नहीं भूलता चेन्नै प्रवास

मंजुला वाधवा


15 वर्ष पूर्व किसी पत्रिका में पढा था, ''चेन्‍नै शहर है जबकि मद्रास मनोवेग'' उस समय इस उक्ति के निहितार्थ को नहीं समझ पाई थी। जुलाई 2015 में चेन्‍नै में तैनाती के 2 वर्ष पूरे होने और इस शहर की गलियों, चौबारों-  प्राचीनतम भागों से लेकर जनसंकुल बाज़ारों, यहाँ की कला, संस्‍कृति, साहित्य और परंपराओं को निकट से देखने से लेकर आसपास के ग्रामीण अंचलों का अनुभव लेने के बाद इस कहावत का सही अर्थ मैं समझ पाई। आप कह सकते हैं कि यहाँ के सागर-किनारे, परम्‍पराएं और बाशिंदे इस शहर को खास बनाते हैं। बेशक, 4 वर्षों की तैनाती के दौरान जब यहाँ की भीड़ और सघन यातायात से घबरा जाती थी तो सी-बीच ही मुझे राहत पॅंहुचाते थे। शुरूआती 06 महीनों के दौरान यहाँ की भीषण गर्मी, जनाक्रांत सड़कों, ऑटो-रिक्‍शा के मनमाने दामों और साफ-सफाई की कमी आदि सभी कारणों से मैं इस महानगर से नफरत किया कती थी लेकिन धीरे-धीरे मेरी टूटी-फूटी तमिल समझने की कोशिश करके मदद करते स्‍थानीय दुकानदार, ट्रैफिक पुलिसकर्मियों, कार्यालय में मेरे सहकर्मी जिन्‍होंने 'कुंजम-कुजम' तमिल सीखने में मेरी सहायता की, मेरे कार्यालय के वरिष्‍ठ अधिकारियों जिन्‍होंने सुदूर दक्षिण स्थित इस शहर, जहॉं आज भी काफी तबके न हिंदी बोलते हैं न समझना चाहते हैं, मुझे राजभाषा कार्यान्‍वयन, (जिसके लिए मुझे यहाँ तैनात किया गया था), के लिए पग-पग पर मेरा मार्गदर्शन किया और भरपूर सहयोग भी दिया। सभी के मधुर व्‍यवहार के कारण इस शहर और यहाँ के बाशिंदों के प्रति मेरे मन में स्‍नेह अंकुर पल्‍लवित होने लगा।

इस महानगरी को खोजने के मेरे प्रयासों में सबसे पहले जि़क्र करना चाहूँगी यहाँ के पेय कॉफी का-कहीं तीक्ष्‍ण गंध तो कहीं सौम्‍य महक वाली, कहीं मीठी तो कहीं कुछ कसैले स्‍वाद वाली यहाँ की कॉफी इस शहर और यहाँ के निवासियों को हर सुबह ऊर्जा देती है, मुझे भी भाने लगी और इतनी भायी कि तीन महीनों में कभी एक बार कॉफी पीने वाली मैं उत्‍तर भारतीय, हर दिन अपने बैंक कैंटीन द्वारा सर्व किए जाते चाय और कॉफी के विकल्‍पों में से कॉफी ही चुनती। दक्षिण भारतीय भोजन मेरी और मेरे परिवार की स्‍वादग्रंथियों को इतना पसन्‍द आने लगा कि आज चेन्नै छोड़ने से 08 के वर्ष गुज़र जाने के बावजूद मेरे घर में लगभग हर दिन एक वक्‍त का भोजन इडली, दोसा, सांबर ही बनता है लेकिन दक्षिण भारत का खाना, बिना घूप में सुखाए घर के बने वट्टल, अपलम और सूरन चिप्‍स के कैसे संपूर्ण हो सकता है, लिहा़ज़ा, मेरे अमृतसरी पापड़ अब उत्‍तर भारतीय दाल-चावल के साथ परोसे जाते हैं जबकि दक्षिण के भोजन का स्‍वाद मेरा परिवार और मैं  अब इन्‍हीं के साथ लेती हूँ। हर सुबह की सैर पर जाते समय यहाँ की गलियों में चावल का मिश्रण मलमल की चादरों पर फैलाती महिलाओं की स्‍मृतियॉं आज भी मेरे मानसपटल पर अंकित है। नाश्‍ते में इडली-साम्‍भर मैं तो क्‍या यहाँ आने वाले विदेशी सैलानियों को भी सर्वाधिक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक नाश्‍ता लगता है।

