कहानी: लॉकडाउन में गौरीशंकर

नवल एक अरसे बाद दिल्ली से अपने गाँव आया था। बिहार में चुनाव के ठीक पहले पास के जिले में उसे अपने मित्र के कार्यक्रम में एक राजनैतिक भाषण देना था। ‘पास के जिले में कार्यक्रम है और दो चार दिनों के लिए भी अपने गाँव नहीं रुका तो गाँव के मित्र जीना मुश्किल कर देंगे’। और फिर गाँव के लोग, हरियाली, पुराने दोस्त कहाँ जल्दी-जल्दी मिलने वाले हैं।
नवल को सुबह उठते ही ऐसा लगा जैसे चिड़ियों की चहचहाहट और मोहल्ले के बच्चों की खिलखिलाहट ने उसे थपथपा कर नींद से जगाया हो। उठते ही घर के सामने सड़क के उस पार दूर तक फैले एक-दूसरे से लिपटे बाँस की पत्तियों की सरसराहट सुनकर आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था। अनेकों राज्यों में नए विचार वाले युवाओं के पक्ष में चुनाव प्रचार के लंबे प्रवास और रैलियों में शिरकत करते-करते जैसे वर्षों से उसका मन और मिजाज़ दोनों थके हुए थे। अब उसे कुछ अजीब-सी शीतलता महसूस हो रही थी। अचानक विचार आया – ‘चौक की ओर घूमने जाया जाए’। रास्ते में उसने देखा शिवजी अपने दरवाजे पर खड़ा होकर दातून कर रहा है। दूर से ही एक-दूसरे को देखकर दोनों मुस्कुराए। नवल आगे बढ़ गया। शिवजी को देख नवल को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे कल शाम ही दोस्तों ने बताया था कि शिवजी के पिता गौरीशंकर बहुत बीमार हैं, शायद ही बचेंगे।
गौरीशंकर की स्मृतियाँ आज भी नवल के मन-मस्तिष्क में छाई हुई थी। वे छोटे किसान थे। सुबह पाँच बजे उठते ही वे आँगन में नहाते हुए जनेऊ मंत्र और गायत्री मंत्र पढ़कर जनेऊ साफ़ करते। माथे पर चन्दन का लम्बा चौड़ा लेप लगाते और तुलसी रामायण लेकर बैठ जाते। वे पाठ करते और सामने उनकी पत्नी भरी इच्छाओं से उन्हें सुनती। गौरीशंकर बहुत अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। लेकिन रामायण पढ़ लेते और उसका अर्थ पत्नी को समझाते। पूरे गाँव में वह एकलौता परिवार था जो मैथिली में पूरा दरभंगिया और मधुबनिया लोच देकर बातें किया करते वरना समस्तीपुर का यह पूरा क्षेत्र उखराह मैथिली में ही बात किया करता। जब वे अपनी लोचदार मैथिली में प्रसंग छेड़ते तो सड़क किनारे से आते-जाते लोग मजा भी खूब लिया करते।
“जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोध बधाए।।
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरसहिं सुख बारी।।”
गौरीशंकर लय में ढालकर चौपाई गाते और फिर अपनी भाषा में पत्नी को अर्थ सुनाते –‘ बुझलियय कि नैइय बुझलियय (समझे कि नहीं समझे)’ रस दोनों ओर समान होता – हय, दूर जोह, अपने बुझेबय तब नैअ बुझ्बई’ (आप समझायेंगे, तब तो समझेंगे)।
