कहानी: गूढ़ रहस्य

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

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वक्त भी कभी कैसी-कैसी करवट ले लेता है? यों जीवन में बदलाव आते रहते हैं पर कभी देखते-देखते चीजें बदल जाती हैं। आज इस नये शहर में पुल पर खड़े ताप्ती के जल-प्रवाह को देखते स्मृतियों के जमघट में योगेश को याद आया पांच दशक पहले का वह समय जब ऐसे ही इलाहाबाद में गंगा के पुल पर खड़े उम्र के आरम्भिक पड़ाव पर उनका युवा मन आंदोलित हो उठा था। वह बदलाव था पर्वतांचल स्थित घर-परिवार का छूटना जब विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई के लिये दाखिला लिया। आज अवकाश-प्राप्ति के बाद वक्त  की एक और करवट उन्हें एकदम अजनबी से शहर मे ले आई जब उन्हें और उनकी पत्नी नीलिमा को बेटे के निकट होना कुछ जरूरी लगने लगा और वे सुदूर गुजरात स्थित सूरत स्थानांतरित हो गये। लेकिन जगह बदल देना इतना आसान भी नहीं था उनके लिये, सिर्फ शहर ही नहीं छूटा अपितु कई दशकों के सम्पर्क सूत्र छिन्न-भिन्न हो गये। हाँ,उनकी पत्नी नीलिमा के लिये कोई खास फर्क नहीं हुवा था। बेटा मोहित सूरत से दो सौ मील की दूरी पर अपनी फैकट्री की टाउनशिप में था और वे यहाँ। वह हफ्ते या पन्द्रह दिन मे घर आ जाया करता जबकि इलाहाबाद में साल में एक बार ही आना हो पाता; शायद यह मुख्य वजह थी इलाहाबाद स्थित अपना मकान बेचकर यहाँ चले आने की। वजह दरअसल मनोवैज्ञानिक स्तर पर ज्यादा थी। कभी जरूरत होने पर मोहित का कुछ ही घंटों में आ सकना। तब क्या मालूम था कि कोरोना काल में कुछ  घंटों का सफर कई महीनों में रूपांतरित हो सकता है।

लेकिन यह तो सपने में भी नहीं सोचा था कि यहाँ आते ही ये मंजर देखने को मिलेगा। जीवन यों तो सामान्यतया अपनी चाल चलता रहता है पर कभी वक्र गति भी दिखा सकता है यह तो हर एक को मालूम है और योगेश को भी मालूम था। लेकिन शायद यह कम ही लोगों ने सोचा होगा कि आप अपने ही घर में दो महीने से ज्यादा की कैद झेलने पर मजबूर हो जाय। और आप ही नहीं, हर एक अपनी-अपनी जगह पर जड़वत हो जाय। नगर थम गया, देश थम गया और सारा विश्व ही थम गया और संक्रमण था कि थमने का नाम नहीं ले रहा था।

शहर में आये करीब चार महीना ही हुवा था। मोहित ने पहले से सारी तैयारी कर ली थी मकान किराये पर लेना और सभी जरूरी चीजों का भी इंतजाम। अपने साथ लाया गया सामान धीरे-धीरे खोला जा रहा था और जीवन नये माहौल में व्यवस्थित हो रहा था कि ये बवंडर आ पहुँचा। अब न मोहित का आना संभव था और न उनका कहीं जाना। देखते-देखते लाकडाउन का भी दो महीना होने को आया पर संक्रमण था कि काबू मे आता नहीं दिख रहा था। एक अजनबी शहर में एकदम अकेले और निरुपाय। ऊपर से तनाव भी कि घर से जरूरी सामान या दवा लेने जाना हो तब मास्क पहनो और बाहर से लौटने पर या बाहर से लाया गया सामान छूने के बाद हाथ अच्छी तरह धोना भी जरूरी। और ये सैनिटाइजर – इसका नाम भी शायद ही लिया हो पिछले कई दशकों में आज हवा और पानी की तरह जिंदगी का आवश्यक अंग बन गया लगता है।

