जयप्रकाश भारती - बच्चों के प्यारे लेखक और दोस्त संपादक

भारत की एक पूरी पीढ़ी के प्रिय दिग्दर्शक जयप्रकाश भारती के जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहे हैं उनके मित्र और वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रकाश मनु
प्रकाश मनु

संस्मरण: प्रकाश मनु


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हिंदी बाल साहित्य के सबसे चमकते नक्षत्रों में से एक तथा ‘नंदन’ पत्रिका के यशस्वी संपादक जयप्रकाश भारती (1936-2005) को केवल उनहत्तर बरस का जीवन मिला। यह कोई लंबा जीवन नहीं है। पर उनके कामों को देखें, तो हैरत होती है। बाल साहित्य और बाल साहित्य की बेहतरी के लिए जो काम वे कर गए, उसकी कोई मिसाल नहीं है। 

बच्चों के लिए लिखने वाले लेखक बहुत हैं। पर बच्चों और बाल साहित्य का जयप्रकाश भारती सरीखा पैरवीकार आज ढूँढ़े से भी नहीं मिलता। बालक और बाल साहित्य की चिंता उनके व्यक्तित्व में इस कदर शामिल थी कि सोते-जागते वह उनके साथ ही रहती थी। वे कहीं भी जाएँ, किसी से भी मिलें, किसी भी संदर्भ में बात कर रहे हों, बालक और बाल साहित्य वाली बात घूम-फिरकर आ ही जाती थी। इस विषय पर बात करते हुए वे इतने लयमान हो जाते थे कि समय का उन्हें कुछ होश ही नहीं रहता था। अकसर बच्चे की बात चलते ही उनकी मुखमुद्रा में भी किसी बच्चे जैसी कोमलता और भोलापन नजर आने लगता था और देखते ही देखते उनका समूचा व्यक्तित्व ही बदल जाता था।

जयप्रकाश भारती
(2 जनवरी, 1936 - 5 फरवरी, 2005)
भारती जी के बारे में लिखने बैठा हूँ तो एक साथ इतनी यादें और इतनी बातें मन में घुमड़ रही हैं कि पन्नों पर पन्ने भरते चले जाएँ, फिर भी वे खत्म न होंगी। उनके साथ कोई सत्तरह बरस तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला। और ये वे दिन थे, जब मैंने उनसे बहुत सीखा। बच्चों और बाल साहित्य की दुनिया का क, ख, ग उन्हीं से मैंने सीखा। यह मेरी नौजवानी का समय था, जब मैं उत्साह और ऊर्जा, विद्रोह और कुछ करने की गहरी ललक के साथ भीतर से धधक रहा था। एक जलता हुआ पिंड जैसे। एक साथ बहुत कुछ करने का जोश मुझे पागल बनाए हुए था। कभी इधर बहता तो कभी उधर। अभी धरती पर तो अभी आकाश पर। कभी लगता, मुझे यह करना चाहिए। कभी लगता, हाँ, मगर पहले वह तो करना ही है। एक अजीब तूफान था, जो मुझे नचा रहा था।

इस हालत में मेरा जज्बा खुद मेरे भीतर समा नहीं रहा था। उस समय भारती जी ने मेरी काम करने की दिशा और शक्तियों को थाहकर, दिशा देने का बड़ा काम किया। मुझे एक सिरफिरे अबोध झंझावाती से कुछ-कुछ विवेकवान बनाया और मेरे युवकोचित विद्रोह को कुछ सार्थक और बड़ा काम करने के अनथक उत्साह में तब्दील किया। वरना शायद मैं जितना भटका हूँ, उससे कहीं ज्यादा—बहुत ज्यादा मुझे भटकना पड़ता और जो काम मैं कर पाया, उससे आधा-चौथाई भी न कर पाता।