स्‍मृति-वीथिकाओं से गुज़रते हुए, अब आपसे बाँटना चाहती हूँ मेरे निवास स्‍थान, तेनम्‍पेट (चेन्‍नै) के पास ही बसे मइलापुर का मेरा 'लुज़ अनुभव' - स्‍पैनिश भाषा में लुज़ का अर्थ है 'प्रकाश', माना जाता है कि बंगाल की खाड़ी में भीषण तुफान आने पर जब एक जलपोत दिशा-ज्ञान खो बैठा तो जिस दिशा से प्रकाश दिखा, की ओर मुड़ गया। किनारे पर पॅंहुचकर उसी स्‍थल पर उन्‍होंने गिरजाघर का निर्माण किया जिसे‍ तमिल में 'कट्टु कोविल' और अंग्रेज़ी में कहा गया Forest Temple। आज जंगल तो विलुप्‍त हो चुका है परंतु इस चर्च को आज भी 'लुज चर्च' के नाम से पुकारा जाता है। चर्च के पास ही हाथगाड़ी पर उबली मूंगफली बेचते रेहड़ी वाले, हर दिन प्रातः 4 बजे से रात 12 बजे तक भीड़ से घिरे न्‍यूज़पेपर स्‍टैंड और पुरानी किताबों का सड़क पर लगाया अपना ढ़ेर वर्षा से बचाते वेंडर की स्‍मृति मेरे लुज़ अनुभव को आज भी ताज़ा किए हुए हैं। 4 वर्षों के प्रवास में अपने सहकर्मियों के निमंत्रण पर जितने भी दक्षिण भारतीय विवाह समारोहों में भाग लिया, पाया सभी समारोहों की शोभा बढ़ाता पंचमुखी आदमकद दीप 'कुत्‍तुविल्‍कु'। यहाँ के निवासियों की मान्‍यता है कि इस दीप का हर कोना विवाह वेदी पर बैठी कन्‍या के व्‍यक्तित्‍व के एक गुण का प्रतिनिधित्‍व करता है - स्‍नेह, बुदि्धमत्‍ता, धैर्य, साहस और दूरदर्शिता आदि। तेल भरने वाला स्‍थान नारी के मानस का प्रतीक है। दीप प्रज्‍ज्‍वलित करते ही नारी चरित्र की ये सभी विशेषताएं मानो साकार हो उठती हैं। तमिल परिवारों के विवाहों में 'तविल' और 'नादस्‍वरम' नामक वाद्ययंत्र जिस पावन, माधुर्यपूर्ण परिवेश का सृजन करते हैं, देखते ही बनता है। इनके बिना तो समारोह संपूर्ण ही नहीं माने जाते क्‍योंकि उनकी मान्‍यता है कि ये 'मंगल वाद्य' सुख समृद्धि के वाहक हैं।



