प्रेम के उजास से आलोकित है एक बूंद बरसात

एक बूंद बरसात (उपन्यास)
लेखक: रमाकांत शर्मा
प्रकाशक: इंडिया नेटबुक्स, सी-122 सेक्टर-19, नोएडा

समीक्षक: सुशील कृष्ण गोरे



रमाकांत शर्मा
‘एक बूंद बरसात’ डॉ. रमाकांत शर्मा का तीसरा उपन्यास है जिसमें निश्चित रूप से उनका कथाक्रम एक विकसित फलक हासिल करने में कामयाब हुआ है। उन्होंने किशोरमन के कोमल भावना संसार को उसकी सभी एकांत अनुभूतियों का गहन चित्रण किया है। मूलत: यह तरुणाई की प्रेमकथा है। 

प्रखर उपन्यास का केंद्रीय पात्र है और उसके अंदर किशोरवय में प्रेम की पहली कोंपल के प्रस्फुटन को उन्होंने अपना मुख्य कथासूत्र बनाया है। एक प्रकार से यह कथा प्रेम को महसूस करने और उसे पाने की चिरंतन अभिलाषा का एक आख्यान है। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार यह अहसास उभरता रहता है कि प्रेम के उपजने की उजास किस प्रकार जीवन को आशाओं के आलोक से भर देती है, देखते-देखते जीवन कितना संजीदा और सघन हो जाता है। 

डॉ. शर्मा ने कथावस्तु को जिस मोहक तरीके से विकसित किया है उसे देखकर आपको कहीं भी ऐसा महसूस ही नहीं होगा कि आप इस तरह की कथाएँ पहले पढ़ चुके हैं। कथ्य, भाषा, शिल्प में एक नयापन हर स्तर पर दिखाई देता है। कई मायनों में यह उपन्यास उनकी परिपक्व रचनाशीलता से उपजी एक बेहद उल्लेखनीय कृति साबित होती है।

सुशील कृष्ण गोरे
प्रेम के बारे में एक आम धारणा है कि उसे किए या जिए बिना लिखा जाना शायद संभव नहीं है। यह मनुष्य की सबसे मौलिक भावना भी है। कहा जा सकता है कि यह सभी मानवीय अनुभूतियों का एकमात्र स्रोत है। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार यह बात कौंधती रहती है कि प्रेम ही जीवन की सबसे आदिम कथा है। यह सभी सीमाओं और विभाजनों से परे आजीवन मनुष्य को परिव्याप्त किए रहता है। इस प्रकार वह अपने स्वभाव से ही आत्मकथात्मक है।

उपन्यास के आरम्भ में, अचानक एक रोज़ टहलने के बाद थककर पार्क की बेंच पर बैठे-बैठे पैंसठ वर्षीय प्रखर को अचानक करीब बावन-तिरपन साल पहले की एक घटना याद आ जाती है। देखा जाए तो पार्क में बैठे प्रखर को कोई घटना नहीं बल्कि अचानक किसी चेहरे की याद आई होगी। वह चेहरा उसे खींचकर एक फ्लैशबैक में ले जाता है जहाँ सातवीं कक्षा का किशोरवय प्रखर पहली नज़र में उस चेहरे के सम्मोहन में बिंध गया था। फिर कथा बड़े सिलसिले के साथ आगे बढ़ती है। डॉ. शर्मा का लेखन कौशल तब दिखायी देती है जब वे इस पृष्ठभूमि में बड़े करीने से कथाक्रम को उसके सब प्रसंगों से जोड़ते हुए विस्तार देते हैं। कब कहानी शुरू हो गई, कहाँ तक आगे बढ़ गई और किन मोड़ों से गुजरती हुई किस मुकाम तक पहुँच जाती है, पाठक को अंत तक पता ही नहीं चल पाता। यह उपलब्धि किसी उपन्यास के लिए उसका सबसे सशक्त पक्ष माना जाता है जब वह पाठक को अपने भीतर के संसार में निमग्न कर दे। 

