कहानी: जीतू सब समझता है

- रमाकांत शर्मा

एक दिन पहले ही हमने इस फ्लैट में शिफ्ट किया था। पैकिंग खोल कर सारे सामान को यथास्थान लगाने का काम थकान के मारे अधूरा ही छूट गया था और हम याने मैं और सीमा बाजार से अपने साथ लाए सैंडविच खाकर बिस्तर पर पड़ते ही नींद के आगोश में समा गए थे। 

अभी पूरी तरह से दिन उगा भी नहीं था कि डोर बैल की कर्कश आवाज से हम दोनों ही हड़बड़ा कर उठ बैठे। कौन आया होगा, अभी तो हम यहाँ किसी को जानते भी नहीं हैं, यह सोचते हुए मैंने उनींदी आँखों से दरवाजा खोला तो बाहर एक सामान्य कद के, गठीले बदन वाले और गहरे श्यामवर्णी व्यक्ति को खड़े पाया जिसने एक पुराना सफारी सूट पहना हुआ था। मेरी आँखों में उगे प्रश्न को नजरअंदाज करते हुए, उसने अपने घुंघराले बालों में हाथ फिराते हुए और दरवाजे के बाहर कोने में पड़े खोले गए पैकिंग के कागजों और डिब्बों के ढ़ेर की तरफ इशारा करते हुए कहा – “यह सब क्या है?”

“हमने कल ही शिफ्ट किया है। यह सब खुले हुए पैकिंग का सामान है।”

“वो तो मैं भी देख रहा हूँ। पर, इस ढ़ेर को उठाएगा कौन?”

“सोसायटी का कचरे वाला तो आता ही होगा, वही उठा ले जाएगा” – मैंने कहा।

“मैं ही हूँ, इतनी बड़ी सोसायटी के सारे फ्लैटों का कचरा मैं ही उठाता हूँ। पर यह कचरा है या कचरे का पहाड़?” उसने सख्त से लहजे में कहा।

मैं आश्चर्य से भर उठा। वह अपने पहनावे और बात करने के ढंग से कहीं से भी कचरा उठाने वाला नहीं लग रहा था। मैंने अपने अंदर के आक्रोश को दबाते हुए मुलायम स्वर में कहा – “अब भई, घर का पूरा सामान शिफ्ट किया है तो पैंकिंग का इतना सामान तो होगा ही। बाद में तो रोजाना वही एक छोटा डस्टबिन भर कर ही कचरा निकलेगा।”

“देखिए साहब, बाद की बात तो बाद की है। वह तो मेरा काम है, जिसके लिए मुझे पगार मिलती है। पर, इतना सारा कचरा उठाने का काम मेरा नहीं है। इसके लिए आपको अलग से 200 रुपये देने पड़ेंगे।”

उसकी इस हठीली अदा से मेरा दिमाग भन्ना गया था, मैंने पूछा था – “नाम क्या है, तुम्हारा? मैं सोसायटी के सेक्रेट्री से बात करूंगा।”

“नाम तो मेरा जीतन राम है, पर पूरी सोसायटी छोड़ो, पूरी गली मुझे जीतू के नाम से जानती है। अच्छा, आप जल्दी नक्की करो, दो सौ रुपये देते हो तो कचरा उठ जाएगा, नहीं तो बाद में मुझसे कुछ मत कहना। सेक्रेट्री को भी पता है, जीतू के बिना सोसायटी का काम नहीं चलता। इधर-उधर के सारे काम मैं ही संभालता हूँ।”

“देखो जीतू, कल जिस टेम्पो में सामान आया था, उसका खलासी कह गया है, वह आज आकर पैकिंग के सारे डिब्बे ले जाएगा और 150 रुपये भी देकर जाएगा। देख लो 200 रुपये में तो ये सारा सामान वैसे ही बिक जाएगा। तुम सोसायटी के आदमी हो तो पहला अधिकार तुम्हारा बनता है इस पर। नहीं तो वह खलासी शाम तक आ ही जाएगा।”