गौरीशंकर व्याख्या करते – “ रामचंद्रजी बियाह ‘नय’ कअ लेला आ अप्पन घअरो वापस एइब गेला। आ जहिया से एला हन, तहिये से अयोध्या मेअ मंगले मंगल भअ रहल अछि। बरसा होइए, सुख बरसइए। मने कि कहु, सब गोटा आनंद लअ रहल अछि।” पत्नी पति की व्याख्या में इतनी लीन हो जाती कि पूरी व्याख्या के दौरान वाह-वाह के मैथिलि पर्यायवाची – ‘ओह हो हो, रे बाबु, रे सोना, केहन मंगल बरसलय रे’। बोलती रह जाती। दशकों से दोनों की भक्ति, सुख और मनोरंजन का एकमात्र साधन मानस पाठ ही था।
नवल की सारी यादें ताजा हो रही थीं। उसे याद आया कि जब 10 वर्ष पहले वह छुट्टी में घर आया था तब गौरीशंकर का 30 बरस का छोटा बेटा दिल्ली से टी।बी से बीमार होकर गाँव आया था। दिल्ली में मजदूरी में बीमारी के कारण सक नहीं पाया। लेकिन घर पर इलाज के दौरान भी मवेशी पालने में पिता की मदद किया करता था। देखते-देखते ही उसकी अकाल मृत्यु हो गई। बेटे की मौत के बाद गौरीशंकर रो-रो कर मानस का पाठ किया करते और पत्नी रो-रो कर पाठ सुना करती। छोटे बेटे से एक पोता और बड़े बेटे से दो पोती थीं। बड़ा बेटा शिवजी पत्नी और बच्ची के साथ मुंबई में रहता और छोटे बेटे के निधन के बाद उसकी पत्नी अपने एकलौते लड़के के साथ मायके रहती थी। घर बस गौरीशंकर और उसकी पत्नी थी।
सोचते-सोचते नवल चौक पर पहुँच गया। अखिलेश ने टोका – ‘क्या बात है, बहुत खुश नजर आ रहे हो’? ‘नहीं ऐसी कोई खास बात तो नहीं’ कहकर नवल थोड़ी देर के लिए शांत होकर फिर बोला – “ रास्ते में मैंने शिवजी भैया को देखा, बहुत अच्छा लगा। इसी को रिश्ता बोलते हैं। सच में, गाँव में अभी-भी लोग संबंधों को कितनी अहमियत देते हैं? पिता बीमार है ऊपर से कोरोना का कहर है लेकिन फिर भी बेटा जैसे-तैसे देखने पहुँच ही गया।” अखिलेश नवल को अधिक देर तक सुनने के मूड में नहीं था –‘अरे जैसा तुम सोच रहे हो वैसा नहीं है भाई’। नवल थोड़ा चौंका – ‘फिर? बात क्या है’? अखिलेश ने विस्तार से बताया – “ वहाँ मुंबई में शिवजी की लड़की की शादी तय हो गई थी लेकिन इस महामारी के कारण महीनों से काम ही छूट गया। बेचारे के पास पैसे हैं नहीं तो वही अपने हिस्से की जमीन बेचने आया है।” नवल ने पूछा – ‘लेकिन उनके पास जमीन है ही कितनी’? ‘अब जितनी भी है उसी में अपना हिस्सा उसे बेचकर निकलना है’। नवल और अखिलेश बातचीत कर ही रहे थे कि दुकान पर शिवजी की बूढ़ी माँ पहुँच गई। गीली आँखों से नवल की ओर देखा और पूछा – ‘बउवा, कहिया एलऊँ (कब आए) ? नवल ने उठकर प्रणाम किया – ‘कल ही दादी’। शिवजी की माँ ने अखिलेश की ओर देखा – “सुग्गा रे, आंहाँ त सब टा देईख रहल छी, काईल्ह नौ बजे एब, आ बउवा जे कअ देब सेहे हेत’। नइ त बुड़वा नय बचतअ’ (कल 9 बजे आ जाना और जो फैसला कर दोगे वही होगा। नहीं तो बूढा नहीं बचेगा)। कहते ही वह सुबक-सुबक कर रोने लगी। अखिलेश ने जैसे-तैसे उनको समझाकर वापस भेजा। नवल ने शून्य आँखों से अखिलेश की ओर देखा। ‘ कल चलना तुम भी। पंचायत है शिवजी के यहाँ, सारी बातें समझ जाओगे’। नवल यह सब देख दुखी था लेकिन वह सारे मामले को उसी वक़्त जानना चाहता था। अखिलेश ने उसे सारी बातें बताई – “ अरे ये बेचारी चाहती है कि जमीन का एक हिस्सा बेचकर बुढवा का इलाज करवाए और शिवजी बेचने नहीं दे रहा है।”