अब आपको ले चलती हूँ यहाँ के दर्शनीय स्‍थलों के भ्रमण पर' -सर्वप्रथम विख्‍यात तमिल कवि, लेखक और संत तिरूवल्‍लुवर के नाम पर निर्मित वललुवर कोट्टम। शहर के मध्‍य में कोडमबक्कम के कोने में स्थित वललुवर कोट्टम की संरचना 39 मीटर ऊंचे रथनुमा मंदिर के रूप में है, जिसके अंदर विशालाकार प्रतिमा बनी है संत तिरूवल्‍लुवर की। उल्‍लेखनीय यह है कि इसे सहारा देने के लए कोई स्‍तम्‍भ ही नहीं हैं। प्रकृति प्रेमी हैं, सूर्योदय का अदभुत नज़ारा देखना चाहते हैं तो मरीना बीच एक बार नहीं बार-बार जाना होगा। भारत का सबसे लंबा और एशिया महाद्वीप में दूसरा सबसे लंबा सागर तट है मरीना बीच। सुबह की सैर करने वालों की पसंदीदा जगह जिनके प्रयासों के कारण अब यह बीच बेहद साफ-सुथरा नज़र आने लगा है। 1883 में यहाँ निर्मित थियोसोफिकल सोसायटी इस संस्‍था का वैश्विक मुख्‍यालय है। 260 एकड़ में फैले इस दर्शनीय स्‍थल के बाग-बगीचे पक्षियों के कलरव और क्रीडा़ पसंद करने वालों से गुलज़ार रहता है। यहाँ अनेक प्रवासी दुर्लभ पक्षियों के किलोल देखे जा सकते हैं। यहाँ की एक और विशेषता है मौन तपस्‍वी की भांति राह दिखाता हुआ यहाँ स्थित 450 वर्ष पुराना बरगद का पेड़।

इतिहास की घटनाएँ मेरे और मेरे परिवार की जिज्ञासा का सदैव से केन्‍द्र रही हैं, लिहाज़ा अगला अवकाश दिवस नाम किया एगमोर स्थित राजकीय अजायबघर के। पुरातनता में हमारे देश का दूसरे स्‍थान पर आने वाला सर्वाधिक प्राचीन अजायबघर। कलाकृतियों, पुरातत्विक अवशेषों और भारत की समृद्ध विरासत के प्रतीकों से सुसज्जित इस म्‍यूजि़यम में कैसे 4 घंटे बीत गए, भान ही नहीं हुआ, प्रहरियों के याद दिलाने पर बाह्य द्वार की ओर कूच किया। 16 एकड़ में बने इस म्‍यूजि़यम के विशाल प्रांगण में संरक्षित कांस्‍य व पीतल की चोल और पल्‍लव काल की दुर्लभ कलाकृतियों ने संपूर्ण दक्षिण भारत की संस्‍कृति को हमारे समक्ष साकार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अगला स्‍थल जिसने मुझे आकर्षित किया, वह था मइलापुर, चेन्‍नै में स्थित 7वीं सदी में निर्मित द्रविड़ वास्‍तुकला का प्रतीक कपालीश्‍वर मंदिर। खोजा तो पाया कि देवी शक्ति यहाँ मयूर रूप में शिवजी को पाने के लिए तपस्‍या कर रही हैं। तमिल में 'मइल' का अर्थ है मोर और यहाँ भगवान शिव की कपालीश्‍वर के रूप में उपासना होती है इसीलिए इस स्‍थान का नाम मइलापुर पड़ा। इस मंदिर के दर्शन करके मुझे तमिल धार्मिक संस्कृति की झलक और दो शैलियों – द्रविड़ियन और विजयनगरी का सुंदर स्थापत्य संयोजन देखने को मिला।

हर रोज़ सुबह कार्यालय डयूटी पर जाने के लिए चेन्‍नै के समोज़ी पूंगा के पास से गुज़रती थी, 20 एकड़ में फैला विशाल उद्यान जिसमें विश्‍व भर से लाए गए औषधीय और सुगंधित 500 किस्‍मों के विविध पेड़ पौधे मुझे अपनी ओर आमंत्रित करते प्रतीत होते थे। हर ओर लोगों की भीड़ से भरे चेन्‍नै में हरियाली से भरपूर यह उद्यान देखने का लोभ मैं कैसे संवरण कर सकती थी इसलिए एक सुहानी शाम  जा पॅंहुची यहाँ के नज़ारे देखने। तालाब में बतखें तैर रही थीं तो दूसरी ओर बच्‍चों के मनोरंजन के लिए झूलों वाला पार्क था। 45 वर्ष पुराने चीनी बोनसाई पौधे और थाइलैंड के ऑर्किड उद्यान की शोभा में चार चॉंद लगा रहे थे।