जीतू ने बुरा सा मुंह बनाया। कुछ देर वह खड़ा-खड़ा सोचता रहा फिर बोला – “ठीक है, आप सौ रुपये दे दो। कचरा उठ जाएगा।”

मैंने भी बात को आगे न बढ़ाने की गर्ज से और यह सोच कर सौ रुपये देने के लिए हाँ कर दी कि आखिर रोज-रोज उसी आदमी से तो पाला पड़ने वाला था।

थोड़ी ही देर में जीतू के साथ दो आदमी बोरियां लेकर आ गए थे और पूरा कचरा मिनटों में साफ हो गया था।

दूसरे दिन वह मुझे नीचे लॉबी में झाड़ू लगाता मिला। मैंने चलते-चलते ही उससे पूछा – “कैसे हो जीतू?”

उसने झाड़ू लगाना छोड़कर मेरी तरफ देखा और फिर मुस्करा कर बोला – “ठीक हूँ, सर जी। अब तो आप इस सोसायटी में आ गए हैं, कोई जरूरत हो तो बताना। जीतू हमेशा हाजिर मिलेगा।”

मैंने भी उसकी मुस्कान का जवाब मुस्कान से दिया और “ठीक है”, कह कर आगे बढ़ गया।

सोसायटी के  दो सौ से से कुछ ज्यादा फ्लैटों से कचरा उठाने के अलावा वह पूरी सोसायटी में सफाई का काम करता था। लोगों की कारें और स्कूटर धो देता था। किसी के यहाँ कोई फंक्शन हो तो उनका सामान उठाने-धरने में हाथ बंटा देता। कैसा भी काम हो, बस जीतू को याद करो और वह सचमुच हाजिर हो जाता। हाँ, यह सब काम वह फ्री में नहीं करता था। मेहनत करता तो मेहनताना उसे मिलना ही चाहिए, ऐसा उसका मानना था। लोग भी उसे निराश नहीं करते थे।

उस दिन घंटी बजने पर जब मैंने दरवाजा खोला तो जीतू को कुछ लोगों के साथ खड़े पाया। मेरी प्रश्न भरी निगाहों के जवाब में वह बोला – “सर जी, अपनी गली में हर साल गणपति बप्पा का दरबार लगता है। बिसर्जन तक खूब धूमधाम रहती है। उसके लिए चंदा लेने आए हैं।” 

मैंने जेब से सौ रुपये का नोट निकाल कर उनकी और बढ़ाया तो वह बोला – “क्या सर जी, साल में एक बार गणपति के लिए चंदा लेते हैं। आपको कम से कम दो सौ इक्यावन तो देने चाहिए।”

मैंने बिना कोई बहस किए उन्हें दो सौ इक्यावन रुपये पकड़ाए तो सब खुश हो गए। चंदे की रसीद पकड़ाते हुए जीतू ने कहा – “सर जी, दूसरी गलियों के लोग भी गणपति का चंदा मांगने आ जाते हैं, आपको और किसी को नहीं देना है। यह रसीद दिखा देना और कह देना जीतू की टोली को चंदा दे चुके हैं। फिर कोई कुछ नहीं बोलेगा।” सभी ने सिर हिलाया और फिर वे सीढ़ियां उतर गए।

मैं जीतू को जाते देख रहा था, उसने झकाझक सफेद कुर्ता और पजामा पहना हुआ था। गली के तमाम लड़कों का नेता बना हुआ वह सधे हुए कदमों से सीढ़ियां उतर रहा था। कुछ तो था जीतू में, जब वह अपना काम कर रहा होता तो कच्छे-बनियान में या फिर लुंगी और कमीज में होता। उसके बाद उसका एक दूसरा ही रूप होता, वह साफ-सुथरे कपड़े पहनता, लोगों से बराबरी के स्तर पर बात करता और सोसायटी ही नहीं, गली के सारे कामों में आगे खड़ा नजर आता। उसने सही कहा था कि उसके बिना किसी का काम नहीं चलता। सचमुच हर अच्छे बुरे मौके पर जीतू आगे खड़ा नजर आता।

उस दिन मैं कुछ सामान लेने के लिए गली से गुजर रहा था, तभी पीछे से आता एक स्कूटर जोरों से ब्रेक मारता मेरे पास आकर रुका। मैं चौंक कर उछल ही पड़ा था। स्कूटर वाले को कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी वह जानी-पहचानी आवाज कानों में पड़ी – “सर जी, देखो मैंने स्कूटर खरीदा है। कैसा लगा?”

