कुत्ता न मारूँ, तब भी क्या सवा ग्यारह बजे थाने में लाइसेंस चेक कराना होगा?

साहिबो, कहानी थोड़ी लंबी हो गई। मगर इससे सबक़ मिलता है कि पागल कुत्ता मारना कैसी जोखिम में फँसना है। क़ानून को कार्यान्वित करने वाला हर अधिकारी काटने को दौड़ता है!

बात चलने के अंदाज़ की हो रही थी जो उस health-conscious (सेहत बनाने में रूचि रखने वाले) बुज़ुर्ग के ज़िक्र के बग़ैर अधूरी रहेगी जो अनोखे अंदाज़ से टहलते थे। वह इस तरह कि बीस क़दम आगे जाने के बाद उल्टे पाँव यानी मुँह मोड़े बिना, पीठ की तरफ़ से, पचीस क़दम विपरीत दिशा में यानी पीछे जाते थे। कई बार फ़ुटपाथ पर पीठ के बल गिर चुके थे। कई महिलाएँ भी उनके पिछले बम्पर से टकरा के तस्बीह समेत गिर चुकी थीं। मैंने यूँ ही बैठे-बैठे रफ़ यानी मोटा सा हिसाब लगाया कि अगर वे बिल्कुल इसी तरह पश्चिम की ओर मुँह करके अहराम बाँधे हज के लिए उल्टे पाँव रवाना हों और बराबर चलते रहें, चलते रहें, तो अंततः चीन की दीवार पर जाकर रुकेंगे!

एक दिन मुझसे न रहा गया। वे आदत के अनुसार अर्थात स्वभाव के विपरीत तट पर shunting कर रहे थे। मैंने उनके पिछले बम्पर से बम्बर टकराकर उन्हें रोका और पलटकर पूछा, श्रीमान, आप पंद्रह-बीस क़दम चलने के बाद रिवर्स गियर क्यों लगा देते हैं?

बोले, इससे कूल्हे की वो मांसपेशियाँ मज़बूत होती हैं जो सीधा चलने में इस्तेमाल ही नहीं होतीं। 

निवेदन किया, नामुमकिन को मुमकिन मान लें, तो अगर वे मज़बूत भी हो गईं तो फ़ायदा?

फ़रमाया, फिर इससे दुगनी रफ़्तार से उल्टा चल सकूँगा!

यह ख़ाली-ख़ूली शेख़ी नहीं थी। दो साल बाद मैंने ख़ुद अपनी आँखों से देखा कि वाक़ई दुगनी रफ़्तार से फ़ुटपाथ पर पछाड़ खाने लगे!

अक्सर ख़याल आता है कि राष्ट्रीय योजना और राजनीति में भी हम बिल्कुल ऐसे ही पेशो-पस (आगे-पीछे) अंदाज़ और रफ़्तार से अपने गंतव्य एवं लक्ष्य की ओर जाने की कोशिश करते रहे हैं, और उससे और दूर और दूर होते जा रहे हैं।

पिछले समय में इस क़हक़हा-जनक क्रिया के लिए उर्दू में एक शब्द प्रचलित था--- रजअत-ए-क़हक़री अर्थात उल्टे पाँव फिरना। (क़हक़हा इसका धातु शब्द नहीं था, अपरिहार्य परिणाम था।)

मैंने समुद्र तट का दस-बारह मील का चक्कर लगाया है। कहीं कोई वृक्ष नहीं देखा। न कोई मुर्ग़ाबी या कोई और जलपक्षी। मिर्ज़ा कहते हैं कि ऐसी आबोहवा और हालात में सिर्फ़ ताजिर (व्यापारी), मुहाजिर, मच्छर और मगरमच्छ ही जीवित रह सकते हैं। ख़ैर, पेड़-पौधे, पंछी-पखेरू तो न मिलना थे न मिले। मगर दो सिन्धी मछेरों से हमारी मित्रता हो गई। अस्सी-पचासी वर्षीय इब्राहीम और साठ वर्षीय मूसा से। इब्राहीम कहता है कि “बोटिंग बेसिन में जहाँ आप लोग तिक्के और कबाब खाते हैं, वहाँ अंग्रेज़ के जाने और आपके आने से पहले हम नाव में आया जाया करते थे। जाल डालने के बाद बस निकालने की देर थी। साईं, सब अंग्रेज़ का चमत्कार था। आध घंटे में चाँदी जैसे पेट वाली इतनी मछलियाँ पकड़ लेते थे कि दो-तीन दिन का ख़र्च निकल आता था।” एक दिन वह अपना फटा जाल दिखाकर कहने लगा कि “इसे देखो। इसे खींचने के लिए बावले ऊँट की तागत चाहिए!” मैंने देखा कि उस जाल में बेशुमार छोटी-छोटी समुद्री बट्टियाँ, टिन और गत्ते के डिब्बे, प्लास्टिक के थैले, धार्मिक पुस्तकों के पन्ने, काँच की टूटी बोतलें, Diet Coke की नमकीन समुद्री पानी से भरी बोतलें, फटे पुराने बेजोड़ जूते और चप्पलें, ख़रबूज़े के छिलके और डेढ़-दो किलो उंगली बराबर मछलियाँ थीं। जाल रोज़ फट जाता था। दो घंटे उससे मछली पकड़ते और बारह घंटे उसकी मरम्मत करते। मैंने पूछा बाबा, ये कितने में बिकेंगी? बोला, साईं, बीस-तीस रूपये में। इस इलाक़े में इतने ही दाम लगते हैं। इन बीमार मछलियों को आप लोग नहीं खाते। बड़ी मछलियों को तो फ़िशिंग ट्रालर और गन्दगी खा गई। बाक़ी मछलियाँ प्लास्टिक के थैलों से दम घुटने से मर गईं।

