ये बदलाव इतना भी अच्छा नहीं, सबके बसर के लिए: राकेश कबीर की कविताएँ

पूर्विका अत्री
पूर्विका अत्री

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय-110007


         शान्त, स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल!

         अपलक अनन्त, नीरव भूतल!

         सैकत-शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल

         लेटी है श्रान्त, क्लान्त निश्चल!

         तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,

         लहरें उर पर कोमल कुंतल!

            - सुमित्रानन्दन पंत, ‘‘नौका विहार’’

         पंत जी द्वारा लिखी उपरोक्त पंक्तियाँ गंगा नदी के सौन्दर्य का चित्रण कर रही हैं, गंगा नदी स्निग्ध, दुग्ध, धवल, निर्मल, कोमल और शान्त है जिसमें कवि नौका विहार कर रहा है। यह कविता 1932 में गुंजन कविता संग्रह में संकलित हुई थी। दुःखद है कि 1932 में लिखी ‘‘नौका विहार’’ कविता की गंगा नदी 2020 में दुग्ध-धवल-निर्मल नहीं रही। नदियों के संगम में चप्पू चलाता नाविक पहले कहता था कि वो देखों पतली रेखा सरस्वती नदी की लेकिन अब नाविक नहीं कहता, क्योंकि नाव पर सवार लोग उससे बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि कहाँ? हमें तो नहीं दिख रही। क्या रंग है उस नदी का, कैसे पहचाने उसे। नाविक बात को टाल जाता है और गंगा-जमुना का बखान शुरू कर देता है क्योंकि नाविक भली-भाँति आँखों देखा हाल जानता है कि रंग तो अब पावन गंगा और जमुना का भी वह नहीं रहा जैसा सदियों पहले हुआ करता था। जी हाँ, विलुप्त हो चुकी नदियों का रंग और आकार नहीं बताया जाता। सदियाँ गुजरती गई और रंग बदलता गया हमारी नदियों का, पैरों के नीचे ज़मीन का और आँसमां से गुजरती किरणों का, सर... सर... सर... बहती हवा का। समय बीतता गया, बदलती गई सभ्यताएँ, जन्म होता गया नई संस्कृतियों का और उनमें ढलते गए लोग, फिर बदलते गए लोग। इसी पूरे बदलाव का चित्रण करती हैं राकेश कबीर जी की कविताएँ।

         अब तक प्रकाशित अपने दोनों ही कविता संग्रहों में राकेश जी ने बदलाव की नब्ज़ को भली-भाँति पकड़ा है। जीवन का हर क्षेत्र बदल रहा है और उनकी कविताएँ हर क्षेत्र तक पहुँचती है, उसे शब्द देती है। इस बदलाव में जो कुछ नष्ट हो गया उसे कसौटी पर कसती हैं और इस कड़ी में जो पिछड़ गया, उसके लिए आवाज़ उठाती है। उनकी कविताओं का सरोकार प्रकृति, समाज, सामाजिक रूढ़ियाँ-परम्पराएँ, राजनीति, तकनीक, अर्थतंत्र एवं जीवन के विविध पहलुओं से दिखाई देता है।

         राकेश जी की चेतना सर्वाधिक प्रकृति से जुड़ी है। प्रकृति का मनोहारी रूप उन्हें भावों से भर देता है। वे पहाड़ों पर बारिश के बाद उठते धुएँ में दो बिरहीं आत्माओं के मिलन का अनूठा बिम्ब खींच लेते हैं। वहीं नदियाँ बहती रहेंगेशीर्षक कविता में, नदी के निर्माण की साहसिक प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। नदियाँ जरूरी बनेगी और बहती रहेगी। ये कविता आभास दिलाती है मनुष्य निर्माण के संघर्ष की। भारतीय समाज के वे लोग जो पीछे ढकेल दिए गए, एक दिन अवश्य लड़ पेडेंगे, तब पत्थर से कठोर दिल वालों को भी पिघलना होगा। ये पिछड़े हुए लोग फिर आगे बढ़ेंगे, इनका रास्ता कोई नहीं रोकेगा। नदियों की भांति वह बह चलेंगे, अपना रास्ता खोज लेगें, ठीक वैसे ही जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी का ढीठ कुटज वृक्ष, पत्थरों को काटकर अपने जीवन रस के लिए रास्ता बना लेता है। नदी बहती रहती है, जब तक सूख नहीं जाती, ठीक वैसे ही मनुष्य का जीवन चलता ही रहता है, जब तक उसकी सांसे थम नहीं जाती। इस प्रकार राकेश जी की कविताओं में नदी और जीवन के इस पहलू का बखूबी जुड़ाव नज़र आता है।