मरीना बीच तो बहुत बार गए किंतु वहाँ सिथत विवेकानन्‍द हाऊस (तमिल में विवेकानंद ईल्‍लम) के अंदर जाने का अवसर पहली बार चेन्‍नै प्रवास के चौथे साल में मिला। 1897 से रामकृष्‍ण मठ से जुड़े इस स्‍मारक में स्‍वामी विवेकानंद पश्चिमी दुनिया का भ्रमण करने के बाद  1900 मैं यहाँ  06 सप्ताह रूके। 1897 से 1906 तक यहाँ रामकृष्‍ण मठ चलता रहा। अब इसमें भारतीय संस्‍कृतिఀ और स्‍वामी विवेकानन्‍द से जुड़ी वस्‍तुओं की प्रदर्शनी लगी हुई है जिसे देखने ज्ञान-पिपासु देश-विदेश से यहाँ आते हैं। 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यपारियों द्वारा निर्मित सेनथोम चर्च का पुनर्निर्माण 1893 में अंग्रेजों ने चर्चित ब्रिटिश वास्तुशिल्प, नियो-गौथिक शैली में करवाया और इसे कैथिडरल का दर्जा दिया। ईसाई पौराणिक कथाओं के अनुसार सैंट थामस ईसामसीह के 12 अनुयायियों में से एक थे।

वह 52 ईस्वी के आसपास सीधे केरल के समुद्र तट पर पहुँचे थे और 72 ईस्वी तक यहाँ रुके थे। 72 ईस्वी में ही यहाँ की एक चोटी पर उनका निधन हुआ, जिसे आज सेंट थामस माउंट के नाम से जाना जाता है।  रोमन कैथोलिक चर्च होने के कारण यह मद्रास-मलयापुर कैथोलिक आर्कडियोसिस के अंतर्गत आता है। भारत के ईसाई समुदाय का यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। चेन्नै का एक अन्य महत्वपूर्ण आकर्षण है 1640 में ईस्ट इंडिया कंपनी के फ्रांसिंस डे द्वारा बनवाया गया सेंट जॉर्ज फोर्ट। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक केंद्र रहा यह चर्च अँगरेजों द्वारा भारत में बनवाया गया सबसे पुराना चर्च माना जाता है। इस किले की सबसे अद्भुत और भव्य संरचना इसका संग्रहालय है जिसे “फोर्ट म्यूजियम” के नाम से भी जाना जाता है, इसका निर्माण वर्ष 1795 ई। में किया गया था, जिसमे ब्रिटिश शासन की कई वस्तुऐं और मद्रास में खोले गये पहले बैंक की चीजों को संभाल कर रखा गया है। इस संग्रहालय के ऊपर नोबेल पुरस्कार विजेता “ओरहान पामुक” द्वारा एक उपन्यास लिखा था। आजकल इस किले का मुख्य भाग तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के कार्यालयों के रूप में उपयोग किया जाता है। इन सभी स्थानो का  भ्रमण करने के बाद, मै इस निष्कर्ष पर पहुँची कि चेन्नई एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास वाला शहर है जो अपनी संपन्न आधुनिक जीवन शैली के साथ अपनी विरासत को भी पूरी तरह संतुलित रखे हुए है।