मैंने स्कूटर पर सवार जीतू को देखा, वह बाबू साहब बना नए स्कूटर पर सवार था। मैंने अपने विस्मय को दबाते हुए कहा – “क्या बात है जीतू, बहुत सुंदर स्कूटर खरीदा है। अब तो तुम स्कूटर वाले हो गए।”

“हाँ, सर जी। बहुत दिन से मन था कि अपना स्कूटर हो। जब सभी लोग स्कूटर पर चलते हैं तो जीतू क्यों नहीं?”

“नहीं, नहीं बड़ा अच्छा किया तुमने। बहुत-बहुत बधाई। अभी तो मैं जल्दी में हूँ, फिर किसी दिन सैर करेंगे तुम्हारे स्कूटर पर।”

वह जोर से हंसा था और फिर अचानक स्कूटर को रेस देता हुआ तेजी से आगे निकल गया था। उसके स्कूटर की गति से उछली धूल मेरे चेहरे से आ टकराई थी।

कई दिन बाद जब जीतू नीचे सफाई करता हुआ मिला तो मैं अपने मन में घुमड़ते उस प्रश्न को बाहर निकाल ही बैठा – “कितने का लिया स्कूटर? नया खरीदा है या फिर .......?”

उसने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा था – “अपने पैसों से खरीदा है, सर जी। उठाईगिरी नहीं की है। आपके पास दो मिनट हों तो मैं सब बताता हूँ” - उसने अपने हाथ की झाड़ू को दीवार से टिकाते हुए कहा था।

मैं भी थोड़ी फुरसत में था। वहीं पड़ी बेंच पर बैठते हुए मैंने कहा – “बताओ, क्या बता रहे थे।”

वह भी वहीं जमीन पर बैठ गया और बिना किसी भूमिका के उसने कहना शुरू किया  -  “सर जी, आप नए आए हैं, इसलिए आपसे खुल कर दिल की बात कर सकता हूँ। ये जो सोसायटी और गली के लोग हैं न, ये ऊपर से तो बड़ी मीठी-मीठी बातें करते हैं, पर पीछे से बहुत बातें बनाते हैं। सामने कोई बोलता नहीं क्योंकि जीतू के बिना इन लोगों का काम चलता नहीं।”  

“लेकिन, मैंने तो किसी को तुम्हारे बारे में कुछ कहते नहीं सुना, सभी तो जीतू-जीतू करते रहते हैं” - मैंने उसे टोकते हुए कहा।

उसने एक फीकी हंसी हंसते हुए कहा – “सर जी, जीतू पढ़ा-लिखा नहीं है, पर समझता सब है। इनको यह बुरा लगता है कि इनके घरों से कचरा उठाने वाला जीतू साफ-सुथरे कपड़े क्यों पहनता है, सफारी पहन कर बाबू साहब बना क्यों फिरता है। गणपति स्थापना में आगे बढ़ कर हिस्सा क्यों लेता है। सब चाहते हैं, जीतू को औकात में रहना चाहिए। अब जब से स्कूटर खरीद लिया है तो लोगों की भौंहें तन गई हैं। लोगों को लगता है कि जीतू उनकी बराबरी करना चाहता है।”