स्मृतियाँ उसे पीछे ले जाती हैं। प्रखर की बड़ी बहन की शादी में बारात बुलंदशहर से मेरठ आई हुई थी। उसी बारात में पाँचवी में पढ़ने वाली प्रभा भी आई थी जो दूल्हे के मामा-मामी की बेटी थी। प्रखर की प्रभा से पहली मुलाकात जनवासे में होती है। देखा जाए तो उस समय दोनों की कोई उम्र ही नहीं हुई थी, शायद उनको यह भी समझ नहीं होगी कि रस्मो-रिवाज़ या रिश्ते क्या होते हैं। उस वय में उनसे इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती जब उनके कोमल मन और ह्रदय के निविड़ प्रांतर में निजपन की कुछ इच्छाएँ उमग रही होंगी। कुछ चाहतें जन्म ले रही होंगी जो किसी के करीब आने, उसे देखने, उससे बातें करने, उसके भीतर अपने लिए प्यार की जगह बनाने की स्वप्निल कामनाओं को जगा रही होंगी। 

डॉ. शर्मा ने इस उपन्यास में तरुण प्रेम के अहसास को बहुत शिद्दत से उभारा है जो प्रखर और प्रभा के एक-दूसरे के करीब आते जाने और उनसे जुड़े सभी प्रसंगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह प्रखर के भीतर जन्मी उत्सुकताओं के माध्यम से बहुत सुंदर रूप में व्यक्त होता है। डॉ. शर्मा की लेखनी ने इस क्रम में बड़ी सावधानी से प्रखर के तेजी से बदलते मनोभावों को उसकी सब गोपन और मनोरम छवियों में समग्रता के साथ चित्रित किया है। प्रभा का मन अभी इस रिश्ते में अनुराग तक नहीं पहुँचा है। वह इसे सहज आत्मीयता से लेती है। उसे भी प्रखर से नजदीकी अच्छी लगती है लेकिन शायद अभी दोस्ती की हद तक। वह तुरंत उसमें डूबती नहीं है। यहाँ उपन्यासकार उसे एक स्त्री चेतना की प्रारंभिक मन:स्थितियों के साथ जोड़कर बहुत संतुलित दृष्टिकोण से अपने रचनाकर्म का प्रमाण प्रस्तुत करता है।       

उपन्यास में मुख्य धारा की कैशोर्य की प्रेमकथा के समानांतर दो अन्य प्रेम कथाएँ भी चलती रही हैं। डॉ. शर्मा ने इन सब कहानियों की बुनावट और विस्तार को जिस खूबसूरती के साथ सूत्रबद्ध किया है वह वाकई काबिले-तारीफ़ है और निश्चित रूप से उनकी औपन्यासिक प्रतिभा को भी रेखांकित करती है। चाहे वह मौली के जीवन में घट रही प्रेम संवेदना का कथात्मक चित्रण हो या नीरा के एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक्षा में डूबा एकांत हो, डॉ. शर्मा ने अपने पात्रों को बेहद संजीदा प्रेम छवियों में प्रस्तुत किया है। वे सब साधारण जीवन के साधारण प्रेम के समस्त निश्छल एवं विह्वल, आत्मीय प्रसंगों में विकसित होते हुए जीवंत चरित्रों का निर्माण करते हैं। 

एक विशेषता के लिए डॉ. शर्मा को श्रेय दिया जा सकता है कि उनके पास प्रेम करते ह्रदय की हर धड़कन को न केवल समझने की क्षमता मौजूद है बल्कि वे उसकी सब नि:शब्द आंतरिक कामनाओं को पूरी कलात्मकता के साथ उकेरेने में भी सिद्धहस्त हैं। अपनी इस खूबी के साथ उन्होंने अपने पुरुष और स्त्री दोनों चरित्रों के भीतर चलने वाले सभी मनोभावों को उनकी तीव्रता के सभी स्तरों में पकड़ा है। उनके पात्र अत्यंत स्वाभाविक रूप से अपने प्रसंगों एवं स्थितियों में अपनी भूमिकाओं में बखूबी विन्यस्त दिखाई देते हैं। उनके संवाद एवं प्रतिक्रियाएँ उनके चरित्रगत स्वभाव के अनुकूल बैठती हैं। किसी कथा या उपन्यास में इस तरह की संगति उसे विश्वसनीय एवं प्रामाणिक बनाती है। लेकिन इसके लिए कथाकार को खुद पहले संवेदनात्मक धरातल पर बहुत सांद्र, गहन और मानवीय होने की अनिवार्य अपेक्षा पूरी करनी होती है। 