         पूरी दुनिया आज तरक्की के राह पर है। सभी देश विकसित, विकासशील और अल्पविकसित की श्रेणियों में बँट चुके हैं। संसाधनों के ज्यादा-से-ज्यादा दोहन की होड़ मची है। आवास के लिए जंगलों को काटकर ऊँची इमारतें, जल के लिए नदियों के प्रवाह को रोककर बाँध निर्माण, ऊर्जा के लिए नाभिकीय विखण्डन / संलयन क्रिया, बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति के लिए खेती में उर्वरकों / कीटनाशकों का प्रयोग, संचार तकनीक में विकास के लिए उपग्रह आदि का प्रक्षेपण, सीमाओं की सुरक्षा के लिए हथियारों की होड़ लगी हुई है। चहुँओर विकास की प्रतियोगिता चल रही है। लेकिन राकेश कबीर जी की दृष्टि विकास की दौड़ में नष्ट होते जंगल, जमीन, नदियाँ, पहाड़, हवा, वर्षा को देख रही है। प्रकृति के अंगों की ऐसी उपेक्षा से भयाक्रांत होकर वे कहते हैं कि ‘‘विकास तुम न आना’’ क्योंकि तुम्हारे आने से जमीन बंजर, नदियाँ प्रदूषित, हवा जहरीली हो जाती है तथा जंगल और पहाड़ कटने लगते हैं। प्रकृति की गोद में सांस लेते प्राणी जगत पर जीवन संकट मंडराने लगता है।

         तुम आओगे तो बंजर हो जाएगी

         हमारे पुरखों की हरी-भरी धरती

         तुम आओगे तो वीरान हो जाएँगे

         हमारे पहरेदार हरे-भरे जंगल

         ×              ×              ×

         विकास तुम बिलकुल न आना

         हम तुम्हारे आतंक से भयाक्रांत हैं।

         भारत एक विकासशील राष्ट्र है। आजादी के बाद से ही कठोर परिश्रम से खुद को अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर स्थापित करने में लगा है। आज 21वीं सदी में भारत नए कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। अंतरिक्ष, ग्रह, उपग्रह तक पहुँच चुका है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों का अप्रतिम विस्तार कर रहा है। लेकिन देश के सामने विकास के साथ-साथ अनेक चुनौतियाँ भी खड़ी हो चुकी हैं। बढ़ती जनसंख्या ने इस समस्याओं पर अतिरिक्त दबाव बना दिया है। आज देश के सभी बड़े महानगर एवं नगर बढ़ते शहरीकरण के कारण स्वच्छ जल के संकट से जूझ रहे हैं। विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में भारतीय नदियों का भी स्थान है। नदियों में प्रदूषण के पारंपरिक कारणों जैसे- सीवेज का ट्रीटमेंट न होना, फ्रैक्ट्रियों का रसायन युक्त जल सीधे नदियों में छोड़ा जाना, कचरा प्रबंधन की ठोस रणनीति का न होना, अन्य जल स्रोतों कुएँ, तालाब, झीलों की संख्या में निरन्तर कमी होना आदि का प्रबन्धन अभी भी जारी है। जलवायु परिवर्तन से वर्षा चक्र में परिवर्तन हुआ है जिसका प्रभाव भारत के उन क्षेत्रों पर सर्वाधिक पड़ा है जहाँ वर्षा कम होती है। भारत का 2/3 क्षेत्र सूखे से प्रभावित है, जिसमें 14 राज्यों के 63 जिले सर्वाधिक। इन स्थानों पर भूमिगत जल काफी नीचे चला गया है।