उसने एक लंबी सांस भर कर छोड़ते हुए कहा – “हम मेहनत मजदूरी करने वाले लोग हैं। कमा कर खाते हैं। हर फ्लैट का कचरा उठाने का महीने में डेढ़ सौ रुपया मिलता है, सर जी। ढाई सौ फ्लैट हैं, पैंतीस हजार के करीब तो इसी काम के मिल जाते हैं। फिर कार धोकर, लोगों के काम करके पांच-दस हजार और कमा लेता हूँ। मेरी बीबी सामने वाली सोसायटी में काम करती है, वह भी सात हजार रुपया कमाती है। मेरा लड़का म्युनिसिपेलिटी में लग गया है। सड़कों की झाड़ू-बुहारी करता है, उसे भी आठ हजार रुपये मिलते हैं। सब मिला कर पचास हजार से ऊपर घर में आते हैं।”

“पचास हजार से ऊपर?” – मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ।

“हाँ सर जी, अब आप ही बताओ, जब भगवान दे रहा है तो हम ठीक तरह से खाएं-पहने भी नहीं? मैंने नया स्कूटर लिया है, हर महीने तीन हजार रुपये उसकी किस्त दूंगा। किसी के सामने झोली नहीं फैलाई है मैंने, फिर भी........।”

“समझ में नहीं आता, लोगों को इससे क्या” – मैंने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा।

“वही तो सर जी। हमें तो हजारों सालों से दबाया जाता रहा है। इनकी गंदगी उठाओ, खुद कहीं गंदगी में पड़े रहो, इनका जूठा-कूठा खाओ, इनकी जूतियां और गालियां सहते रहो, बस तभी तक ठीक है। जरा भी इससे बाहर निकलने की कोशिश करो तो बस.....। वो तो सरकारी कायदे-कानूनों की वजह से अब इनका बस नहीं चलता, नहीं तो जीना हराम कर दें।” 

“जीतू, तुम मुझे यह सब सुना रहे हो। मैं भी तो उन्हीं लोगों में से आता हूँ।”

“पता नहीं, सर जी, आप कुछ अलग लगे, इसलिए आपके सामने सारा दिल खोल दिया। आप बताओ, मैं सही कह रहा हूँ या नहीं? किसी को उसकी जाति, गरीबी के चलते दबाना सही है क्या? उसकी थोड़ी सी खुशी भी किसी को बर्दाश्त क्यों नहीं होनी चाहिए?”

उसने बहुत संजीदा बात कही थी, पर मैंने हंसते हुए कहा था – “जीतू, तुम में लीडर बनने के सारे गुण हैं। किसी पार्टी में शामिल क्यों नहीं हो जाते?”

“देखेंगे सर जी” – वह भी हंस पड़ा था। 

मुझे उठकर खड़ा होते देख वह भी उठ खड़ा हुआ और दीवार से टिकी झाड़ू उठा कर कचरा इकट्ठा करने में लग गया।

उसके बाद वह जब भी मिलता, “सर जी जै राम जी की, कैसे हैं?” कहना नहीं भूलता। कई बार उसका ध्यान नहीं होता तो मैं भी – “जीतू कैसे हो?” कह कर उसका हालचाल पूछ लेता।

पिछले कुछ समय से फ्लैट का कचरा उठाने जीतू की जगह एक मरियल सा लड़का आने लगा था। बचपन में शायद उसे पोलियो हुआ था। वह एक टांग से अच्छी तरह चल भी नहीं पाता था और उसका एक हाथ कोहनी के पास से हमेशा मुड़ा रहता। सीमा ने ही मुझे बताया था कि आजकल जीतू नहीं आता। उसकी जगह जो लड़का आता था वह अपनी शारीरिक हालत की वजह से कचरे के डिब्बे से बड़ी मुश्कल से कचरा निकाल पाता और उसे साथ लायी बोरी में डाल पाता। इस सब में थोड़ा-बहुत कचरा वहीं दरवाजे के पास और सीढ़ियों में गिर पड़ता। सीमा कभी-कभी तो खुद ही वह सब साफ कर देती। उसने मुझसे कहा था कि मैं जीतू से बात करूं, वह खुद क्यों नहीं आता।

