मेरे पिता, मेरे आदर्श (सम्पादकीय: अनुराग शर्मा)

नमस्कार मित्रों!

अप्रैल मास में जब भारत में कोविड-19 अपने चरम पर था, मेरे पिता सीढ़ियों से फिसल गये थे। गिरने और सीढ़ियों पर रगड़ने के कारण उनके सिर-माथे पर भीषण चोट लगी थी और हाथ सीने आदि पर भी गहरी खरोंचें थीं। वे तीन सप्ताह तक कोमा में थे जिसमें प्रारम्भिक दो सप्ताह ऑक्सीजन सपोर्ट भी लगी रही। जब उनके चिकित्सालय ने अपने इंटेसिव केयर यूनिट में भी कोरोना मरीज़ों को रखना आरम्भ कर दिया तो वे एक निजी कक्ष में चले गये और बाद में अपने छोटे पुत्र के घर पर रहे। विशेषज्ञों के अनुसार उनकी बोलने की क्षमता और स्मृति मस्तिष्क में बचे रहे क्लॉट्स के घुलने के साथ-साथ, धीरे-धीरे वापस आनी थी। एक महीने में वे बोलने लगे थे। फिर कुछ समय पश्चात वे पूछने पर अपनी पहचान भी बताने लगे थे। वे अपने सामने आये किसी भी व्यक्ति को पहचान नहीं सके यद्यपि उनका नाम लेने पर उस नाम को धीमी गति से दोहराते थे। सब कुछ आशानुकूल था, फिर पूरे दो महीने बिस्तर पर रहने के बाद 18 जून को अचानक हृदयाघात से उनका देहांत हो गया।

मेरे पिता निम्न-मध्य वर्ग के एक साधारण सैनिक परिवार की सबसे छोटी संतान थे। उनका आरम्भिक जीवन अति संघर्षमय रहा। अपने सिद्धांतों से समझौता न करने के आग्रही परिवार के सामने आर्थिक संकट तो था ही, अनेक सामाजिक समस्यायें भी मुँह बाये खड़ी रहीं। भारतीय सेना में रहते हुए, उनके पिता (मेरे बाबा) द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जलपोत द्वारा यूरोप के मोर्चे पर पहुँचे। सेना से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने उत्तरप्रदेश पुलिस में सेवा दी, और उसके बाद बदायूँ की गौशाला में आरम्भ किये गये श्री कृष्ण विद्यालय में अध्यापन भी किया, जो बाद में श्री कृष्ण इंटर कॉलेज बना।

पिताजी की पहली नौकरी उत्तरप्रदेश स्वास्थ्य विभाग की थी जिसमें ऊपरी आमदनी अपवाद न होकर एक संगठित व्यवसाय था। बेचैन पिता ने अवसर पाते ही उस नौकरी को छोड़कर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस की नौकरी की और देश के सबसे होस्टाइल क्षेत्रों में सेवा प्रदान की। वे नक्सलवाद के दिनों में पश्चिम बंगाल और खालिस्तान के दिनों में पंजाब क्षेत्र में थे। जब कश्मीर में इस्लामिक जेहाद चरम पर था तब वे श्रीनगर में और उससे बहुत पहले पूर्वोत्तर भारत के अशांत दिनों में उन्होंने असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैण्ड और मिज़ोरम में अपनी सेवाएँ दीं।

अशांत और आतंकग्रस्त क्षेत्रों में लम्बा समय बिताने के कारण उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ा। अपने माता और पिता के देहांत और अंतिम संस्कार के समय भी वे उपस्थित नहीं थे। रामपुर और जम्मू के आरम्भिक वर्षों के अतिरिक्त मेरा बचपन और कैशोर्य सामान्यतः उनसे दूर ही बीता। नोएडा में मेरी पहली नौकरी के ढाई वर्ष में पहली बार सारा परिवार इकट्ठा रहा जो मेरी दूसरी नौकरी के दिल्ली प्रवास के काल के कई वर्षों में फिर चला और बाद में बहनों के विवाह, भाई की नौकरी, मेरे प्रवास और अन्य कारणों से फिर ऐसा बिखरा कि कभी जुड़ न सका।

