ग़ज़लें: आरती कुमारी

आरती कुमारी
1. ग़ज़ल

अंधियारा है खूब घना दिनकर बनने की सोचें
हर दिन हर पल ख़ुद को हम बेहतर करने की सोचें

सबके दुख की रामकहानी कौन सुनेगा बोलो
लोगों की पीड़ा को हरदम अब हरने की सोचें

जीना मुश्किल है यह माना पर जीवन का मोल बहुत
जीने से पहले ही आख़िर क्यूँ मरने की सोचें

ज़ुल्म का शासन ख़ूब हुआ है सिर को धुनना छोड़ें
क़िस्मत को कोसेंगे कब तक क्यूँ सहने की सोचें

मंदिर मस्जिद धर्म की बातें हमको छलती रहतीं हैं
ईश्वर की संतान हैं हम सब क्यूँ लड़ने की सोचें
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2. ग़ज़ल

हर तरफ़ है शोर जारी, ख़ौफ़ तारी है
मन व्यथित है साँस भारी, ख़ौफ़ तारी है

वक़्त है हम चुप न बैठे हाथ बांधे यूँ
अब तो लें कुछ ज़िम्मेदारी, ख़ौफ़ तारी है

हर घड़ी है सबके मन में सोच यह हावी
कब यहाँ पर किसकी बारी, ख़ौफ़ तारी है

ज़ात मज़हब नस्ल पैसा, कुछ नहीं देखे
इसके आगे सब भिखारी, ख़ौफ़ तारी है

खबरें मुर्दों से भरीं, चैनल से रिसता खूं
ख़ौफ़ में आवाम सारी, ख़ौफ़ तारी है

ये सियासत मौत पे भी जश्न है करती 
कुछ कमी इसमें हमारी, ख़ौफ़ तारी है
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3. ग़ज़ल

स्वप्न है परिदृश्य बदले प्रेम ही आधार हो 
मिट सकें ये दूरियाँ आशा भरा उद्गार हो 

शोषितों को वंचितों को हक़ मिलें उनके सभी 
हर दिशा में हर विधा में उनका भी अधिकार हो

हाशिये पर जो खड़े हैं मन में कड़वाहट लिए
उनको हो मुखपृष्ठ हासिल उनका भी उद्धार हो

न्याय के गलियारे में मत बैठो पट्टी बाँधकर
झूठ के पर्दे हटें सच्चाई का विस्तार हो 

पिस रही घर और दफ़्तर में जो चक्की सी सदा
ऐसी नारी जाति का सम्मान हो श्रृंगार हो॥

1 comment :

  1. बेहद सुंदर कविताएं और गज़ल

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