वे दोनों बूढ़े मछेरे अपना ताज़ा-ताज़ा फटा और भीगा जाल और टोकरियाँ समेटकर जाने लगे तो मैंने आश्चर्य से पूछा कि इस उम्र में तुम यह सारा सामान लादकर सात-आठ मील दूर अपने गोठ पैदल कैसे जाओगे? मूसा कहने लगा “साईं, हमें कोई बस की छत पर भी नहीं बैठने देता।” मैंने कहा, “ताज्जुब है लोग मछली गपागप खाते हैं और मछली की बू पर नाक-भौं चढ़ाते हैं!” वह बोला “नहीं जी, कंडक्टर कहते हैं तुम्हारे बदन से बदबू आती है। सारी बस का महौल ख़राब कर देते हो।”

चलने लगे तो इब्राहीम बोला “गोठ के लोग कहते हैं मैं अस्सी से ऊपर हूँ। सब कुछ देखा-भाला। भोगा, भुगता। बस एक ही चिंता सताती है। अगर आपकी किसी मंत्री या असेम्बली के मेम्बर तक पहुँच हो तो हमारी तरफ़ से हाथ जोड़के उससे निवेदन करें कि हमारे गोठ के लिए क़ब्रिस्तान का बंदोबस्त करें। शहर वालों के क़ब्रिस्तानों में हमारे जनाज़े को घुसने नहीं देते। हम अपनी मैयत (शव) को एक क़ब्रिस्तान से दूसरे और दूसरे से तीसरे, चौथे कांधों पर उठाये-उठाये बेइज़्ज़ती कराते फिरते हैं। दिन भर कड़ी धूप में पड़े रहने के बाद हमारी मैयत से ख़ुशबू तो आने से रही। मुर्दे की मिट्टी ख़राब होती है। महौल अलग ख़राब होता है। साईं कुछ करो। रात को चिंता से नींद नहीं आती। अस्सी से ऊपर हूँ।”   

देखिये, द्रुतगामी लेखनी चुहलक़दमी करती कहाँ से कहाँ जा निकली। सुबह की घड़ी वापस समुद्र तट पर चलते हैं। सूर्योदय से कोई आठ घंटे पहले तीस-चालीस सफ़ाई-कर्मियों का, साइकलों पर सवार, एक क़ाफ़िला शोर मचाता प्रकट होता है। और समुद्र तट के कूड़े, कचरे, कौओं, कुत्तों और टहलने वालों पर झाड़ुओं से हल्ला बोल देता है:

उनमें कुछ लाग़र भी हैं, बच्चे भी हैं, हुशियार भी हैं

और कुछ हैं कि हर इक काम से बेज़ार भी हैं

(लाग़र –कमज़ोर, दुर्बल)