एक बूंद बरसात आज के परिदृश्य में बहुत पठनीय उपन्यास है क्योंकि आज के जीवनानुभवों से प्रेम लगातार कटता जा रहा है। अपने सहजात सौंदर्य के साथ उसकी उपस्थिति समकालीन परिदृश्य में लगातार विरल होती जा रही है। उसकी जगह तमाम प्रकार की भौतिकताओं के जंजाल में कहीं खोती जा रही है। उसके सभी एकांतों और अभिसारों पर अब इंटरनेट की आभासी छायाओं का कब्जा होता जा रहा है। इस समय प्रखर को ऐसी कोई बारात नहीं मिलेगी कि जिसमें वह अपनी प्रभा को पहली बार करीब से देख सके, उसकी ऊष्मा में अनुरक्त हो सके और फिर उससे ताउम्र भूल न पाए। अब वह मौली भी नहीं जो दूर के रिश्ते में होने के बावजूद प्रखर को उसके प्यार से मिलाने में कोई कसर न छोड़ती हो भले ही खुद उसकी चाहतों वाला प्यार उसे आखिर तक न मिल सका हो। उपन्यास में दर्ज यह स्थानीयता और उसका पूरा परिवेश एक जबरदस्त नास्टैलजिया पैदा करता है जो उम्रदराज पाठकों को मोह लेता है। 

इस उपन्यास में प्यार पर पूरा एक अध्याय नीरा का भी है जो मध्यांतर के बाद उस समय खुलता है जब प्रखर की दुनिया में उसके अपने प्यार का उत्तरार्द्ध शुरू हो जाता है। प्रभा के सामने उसका अपना एक नया संसार सिरजने लगता है। उसके रिश्ते की बात पक्की हो जाती है। उसके मन में नए जीवन के सपने आकार लेने लगते हैं। उधर प्रखर खुद को अजीब कश्मकश में फँसा महसूस करता है। भावनाओं के गहरे आवर्त्त से घिरा खड़ा वह मौन वेदना सहने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। उसके सपने एक झटके में बिखर कर टूट गए थे जिसकी आवाजें उसके आलावा कोई नहीं सुन सकता था। जो बुलंदशहर कभी उसके लिए जिंदगी की आखिरी मंजिल बन चुका था, वही उसकी आँखों में चुभने लगा था और वह उससे दूर भाग जाना चाहता था। वह वापस मेरठ अपने घर आता है, दिल की वीरानी, तनहाई का बोझ, टीसती यादों का सैलाब लिए। शायद, वक्त कुछ नया करने वाला था क्योंकि उसे हर दिल की दास्ताँ मालूम है। शायद नीरा के लंबे इंतजार में कहीं प्रखर की जिंदगी का नया मोड़ छिपा था। 

डॉ. शर्मा ने टूटे हुए सिसकते प्रेम को वियोग की भावशून्य और विषण्ण कर देने वाली गहरी वेदना के पार झिलमिलाती नई आशाओं के क्षितिज की ओर ले जाते हुए एक बड़ी सार्थक बात मौली से कहलवाई है, “जब हम खुद को दु:ख-दर्द भरे अंधेरे कमरे में बंद करके बैठ जाते हैं तो जो खुशियाँ बाहर खड़ी इंतजार कर रही होती हैं, वे हम तक नहीं पहुँच पातीं। सच कहूँ मैंने भी खुद को उस अंधेरे बंद कमरे में कैद कर लिया था। उससे बाहर निकली तभी उन बेपनाह खुशियों तक पहुँच पायी जो आज मेरी झोली में भरी हैं। समझ रहा है न? पता नहीं अब कब मिलना हो भाई, पर हम जब भी मिलेंगे, मैं तेरे चेहरे पर दर्द की शिकन नहीं, नई जिंदगी की चमक देखना चाहूंगी।” 