शिवजी क्यों रोक रहा है? नवल ने गुस्सा जाहिर करते हुए पूछा। अखिलेश के चेहरे पर बेबस मुस्कान थी – “अरे यही तो समस्या है। अगर वह बेचने देगा तब जो उसके हिस्से जितनी जमीन आएगी उससे उसकी बेटी की शादी भी नहीं हो पाएगी भाई। आखिर जमीन है ही कितनी, दस नहीं तो बारह कट्ठा।” ‘हाँ लेकिन इलाज भी तो जरुरी है’। अखिलेश ने उबासी ली – ‘हाँ भाई। जरुरी तो है’। ‘अब देखो कल क्या होता है? आना तुम भी’। इलाज सरकारी अस्पताल में भी तो हो सकता है’? अखिलेश खीझ चुका था। उसने नवल की ओर आँखें तरेरकर देखा – “यार नवल, तुम दिल्ली ही न रहते हो? और वहीं से आए हो? फिर ये दूसरे लोक से आने जैसी बात क्यों कर रहे हो।” नवल ने दुबारा सरकारी अस्पताल पर कोई चर्चा ही नहीं की।
नवल जिस शिवजी को देखकर सुबह-सुबह खुश हो रहा था अब उसे उसी शिवाजी पर क्रोध आ रहा था साथ ही वह फ़ौरन खुद को प्रसन्न करने के लिए बिना जाँच परख के जो परिभाषाएँ गढ़ रहा था उसे उस बात पर भी गुस्सा आ रहा था। वह खुद से बातें करते हुए एकांत में बुदबुदाया – ‘मैं भी न... कितना आदर्श की चपेट में आ जाता हूँ’...
नवल आज सुबह ही उठ गया था। उसने 9 बजने का बड़ी बेसब्री से इंतजार किया। अखिलेश उसे बुलाने भी पहुँच चुका था। दोनों साथ-साथ शिवजी के घर पहुँचे। वहाँ मोहल्ले के कुछ लोग, शिवजी और उसकी माँ पहले से ही बैठे थे। शिवजी और उसकी माँ चटाई के दायरे के बाहर जमीन पर बैठे थे बाकि सभी पंच चटाई पर। नवल को देख पंचों ने औपचारिक स्वागत भरी निगाह से देखा और मुस्कुराया। अंदर एक कमरे से गौरीशंकर के बीच-बीच में खांसने की आवाज आ रही थी। शिवजी की आँखों में भी आंसू थे। वह बार-बार कहता – ‘अब आप लोग ही जो फैसला करेंगे’। पंच आपस में बात करने लगे – ‘इलाज भी तो जरुरी है’। ‘बेटी की शादी भी जरुरी है’ । ‘अरे भाई अब तो गौरी भाई अपना जीवन जी चुके, जो सामने है उसको भी तो देखना पड़ेगा’। शिवजी की माँ सुनती और सुबक-सुबक कर रोना शुरू कर देती – ‘हमरा पूरा विश्वास छ बउवा, इलाज हेतअ त बुड़वा जी जेतअ (हमको पूरा विश्वास है बाबु, इलाज हुआ तो बूढा जी जाएगा)’। शिवाजी अपनी माँ की बात को फ़ौरन काटता – ‘अरे उ नहीं बचेंगे, झुट्ठे का खरचा होगा’। पंच में से एक ने शिवजी से पूछा – ‘ लेकिन बेटा शिव, तुम्हारी तो दो-दो बेटियाँ हैं। एक की शादी जमीन बेचकर कर भी दोगे तो दूसरी की शादी कैसे करोगे’? शिवाजी को कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। वह कुछ देर शांत रहा और फिर बोला – ‘ इ हमको भी नइ पता चच्चा। बस इतने पता है उसकी उमर निकली जा रही है। अपने ही क्षेत्र का वहाँ एक परिवार है जहाँ बहुत मुश्किल से कम ले-देकर बात हो रखी है’।