भला यह भी कोई जिंदगी है? लेकिन इसको बचाना है तो यह भी करना होगा। योगेश दवा लेने के लिये निकले ही थे कि देखा सिर पर सामान की गठरी लादे लोग पैदल चले जाते थे याद आया कि संभवत: प्रवासी श्रमिक अपने घरों को चल पड़े हैं इसकी चर्चा कुछ समय से जारी थी। जब दो माह के बाद भी हालात में सुधार न दिखाई दिया और निकट भविष्य में भी आशा की किरण न दीख रही हो तब यह तो होना ही था। जिनके पास कोई कमाई का साधन न हो और आगे अनिश्चितता हो तब इसके अलावा वे और कर भी क्या सकते थे? यह कोई विकल्प  की बात न थी खालिस मजबूरी थी अन्यथा कौन सैकड़ों-हजारों मील की दूरी तय करने पैदल ही निकल जाता है। यह एक दैवी प्रकोप जैसा ही था पर बहुत कुछ इंसान की अपनी नाकामियों की वजह से भी था।

देखते-देखते पूरे दो महीने गुजर गए और साठ दिनों की तालाबंदी ने योगेश को हिला कर रख दिया। बात सिर्फ अजनबी शहर में अजनबी लोगों के बीच इस मुश्किल समय  को बिताने भर की बात ही न थी बात इसके आगे भी थी। साठ दिनों से वही बात सुबह, शाम, दिन और रात, रेडियो हो  या दूरदर्शन - वही एक चर्चा सुनते एक डर का माहौल लोगों को तनावग्रस्त करता जा रहा था और योगेश भी अपवाद न थे। जब देह अधिक क्रियाशील न हो तब मन ज्यादा उछल-कूद करने लगता है। योगेश का मन भी भानुमती का पिटारा बन गया था इस संक्रमण एवं तालाबंदी काल में। अपने रिश्तेदारों और मित्रों में योगेश हमेशा एक द्दढ़ इच्क्षाशक्ति, वैचारिक परिपक्वता और तर्कपूर्ण निर्णयों के लिये जाने जाते थे और उनसे राय-मशविरा करने की जरूरत अक्सर लोगों को महसूस होती पर देखते-देखते वे खुद एक मनोरोगी की अवस्था में पहुँचने लगे थे। वजह वही थी तालाबंदी، एक डर का माहौल, और जैसा पहले जिक्र किया गया है देह-मन के द्वन्द में देह का शैथिल्य मन को जरूरत से ज्यादा क्रियाशील बना देता है और मुश्किल हालातों में ऋणात्मक पहलू ही अधिक उभर जाते हैं। योगेश अक्सर सोचने लगते अगर कोई परेशानी की बात हुई तब इस अजनबी शहर में नितांत अकेले रह जायेंगे और जिसकी वजह से इतनी दूर आकर बसने की सोची वह भी फिलहाल जरूरत होने पर भी नहीं आ सकता। दुश्चिंताऐं जब हावी होने लगें तब मन पर कहाँ नियंत्रण रह पाता है। अक्सर नींद में ही बड़बड़ाने लगना, या सपना देख चौंक कर उठ बैठना आम बात हो गई थी। अब तो डरावने सपने देखना आम बात हो गई थी।

अब उस रात ही तो वे हाँफते उठ बैठे थे क्या अजीबोगरीब सपना था: योगेश स्वयं एक डाक्टर हैं ड्यूटी पर; मरीज बाहर लाइन में खड़े हैं उन्होंने नर्स को कहा एक-एक कर बुलाओ। नर्स ने बताया कि लाइन तो बहुत लम्बी है हो सकता है शाम तक भी काम पूरा न हो सके। डाक्टर उठे कि चलो देखें क्या हाल है लाइन कितनी लम्बी है; वे चलते गये लेकिन दूसरा छोर नजर नहीं आया। तभी लाइन में खड़े कुछ लोगों ने पहचान लिया, बोले ये डाक्टर बाहर मस्ती कर रहा है और हम अपनी बारी के इंतजार में घंटों से खड़े हैं; आवाजें आने लगीं, मारो साले को। योगेश दौड़े भीड़ के आक्रोश से बचने को लेकिन ठोकर खाकर गिर पड़े और आँख खुल गई। उनका दिल अभी भी तेजी से धड़क रहा था। यह महज एक दिन की बात न थी अब करोना के अलावा और कोई सपना आता ही न था।