इस पंक्ति को उपन्यास के मुख्य सूत्र की तरह देखा जा सकता है। यह प्रखर और प्रभा के अलावा नेपथ्य की सभी प्रेमकथाओं की भावभूमि है। यही सूत्र है जो समान रूप से सभी कथाओं को सुखांत का समीकरण बना देता है। पात्रों को बहुत घरेलू बना देता है। इस प्रकार उनकी कोई कमजोरी दिखाई नहीं देती। यह तत्व उन्हें आदर्शवादी भी बना देता है तथा यह भी नोट किया जा सकता है कि तनाव एवं दर्द की बहुत सारी जरूरी लकीरों से महरूम कर देता है जिनके अक्स के बिना अक्सर प्रेमकथाएँ कमजोर हो जाती हैं। ऐसे में प्रेम हो या जीवन जिसे नदी की तरह उन्मुक्त होना चाहिए वह सुव्यवस्थित एवं पूर्व-निर्धारित नियति-सा एकरेखीय बन जाता है। निराशा या व्यग्रता का दुर्गम पठार पार किए बिना प्रेम समझौतों के रास्ते कभी अपने शिखर तक नहीं पहुँच सकता। विवशताओं एवं जीवन संघर्षों के अभाव में वह शिखर अपनी जगह केवल एक धूमिल आकार-सा, ठूंठ और यंत्रवत बना खड़ा रहता है। लेकिन रचनाकार की शक्ति उसे घुटन के धुंध से बाहर निकालकर एक निरभ्र और स्वच्छ आकाश देती है। अविजित उत्कट इच्छाओं का समुद्र और उसका विक्षोभ मानवीय जीवन का सबसे निकटतम रूपक है। एक प्रतिभाशाली लेखक पूरी ईमानदारी के साथ इसे अपने अनुभवों और भाषा-शिल्प से अपनी रचना में प्रतिस्थापित करने के लिए निरंतर जूझता रहता है। उसका यही रचनात्मक आत्मसंघर्ष उसकी कृति को प्रामाणिक यथार्थ की जमीन देता है।

वैसे तो उपन्यास का देशकाल पुराना है लेकिन फिर भी सभी प्रेम का अनिवार्य अंत परिणय पर ही हो, तो वह कथाओं को कृत्रिम बना देता है। कथा की संवेदना में प्रेम की संवेदना उसकी आत्मा की तरह बसी होनी चाहिए जो पाठक को आलोकित करती रहे लेकिन दिखे नहीं, केवल उसमें नि:शेष और निरात्म बनी रहे। इन सीमाओं के बावजूद इस कथाकृति की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह एक अकुंठ प्रेम की कथा कहता है जिसमें कहीं आसक्ति या सतही आकर्षण नहीं है। मांसल स्थूलताएँ नहीं हैं, अनावश्यक मोहग्रस्तता नहीं है। वह ज्यादातर मौन और अभिराम है। उसमें भीनी स्निग्धता के साथ प्रणय और प्रतीक्षा है। यह विशेषता उपन्यास को नए प्रयोगों के खाने में भले न डाले लेकिन उसे सामान्य मानवीय आकांक्षाओं को उभारने वाले एक प्रभावशाली उपन्यास के बतौर अवश्य स्थापित करती है। 

डॉ. शर्मा ने गहनता से कई कथासूत्रों को एक दूसरे के साथ पिरोया है और काफी हद तक उनको एक औपन्यासिक रचना में ढालने में सफलता हासिल की है। हम आशा कर सकते हैं कि वे अभी बहुत कुछ लिखेंगे और कथा-विन्यास तथा कथा-भाषा के नए प्रतिमान रचेंगे।