कुछ सफ़ाई-कर्मी सारी उम्र इसी तट पर झाड़ू देते-देते इतने बूढ़े हो गये हैं कि अब झाड़ू देते वक़्त झुकना नहीं पड़ता। ये सब सींक की लम्बी-लम्बी झाड़ुओं से एक मील लम्बे promenade की सफ़ाई में जुट जाते हैं। उस पर अध-खाए भुट्टों, गंडेरियों, केले, कीनू और मूँगफली के छिलकों, सिग्रेट की डिबियों, प्लास्टिक के थैलों, आम की गुठलियों, और दूसरी मौसमी गंदगियों और रात्रि-कालीन मैली चीज़ों के ढेर लगे होते हैं। टहलने वाले का पैर हफ़्ते में दो-एक बार उस वस्तु पर भी पड़ जाता है जिससे ज्ञात होता है कि अब लोग फ़ेमिली- प्लानिंग के सुझाओं पर घर और दांपत्य सीमाओं के बाहर भी गर्भ-नियोजन कर रहे हैं। हर गैंग कचरे को समेट- समाट के दस-दस क़दम की दूरी पर ढेरियाँ बनाता जाता है। फिर इन ढेरियों को डेढ़ फ़ुट चौड़ी दीवार के उस तरफ़ फेंक देता है जिधर समुद्र की लहरें ज्वार भाटे के दौरान दीवार से टकराती हैं। यह दीवार अरब सागर और कराची के बीच विभाजक रेखा का काम करती है। सफ़ाई-कर्मियों का काम बस इतना है कि डेढ़ फ़ुट चौड़ी दीवार के इस तरफ़ पड़ी हुई गन्दगी को उस तरफ़ फेंक दें। बाक़ी काम, यानी सारा काम, समुद्र की आती जाती लहरें अंजाम देती हैं। सोचता हूँ अगर यह दीवार न होती तो सारे सफ़ाई-कर्मचारी अपने अधिकारियों सहित बेकार और बेरोज़गार हो जाते।

दीवार के उस तरफ़ ठाठें मारता झाग भरा समुद्र है, जो इस गंदगी को बरसा-बरस से सहन कर रहा है। समुद्र में गिरते नाबदानों और नालियों के अलावा दिन में कई बार सीवरेज की गन्दगी से भरे टैंकर यहाँ  आते हैं और मलमूत्र व अपशिष्ट समुद्र में फेंक-फाँककर प्रेशर-हॉर्न बजाते चले जाते हैं। कहीं ऐसा न हो कि इसका वह तेज़ नमक जो लकड़ी और लोहे तक को गलाकर बुरादे और ज़ंग में तब्दील कर देता है, अपशिष्टों के इस ढेर से हार मान जाए। मीलों तक कोई बगुला नज़र नहीं आता, इसलिए कि उसके खाने के लिए कोई मछली जीवित नहीं रही। समुद्र को अब सांस लेना कठिन हो गया है। फिर भी इसके अथाह सीने में बड़ी समाई (क्षमता) है। आज भी चाँदनी रातों में इसकी लहरें उसी तरह अशरफ़ियाँ लुटाती हैं।

यह लोक-सागर है, जो सब कुछ देखता है और कुछ नहीं कहता। सब कुछ सहज-सहज सहता और सहारता है कि शीतल शांत रहना इसका स्वभाव है। पर जब इस लोक-सागर में ज्वार भाटा आता है तो अपने अन्दर फेंकी हुई गंदगी का थोड़ा सा अंश, नमूने के तौर पर, अपने किनारे पर दीवार तले वापस फेंक जाता है कि अगर तुम्हारी आँखें हैं और आँखों में अभी तक बीनाई (ज्योति) बाक़ी है तो देखो तुम मुझे क्या देते रहे हो।

यह डेढ़ फ़ुट चौड़ी दीवार चेतावनी सूचक-सन्देश लिखी हुई वह असुरक्षित दीवार है जिसपर लिखने वाली उंगली लिखती चली जाती है। इस दीवार ने भी कैसे-कैसे सफ़ीने डूबते देखे हैं। इस दीवार पर चढ़ते ही फ़ील्ड मार्शल अय्यूब ख़ान को ख़याल आया कि मूढ़ जिसको असीम और अथाह लोक-सागर समझ बैठे हैं वह तो मटमैला, उथला जोहड़ (कच्चा बरसाती तालाब) है जिसका पानी बस मेरे बूट तक आता है। दस साल बाद एक कड़क और कड़ाके के साथ दीवार में डिक्टेटर-भर दरार पड़ी और लोक-सागर उसे बूट समेत निगल गया। उसके बाद रंग बदलती, चंचल व मादक हाला हाथों में लिए एक मतवाला, यानी यहिया ख़ान उस चेतावनी-सूचक सन्देश वाली दीवार पर बूट व बोतल सहित चढ़ गया। और नीरू वाली बाँसुरी पर सम्पूर्ण ठाठ का राग दुलारी बलिहारी बजाने लगा। हुक्मरानी का शौक़ तो था ही, मगर इस शब्द के दूसरे अंश यानी ‘रानी’ पर मोहित व सम्मोहित निकला। अतः अब हुक्म, रानी ही का चलने लगा! उसने देखते-देखते हाकिम को मदहोश व हतबुद्धि कर दिया। लेकिन दौर-ए-जाम बहुत अल्पावधिक निकला। एकाएक

