कहानी: गूंगी गुड़िया

रंजना जायसवाल


इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद सौरभ की शादी के लिए रिश्ते आने लगे थे। रोज ही कोई न कोई अपनी बेटी का रिश्ता लेकर चला आता घर में खुशी का माहौल था, सब बड़े खुश थे। अनुराधा भी बहुत खुश थी, आखिर सौरभ उसका लाडला था। अनुराधा की शादी के समय उसके कंधे तक आता था, दिनभर उसके आगे-पीछे डोलता रहता था। उसका प्यारा देवर आज इतना बड़ा हो चुका था कि उसकी शादी की चर्चा भी होने लगी थी। बचपन में कितना चिढ़ाती थी वह, “तेरी दुल्हनिया तो कानी आएगी कानी एक आँख से देखेगी।” नन्हा सौरभ कितना चिढ़ जाता था और वह उसको चिढ़ता देखकर खिलखिला कर हँस पड़ती। 
रंजना जायसवाल

“मैं... मैं शादी नहीं करूँगा मुझे तो सुंदर सी दुल्हनिया चाहिए, बिल्कुल आप जैसी…” 

“मेरी जैसी?”

 उस दिन सौरभ की बात को सुनकर अम्मा जी कितना नाराज हुई थी, “भगवान बचाए ऐसी दुल्हन से, हर चीज का जवाब हाजिर रहता है। ऐसी पढ़ी-लिखी बहू लाने का दंड भी तो इसी जन्म में भोगना होगा। “

अनुराधा कट कर रह जाती, उसकी सिर्फ इतनी ही तो गलती थी कि वह पढ़ी-लिखी थी। चीजों को अपने अनुसार देखती और समझती थी। न जाने कितने मौकों पर उसने अपनी बात रखने की पर जब-जब कोशिश की हर कोई उसे डाँट कर चुप करा देता, “जब तुम से राय मांगी जाए तभी तुम अपनी राय देना, अभी घर में हम सब जिंदा हैं ।”

क्या थी उसकी जिंदगी सिर्फ किसी की बहू और किसी की बीवी... क्या पढ़ा-लिखा होना इतना बड़ा अपराध है। छोटी सी छोटी गलती को उसकी पढ़ाई से जोड़ दिया जाता।

“माँ ने कुछ सिखाया नहीं जीवन भर बस कागज और कलम लिए बैठी रही। यह पढ़ाई-लिखाई कभी काम नहीं आती। कलेक्टर भी हो जाती तब भी घर-गृहस्थी तो देखनी ही पड़ती। माँ के साथ रहकर घर-गृहस्थी सीखी होती तो मायके की नाक यूँ न कटती।”

 शायद उसके ससुराल वालों को बहू नहीं एक गूंगी गुड़िया चाहिए थी जो चुपचाप सर झुका कर उनकी बातों को सुनती और मानती रहती। एक अजीब सा डर उसके मन में घर कर गया था, वह भगवान से प्रार्थना करती थी कि सौरभ की होने वाली बीवी की उसकी जैसे हालत न हो। अभी-अभी लड़की वाले गये थे, लड़की देखने मे ठीक-ठाक थी पर दहेज... अनुराधा से रहा नहीं गया आखिर...

“एक बार सौरभ भैया से भी उनकी पसंद पूछ लीजिए हो सकता हो वह किसी को पसंद करते हो। सब अपनी-अपनी चला रहे हैं पर जिंदगी जिसे काटनी है उसकी पसंद भी तो सब को समझनी चाहिए।”

अम्मा जी ने जलती हुई निग़ाहों से देखा, जब तक वो कुछ कहती तब तक प्रखर बोल पड़े, “तुम फिर शुरू हो गईं, कितनी बार कहा है घर के मामलों में चुप रहा करो, हमें तुमसे ज्यादा सौरभ के भले-बुरे की फिक्र है। तुम से किसी ने राय मांगी जो तुम चली आई हो राय देने।”
 
अनुराधा छटपटा कर रह गई, ऐसे कैसे चुप हो जाये। आखिर सौरभ उसका भी तो कुछ लगता है। समय बीतता रहा, रोज कोई न कोई रिश्ता लेकर आता ही रहता पर कभी दहेज, कभी रंग-रूप तो कभी लड़की की शिक्षा-दीक्षा के नाम पर बात बन नहीं रही थी। अम्मा जी एक बार पढ़ी-लिखी बहू लाने का परिणाम देख चुकी थी अब दूसरी नहीं।

रोज-रोज मेहमानों की आवभगत से घर वाले भी अब कहीं न कहीं खीजने लगे थे। कल रात ही अनुराधा की मौसी की देवरानी का फोन आया था, उनकी बेटी भी शादी करने लायक थी। परिवार काफी सुलझा हुआ था, न-न करते-करते भी उन्होंने अनुराधा को कुहू की फोटो भेज दी थी। अनुराधा कई बार कुहू से मिल चुकी थी। 

“बिटिया! तेरी छोटी बहन की तरह है, क्या तू नहीं चाहती कि तेरी बहन का घर बसे।”

क्या कहती वह… मौसी जी को मना भी कैसे करती पर

“अम्मा जी! सौरभ के लिए एक रिश्ता आया है। मेरी मौसी की देवरानी की बेटी है...”

अनुराधा ने धीरे से मोबाइल अम्मा जी की तरफ खिसका दिया

“देखने में तो लड़की सुंदर और समझदार लग रही है।”

“काफी सम्मानित परिवार है, दहेज में कार, गृहस्थी का सामान और पच्चीस लाख भी देने को तैयार है। एक बात और, वह ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं है।”

“अरे इतना अच्छा रिश्ता तुमने कभी बताया क्यों नहीं, ये तो वही बात हो गई बगल में छोरा शहर में ढिढोरा…”

पता नहीं ये भ्रम था या फिर कुछ और अनुराधा को ऐसा महसूस हुआ कि अम्मा जी इस बात से ज्यादा खुश थीं कि कुहू कम पढ़ी-लिखी थी, “सौरभ के पापा! अनुराधा का देखा-भला परिवार है , बढ़िया शादी भी कर रहे हैं और क्या चाहिए हमे… कोयल की तरह कुहूकती रहेगी दिन भर…”

तभी अनुराधा ने कहा, “आप सभी से एक जरूरी बात कहनी है…” 

“अब कौन सी जरूरी बात रह गई तुम्हारी?” अम्मा जी ने बुरा सा मुँह बनाया

“कुहू बहुत अच्छी लड़की है। मैं भी चाहती हूँ कि उसका संसार बस जाए, … पर वह बोल नहीं सकती। एक एक्सीडेंट में उसकी आवाज जाती रही।”

अनुराधा की बात को सुन पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया। अम्मा जी का चेहरा सफेद पड़ गया, प्रखर गुस्से में कमरे से बाहर चले गए। एक अजीब सा सन्नाटा पूरे कमरे में भर गया। शब्द कहीं खो से गए, पूरा घर उसे ऐसे देख रहा था कि मानो उसे खड़े-खड़े भस्म कर देगा। अनुराधा सोच रही थी बोलती हुई बहू किसी को नहीं अच्छी लगती पर गूंगी बहू भी किसी को नहीं चाहिए होती। 
***

निवास: मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश
ईपता: ranjana1mzp@gmail.com

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दिल्ली एफ एम गोल्ड , आकाशवाणी वाराणसी, रेडियो जक्शन और आकाशवाणी मुंबई संवादिता से लेख और कहानियों का नियमित प्रकाशन,  पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताओं और कहानियों का प्रकाशन, 


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