वर्षों से साध संजोयी हुई थी-महाबलीपुरम देखने की, पूरी हुई जब हमारे बैंक के स्‍पोर्टस क्‍लब ने एक दिन की पिकनिक का निमंत्रण दिया और हम जा पॅंहुचे, चेन्‍नै से 60 किलोमीटर दक्षिण में स्थित 7वीं सदी में निर्मित दक्षिण भारत के पल्‍लव वंश की पत्‍तन नगरी, महाबलीपुरम। प्राचीन भारत में व्‍यापारी दक्षिण पूर्व एशिया से व्‍यापार करने के लिए इसी बंदरगाह से जाया करते थे। महाबलीपुरम मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य में बंगाल की खाड़ी के किनारे कोरोमंडल तट पर स्थित एक विशाल और भव्य मंदिर हैं। महाबलीपुरम अपने जटिल नक्काशीदार मंदिरों और रॉक-कट गुफाओं के लिए जग प्रसिद्ध हैं। तमिलनाडु का यह ऐतिहासिक ममल्लापुरम या महाबलीपुरम यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए एक शानदार पर्यटन स्‍थल के रूप में जाना जाता हैं। इसे वर्ष 1984 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया जा चुका हैं। शहर की स्थापना का श्रेय 7 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान में पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम को जाता हैं। यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है - 8 वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का ‘शोर मंदिर -तीन तीर्थों का एक अदभुत संयोजन । पल्लवों द्वारा ग्रेनाइट के ब्‍लॉकों का प्रयोग करके 60 फीट ऊंचे और 50 फीट चौकोर मंच पर विश्राम करते हुए पिरामिड शैली में एक शानदार संरचना का निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है। पंच रथ मंदिर 7 वीं शताब्दी के अंत में पल्लवों द्वारा निर्मित किया गया एक रॉक-कट मंदिर है। महाबलीपुरम के रथ मंदिर का परिचय पांडवों और महाभारत के अन्य पात्रों के नाम के अनुसार रखा गया है।  महाबलीपुरम बीच लगभग 20 किमी लंबा समुद्र तट हैं जोकि 20 वीं शताब्दी के बाद से ही अस्तित्व में आया था। यह समुद्र तट धूप सेकने, गोताखोरी, विंड सर्फिंग और मोटर बोटिंग जैसी समुद्र तट की गतिविधियों के लिए पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। महाबलिपुरम समुद्र तट पर स्थित दक्षिण भारतीय शिल्प उद्योग को कलात्मक और पारंपरिक रूप में दर्शाते विरासत गॉंव दक्षिणाचित्र का भ्रमण किए बिना कैसे वापस लौट सकते थे। महाबलिपुरम में वेस्टराजा स्ट्रीट पर स्थित विशाल शैल स्मारक - गंगा उद्गम को देखकर मन अत्‍यंत उल्‍लसित हो उठा।  चट्टान पर की गई नक्काशी पवित्र गंगा नदी के स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर आने की कहानी को बयान करती हैं।



निकट भविष्य में होने वाले पारिवारिक विवाह समारोह मॆं साउथ-सिल्क साड़ी पहनने का शौक मुझे और मेरे परिवार को ले जा पहुँचा- कांचीपुरम। सह्कर्मियो से बहुत सुना था- एक हजार मंदिरों के ‘सुनहरे शहर’ के रूप में जाने जाने वाले कांचीपुरम के बारे में जो केवल मंदिरों और ऐतिहासिक स्थानों तक सीमित नहीं हैं, यहाँ आप रामाराजा स्ट्रीट पर पैरासेलिंग, कोवलॉन्ग पॉइंट पर स्कूबा डाइविंग, थिरकनारायण एवेन्यू में रॉकिंग और रॉक क्लाइम्बिंग जैसे कई साहसिक खेलों के लिए भी जा सकते हैं। किंवदंती के अनुसार, कांचीपुरम नाम कै और अनची शब्द से लिया गया है। “कै” हिंदू भगवान ब्रह्मा को संदर्भित करता है और “अनची” भगवान विष्णु की पूजा के लिए संदर्भित करता है। सबसे सुखद लगा कि कांचीपुरम की संस्कृति में जैन, बौद्ध, हिंदू और मुस्लिम जैसे सभी धर्मों का मिश्रण शामिल है और सभी धर्मो को पूर्ण श्रद्धा भाव से अपनाया जाता है। भारत में स्थापित 51 शक्ति शक्तिपीठों में से कामाक्षी अम्मन मन्दिर के दर्शन करने गये तो ज्ञात हुआ,  इस स्थान पर देवी सती की नाभि गिरी थी। कामाक्षी नाम में, ‘का’ अक्षर सरस्वती का प्रतिनिधित्व करता है, ‘मा’ लक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ‘अक्षी’ का अर्थ है आंखों को देखना। जिसका अर्थ है ये तीन हिंदू देवी या देवियां ब्रह्मांड की महिला पारलौकिक ऊर्जा की पवित्र त्रिमूर्ति का निर्माण करती हैं।  1053 में चोल वंश द्वारा निर्मित “वरदराजा पेरुमल मंदिर” जाने पर, यकीन माने आप भगवान विष्णु के दर्शन के साथ-साथ मंदिर परिसर की भव्य वास्तुकला और जटिल नक्काशी देखकर मंत्रमुग्ध हो जायेंगे। सीमित समय में सभी दर्शनीय स्थलो को देखना तो सम्भव होता नहीं, अत: पूरे भारत में विशिष्ट पहचान और लोकप्रियता प्राप्त रेशम की साड़ियाँ ख़रीदने के लिए बाज़ार गये।

