आज़ादी का अमृत महोत्सव एवं अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

हिंदुस्तान की जनता अपने आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रही है। एक ऐसा उत्सव जी रहें हैं भारतीय, जिसे उन्हें अनेक बलिदानों और बलिदानियों ने अपनी क़ुर्बानी देकर प्रदान किया है। अपने जीवन को हवन करने वाले हमारे स्वाधीनता सेनानियों के मन में स्वाधीनता की अनुगूँज थी। जिसकी वजह से वे भारत को अपना सर्वस्व न्यौछावर करके, एक सशक्त और अहिंसक भारत सौंपना अपना पुनीत कर्तव्य मानते थे। क्या आपको पता है कि इसमें भारत का प्रत्येक गाँव, शहर और नदी तटों पर बसे लोग शामिल थे, वे सभी लोग जिन्हें अखंड भारत से प्रेम था।

कोई भी आज़ादी हिंसा की बुनियाद पर ही मिली, चाहे वह हिंसा किसी भी कोटि की रही हो। हिंसा और प्रतिरोध ने भारत को आज़ाद किया। गाँधी जी ने अहिंसा की राह पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी लेकिन उन आत्म-अनुशासन में वे स्वयं पर हिंसा करते हुए मिलते हैं। क्योंकि सत्याग्रह, उपवास और आमरण से उनकी शरीर और आत्मा दोनों को हिंसा का शिकार होना पड़ा था, उसको कौन महसूस करेगा? इन सबके बावजूद हमारी समस्त लड़ाई सफल हुई। 15 अगस्त, 1947 को देश आज़ाद हुआ। 
भारत के स्वाधीन होने के बाद की भारतीय स्थिति तो बहुत नाजुक थी। यहाँ इसी धरती पर जब देश खण्डित हो गया, तो भारी मात्रा में लोगों का विस्थापन, क्रूर हिंसा और दंगे देश को लाल रंग और असंतोष में बदल दिए थे। यह एक क्रूर हिंसा का बिंब है और इसे इतिहासकार अपनी सुविधा से अपने-अपने सृजन में सम्मिलित किए हैं। सच लिखा गया, सच ही प्रकाशित और प्रसारित किया गया, लेकिन सच आज तक सामने नहीं है तो वह कैसा सच?

आज़ाद भारत और पाकिस्तान की आत्मकथा भी क्रूरता की लम्बी शृंखला के साथ चल रही है और दोनों देशों के लोग अपने-अपने अनुसार इसको सही और गलत ठहरा रहे हैं। भोगा जिसने और सहा जिसने वे आज हैं भी नहीं कि कुछ कह सकें। अब जो कहने वाले हैं वे अपने हिसाब से कह रहे हैं, और मानने वाले और न मानने वाले अपने अनुसार मान रहे हैं और खंडन कर रहे हैं। लेकिन क्रूरता का सच पीढ़ियों तक जाता है। किसी की तारीफ़ करना और उसके कसीदे पढ़ना दुर्भाग्य का आमंत्रण है, किन्तु भारत और पाकिस्तान के दो टुकड़े होकर, यही दुर्भाग्य को ही जीना नियति बन जाए तो हिंसा कभी भी अपना दम नहीं तोड़ेगी। दोनों देशों के लोग यह नहीं जानते कि वे एक हैं और दोनों देशों के लोग यह भी नहीं चाहते कि वे खतरनाक दौर के साक्षी बनें लेकिन हिंसक सभ्यता के पैरोकार, सहज जीवन जीने वाले लोगों को जीने लायक छोड़ते कहाँ हैं?

लोकतंत्र के उत्सव को आजादी के ज़श्न के रूप में भले जानने-समझने की कोशिश की जाए, लेकिन अब जो इरादे हैं और विचलित करने वाले बुरे सपने, दोनों देशों के भविष्य के लिए खतरा हैं। गरीबी, भुखमरी और जलवायु परिवर्तन पूरे विश्व की समस्याएँ हैं। लेकिन जो देश अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, उनके लिए बड़ी चुनौती है। हमारी आर्थिक स्थिति तो बिलकुल अच्छी नहीं है। हमारे सामाजिक स्तर में भी बहुत बदलाव नहीं हुआ है जिस तरीके के बदलाव आने चाहिए थे। दोनों देशों की स्त्रियाँ अभी भी सशक्त नहीं हुई हैं। दोनों देशों के बच्चों का भविष्य स्वर्णिम नहीं हैं अपितु वे एक न एक नए चुनौतियों से जूझ रहे हैं। कोई आतंक की गिरफ़्त में है तो कोई उन्मादी हो रहा है। यह हिंसा के लिए आमंत्रण ही नहीं है अपितु देश को गहरे अंधकार की ओर धकेलने का प्रयास है।