शिवजी की माँ ने पंचों से फिर आग्रह किया – “बउवा, निरनय कईये कअ जैब। रात कअ कुण्डी लगा कअ सुतई छी। बहुते डेरेईल छी।। बुड़वा केअ गरदन दाईब देतअ   (बेटा, फैसला करके ही जाइये। रात को कुण्डी लगाकर सोते हैं। बहुत डर लगता है... बुढ़वा का गला दबा देगा...।)”  कहते हुए वह गला दबा देने के बाद की पीड़ा की अनुभूति के साथ गला फाड़कर रोने लगती है। नवल को यह सुनते ही लगा जैसे कि उसका कलेजा फट जाएगा। शिवजी ने अपनी माँ की ओर देखा भर, कहा कुछ नहीं।
बहुत देर तक काना फूसी होती रही लेकिन कोई फैसला नहीं हुआ। पंचों ने बस इतना दिलासा दिया कि ‘अच्छा हम लोग कुछ सोचते हैं’। दो दिन इसी उधेड़बुन में खर्च हो गया और तीसरे दिन सुबह-सुबह रोने की जोर-जोर से आवाज आई। सभी दौड़कर पहुँचे। गौरीशंकर के मृत शरीर से लिपटी बुढिया की आवाज की वेदना समूचे गाँव को झकझोर रही थी। शिवजी कोने में खड़ा लाश को निहारे जा रहा था। उसकी आँखें एकदम बेजान और सूखी थीं।
क्रिया-कर्म का दौर शुरू हुआ। गंडक नदी किनारे लाश को शिवजी ने आग दी। लौटते वक्त धीरे धीरे लोग बातचीत करने लगे। नवल तक सिर्फ आवाजें पहुँच रही थीं– ‘ अच्छा है चलते फिरते निकल गए’। ‘हाँ, दुःख नहीं झेलना पड़ा’। ‘भाई साहब, महीने भर पहले तक निरोग थे। इलाज होता तो 10 साल और कहीं नहीं गया था’। ‘अरे, अभी भी हमलोग इस उम्र तक पहुँच पा रहे हैं, बहुते है’।
गाँव के नियमानुसार मृत्यु के अगले हफ्ते लोग शिवजी के घर जुटे। भाई-भैयारी के लोग अधिक थे। ब्राह्मण रीति अनुसार आज चिट्ठा बनना था। चिट्ठा बनाने वाले अनुभवी उमाशंकर ने शिवजी के पड़ोसियों से पूछा- ‘चिट्ठा कितने लोगों का बनाना है? कुछ देर तक चर्चा हुई। शिवजी वहीं उत्तरी धारण कर बैठा था और अंदर आँगन में अन्य स्त्रियों के साथ उसकी माँ विलाप कर रही थी। सभी फैसला कर चुके थे। ‘तीन दिन का भोज होगा। पहले दिन मोहल्ले भर का, दूसरे दिन पूरे गाँव का और तीसरे दिन मोहल्ले के सारे लोगों के साथ साथ बाकि के गाँव से एक-एक लोग। एक ने कहा – ‘शोर्ट-कट में ही लीजियेगा, पत्ता पर एक दू आइटम से हो काम चल जाएगा’। चिट्ठा तैयार हो चुका था। उमाशंकर ने हिसाब-किताब करके कहा – ‘एक लाख पच्चीस हजार’।
नवल ने शाम में अखिलेश से पूछा – ‘अरे उसके पास एक लाख आएंगे कहाँ से? अखिलेश ने प्रौढ़तापूर्वक कहा – ‘अब कर्म को भला आदमी छोड़े भी तो कैसे’? ‘व्यवस्था हो चुकी है। पड़ोसी सत्यनारायण जी खर्चा कर रहे हैं, कर्म के बाद चार कट्ठा जमीन लिखवा लेंगे’। नवल ने फिर कुछ नहीं पूछा।
दो दिन बाद दोपहर एक नौजवान साइकल पर भोज का निमंत्रण देने आया। नवल ने गौर से देखा कि वह सूर्यप्रकाश है। वह चौंका – ‘ अरे अखिलेश, ये तो वही सूर्यप्रकाश जी हैं न जो श्राद्ध-भोज के खिलाफ थे? अखिलेश मुस्कुराया – “अरे इ गाँव है भाई, यहाँ अधिक दिनों तक चोंचलेबाजी नहीं चलती है। अब जरा पूछो न उससे कि सूर्यप्रकाश जी, अँधेरा फैला रहे हैं कि साइकिल से प्रकाश फ़ैलाने निकले हैं?”