         जल संकट के अतिरिक्त देश के अनेक शहर वायु की गिरती गुणवत्ता से परेशान है। बढ़ते वाहनों की संख्या, फैक्ट्रियों से निकलते धुएँ एवं कई अन्य कारणों से वायु की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुँच जाती है। दिल्ली जैसे शहर गैस चम्बर में तब्दील हो रहे हैं। राकेश कबीर जी लिखते हैं-

         विकास के नारों से उड़ती धूल

         इस कदर जम गई है

         शहर के ज़िंदा दरख़्तों पर

         कि दम घुट रहा है पत्ते-पत्ते का

         साँसों के पहरूए तड़प रहे हैं

         खुद ही साँस लेने को!

(घुटती साँस)

         भारत में प्रायः आवास, कृषि एवं उद्योगों की स्थापना के जंगलों को काटा जाता है। बीते कुछ दशकों से सड़क, रेल एवं मेट्रो रेल के निर्माण के लिए जंगल काटे गए, जिसमें कृषि योग्य भूमि का उपयोग भी किया गया। अत्यधिक वनों के कटाव से मरूस्थलीकरण, मृदा क्षरण एवं जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ सामने आती है। भारत में कुल वन क्षेत्र लगभग 21 प्रतिशत तक पहुँच गया था, पिछले कई वर्षों के लगातार प्रयास से 30 दिसम्बर 2019 में प्रस्तुत नवीन आंकड़ों में वृद्धि दर्ज की गई है। भारत में अब कुछ वन क्षेत्र 24.56 प्रतिशत हो गया। परन्तु वन क्षेत्र को और बढ़ाने की जरूरत है तभी वैश्विक जलवायु परिवर्तन से बचा जा सकता है।

         विकास के बावजूद पैदा हुए विभिन्न पर्यावरणीय संकटों के साथ व्यक्ति का जीवन बसर करना अत्यन्त मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सदैव दरकार होती है सन्तुलित विकास की। राकेश कबीर जी ने अपनी कविताओं में विकास का पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के अलावा पशु-पक्षियों, मनुष्यों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी दिखाया है। आधुनिक औद्योगिक एवं सामाजिक विकास की दौड़ में कुछ लोग पीछे रह गए या स्वार्थवश पीछे ढकेल दिए गए। उन्हें पीड़ा एवं दमन सहना पड़ा। औद्योगिक विकास का नकारात्मक प्रभाव खेती किसानी पर पड़ा। बीज, खाद एवं सिंचाई मँहगी होती गई और फसलों का उचित दाम उनसे दूर होता गया। इस समस्या की मार सबसे ज्यादा सीमान्त किसानों पर पड़ती है। राकेश जी ने अपनी कविता आलूमें दिखाया है कि फैक्ट्री में बनने वाला चिप्स महंगा बिकता है, जबकि किसान के उगाए आलू सस्ते बिकते है-

यही कमाल है ग्लोबलाइज्ड बाज़ार का

बेचने वाले हवा भी पैकेट में

भरकर बेच देते है

हम प्याज-आलू-टमाटर, जाने क्या-क्या

पक्की सड़क पर फेंक देते हैं

         दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों के कारण कृषि धीरे-धीरे घाटे का सौदा बन गई है। भू-जोत के आकार का दिन-प्रतिदिन छोटा होने से कृषकों की आय में लगातार कमी हो रही है। इन कारणों से किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। 1990 के बाद से लगभग चार लाख से अधिक किसान एवं कृषक मजदूर आत्महत्या कर चुके हैं। यह वास्तव में भयावह है। किसानों के लिए ठोस आर्थिक नीति बनाने की आवश्यकता है।

         राकेश कबीर जी असन्तुलित विकास के दूरगामी दुष्प्रभावों के प्रति सजग है। वे विकास तुम न आना, घुटती साँस, शहर, हाइवे, गिद्ध, कांटे, पानी कहाँ जाए?, वापसी, उलटी धार, शहरी मेंढ़क, आलू, दिल्ली, डिज़िटल-ग्लोबल दुनिया, अतिक्रमण जैसी कविताओं में विकास के बाद उत्पन्न विभिन्न प्रकार की असमानताओं से परिचय कराते हैं।