गली में आते-जाते जीतू मुझे दिखाई देता ही रहता था। उस दिन उसे रोक कर मैंने पूछा था – “जीतू, आजकल तुम नहीं आते। वह बेचारा लड़का बड़ी मुश्किल से काम करता है।”

“सर जी, बहुत गरीब लड़का है, आपने उसकी हालत देखी है, कोई उसे काम पर नहीं रखता। मैंने उसे रख लिया है। वह मेरा काम कर देता है और मैं उसे मजदूरी दे देता हूँ। काम से लगने पर खुश है वह और उसकी माई। ठीक है न, सर जी।”

कितना अच्छा था जीतू, एक दिव्यांग गरीब लड़के की किस तरह सहायता कर रहा था। मन ही मन मैं जीतू की सराहना करने से अपने को नहीं रोक पाया।

उस दिन जब वह लड़का फ्लैट के बाहर से कचरा उठा रहा था तब मैंने उससे पूछा था – “क्या नाम है तुम्हारा?”

“ढ़ेंढ़ू है साहब।”

“अच्छा, तुम्हें जीतू ने अपनी जगह रखा है, सारे फ्लैटों का कचरा उठाते हो तुम?”

“नहीं साहब, खाली तीन बिल्डिंग का कचरा उठाता हूँ। यही कोई सौ फ्लैट होंगे।”

“कैसे कर पाते हो तुम यह सब? कैसे इतना बोझ उठा कर सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हो, लिफ्ट तक और फिर महानगर पालिका के डिब्बे तक ले जाते हो?”

“करना पड़ता है, साहब। पेट में कुछ पड़ना चाहिए ना। बिना काम के तो कोई कुछ देगा नहीं।”

“इन फ्लैटों से जो कुछ महीने में मिलता है, वह सब जीतू तुम्हें दे देता है?”

“नहीं साहब, हर दिन काम खत्म होने के बाद सुबह एक बड़ा पाव खिला देता है, जीतू दादा।”

“बस, एक बड़ा पाव? हैरत से मेरी आँखें फैल गई थीं?”

“ऐसा नहीं है, हर दो-तीन दिन में दस का एक नोट भी देता है जीतू दादा। बहुत भला मानुष है।” 

मेरे अंदर एक तड़प सी उठने लगी थी। सौ घरों से कचरा उठाने का जीतू को हर घर से डेढ़ सौ रुपये के हिसाब से महीने में पन्द्रह हजार रुपये मिलते थे और वह इस लड़के को काम पर रखने के नाम पर सिर्फ एक बड़ा पाव और सौ-दो सौ रुपये देकर भलामानुष बना फिर रहा था। मेरा दिमाग घूम गया। मैंने उस लड़के से कहा – “जीतू को कहना मैंने बुलाया है, जरूरी काम है।”

शाम को जीतू आया तो बोला – “सर जी, आपने याद किया? हुकुम करो।”

उसे देखते ही मेरा खून खोलने लगा था। बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू पाकर मैंने कहा था –

“जीतू, तुम ढेंढ़ू के साथ वही सब नहीं कर रहे हो, जिसके लिए उस दिन दूसरों को गालियां दे रहे थे?”

“सर जी, मैं समझा नहीं?’

“मैं तुम्हें अच्छी तरह समझाता हूँ। तुम उसकी गरीबी, उसकी अपंगता और उसकी मजबूरी का वैसा ही लाभ नहीं उठा रहे हो जैसा लोग हजारों साल से उठाते आ रहे हैं? तुम सौ घरों का कचरा उठाने का काम उससे करवाते हो और देते क्या हो? हर दिन एक बड़ा पाव और महीने में कुछ सौ रुपये। शर्म नहीं आती तुमको?”

जीतू इस हमले के लिए तैयार नहीं था। एकदम सकपका गया – “सर जी, मैं तो उसकी सहायता कर रहा हूँ। उसे तो कोई कानी कौड़ी के लिए भी काम पर नहीं रखे।”

“वह तुम्हारा काम निपटाता है न, इतना सारा। उसकी मेहनत पर तुम ऐश नहीं कर रहे? आज तुम्हारे पास पैसा है तो तुम भी गरीब और अपंग के साथ वैसा ही व्यवहार नहीं कर रहे जिसकी याद आते ही तुम्हारी आँखों से लावा निकलने लगता है?”