क्रिया-कर्म समाप्त हो चुका था। बाकी की जमीन से शिवजी के हिस्से बहुत कम रकम आई। वह मुंबई के लिए निकला। दरवाजे पर उसकी माँ सफ़ेद साड़ी में लिपटी खड़ी थी। शिवजी माँ की ओर देखे बगैर कुछ पल के लिए रुका। माँ ने एक पोटली उसके झोले में डाल दी और वापस आँगन की ओर चल दी।
ट्रेन में शिवजी घंटों खिड़की के बाहर झाँकता रहा। कुछ देर बाद धीरे से उसने झोले से पोटली निकाली और खोली। रोटी और आलू की सूखी भुजिया को चबाते-चबाते उसका मुँह कुछ देर के लिए रुका। शिवजी ने पोटली को अपने ललाट से चिपकाकर बहुत जोर से आवाज लगाई –‘बा बा बाबूजी...’

5 comments :

  1. बेहद मार्मिक। महामारी के दौर में संबंधों में दरारें किस तरह पूंजीवादी व्यवस्था की देन है। कहानीकार को बधाई

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  2. ग्रामीण परिवेश को चित्रित करती हुई कहानी वर्तमान दौर की मुख्य समस्या बेरोजगारी की समस्या को रेखांकित करती है पूंजीवादी व्यवस्था ने ना केवल महानगरों को प्रभावित किया है बल्कि ग्रामीण परिवेश को भी प्रभावित कर रही है इसे कहानी में भली-भांति चित्रित किया गया विमर्श दौर मे यह कहानी दलित वर्ग द्वारा उच्च वर्ग पर लगाने वाले आरोपों का भी खंडन करती हुई नजर आती है यह कहानी यह बताती है कि दलित शोषण ब्राह्मण वर्ग की देन नहीं है यह शोषण पूंजीवादी व्यवस्था की देन है पूंजीवादी व्यवस्था का शिकार तो उच्च वर्ग भी होता आया है इस बात को समझने की आवश्यकता है ना कि आपसी विवादों में फंसने की इस कहानी में मैथिली भाषा का भी प्रयोग हुआ है जिसे हिंदी के लिए नया प्रयोग कहा जा सकता है यह प्रयोग उत्कृष्ट है सराहनीय है जो कि हिंदी भाषा के मान सम्मान को बढ़ावा देने में और सहायक रहेगा यह कहानी अनूठी है वैश्विक महामारी के दौर में रोजगार की समस्या जो की महत्वपूर्ण समस्या है वह न केवल वैश्विक महामारी के दौर की समस्या है बल्कि सामान्य दिनों की भी समस्या है यह समस्या पूंजीवाद की देन है इसे समझना आवश्यक है यह कहानी पाठ को को महत्वपूर्ण संदेश देती है जागरूकता लाने में समर्थ है

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  3. ग्रामीण परिवेश को चित्रित करती हुई कहानी वर्तमान दौर की मुख्य समस्या बेरोजगारी की समस्या को रेखांकित करती है पूंजीवादी व्यवस्था ने ना केवल महानगरों को प्रभावित किया है बल्कि ग्रामीण परिवेश को भी प्रभावित कर रही है इसे कहानी में भली-भांति चित्रित किया गया विमर्श दौर मे यह कहानी दलित वर्ग द्वारा उच्च वर्ग पर लगाने वाले आरोपों का भी खंडन करती हुई नजर आती है यह कहानी यह बताती है कि दलित शोषण ब्राह्मण वर्ग की देन नहीं है यह शोषण पूंजीवादी व्यवस्था की देन है पूंजीवादी व्यवस्था का शिकार तो उच्च वर्ग भी होता आया है इस बात को समझने की आवश्यकता है ना कि आपसी विवादों में फंसने की इस कहानी में मैथिली भाषा का भी प्रयोग हुआ है जिसे हिंदी के लिए नया प्रयोग कहा जा सकता है यह प्रयोग उत्कृष्ट है सराहनीय है जो कि हिंदी भाषा के मान सम्मान को बढ़ावा देने में और सहायक रहेगा यह कहानी अनूठी है वैश्विक महामारी के दौर में रोजगार की समस्या जो की महत्वपूर्ण समस्या है वह न केवल वैश्विक महामारी के दौर की समस्या है बल्कि सामान्य दिनों की भी समस्या है यह समस्या पूंजीवाद की देन है इसे समझना आवश्यक है यह कहानी पाठ को को महत्वपूर्ण संदेश देती है जागरूकता लाने में समर्थ है

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