         भारत देश सदियों से सभ्यताओं, संस्कृतियों, धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों, प्रजातियों का देश रहा है। इसी विविधता में कई रूढ़ियाँ एवं परंपराएँ समाज में स्थान पाती गई। भारत देश सैकड़ों वर्षो तक गुलाम भी रहा। ये गुलामी मात्र औपनिवेशिक शासन की नहीं थी बल्कि उन सड़ी-गली अप्रासंगिक रूढ़ियों-परंपराओं की भी थी, जिसने अंधविश्वास, हिंसा, दमन, उत्पीड़न को जन्म देकर मनुष्य से मनुष्य होने का दर्जा तक छीन लिया। राकेश कबीर जी की अनेक कविताएँ इसी क्रूर व्यवस्था पर सवाल उठाती है।

         आज़ादी के बाद भारतीय संसद ने संविधान के माध्यम से जनता को समान प्रतिनिधित्व एवं अवसर देने हेतु अनेक कानून एवं प्रावधान बनाए, जिससे आज सभी जाति-धर्म के लोग हर पद, हर विभाग, हर क्षेत्र में पहुँच चुके हैं। ये कानून इसलिए बनाए गए की देश के सभी जातियों एवं धर्मों के बीच सामाजिक एवं आर्थिक असमानता घटे तथा प्रत्येक नागरिक गरिमापूर्ण जीवन जीए। इन कानूनों से निश्चित तौर पर बदलाव आया परन्तु सामाजिक असमानता अभी-भी साँसे ले रहा है, दूसरी तरफ पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते झुकाव से देश में आर्थिक असमानता भी कायम ही है। इस समस्या का प्रमाण आए दिन आने वाली जातिगत एवं धार्मिक भेदभाव की खबरें है, जिसमें पीड़ित कभी आत्महत्या कर लेता है या कभी उसकी हत्या कर दी जाती है। इसी भेदभाव का चित्रण करती राकेश कबीर की कविता ‘‘जाति तो रहेगी’’ है जिसमें निराशा से भरकर वे लिखते हैं कि-

         आप कुछ नहीं कर पाते तमाशा देखने के सिवा!

         इन्हीं परिस्थितियों का और जटिल रूप उनकी कविता ‘‘अपना हिस्सा’’ में भी देखने को मिलता है।

         अब हमें भी मौका मिला है

         तुम्हारे भाग्य का हिसाब-किताब करने का

         अब हम लिखेंगे तुम्हारी कुंडली

         और सरकारी राशिफल भी

         दिलाएँगे पीड़ित मानवता को न्याय

         तुम्हारे सदियों के अन्याय से!

         राकेश जी भविष्य की चुनौयितों के साथ-साथ वर्तमान की प्रत्येक घटना पर अपनी नज़र बनाए रखते हैं। बीते कुछ वर्षों से देश में राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुस्लिम एकता, सहिष्णुता, लव जिहाद, गौ रक्षा जैसे विषयों पर बहस छिड़ी है। कवि की दृष्टि इन पर संकीर्ण बहसों से उपजे दुष्प्रभाव पर है, जहाँ अफवाह के आधार पर दलितों एवं मुस्लिमों पर भीड़ तंत्र द्वारा जघन्य हिंसाएँ की गई। अनेक सांप्रदायिक दंगे घटित हुए। एक सजग कवि की भाँति राकेश जी इन समस्याओं को भी पंक्तिबद्ध करते हैं।

         अफ़वाह बड़े काम की चीज है

         ×              ×              ×

         बस नंगे पाँव दौड़ो इनके पीछे

         मचाओ शोर, जमा कर लो भीड़

         मार डालो किसी गरीब को

         चुडै़ल, मुँहनोचवा, चोटी कटवा बताकर

         ×              ×              ×        

         तुम्हारे पास सिर है, पैस है, दिल-दिमाग सब है

         लेकिन तुम अफवाहों के गुलाम हो!