मैं बोलता जा रहा था और जीतू सिर झुकाए चुपचाप खड़ा सुनता जा रहा था। मेरा आक्रोश थोड़ा ठंडा हुआ तो मैंने कहा – “वह तुम्हें भला मानुष समझता है, उसे नहीं पता कि तुम उसके साथ क्या कर रहे हो। उस अपंग, कमजोर और गरीब लड़के पर रहम नहीं आता तुम्हें?”

जीतू कुछ नहीं बोला था। उसने हाथ जोड़े और फिर तेजी से सीढ़ियां उतर गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैंने जो कुछ किया वह सही था या नहीं। जीतू ने उसे किस रूप में लिया होगा? अपने जाती मामले में दखल मान कर वह मुझसे नाराज तो नहीं हुआ होगा? सीमा ने भी मुझे लताड़ा था – “क्या जरूरत थी, तम्हें इस पचड़े में पड़ने की। यह जीतू और ढ़ेंढ़ू के बीच का मामला है। जब ढेंढ़ू को ही कोई शिकायत नहीं है तो तुम्हें क्या। काजी जी क्यों दुबले शहर का अंदेशा।”  

सच तो यह था कि जीतू की चुप्पी और उसका तेजी से सीढ़ियां उतर जाना, मुझे बेचैन कर गया था। पता नहीं उस बेचारे निरीह ढेंढ़ू पर क्या बीती होगी, यही सब सोचते-सोचते मैं रात को बड़ी मुश्किल से सो पाया।

कई दिन तक हमें वह लड़का ढेंढ़ू दिखाई नहीं दिया। उसकी जगह जीतू आता और कचरा उठा कर ले जाता। जीतू दिख जाता तो हमेशा की तरह “सर जी जै राम जी” की जरूर कर देता। मैं भी उसका जवाब दे देता। मैं मन ही मन खुद को कोसता रहता, उस लड़के को जो कुछ थोड़ा-बहुत मिल रहा था, वह भी शायद मेरी वजह से उसने खो दिया था।

उस दिन अचानक गली में ढेंढ़ू दिख गया। मैं उससे बच कर निकल ही रहा था कि उसने मेरा रास्ता रोक लिया। मैं अंदर तक सहम गया, उसका अपराधी था मैं। जीतू ने खूब लानत मलामत की होगी उसकी कि उसने मुझे वह बड़ा पाव वाली और कभी-कभी दस रुपये देने वाली बात क्यों बताई थी। तभी उसकी आवाज मेरे सुन्न होते कानों में पड़ी – “साहब, मैंने कहा था न, जीतू दादा बड़ा भला मानुष है। उसने सोसायटी के सेक्रेटरी से कह कर मुझे सभी बिल्डिंगों के पहले और दूसरे माले के फ्लैटों का कचरा उठाने का काम दिला दिया है। कह रहा था, ऊपर के मालों पर चढ़ने-उतरने में और बोझ लेकर लिफ्ट तक जाने में मुझे जो परेशानी होती थी, वह खत्म हो जाएगी। सर जी, इन तीस फ्लैटों से मिलने वाला पैसा हर महीने मुझे मिला करेगा। सच कहता हूँ – जीतू दादा सबका दर्द समझता है। आदमी नहीं खरा सोना है, जीतू दादा।” 

मैंने देखा उस लड़के की आँखों में श्रद्धा और खुशी के तारे चमक रहे थे। मेरी धुंधलाती आँखें जीतू को ढूंढ़ने में लगी थीं, वह यहीं कहीं होगा, हाथ में झाड़ू लिये कच्छे-बनियान में या कमीज-लुंगी में या फिर सफारी सूट पहने शान से स्कूटर पर सवार।


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