कहानी: वह भूत था

मनमोहन भाटिया
- मनमोहन भाटिया


कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि विदेश जाना नसीब होगा। पूरा भारत भी आजतक कभी नहीं घूमे। इच्छा हमेशा से मन के एक कोने में छुपी रही कि कम से कम एक बार तो विदेश घूमा जाए, चाहे दो दिनों के लिए ही सही। 
खैर कभी अपनी ख्वाहिश किसी के आगे जाहिर नहीं की। लोगों का काम है मजाक बनाना। नहीं गया तब हर कोई कहेगा कि कहता फिरता है लेकिन जाता है नहीं। शेखचिल्ली है पूरा। अपनी खासियत है कि कम बोलो और बोलो तो कर के बोलो। यही कारण है कि इच्छा को किसी के आगे जाहिर नहीं किया।
एक दिन अपनी मुराद पूरी हो गयी। इंग्लैंड जाने का मौका मिल ही गया। गर्मियों के दिन थे। इंग्लैंड में भी उस समय ठंड नहीं होती है। हल्के गर्म कपड़ों के साथ इंग्लैंड पहुँच गया। 
दिन भर हल्की बरसात होती रही। शाम के समय काम करके समीप के पार्क में टहलने चला गया। बरसात रुक चुकी थी और आसमान पर इंद्रधनुष ने बहुत खूबसूरत छटा बिखेर दी थी। खूबसूरत इंद्रधनुष को निहारने मैं पार्क के एक बेंच पर बैठ गया। पार्क बहुत ही खूबसूरत था। विभिन्न तरह के फूलों से पार्क सजा हुआ था। बच्चे खेल रहे थे। मैं पार्क की खूबसूरती देख कर मुग्ध था। कई किस्म के फूलों को मैंने पहली बार देखा था। रंग बिरंगे फूल अपनी खुशबू बिखेरते हुये मुझे मंत्रमुग्ध कर रहे थे।
अब शाम की अंतिम धूप निकली। बरसात के कारण कुछ ठंडक महसूस हुई थी। धूप निकलते मैं पार्क के बैंच पर बैठ कर शाम की जाती हुई धूप की गर्मायी लेने लगा। बैंच पर बैठे मुझे कहानी के नये विचार आने लगे और मैंने अपना मोबाइल निकाल कर उन विचारों को मोबाइल में लिखना आरंभ किया ताकि उन पर बाद में विस्तृत कहानियाँ लिख सकूँ। कभी-कभी कोई विचार मन में आता है औऱ बाद में भूल जाते है। उन विचारों को मोबाइल पर लिख कर निश्चित हो जाता हूँ, वर्ना कई बार विचार आते हैं औऱ चले जाते हैं। उनको याद करने के लिये मस्तिष्क पर दबाव भी डालना पड़ता है। अकसर उनका दुबारा याद आना असफल रहता है। पहले कॉपी, रजिस्टर या डायरी और पेन लिखने के लिये साथ में रखते थे लेकिन आधुनिक तकनीक ने एक छोटा सा यंत्र जो खिलौने जैसा है हमें दिया और दुनिया को हमने मुट्ठी में कर लिया। फ़ोन, इंटरनेट और लिखने पढ़ने के सभी कार्य मोबाइल फोन पर सम्पूर्ण हो जाते हैं।
मैं लिखने में मग्न था तभी एक अंग्रेज सज्जन बैंच पर मेरे साथ बैठ गये लेकिन मुझे उस सज्जन का मेरे समीप बैठने का तनिक भी अहसास नहीं हुआ। जब मैंने मोबाइल पर लिखना बंद किया तब उन सज्जन ने मुझसे कहा।
(यहाँ उन सज्जन और मेरे बीच अंग्रेजी में संवाद हुआ लेकिन मैं यहाँ हिंदी में लिख रहा हूँ। याद रहे कि उन अंग्रेज सज्जन के साथ मैं अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में बात कर रहा था। गनीमत रही कि उन सज्जन को मेरी बोली समझ आ रही थी)
"क्या आप लेखक हैं?" उन सज्जन की बात सुन कर मैं चौंक गया। मैंने देखा कि बैंच पर बैठे वे सज्जन मुझसे कह रहे हैं।
"जी मैं लेखक भी हूँ। अपने खाली समय में मैं कहानियाँ लिखता हूँ, लेकिन आप ने कैसे जाना कि मैं लेखक हूँ?
"आप लिख रहे थे तब मैंने महसूस किया कि आप कोई रचना को जन्म देने वाले हैं।"
"हाँ आपने सही समझा कि मैं अपने विचार लिख रहा था ताकि उनको कहानियों में विकसित कर सकूँ।"
"यानी मेरा आंकलन बिल्कुल सही था।" उन सज्जन के होठों पर एक बडी मुस्कान थी।
"हाँ, वह तो ठीक है कि मैं लेखक हूँ और अपनी नई रचना के लिये छोटे नोट्स लिख रहा था। एक बात मैं नहीं समझा कि मैं हिंदी में लिख रहा था, क्या आपको हिंदी आती है?" मैंने उन सज्जन से पूछा।
"मुझे हिंदी नहीं आती है लेकिन लेखक कहीं भी रहता हो और किसी भी भाषा में लिखे, कैसा भी लिखे, सब में एक बात अवश्य मिलती है, वह बात है कि अपने विचारों को तुरंत कहीं लिख लेते है ताकि वे भूले नहीं और बाद में उन विचारों को प्रभावशाली कहानी में परिवर्तित कर सकें।"
"आप की बातों से लगता है कि आप भी एक अच्छे लेखक हैं।" मैंने उन सज्जन से पूछा।
मेरा प्रश्न सुनकर उन सज्जन ने एक जबरदस्त ठहाका लगाया। "हाँ भाई हाँ, मैं एक लेखक हूँ। क्या तुमने मुझे पहचाना नहीं?"