चली सिम्त-ए-शर्क़ से इक हवा कि चमन सुरूर का मिट गया10

ऐसा तूफ़ान उठा कि दीवार अचानक दो टुकड़े हो गई और लोक-सागर की मैली-मटमैली चादर ने ज़ालिम तानाशाह को ढांक लिया।

छह साल नहीं गुज़रे थे कि एक मुक़द्दर व संवाद का सिकंदर मुल्लाओं के दीन (धर्म) की सीढ़ी लगाकर दीवार पर चढ़ गया। उसकी धाक और दहशत दिलों में ऐसी बैठी कि प्रोफ़ेसर क़ाज़ी अब्दुल क़ुद्दूस ने अपना सियासी क़िबला (काबा) बदला सो बदला, अपना इमला भी बदल दिया। और ज़ियाबीतस (मधुमेह) को “ज़ाल” अक्षर के बजाए “ज़्वाद”11 से लिखने लगे, जो मुल्क में तेज़ी से फैल रही थी! ज़ियाउलहक़ ने इस्लामाबाद में लेखकों और कवियों के एक कन्वेंशन में पैग़म्बरों की ज़बान और फ़िरौन के लहजे में धमकी दी, जिसका मतलब प्रतिनिधि-गण यही समझे कि जिसने उसके लौह-मंडित हाथों पर पूर्ण समर्पण का प्रण न लिया उस पर इस धरती की रोज़ी-रोटी, चाँदनी और छाँव हराम (वर्जित) है।

इक इन्साँ था कि ओढ़े था ख़ुदाई सारी

इक सितारा था कि आकाश पहनकर निकला

यह दीवार चुपकी खड़ी सुनती रही। अचानक किसी अनदेखे हाथ ने सीढ़ी खींच ली और उसका भी वही हश्र हुआ जो  Humpty Dumpty का दीवार गिरने के बाद हुआ था:

And all the king’s men and all the king’s horses could not put Humpty Dumpty together again.

जब कोई मूसा सामरी का तिलिस्म (जादू) तोड़ता है और अपने समय के किसी फ़िरौन की लाश लोक- सागर में ग़र्क़ होती है तो समुद्र की तह में सीधी उस कूड़े और विष्ठा पर जाकर टिकती है जो उसने फेंका या फेंकने दिया था। फिर जब चौदहवीं का चाँद चाँदनी छिटकाता है तो बिफरा हुआ समुद्र उस लाश को उछाला देकर सबकपूर्ण समुद्र तट पर फेंक देता है और डेढ़ फ़ुट चौड़ी दीवार पूछती है:

हरा समुन्दर, मेरे अन्दर
बोल मेरी मछली कितना पानी
------------       इतना पानी
हरा समुन्दर, मेरे अन्दर
बोल मेरी मछली कितना पानी
(डूबते हुए) ---- पानी ही पानी!

प्रोफ़ेसर हारून रशीद ने वर्तमान परिस्थितिओं पर टिप्पणी के लिए दो पृष्ठों की फ़रमाइश की थी। वक़्त बहुत कम था। जल्दी में दस पन्ने काले कर डाले। दो पृष्ठों में बात कहने के लिए बहुत वक़्त और सलीक़ा चाहिए।

ज़िक्र* जब छिड़ गया क़यामत का
बात पहुँची हुकुम रानी तक

(*ज़िक्र जब छिड़ गया क़यामत का
बात पहुँची तेरी जवानी तक 

सही उच्चारण ‘हुक्म’ है। कुछ लोग शायद अधिक ही आज्ञाकारिता दिखाने के लिए ‘हुकुम’ कहते हैं। मसलन क्या हुकुम है? हुकुम करो। हुकुम का ग़ुलाम।)

मैं नहीं कह सकता कि जिन वाक़यात व परिस्थितिओं पर मैंने गुफ़्तगू की है उन्हें वर्तमान हालात की श्रेणी में शुमार करेंगे या नहीं: बहरहाल-

यही कुछ है मता-ए-फ़क़ीर 

(मता-ए-फ़क़ीर-फ़क़ीर (इस तुच्छ) की पूँजी; माल,)