उधर उनकी पत्नी नीलिमा इस बदलाव को साफ महसूस कर रहीं थी। सबसे अजीब बात तो यह कि हमेशा से डरी-सहमी सी रहने वाली नीलिमा अब इस मुश्किल दौर में अपेक्षाकृत अधिक संतुलित और संयमित लगने लगी थी जबकि योगेश पर इन सबका असर अधिक हो रहा था। दोनों की भूमिकाऐं जैसे बदल सी गईं थीं। एक दिन नीलिमा से न रहा गया और बोल उठी:
- क्या हर वक्त आलतू-फालतू सोचते रहते हो और डायरी में कुछ लिखते रहते हो?
- तो क्या करें; बाहर जाने को तुम ही मना करती ही और कहती हो निकलो भी तो बिना मास्क लगाये मत निकलो। इसे पहन के तो मैं साँस भी नहीं ले पाता।
- अरे सारी दुनिया लगाती है तुम क्या अनोखे हो। कभी मन बहलाने छत पर चले जाया करो, कुछ व्यायाम भी किया करो, देखो तोंद निकल आई। कल ही से छत पर जाकर व्यायाम करोगे। और ये जो आलतू-फालतू हर वक्त सोचते रहते हो बंद करो इसे।

कुछ समय पहले तक इस तरह की फालतू न सोचने की नसीहत वे पत्नी को दिया करते थे पर आज वे उन्हें समझा रही थीं। योगेश को लगा बात तो ठीक ही कह रही हैं शरीर क्रियाशील होगा तो स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ मन भी स्थिरता की ओर अग्रसर होगा। खाली बैठे-बैठे मन में सब तरह की ऊल-जलूल बातें आती रहती हैं और हर वक्त वही संक्रमण की खबरें एक डर का माहौल पैदा कर देती हैं। उन्होंने अगले दिन से ही एक नई शुरूवात करने का मन बनाया।
                                                 
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पंद्रह दिन और निकल गये और कुछ सुधार होता न देख लॉकडाउन में थोड़ा ढील देना आरम्भ हुआ लेकिन संक्रमण की रफ्तार भी बढ़ जाने से आने-जाने की पाबंदियाँ बनी रहीं खासकर दूर के स्थानों के लिये। हाँ रात का कर्फ्यू लागू कर दिया ताकि श्रमिकों की आवाजाही को रोका जा सके। बसें अब भी केवल शहर के अंदर कुछ जगहों पर चल रही थी और इंटर-सिटी का अभी सवाल ही नहीं था। योगेश भी नहीं चाहते थे कि मोहित कोई खतरा मोल ले क्योंकि यात्रा करने में सावधानियाँ रखना आसान न था और फिर अनावश्यक जोखिम लेने में कोई समझदारी न थी। सबसे बड़ा डर तो क्वारंटीन किये जाने का था। यह बात उन्होंने मोहित से साफ कर दी थी कि फिलहाल अपनी ही जगह पर बने रहना ठीक होगा। पर उनके मन के अंदर का तूफान थमने का नाम नहीं लेता था। व्यायाम शुरू करने के बाद भी मन की उथल-पुथल कुछ कम तो हुई पर कुछ दिनों के बाद फिर वही डर का माहौल जारी रहा। तरह-तरह की खबरें और अफवाहें डर के माहौल को और ज्यादा सघन कर देती थीं।
अब कभी-कभी वे मास्क पहन अधिक दूर तक टहलने चले जाते और कभी जरूरी सामान और दवा के लिये भी निकलना हो जाता।