अखबार पढ़ना और रेडियो पर समाचार सुनना उनकी आदत ही नहीं, बल्कि शौक सा था। हिंदी और अंग्रेज़ी के समाचरपत्र, द वीक से लेकर न्यूज़वीक और इंडिया टुडे से लेकर टाइम तक सभी पत्रिकाएँ घर में आती थीं और अनजाने ही मैं भी पठन-पाठन से जुड़ता रहा। शब्दकोश साथ रखने और उनके भरपूर प्रयोग की आदत मैंने सात वर्ष की आयु में ही उनसे सीख ली थी जो आज तक बनी हुई है। वे एक सरल व्यक्ति थे। जीवन भर शाकाहारी रहे। केंद्रीय पुलिसबल के कठिनतम कार्यक्षेत्रों में रहते हुए कभी शराब या किसी अन्य नशे को हाथ नहीं लगाया। आदर्श जीवन के अनेक सूत्र मैंने उनसे सीखे लेकिन सबसे बड़ी शिक्षा अन्याय के प्रतिकार की थी, विजय की आकांक्षा की नहीं। बल्कि जहाँ हार सुनिश्चित हो वहाँ भी डटकर प्रतिरोध करना अक्सर उन्हें अकेला कर देता था लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी, न किसी अन्य की राय या मानापमान की चिंता की।

अनुराग शर्मा
उनके देहावसान और अंतिम संस्कार के कारण मैं सेतु के जून अंक को अधिक समय नहीं दे सका हूँ तो भी सेतु परिवार की ओर से पहले सप्ताह में प्रकाशन का वचन पूर्ण किया जा रहा है, इसकी संतुष्टि है।

सेतु के छठे वर्ष में प्रवेश की शुभकामनाएँ और हार्दिक बधाई!

शुभाकांक्षी,

सेतु, पिट्सबर्ग
30 जून 2021 ✍️

13 comments :

  1. आप एक आदर्श पिता की सुयोग्य संतान हैं। ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें तथा आपको सफलता के नित नए सोपान दें

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  2. आप एक आदर्श पिता की सुयोग्य संतान हैं। ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें तथा आपको सफलता के नित नए सोपान दें

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  3. पूज्य पिताजी के प्रेरणादायी सिद्धान्त जानकर प्रसन्नता हुई. पूज्य पिताजी को शत्-शत् नमन.
    -विनोद नायक, नागपुर

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  4. आप जिस मनोदशा से गुजर रहे होंगे उसका अनुमान लगाना हम जैसे अधिकांश
    लोगों के लिये कठिन नहीं है क्योंकि कई वर्ष पहले मैं भी उसी स्थिति से गुजर चुका हूं।
    पिता के अनुशासन व मार्गदर्शन की अनुपस्थिति
    में भटक जाने का जो खतरा होता है उसके उदाहरण अक्सर ही मिल जाते हैं। वास्तव में ऐसे कर्मठ
    लोग ही देश व समाज की रीढ़ होते हैं। सेतु जैसी पत्रिका की कल्पना को साकार करने में
    प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष जिन वैचारिक सेतुओं की
    श्रंखला प्रेरणा बनकर उभरती है उसका एक सिरा अनायास आपके पिताजी से जाकर जुड़
    जाता है। उनकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद बिना यह संभव न हो पाता।
    मुझे बरबास याद आती हैं मुक्तिबोध की पंक्तियां-
    मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।
    ऐसे प्रेरणा पुंज की स्मृति को सादर नमन।

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  5. Chandra Mohan BhandariJuly 5, 2021 at 6:56 AM

    आप जिस मनोदशा से गुजर रहे होंगे उसका अनुमान लगाना मेरे जैसे अधिकांश
    लोगों के लिये कठिन नहीं है क्योंकि कई वर्ष पहले मैं भी उसी स्थिति से गुजर चुका हूं।
    पिता के अनुशासन व मार्गदर्शन की अनुपस्थिति
    में भटक जाने का जो खतरा होता है उसके उदाहरण अक्सर ही मिल जाते हैं।
    वास्तव में ऐसे कर्मठ
    लोग ही देश व समाज की रीढ़ होते हैं। सेतु जैसी पत्रिका की कल्पना को साकार करने में
    प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष जिन वैचारिक सेतुओं की
    श्रंखला प्रेरणा बनकर उभरती है उसका एक सिरा अनायास आपके पिताजी से जाकर जुड़
    जाता है। उनकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद बिना यह संभव न हो पाता।