अब कुछ और बातें हो जाएँ।

अनुवादक: डॉ. आफ़ताब अहमद

वरिष्ठ व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


संदर्भ

1 ‘तहतुल-लफ़्ज़’ में सुनाना: शेर को पढ़कर सुनाना; इसका विलोम है ‘तरन्नुम में’ अर्थात गाकर सुनाना।
2 हुस्न-ए-तवारुद (भावसाम्य)—एक ही चीज़ का दो जगह उतरना या एक ही विचार एवं भाव का दो अलग-अलग कवियों के यहाँ पाया जाना। इसके कारण बाद वाले कवि पर कोई साहित्यिक चोरी का आरोप लगा सकता है, लेकिन यदि दो बड़े कवियों के यहाँ विचार या भाव साम्य होता है तो इसे साहित्यिकी चोरी के बजाय सुन्दर-संयोग माना जाता रहा है। उदाहरण:
            ज़ुबान-ए-यार-ए-मन तुर्की व मन तुर्की नेमी दानम
            चे ख़ुश बूदे अगर बूदे ज़ुबानाश दर दहान-ए-मन      (अमीर ख़ुसरो)
अर्थात मेरी प्रेयसी की ज़ुबान तुर्की है और मुझे तुर्की नहीं आती। कितना अच्छा होता अगर उसकी ज़ुबान मेरे मुँह में होती।
            कुश्ता हूँ मैं तो शीरीं जुबानी-ए-यार का
            ऐ काश वह ज़ुबान हो मेरे दहन के बीच          (मीर तक़ी मीर)
अर्थात मैं तो अपनी प्रेयसी की ज़ुबान की मिठास का मारा हुआ हूँ। काश वह ज़ुबान मेरे मुँह के बीच में हो! 
3 मिर्ज़ा ग़ालिब के निम्नलिखित शेर की पैरोडी: 
            हम सुखन-फ़हम हैं ग़ालिब के तरफ़दार नहीं
            देखें इस सेहरे से कहदे कोई बढ़कर सेहरा
(सुखन-फ़हम: काव्य मर्मज्ञ)
4 मुग़ल बादशाह बाहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद शेख़ इब्राहीम ‘ज़ौक़’ के निम्नलिखित शेर की ओर संकेत:
            शब को मैं अपने सर-ए-बिस्तर-ए-ख़्वाब-ए-राहत
            नश्शा-ए-इल्म में सरमस-ए-ग़ुरूर-ओ नख़वत
अर्थात रात को मैं अपने सुखद स्वप्नों वाले बिस्तर पर, ज्ञान के के नशे में अभिमान व अहंकार से मदहोश...
5 मोमिन खाँ मोमिन के निम्नलिखित शेर की पैरोडी:
            वह जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
            वही वादा यानी निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
6 अल्लामा इक़बाल के निम्नलिखित मिसरे (पंक्ति) की पैरोडी:
            निगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें
7 अल्लामा इक़बाल के निम्नलिखित शेर की पैरोडी:
            जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें 
            बन्दों को गिना करते हैं तौला नहीं करते
8 तईं:  को, के लिए। पुरानी उर्दू में ‘ख़ुद को’ या ‘ख़ुद के लिए’ के अर्थों में ‘अपने तईं’ का प्रयोग बहुत आम था, जो अब अप्रचलित हो गया है। इसी प्रकार इसके अन्य प्रयोग भी थे। मसलन ‘उसके तईं’, ‘हमारे तईं’, ‘तुम्हारे तईं’ इत्यादि। बहुत से पुराने शब्दों के अप्रचलन से यूसुफ़ी साहब दुखी हैं और अपनी रचनाओं में अक्सर इसका ज़िक्र करते हैं।  
9 इस्तिंजा – पानी उपलब्ध न होने पर मुसलमानों द्वारा पेशाब करने के बाद सूखी मिट्टी के ढेले को लिंग के छिद्र पर रखकर मूत्र को सुखाने और इस प्रकार शरीर को पवित्र रखने की क्रिया।

10 सिराज औरंगाबादी की निम्नलिखित पंक्ति की परोडी:
            चली सिम्त-ए-ग़ैब से इक हवा कि चमन सुरूर का जल गया
ग़ैब (शून्य) को शर्क़ (पूरब) से बदल कर पैरोडी की है। बंगलादेश के पाकिस्तान से पृथक होने से पूर्व की परिस्थितियों की ओर संकेत है। 
11 उर्दू वर्णमाला में “ज़” की आवाज़ के लिए चार अक्षर हैं—“ज़ाल” (ذ), “ज़े” (ز), “ज़्वाद” (ض) और “ज़ो” (ظ) । ज़ियाउलहक़ में  “ज़” की आवाज़ के लिए “ज़्वाद” (ض) अक्षर प्रयुक्त होता है, जबकि ‘ज़ियाबीतस’ की “ज़” के लिए —“ज़ाल” (ذ)अक्षर प्रयुक्त होता है।

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