         विडंबना है कि देश में शिक्षा एवं शिक्षित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विज्ञान एवं वैज्ञानिक अविष्कार को बढ़ावा दिया जा रहा है लेकिन जाति एवं धर्म के नाम पर फैली संकीर्ण मानसिकता एवं अंधविश्वास खत्म होता ही नहीं। अफवाह, कातिल सड़कें, दहशतगर्त, खबरदार, कुँवरवर्ती, अपनी राह आदि कविताओं में राकेश जी ने इसी मानसिकता पर सवाल उठाया है।

         सत्ता परिवर्तन के साथ व्यवस्था परिवर्तन भी होता है। ये परिवर्तन सकारात्मक-नकारात्मक दोनों हो सकते हैं। नेता वोट मांगने के वायदे करते हैं और चुनाव जीतने के बाद मुकर जाते हैं। चुनावों में पैसे का दुरुपयोग किया जाता है। नेता वोटर्स की भावनाओं में सेंध मारने के लिए विवादित भाषण देते हैं, जिससे जनता में फूट पड़ती है। राकेश जी ने राजनीति के इसी चरित्र पर व्यंग्य करते हुए अनेक कविताएँ लिखी हैं। ‘‘क्या बेच रहे हैं आप’’ में लिखते हैं-

         झूठे वादे दिलाने को

         बहकाने के, बहलाने के

         ×     ×     ×

         जूलूस में ढोलक बजाने के

         सेहरा गाने के

         सब कुछ के पैसे मिलते हैं।

         ये कौन-सा बाजार है?

         आज क्या ख़रीद-बेच रहे हैं भाई?

         यदि किसी देश की जनता अपना वोट बेचने लगे, अपना ईमान बेच दे, तो उस देश की सत्ता पर कोई भी अयोग्य व्यक्ति काबिज़ हो सकता है। जरूरी है कि जनता अपने विवेक का उपयोग करते हुए सच्चे कर्मठ नेता का चुनाव करें। चुनावों के समय उसके पूरे कार्यकाल का मूल्यांकन करे अथवा किसी नए उम्मीदवार के लिए उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन कर वोट दे। जीत, जनता क्या चाहती है, सिंहासन, सत्ता, वी.आई.पी. सुनवाई, कारोबार, अफ़सोस आदि कविताएँ भारतीय राजनीति का खुलासा करती है।

         राकेश कबीर जी भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर चिन्ता जाहिर करते हुए बदलाव की मांग करते हैं। राकेश जी कुँवरवर्तीकविता के माध्यम देवी बना दी गई मिथकीय चरित्रों के पीछे के सत्य की कल्पना करते हैं। कुँवरवर्ती अवश्य प्रेम से विलग विरहन रही होगी, जिसने प्रेम जैसे अपराध का दंड भोगने के लिए अथाह जलराशि में कूदकर जान दे दी होगी और एक दिन उसी स्थान से नदी बह निकली होगी।

         भोगने को दंड

         ‘प्रेमजैसे सर्वमान्य अपराध का

         कूद गई होगी अथाह जलराशि में

         और उसके आँसुओं के सैलाब से

         उफनकर निकली होगी एक नदी

         लोग भी ऐसा कहते हैं।

         भारतीय समाज अभी भी स्त्रियों को प्रेम करने, जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता है भले ही वे शिक्षित हों, नौकरी करती हों। यहीं से ऑनर किलिंग जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। दूसरी तरफ स्त्रियों को देवी मानना, उनकी पूजा करना मात्र विडंबना है। ऐसे समाज से लड़ने वाली लड़कियों के लिए वे लिखते हैं-

         दकियानूस बंदिशों को तोड़

         चैराहों पर शान से खड़ी लड़कियाँ

         इनसे डरो ऐ सामंतवादियों!