हिंसा की असभ्यता से दोनों देशों के लोग कब सुरक्षित हो सकेंगे, यह अमृत महोत्सव पर कोई भी देश बहस का हिस्सा नहीं बनाए, दुखद यही है। बल्कि अपने-अपने देशों के स्वाधीनता सेनानियों को केवल स्मरण कर रहे हैं, जो नाकाफी है। अच्छा होता एक मौलिक सोच विकसित करने के लिए और सहिष्णुता को बढ़ाने के लिए नए मंच को दोनों मुल्क महत्व देते। मीडिया इस आग में घी डाल रहा है। और दोनों तरफ की बहस एक दूसरे के लिए किसी भी प्रकार की संतोषप्रद बातें नहीं प्रतीत होतीं बल्कि हिंसा के लिए एक नया अवसर देती हैं जो मनुष्यता के लिए खतरा है। यह तो प्रेम और करुणा के लिए अभिशाप है।

हिंसा और असभ्य व्यवहार अथवा बहस में पड़ने के बजाय अगर दोनों ओर से करुणा और प्रेम की समझ विकसित होती, और दोनों देश एक हो जाते या बांग्लादेश भी मिलकर एक दक्षिण-पूर्वी एशिया के संयुक्त एजेंडे के साथ चलने को राजी हो जाएँ, तो हमारे अमृत महोत्सव पर एक नई इबारत देखने को मिलती, लेकिन यह एक दिवा-स्वप्न सा है। जश्न फीके हैं और हरेक रंग भी फीका है यदि उनमें बाँधने की क्षमता नहीं है। हमारी सामान सोच, हमारी समान परिपक्वता, हमारी समान पहल, हमारे मैत्री को विकसित करने में काम क्यों नहीं आ रहे हैं, यह आज एक बड़ा सवाल है।

सन 1947 में जब यह देश आज़ाद होकर अपने आज़ादी को मना रहे थे तो भी हिंसा थी। आज आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हिंसा ने साथ नहीं छोड़ा। हिंसा की जड़ें गहरी होती गईं। हमारा विभाजन ही हिंसा के लिए हुआ था। वह विभाजन ही गलत था लेकिन क्या हमारी सोच और संवेदना कभी एक होने के लिए एक साथ नहीं आ सकते? यह दूरियाँ हिंसा की वजहें हैं और यह हिंसा हमारे बीच वैमनस्यता का कारण। इसे अमृत महोत्सव पर किस तरीके से समझा जा रहा है? ज़श्न तो इस बात का होगा कि हम टूटे थे। हम एक साथ जुड़ गए। हमारी सभ्यता और हमारी संस्कृति तो एक ही थी, हम एक ही साथ बहेंगे। हमारे भीतर कोई मतभेद नहीं हैं। हमारे स्वाधीनता सेनानी जो दो मुल्क के रूप में बंटवारे से पहले शहीद हुए, उनके भीतर तो सम्पूर्ण भारत की तस्वीर थी। और सम्पूर्ण भारत के एकीकृत आज़ादी का सपना था। हमारे सभी भू-भाग के बच्चे एक साथ रहें, एक साथ सूरज और चंद्र के सहभागी बनें, ऐसी कल्पना थी। पर किसी की ओर से उन सपनों को साकार करने की कोई पहल नहीं हो रही है। हमारे भीतर संघर्ष और अंतर्द्वंद्व अवश्य दिखे हैं। हिंसाएँ और खून-खराबे अवश्य दिखे, यह भारत की असली तस्वीर नहीं हो सकती जिसका अर्थ ही प्रकाश के लिए रत रहने वाला देश था। यह तो घोर अंधकार वाले और मातम वाले देश की परिकल्पना है।

भारत और भारत से टूटे हुए भाग के निवासियों की चिंताएँ यदि इसके लिए मुखर नहीं होतीं तो अमृत महोत्सव को सेलिब्रेट करने या मनाने का कोई अर्थ नहीं है। करुणा और मैत्री से एक सूत्र में बंधने का साहस नहीं है तो किसी भी तरीके से हम अहिंसक सभ्यता वाले भारत के रहवासी हो ही नहीं सकते। हम तो एक क्रूर सभ्यता के साक्षी बन रहे हैं या बनते आ रहे हैं, यह हमारे सच्चे स्वाधीनता सेनानियों ने कभी नहीं सोचा था। दो राष्ट्र बने, दो रास्ते बने। हिंसा के मुद्दे बनते गए और हमारी पीढ़ियाँ इसको भोगने के लिए विवश रहीं।

केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री मुरलीधरन ने युवा प्रवासी भारतीय दिवस-2022 पर आज़ादी के अमृत महोत्सव में युवाओं की भूमिका-नवाचार और नई तकनीक विषय पर एक अभिभाषण में कहा-हमारे प्रवासी भारत को दुनिया से जोड़ने वाले एक जीवित पुल का काम करते हैं। यह दिल को छू लेने वाला है कि कैसे हमारे बड़े डायस्पोरा के सदस्य, जहां वे रहते हैं और काम करते हैं, उन देशों और समाजों में अच्छी तरह से एकीकृत होने के बावजूद, अपनी मातृभूमि और इसकी समृद्ध विरासत, परंपराओं और संस्कृति के साथ गहरे और स्थायी संबंध बनाए रखते हैं। भले ही वे सम्मानित पदों पर हों, अपने-अपने क्षेत्रों में-चाहे वह राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, सेवा या प्रौद्योगिकी हो, वे अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी परंपराओं, संस्कारों और अनुष्ठानों, संस्कृति, व्यंजनों और भाषा को कायम रखने में एक स्थायी बंधन और रुचि को बनाए रखते हैं और उसका पोषण करते हैं। हमारे दावे प्रवासी भारतीयों के बारे में भी बड़े-बड़े किए जाते हैं लेकिन भारत की संपूर्णता को स्थापित करने में हमारे प्रवासी भारतीय कितना अवदान दिए, यह किसी से छुपा नहीं है। सभी प्रवासियों ने अपने विभिन्न उपलब्धियों के साथ केवल दो राष्ट्रों से अपना-अपना लाभ देखा, उन्हें एकीकृत करने के लिए कोई सशक्त प्रयास नहीं किया।

भारत के लिए आज़ादी का अमृत महोत्सव उन्हें याद करने का है जिन्होंने अपने जान की बाजी लगाकर अपने देश को स्वतंत्र किया या आज़ादी के बाद देश को संवारा किन्तु इस अवसर पर इस बात के लिए भी सोचने का समय है कि हम भारत को एकीकृत करके सम्पूर्ण भारत को एक नए ऊंचाई की ओर ले जा सकते हैं क्या? हमारे स्वाधीनता सेनानियों के बलिदान आज की हिंसाओं से मुक्त समरसता वाला समाज देखना चाहते होंगे न कि विभिन्न प्रकार के मतभेद। हमारे मतभेद और मनभेद मिटकर जब मैत्री और प्रेम के गीत गायेंगे तो वही हमारे अहिंसक समाज की स्थापना होगी और हिंसा से मुक्ति पाने का मार्ग होगा। हमारे लिए सामान रूप से चुनौतियाँ बनी गरीबी, भुखमरी और दूसरी पर्यावरणीय चिंताएँ यदि हमारे एकीकृत चिंता के कारण बनेंगे, तो हम एक हैपी-प्रसन्न समाज बना सकेंगे और आज़ादी का अमृत महोत्सव ऐसे ही प्रसन्न समाज की उम्मीद करता है। बहुत पहले हमारे बीच बुद्ध आए। हमारे ऋषि-महर्षि आए जिनकी अहिंसक चिंताएँ रही हैं। हमारे धर्मशास्त्र भी आए। तब भारत का भू-भाग विस्तृत था और सोच भी। हमारे शास्त्र कहते हैं-
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।

अर्थ – हम सब एक साथ चलें, आपस में संवाद करें, हमारे मन एक हों। जिस प्रकार पहले के विद्वान अपने नियत कार्य के लिए एक होते थे, उसी प्रकार हम भी साथ में मिलते रहें।

हम अपने बीच में दीवार खींच लिए, बाड़ लगा लिए और अपने-अपने हिसाब से किताब के गुलाम हुए और चल रहे हैं। संविधान या किताबें हमारी दीवारों को खींचकर हमारे भू-गोल को कम कर दीं। यह हिंदुस्तान के लिए बुद्ध की कल्पना नहीं थी, न ही हमारे पूर्वजों की। अमृत महोत्सव पर सबका मेल करने का समय है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों की स्वतंत्रता के भू-भाग की कल्पना को पुनः प्राप्त करने का अवसर है वह भी अहिंसा के पथ पर चलते हुए। क्या हम एक ऐसा हिंदुस्तान गढ़ने में सक्षम हैं, आज सवाल हमारे सामने अमृत महोत्सव पर यह है, न कि केवल औपचारिकता से स्वाधीनता सेनानियों को स्मरण मात्र कर लेने का। ऐतिहासिक भूलें होती हैं और ऐतिहासिक भूलों में दूरियाँ भी बढ़ती हैं, लेकिन जो जोड़ दे वही सर्वश्रेष्ठ मानवता का प्रहरी है। अहिंसा और प्रेम से ही यह सम्भव है। जब तक हमारे अंतस में अहिंसा के भाव विकसित नहीं होंगे और प्रेम की अनुभूतियाँ एक-दूसरे के प्रति नहीं होंगी, तबतक हम किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकते। देखना यह है कि इस अवसर को हम केवल एक उत्सव के रूप में ही भुनाएंगे या कुछ अच्छी पहल भी होती है।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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