मैंने उन सज्जन को वाकई नहीं पहचाना। मैं हिंदी लेखक हूँ और कभी अंग्रेजी में लिखा नहीं और किसी अंग्रेजी लेखक से मिला भी नहीं और सबसे बड़ी बात कि मैं अपने जीवन में पहली बार इंग्लैंड आया हूँ और पहली बार किसी अंग्रेज लेखक से अचानक मुलाकात हो गई, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। 
"मैं अब्राहम स्टोकर हूँ।" कह कर उन सज्जन के मुख पर एक बड़ी लंबी मुस्कान थी।
मैंने दिमाग पर जोर डाला। "अब्राहम स्टोकर" कुछ जाना पहचाना नाम लग रहा है। मैंने घूर कर उन सज्जन को देखा। "अब्राहम स्टोकर" की फोटो देखी थी औऱ पढ़ा भी था। अचानक से दिमाग की बत्ती जली।
"अब्राहम स्टोकर, ड्रैकुला के लेखक।" शून्य भाव के साथ मेरे मुख से वह वाक्य निकला।
"बिल्कुल सही फरमाया आपने। मैं ड्रैकुला का लेखक अब्राहम स्टोकर हूँ।"
"यह कैसे हो सकता है। उनको मरे तो एक सदी बीत गयी हैं। उनका निधन 1912 में हुआ था।" 
"20 अप्रैल 1912 में मेरी मृत्यु हुई थी।"
यह सुनकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी। "यह कैसे संभव हो सकता है। एक मृत व्यक्ति मेरे साथ जीता जागता कैसे बातचीत कर सकता है।"
"लेखक कभी नहीं मरता है। उसका जीवन मृत्यु के बाद आरंभ होता है।"  उन सज्जन ने आँख मारते हुए मुझसे कहा।
"वह कैसे?"
"मुझे देख लो। आज दुनिया में जितने लोकप्रिय लेखक है। वे उतने अपने जीवन में लोकप्रिय नहीं रहे, जितना आज हैं। उनके मरने के पश्चात उनको पूजा जाता है। मुझे एक मैनेजर के रूप में अधिक जाना जाता था। आज मेरी रचना ड्रैकुला को लेखक कॉपी करते हैं जो उस समय नहीं था। आपके यहाँ भी मेरे ड्रैकुला पर बहुत कुछ लिखा जाता है। लेखकों में कल्पना शक्ति नहीं है। मैं बचपन में बहुत बीमार रहता था। सात वर्ष की उम्र में स्कूल गया। बीमारी के दौरान मैं बहुत सोचता था, कल्पना करता था। यही मेरे लेखन की सबसे बड़ी ताकत मेरी कल्पना शक्ति थी। मुझे लगता है कि तुम्हारे अंदर कल्पना भरी हुई है। तुम खाली समय सोचते हो और जो विचार तुम्हें आते हैं, उनको लिख लेते हो और फिर उनको कहानियों में विकसित करते हो। मैं भी ऐसा करता था। ड्रैकुला लिखने से पहले मैंने बहुत से नोट्स हाथ से लिखे और टाइप भी किये थे।"
"क्या आप सच मे अब्राहम स्टोकर हो?"
"मैं उसका भूत हूँ।" कह कर उन सज्जन ने ठहाका लगाया।
"मैं घबरा गया। मेरी घबराहट देख कर अब्राहम स्टोकर का भूत बोला। "जब तुम भूतों की कहानियाँ लिखते हो तब भूत देखकर डर क्यों गये?"
"मैंने कभी भी भूत नहीं देखा।"
"तब आज देख लो। मैं तुमको बधाई देता हूँ कि तुमने कभी भी भूत नहीं देखा फिर भी भूतों की कहानी लिखते हो।"
"बस मैं भूतों की कल्पना करता हूँ।"
"तभी तुम अच्छा लिखते हो। अच्छा और क्या लिखते हो?"
"हर विषय पर लिखता हूँ।"
"तुम्हें मालूम है कि मैंने मेलोड्रामा भी लिखे हैं लेकिन ख्याति ड्रैकुला के कारण हुई।"
"हाँ मैंने पढ़ा है।"
"तुम्हें औऱ तुम्हारे प्रकाशक, दोनों को मेरी शुभकामनाएँ। अच्छा मैं चलता हूँ।" कह कर वह भूत चला गया।
पल भर में वह गायब हो गया। गायब होने के बाद मैंने उसे इधर उधर देखा लेकिन वह कहीं भी नजर नहीं आया। मैं उसे ढूंढने के लिये भागा और सामने बैंच पर बैठी एक महिला से टकरा गया। मेरी टक्कर से वह बिगड़ गयी।
"तुम पागल तो नहीं हो? मैं तुम्हें पंद्रह मिनट से देख रही हूँ। अपने आप बैठे हुए बातें कर रहे हो। तुम सचमुच के पागल हो। बिना देखे भागे जा रहे हो। पागल कहीं का।"
हाँ वह भूत ही था जिससे मैं बात कर रहा था। भूतों की कहानी लिखने वाले आधे क्या पूरे ही पागल क्या स्वयं भूत होते हैं।
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