         ये हैं नए जमाने की बहादुर लड़कियाँ।

         राकेश कबीर जी ने प्रकृति, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था आदि पर लिखने के साथ ही अपने निजी जीवन अनुभवों को भी कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। जिनसे पाठक भी स्वयं को जोड़ने से बच नहीं पाता। बिरह, तन्हाई, तेरी यादें, अजनबी और भी, तुम्हारा साथ, इंतजार, प्यार का स्वाद, शरीक-ए-हयात, अकेली शाम, तारीफें जैसी अनेक कविताओं में प्रेम, दर्द, अजनबीयत, यादें, खुशी आदि भावनाओं के चित्रण ने कवि के अन्तर्मन को खोलकर रख दिया है। ऐसी कविताओं में कवि एवं पाठक का अधिक जुड़ाव संभव हो सका है क्योंकि इन कविताओं से पाठक राकेश जी के व्यक्तित्व को भी समझता चलता है।

         राकेश जी लिखते हैं कि- ‘‘मनुष्य होने के नाते हम सभी एक समाज में रहते व अंतः क्रिया करते हैं, जिसके कारण हमें अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं। एक कवि प्रकृति, समाज, घटनाओं, स्मृतियों और व्यक्तियों के संसर्ग से अपनी एक अनुभव की गठरी और समझ बनाता है और अपनी कविताओं में अपनी शैली में प्रस्तुत करता है।’’ इसी विशिष्ट शैली में राकेश जी ने अपनी कविताओं में अनेक घटनाओं का चित्रण किया है। ये घटनाएँ हमारे सामान्य जीवन का हिस्सा भी हो सकती है लेकिन राकेश जी ने उन्हें बखूबी शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया है। कहीं-कहीं वे घटनाएँ अत्यन्त मार्मिक बन पड़ी है। उदाहरणस्वरूप कस्बाकविता में कस्बाई जीवन की दैनिक दुरूहता का यर्थाथवादी चित्रण-

         घंटो जाम में धुआँ, धूल-गर्द से

         हरदम है बिलबिलाती ज़िंदगी

         साइकिल, रिक्शा, आटो ट्रैक्टर,

         ट्रक बसों में चिल्ल-पों मचाती है ज़िंदगी

          मुक्त विचरते कुक्कुर, सुअर और साँड़

         हर पल मौत से टकराती है ज़िंदगी

         गिलावा, धूप की लकीर, पगडंडियाँ, आलस्य दिवस, जागते रहो, चैन की नींद, मुर्दाबाद, शहर, बुरा वक्त, कब्रिस्तान में आशियाना, बेचारा किसान, गुजरता वक्त, दीपावली, खलिहान, होली है आदि कविताएँ घटनापरक कविता शैली में लिखी गई हैं, जिनसे कवि की सजगता का पता चलता है।

         समग्रतः राकेश जी एक सजग, आधुनिक चेतना सम्पन्न युवा कवि है। यदि किसी व्यक्ति को 21वीं सदी में भारत की समस्याओं से रूबरू होना है, यहाँ के जीवन को समझना हैं तो इसके लिए राकेश जी की कविताएँ अति उपयोगी हैं क्योंकि इनकी कविताओं की विषयवस्तु 21वीं सदी के भारत के संपूर्ण अध्ययन की भांति है। अध्ययन की सुविधा के लिए राकेश जी की कविताओं को निम्न रूपों में बाँटकर पढ़ा जा सकता है- (i) प्रकृति / पर्यावरण संबंधी, (ii) सामाजार्थिक संबंधी, (iii) समाज संबंधी, (iv) निजी भाव संबंधी, (v) राजनीति संबंधी, (vi) घटना विशेष संबंधी। इन सभी रूपों में प्रेम, दाम्पत्य, दोस्ती, इंतजार, निजी जीवन के राग-द्वेष, प्रकृति, समाज, राजनीति, दहशतगर्दी, आतंकवाद, विद्रोह, हिंसा, पीड़ा, दमन, तीज-त्योहार, हवा, पानी, नदी आदि सभी शामिल है। उनकी दृष्टि से कुछ भी नहीं छूटा।

         राकेश जी अन्याय के प्रति विद्रोह के कवि है। ये अन्याय चाहे विकास के नाम पर प्रकृति के साथ हो रहा हो या धर्म-संस्कृति-परंपरा के नाम पर मनुष्यों के साथ। उनकी चेतना सिहर उठती है, नेत्र आंसूओं से भर जाते हैं और हृदय अनगिनत सवाल करने लगता है, जब वे प्रकृति को नष्ट होते हुए देखते हैं। पर्यावरण संकट एक सामाजिक समस्या भी है, जिसके प्रति बिना नैतिकता अपनाए उसे ठीक नहीं किया जा सकता। ‘‘मनुष्य के अतिरिक्त धरती पर पौधों तथा पशुओं को भी पृथ्वी के संसाधनों पर अधिकार है। हजारों और लाखों वर्षों से विकसित एक प्रजाति को विनाश के मुँह में धकेलने का मानव को कोई अधिकार नहीं है।’’