उस शाम योगेश सुनसान सड़क पर जरा आगे तक चले गये। देखा एक युवक सिर पर एक गठरी लिये जा रहा था। मास्क की वजह से चेहरा तो नहीं दीख रहा था पर लगता था पचीस साल के आसपास उम्र रही होगी। चौराहे पर खड़ा वह असमंजस में लगता था। उसने योगेश से पूछा-
- काका, हाईवे आठ के लिये यही रास्ता होगा?
- माफ करना भाई, मैं तो एकदम नया हूँ मुझे यह भी मालूम नहीं कि हाइवे आठ कहाँ है और कहाँ जाता है? लेकिन तुम जा कहाँ रहे हो?
- मैं प्रयाग के पास अपने गाँव जा रहा हूँ।
- इतनी दूर और वह भी पैदल ही।
- हमारे साथ के कुछ लोग ट्रक में बैठकर चले गये पहले।
- तुम साथ नहीं गये?
- तीन हजार किराया मांग रहा था आप ही बतायें इतना रुपया देना और वो भी जानवरों की तरह ट्रक में ठूंस देना। मेरे पास इतना रुपया था भी नहीं, जो था वो दो महीनों में किराया और भोजन का जुगाड़ करने में निकल गया। मेरे पास तीन हजार होता भी तो मैं ट्रक में कभी ना जाता।
- लेकिन पैदल, वो भी अकेले। ट्रक में बैठकर जाना फिर भी बेहतर है पैदल के मुकाबले।
- देखो काका, कुछ लोग उधर जाने वाले मिल ही जायेंगे। मेरे कुछ परिचित बड़ौदा से चलेंगे। रही पैदल जाने की बात, तो संक्रमण का खतरा पैदल जाने में कम है। ट्रक में तो समझो एक भी संक्रमित हुआ तो सब हो जायेंगे। 
- बात तो पते की कही तुमने। लेकिन कुछ दिन और रुकना ठीक नहीं समझते। हालात में कुछ सुधार हो जाय, शायद।
- ढाई-तीन महीने से इसी आशा में रुके थे कि कुछ सुधार होगा पर हालात बिगड़े ही हैं। आसार नहीं हैं काम शुरू होने के और यहाँ किराया भी नहीं दे सका तो मकान मालिक बाहर कर देगा। कोई और रास्ता नहीं।
- हाँ, हालात मुश्किल तो हैं। लेकिन इस तरह जाने में खतरा काफी है।
- खतरा क्या यहाँ नहीं है? यहाँ भूख से मरने से अच्छा यही है घर की ओर प्रस्थान किया जाय। अगर मर गया तब यह संतोष होगा कि घर जाने की कोशिश में मरा और यह भी कि घर से कुछ पास जाकर मरा। वैसे भी काका ऐसा कौन सा सुख है जिसके लिये जिंदगी का इतना मोह हो।
यह कह वह मुस्कराया, कुछ रुका, झोले से बोतल निकाल एक घूंट पानी पिया औेर बोला:
- काका आप हँसोगे मेरी बेवकूफी की बात पर। घर जाकर सोचोगे एक सिरफिरे से मुलाकात हुई थी। पर मैं बिलकुल सच कह रहा हूँ जो मेरे मन में है।
- बिलकुल नहीं। यह बेवकूफी नहीं तुम्हारी सोच का सयानापन है। तुम बेवकूफ नहीं, समझदार और विवेकशील हो। मैं तुम्हारे लिये क्या कुछ कर सकता हूँ?
मैंने अपनी जेब टटोली उसमें दवा के लिये जरूरी रुपयों के अलावा करीब तीन-चार सौ बचते थे। मैंने कहा:
- बेटा, रख लो, लम्बा सफर है काम आयेंगे।
- अरे नहीं काका, मैं कहाँ लौटा पाऊंगा।
- अरे, कोई उधार थोड़े ही दे रहा हूँ।
- फिर भी, इतना. . . .
- तुमने बताया प्रयाग की तरफ जाना है, किस जगह?
- शंकरगढ़, करीब पंद्रह मील है प्रयाग से।
- अरे तुम नैनी से ही शंकरगढ़ की ओर चले जाओगे।
मेरी इस बात से वह कुछ चौंका, बोला -
- अरे काका, आप उधर के बारे में काफी जानते हैं, कभी गये होंगे?
- मैं वहीं विश्वविद्यालय में पढ़ा और नौकरी भी वहीं की थी पूरे चालीस साल। 
 मेरा प्रयाग कनेक्शन काम कर गया और उसने रुपये रख लिये मेरा फोन नंबर लेना न भूला, बोला:
- अगर जिंदा रहा तो आपको सूचित जरूर करूंगा घर पहुँचने पर।
- वो तो करोगे ही; तुम रास्ते से भी फोन करके बता सकता हो कितना सफर तय हो गया।
- ठीक है काका।   
उसने मुझे झुक कर नमस्कार किया और चल  पड़ा, जाते-जाते बोला:
- काका, आपको भूलूंगा नहीं।
- अरे, मैं कौन तुमको भुला देने वाला हूँ। मुझे तुम्हारी बातें हमेशा याद रहेंगी। अपना ख्याल रखना।
 योगेश जब लौट रहे थे युवक के शब्द उनके मन में गूंज रहे थे:
यहाँ भूख से मरने से अच्छा यही है घर की ओर प्रस्थान किया जाय। अगर मर गया तब यह संतोष होगा कि घर जाने की कोशिश में मरा और यह भी कि घर से कुछ पास जाकर मरा। वैसे भी काका जिंदगी में ऐसा कौन सा सुख है जिसके लिये जिंदगी का इतना मोह हो।