सप्ताह का अंत, अवकाश के 3 दिन, और मेरी यायावरी प्रवृत्ति मुझे खींच कर ले गयी- बंगाल की खाड़ी के कोरोमंडल तट पर स्थित चेन्नै से लगभग 162 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित पुडुच्चेरी।  निश्चय ही यहाँ की पत्थर की गलियां, नीला पानी और बहुतायत में मिलने वाली प्राकृतिक सुंदरता आपको चकित कर देगी। घूमने के लिए दिलचस्प स्थानों की पूरी श्रंखला मौजूद है, जिसमें प्राचीन मंदिर और चर्च,  ऑरोविले,  कई संग्रहालय, धार्मिक केन्द्र और कुछ खूबसूरत बीच शामिल है परंतु  मै तो गयी थी आध्यात्म की खोज करने और शांत आत्मनिरीक्षण के लिए मानव एकता को समर्पित ऑरोविले के पड़ोस के गांव में स्थित, ऑरोविले  ("द सिटी ऑफ डॉन") से बेह्तर स्थान हो ही नहीं सकता। पांडिचेरी से 8 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित  20 स्क्वेयर किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली  एक्सपेरिमेंटल टाउनशिप ऑरोविले जो समुदायिक रहन-सहन के साथ दीर्घकालीन रहने के अंदाज को सिखाती है। आप यहाँ गतानुगातिता के परिवेश से निजात पाकर यहाँ एक अलग अनुभव को पाने के लिए जा सकते हैं। किसी एक एनजीओ में स्वंयसेवक बने या ऑर्गेनिक खेती, हस्तकला उत्पादन केन्द्र, लाइब्रेरी, समुदायिक रसोई में योगदान दे सकते हैं। बड़े शहरों की हलचल से दूर यह भारत के दक्षिणी तट पर स्थित एक शांत सा शहर है। अचूक फ्रेंच कनेक्शन, पेड़ों की कतार से सुसज्जित प्रमुख मार्ग, विचित्र औपनिवेशिक इमारतों की विरासत, आध्यात्मिक प्राकृतिक दृश्य, अंतहीन विशुद्ध और खूबसूरत समुद्र तट और बांध और व्यंजनों के आश्चर्यजनक विकल्प के साथ रेस्तरां यात्रियों को अनुभव का एक आकर्षक मिश्रण प्रदान करते हैं।  पांडिचेरी के व्हाइट टाउन में स्थित श्री का अरबिंदो आश्रम का नाम अरबिंदो घोष के नाम पर पड़ा जिसकी नींव उनके द्वारा वर्ष 1926 में 24 नवंबर को रखी गई थी, जब वह राजनीति से सेवानिवृत्त हो गए थे और तत्कालीन पांडिचेरी में रहने लगे थे। 
सच पूछिये तो, पर्यटन से सिर्फ़ ज़हन की गिरहें ही नहीं खुलतीं बल्कि सामाजिक विस्तार भी होता है। सबसे ख़ास, संस्कृति का आदान-प्रदान होता है। इसी सैर-सपाटे और घूमने पर शायर जमील मलिक की निम्नलिखित पंक्तियाँ याद करते हुए, मैंने शाम के धुँधलके में वापस चेन्नै की ओर प्रस्थान किया:-

"यूँ तो घर ही में सिमट आई है दुनिया सारी 
हो मयस्सर तो कभी घूम के दुनिया देखो"

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