**************************************
रमाकांत शर्मा (लेखक): एम.ए.(अर्थशास्त्र), एम.कॉम (वित्तीय प्रबंधन), एलएल.बी, सीएआइआइबी तथा वित्तीय प्रबंधन में पीएच.डी डा. रमाकांत शर्मा पिछले 45 वर्ष से लेखन कार्य से जुड़े हैं। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ, व्यंग्य तथा अनुवाद प्रकाशित होते रहे हैं। अब तक उनके पाँच कहानी संग्रह – ‘नया लिहाफ’, ‘अचानक कुछ नहीं होता’, ‘भीतर दबा सच’, “डा. रमाकांत शर्मा की चयनित कहानियाँ”, “तुम सही हो लक्ष्मी” तथा अनूदित कहानी संग्रह ‘सूरत का कॉफी हाउस’ और व्यंग्य संग्रह ‘कबूतर और कौए” प्रकाशित हो चुके हैं। उनके तीन उपन्यास – “मिशन सिफर”, “छूटा हुआ कुछ” तथा “एक बूंद बरसात” भी प्रकाशित हैं। मुंबई रेडियो से उनकी कहानियाँ नियमित रूप से प्रसारित होती रही हैं। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी से सम्मानित डा. शर्मा की कई कहानियाँ अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कृत हुई हैं। यू.के. कथा कासा कहानी प्रतियोगिता में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला है। उन्हें दो बार कमलेश्वर स्मृति कहानी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उनकी कई कहानियों का मराठी, सिंधी, गुजराती, तेलुगु और उड़िया में अनुवाद हो चुका है। बैंकिंग और उससे संबद्ध विषयों पर भी उनकी सात पुस्तकें, वित्तीय समावेशन, व्यावसायिक संप्रेषण, बैंकिंग विविध आयाम, प्रबंधन विविध आयाम, इस्लामी बैंकिंग, कार्ड बैंकिंग और समावेशी विकास और नया भारत प्रकाशित हो चुकी हैं। “कार्ड बैंकिंग” को महामहिम राष्ट्रपति जी के हाथों पुरस्कृत किया गया है। “व्यावसायिक-संप्रेषण” आइआइबी में पाठ्य-सामग्री के रूप में शामिल की गई है। संप्रति वे भारतीय रिज़र्व बैंक से महाप्रबंधक के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने-पढ़ाने और स्वतंत्र लेखन कार्य में जुटे हैं।
***

सुशील कृष्ण गोरे (समीक्षक) 
जन्म: 15 अगस्त 1970, देवरिया
पत्रकारिता, जनसंचार और अनुवाद में प्रशिक्षण
राजभाषा अधिकारी, भारतीय रिज़र्व बैंक, मुंबई
ईपता -sushil.krishna24@gmail.com

3 comments :

  1. डाॅ. रमाकांत शर्मा के उपन्यास एक बूंद बरसात पर सुशील कृष्ण गोरे लिखी गई समीक्षा उपन्यास के कथ्य और शिल्प के प्रति न्याय करती हुई प्रतीत होती है । आज के समय का सबसे निष्ठुर पहलू प्रेमाभाव है जबकि जीवन की गति को आगे बढ़ाने और सुखमय तथा सुरक्षित बनाने के लिए यही सबसे जरूरी और वांछनीय तत्व है ‌। समीक्षक ने कथानक की मूल संवेदना को अपने भाषा सौंदर्य से सजाकर उकेरने का ओजस्वी प्रयास श्लाघनीय है । सटीक भाषायी कलेवर में प्रस्तुत समीक्षा के लिए साधुवाद ।

    ReplyDelete
  2. डाॅ. रमाकांत शर्मा के उपन्यास एक बूंद बरसात पर सुशील कृष्ण गोरे लिखी गई समीक्षा उपन्यास के कथ्य और शिल्प के प्रति न्याय करती हुई प्रतीत होती है । आज के समय का सबसे निष्ठुर पहलू प्रेमाभाव है जबकि जीवन की गति को आगे बढ़ाने और सुखमय तथा सुरक्षित बनाने के लिए यही सबसे जरूरी और वांछनीय तत्व है ‌। समीक्षक ने कथानक की मूल संवेदना को अपने भाषा सौंदर्य से सजाकर उकेरने का ओजस्वी प्रयास श्लाघनीय है । सटीक भाषायी कलेवर में प्रस्तुत समीक्षा के लिए साधुवाद ।

    ReplyDelete
  3. मन से की गई समीक्षा जिसने कृति के प्रति तीव्र आकर्षण जगा दिया है।
    -अरविंद मिश्र

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।