    मुझे बरबास याद आती हैं मुक्तिबोध की पंक्तियां-

    मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।

    ऐसे प्रेरणा पुंज की स्मृति को सादर नमन।

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  6. Ashish Sahay ShrivastavaJuly 8, 2021 at 5:09 AM

    सेतु को पढ़ते हुए सोचा ही नहीं था कि आपके बारे में इतना दुःखद संदेश पढ़ने को मिल जाएगा। देश सेवा में जी-जान से समर्पित रहे ऐसे पिता को सादर श्रद्धांजलि। आपने भी उनके बारे में ऐसा लिखा कि मन श्रद्धा से भर गया। जाने वाले पता नहीं कहां चले जाते हैं उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो पाती। दुःख की इस घड़ी में हम आपके साथ हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि परिवार को दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। पिताजी को मोक्ष मिले। ओम शांति! उनका आशीर्वाद हम सभी पर बना रहे इसी कामना के साथ कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं :-

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*

    घर है सूना... मन है सूना
    सूना-सूना हरेक कोना
    बिना आपके कद भी मेरा
    लगता है बौना-बौना

    मन कहता है बस, हरदम ये

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*

    बिना आपके मम्मी भूखी
    बड़ी झील भी सूखी-सूखी
    आपसे खुशियॉ हम सबकी हैं
    वरना दुनिया रूखी-रूखी

    एक ही इच्छा रह-रह उठती

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*

    जब कुछ न था, जी रहे थे
    ज़हर भी हंसकर, पी रहे थे
    अब जब कोई कमी नहीं हैं
    आप कह रहे, हमीं नहीं हैं

    धड़कन की आवाज़ भी सुनिये

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*

    किया आपने इतना सब है
    दिया आपने इतना जब है
    आपसे बढ़कर कुछ भी नहीं है
    समझ ये आया हमको अब है

    अंतर्मन आवाज़ दे रहा

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*

    हमको जब कोई श्राप नहीं हैं
    तो फिर क्यों मेरे बाप नहीं हैं
    भर-भर आते ऑख में आंसू
    जब दिखते कहीं आप नहीं हैं

    सिसक-सिसक हर सांस ये कहती

    *लौट आइए पापा जी*
    *अब लौट आइए पापा जी*


    पिताजी के सम्मान में आत्मशान्ति और उनको मोक्ष प्राप्ति की मनोकामना के साथ.... सादर प्रेषित

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  7. पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि🙏 आपसे उनके बारे में जाना अच्छा लगा।पुरानी पीढ़ी का संघर्ष एक सा रहा खुद स्वाभिमान बनाए रखना और विषम परिस्थितियों में भी अन्याय से समझौता न करना प्रेरणादायक है।🙏

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  8. विनम्र श्रद्धांजलि । वे अब आपके माध्यम से अपनी बात कहेंगे , आपके पास अब सदैव रहेंगे 🙏

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  9. भावना सक्सैनाJuly 15, 2021 at 5:50 AM

    देह त्याग की रस्म के बाद मन में और शब्दों में जीवित रहती हैं आत्माएं।
    आपके शब्दों से आपके पिताजी व उनके आदर्शों को जाना। कोटिशः नमन।
    ईश्वर आपको शक्ति दें।

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  10. विनम्र श्रद्धांजलि।

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  11. उस असीम व महान आत्मा के चिरशांति हेतु प्रार्थना के साथ आपके द्वारा प्रकट की गई अभिव्यक्ति को प्रणाम।
    इस दुःख के समय में पूरा सेतु परिवार आपके साथ है।

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  12. आपके पिताजी की स्मृति को नमन. माता पिता की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही होती है कि उनकी संतान उनके बारे में ऐसे विचार रखे जैसे आपके हैं.ध्यान रखिए. सस्नेह.

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  13. आपके पिताजी की स्मृति को नमन. माता पिता की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही होती है कि उनकी संतान उनके बारे में ऐसे विचार रखे जैसे आपके हैं.ध्यान रखिए. सस्नेह.

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