         राकेश जी लोकतंत्र के पूरजोर समर्थक है। वे न केवल राजनीति में लोकतंत्र को चिरंजीवी देखना चाहते हैं बल्कि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भी लोकतंत्र हो। वे फांसीवाद, साम्राज्यवाद के प्रति जनता को जागरूक करते हैं। उनकी कविताओं में वो तबका मुख्य रूप से चित्रित है जो शोषित है। राकेश जी ऐसे दलित, पिछड़े तबके को अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर लड़ने का आह्वान करते हैं। धर्म, जाति, सम्प्रदाय में बांटने वाली राजनीति को पहचान कर सचेत होने के लिए कहते हैं।

         तकनीक एवं संचार माध्यमों के विकास के बाद अनेक सामाजिक एवं राजनीतिक दुष्परिणाम सामने आए हैं। राकेश जी लिखते है- ‘‘तकनीक और सूचनाओं पर निर्भरता ने अवैक्तिकता और मानवीय संबंधों पर निर्भरता को कम किया है, जिसके कारण मानवीय मूल्य भी कमज़ोर हुए हैं। ऐसे समय में सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़ने वालों की तादाद तो बढ़ी है, लेकिन संबंधों की गहराई और गुणवत्ता कम हुई है। अफ़वाहों को तेज़ी से प्रसारित होने का मौका मिला है। अभिव्यक्ति के ख़तरे पूरी दुनिया में बढ़ते ही जा रहे है। सच बोलने-लिखने वाले लेखकों और पत्रकारों पर हमले बढ़ गए हैं। भीड़ मानसिकता और अतार्किक व्यवहारों में लगातार वृद्धि हो रही है, जो लोकतंत्र के संस्थानों में लोगों के घटते विश्वास की परिचायक है।’’ निस्सन्देह राकेश जी अपनी कविताओं में इन खतरों को दिखाते है और इसके समाधान के लिए मुखर होने की बात करते है।

         राकेश जी कबीरउपमान से रचनाएँ करते हैं। यह उपमान अपने आप में एक चुनौती भरा दायित्व है लेकिन साथ ही एक उम्मीद जगाता है कि एक लेखक कबीर जैसे व्यक्ति की भांति मुखर होना चाहता है। सत्ता से लोहा लेना चाहता है। जनता को सर्वोपरि रखते हुए उसे जागरूक करने का प्रयास करता है क्योंकि जनता का ऐसे समाज में बसर करना मुश्किल है जहाँ दमन/उत्पीड़न/भेदभाव हो। हजारों विकास के वादों के बाद भी लोग जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित है। राकेश जी इसी वंचना के प्रति मुखरित होते हैं। वे सत्ता के अन्याय के खिलाफ लिखने की ताकत रखते है। उनके दोनों ही काव्य संग्रह नदियाँ बहती रहेंगी’’ और ‘‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’’ दोनों ही बेहद प्रासंगिक कृतियाँ हैं।


सहायक ग्रंथ सूची

1.              राकेश कबीर, नदियाँ बहती रहेंगी, गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट, वाराणसी, पहला संस्करण 2018

2.              डॉ. राकेश कबीर, कुँवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2020

3.              सुमित्रानन्दन पंत, नौका विहार, एनसीईआरटी बुक्स

4.              हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुटज, एनसीईआरटी बुक्स

5.              राम आहूजा, सामाजिक समस्याएँ (तृतीय संस्करण), रावत पब्लिकेशन्स, जयपुर, 2019

6.              कविता सिंह, भारत में सामाजिक समस्या, इशिका पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, प्रथम संस्करण, 2010

7.              डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, नयी सदी की दहलीज पर भारत: सामाजिक समस्याओं के उभरते क्षितिज, ओमेगा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012


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