एक उथल-पुथल मची थी योगेश के मन में इन शब्दों को लेकर; ऐसा लगा जैसे इसमें कोई गूढ़ रहस्य, कोई दर्शन छुपा हो। वह गूढ़ रहस्य या दर्शन भले उनकी समझ में न आया हो पर बात उनके मन-अभ्यंतर में बहुत गहरे उतर गई। उनके गहन-मन की परतों में एक रूपांतरण सा होने लगा। सबसे बड़ी बात उनके मन का बोझ, दुश्चिंताओं का हुजूम अब कुछ थमने सा लगा था। वह युवक और उसका सोच उनके लिये जैसे प्रेरणा स्रोत बन गये। ऐसा लगा जैसे उन्हें कोई गुरु मिल गया हो जिसने जीवन का गूढ़ रहस्य उन्हें  समझा दिया महज दो वाक्यों में। योगेश को अपनी चिंताऐं, परेशानियाँ उस युवक और वैसे ही हजारों लोगों की तुलना में बहुत साधारण नजर आने लगीं। योगेश को लगा वे कुछ-कुछ अपने पुरानी खोई हुई लय पकड़ रहे थे। उन्हें जरा भी संदेह नहीं था कि उस युवक से साक्षात्कार उनके लिये प्रेरणादायी था। मन ही  मन उन्होंने उस अनाम गुरु को वंदन किया।

उस रात पहली बार उन साठ-पैंसठ दिनों में योगेश गहरी नींद सोये; न बड़बड़ाना, न चौंक कर उठ जाना। नीलिमा की पारखी नजरों से यह बदलाव कहाँ छुप सकता था और उसके अब तक शांत मन में दूसरे तरह की उथल-पुथल शुरू होने लगी कि जरूर कहीं कोई नशा-वशा करके आये हैं। आज जब घर से निकले तब रोजाना की तरह लग रहे  थे लेकिन लौटते वक्त मस्ती में कुछ गुनगुनाते आ रहे थे। यह देख खुश भी थीं कि चलो अपने पुराने ढर्रे पर आने लगे हैं पर यह इतना अचानक कैसे हो सकता है? कुछ गड़बड़ जरूर है। सारे संक्रमण के दौरान काफी संतुलित नीलिमा अब चिंता में पड़ गई। उसका शक और बढ़ गया जब रात बड़बड़ाने या चौकने के बजाय वो पुराने स्टाइल पर खर्राटे भरकर सो रहे थे।

पिछले पंद्रह दिनों से नीलिमा के कहने-सुनने पर सुबह कसरत के लिये छत पर जाने लगे थे लेकिन उसके अगले दिन काफी देर हो गई तब भी बैठे ही रहे। नीलिमा बोलीं:
- व्यायाम के लिये रोज टाइम पर जाते हों। आज क्या बात है? तबियत ठीक है ना।
- हाँ हाँ ठीक है। मुझे हुवा ही क्या है?
- तो जाओ यह काम कर आओ तब तक चाय तैयार करती हूँ.
- अरे चले जायेंगे, वैसे अब उसकी कोई खास जरूरत है नहीं।

नीलिमा को गुस्सा आ गया:
- चार दिन व्यायाम करने के बाद अब कोई जरूरत नहीं रही। चलो अभी उठो और सीधे जाओ।
योगेश छत की ओर बढ़े और नीलिमा ने चाय का पानी चूल्हे पर रखा. लेकिन वो नशे वाला शक अभी उनके मन से निकला नहीं था। योगेश की अनुपस्थिति में कमीज और पैंट की जेबें टटोल कर देख लीं कि कोई पुड़िया-वुड़िया या गोली मिले; पर रोजाना की एसिडिटी  वाली टेबलेट के सिवा कुछ मिला नहीं। उनके मेज की ड्रॉअर में भी कोई आपत्तिजनक चीज न मिल सकी। नीलिमा का चित्त कुछ शांत हुवा कि चलो अच्छा है धीरे-धीरे पुरानी लय पर खुद ही आने लगे कोई ऐसी-वैसी बात नहीं। लेकिन कुछ तो हुआ जरूर है भले नशे वाली बात न हो। किसी ने कोई जादू-टोना..., नहीं-नहीं, ये सब ऊल-जलूल  क्या सोचने लगी?

उन्होंने सीधे पूजाघर की ओर प्रस्थान किया माथा टेका और वापस आकर चाय तैयार करने में जुट गईं। अब चित्त शांत था लेकिन योगेश का वह रहस्यमय रूपांतरण अब भी उनको दुविधा में डाले हुए था। 
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