सोहनलाल द्विवेदी तथा जयप्रकाश भारती
भारती जी की आँखों में बाल साहित्य का एक सपना था। वही उनकी प्राणशक्ति थी, वही आत्मा, वही उनका सर्वस्व था। जब मैं ‘नंदन’ में आया, तो सबसे पहले इसी सपने से बहुत अधिक प्रभावित, बल्कि अभिभूत हुआ। अकसर ‘नंदन’ और बाल साहित्य की चर्चा चलने पर उनकी आँखों में जो तरल सी चमक आती, वह धीरे से मेरे अंदर भी उतर जाती थी और मेरी आत्मा जगमागाने लगती थी। मेरा मन कहता, “हाँ, यह बड़ा काम है। यह सचमुच बड़ा काम है। जो बच्चे के लिए कुछ करता है, निर्मल मन से कुछ सोचता है, वह ईश्वर के बहुत पास है, क्योंकि वह तो असल में ईश्वर का ही काम कर रहा है!”

तब कहीं भीतर से मुझे लगता था, कि मुझे भी जरूर कुछ करना चाहिए। कुछ न कुछ करना चाहिए। बाल साहित्य का बड़ा सपना देखने वाले भारती जी के साथ मिलकर बाल साहित्य के लिए कुछ थोड़ा भी कर सका, तो मेरे लिए यह बड़े सुख की बात होगी, यह मैं अंदर ही अंदर महसूस करता। और जब भारती जी ऐसे किसी काम में मुझे लगाते, तो मेरा मन जैसे आनंद से ऊभ-चूभ हो उठता था। मुझे लगता, सपने सच भी हो सकते हैं। और वह मैं करूँगा। फिर सचमुच मैं जी-जान से उसे करने में जुट जाता था।

वे बातों-बातों में मुझे ‘नंदन’ के प्रारंभिक वर्षों और उससे भी पहले के दौर में ले जाते थे, जब वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में थे तथा विज्ञान और बच्चों के पृष्ठ देखा करते थे। उन्होंने पहले बाँकेबिहारी भटनागर और फिर मनोहर श्याम जोशी के साथ काम किया था। दोनों ही संपादन-कला के महा धुरंधर। इन दोनों ही दिग्गजों के बारे में इतने अद्भुत संस्मरण उनके पास थे कि मुझे लगता, पत्रकारिता का एक गौरवपूर्ण इतिहास मेरे सामने उपस्थित है और मैं उनकी उँगली पकड़े मुग्ध भाव से इतिहास के उन गलियारों में चक्कर लगा रहा हूँ। और सचमुच वे लमहे आज भी मेरी स्मृतियों में जस के तस दर्ज हैं।

मुझे याद है, भारती जी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के पूर्व संपादक बाँकेबिहारी भटनागर और उस दौर में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की अनोखी शान और धज के बारे में बताने लगते थे, तो इतने भावमग्न हो जाते थे कि उन्हें सुनते हुए मेरे मन में भी भटनागर जी की एक ऊँची मूर्ति निर्मित होती जाती थी। वह आज भी उसी तरह मेरे स्मृति-संसार में सुरक्षित है। भटनागर जी के समय हिंदी का कोई बड़े से बड़ा शीर्ष लेखक ऐसा नहीं था, जो उसमें न छपा हो। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिका को उन्होंने पत्रकारिता का गौरव-शिखर बनाया। और फिर मनोहर श्याम जोशी आए तो उनके साथ ही ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का एक नया दौर शुरू हुआ, जिसमें बौद्धिकता और बिंदासपन दोनों एक साथ थे। लिहाजा वह बुद्धिजीवी और आम पाठक दोनों को मोहने वाली अपने ढंग की निराली पत्रिका बनती चली गई। यों ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ को एक नया रूप और नया कलेवर जोशी जी के समय में मिला, जिससे वह बदलते समय और बदलती रुचियों के अनुसार बदली और पुनर्नवा हुई।

एक यशस्वी संपादक के रूप में जोशी जी की समझ और सक्रियता का जिक्र करते हुए, जब भारती जी बताते कि वे कितना अधिक पढ़ते थे और कितने ही संदर्भ उन्हें मुँहजबानी याद थे, तो सुनते हुए मैं अवाक् रह जाता था। सचमुच भारती जी से उस दौर के दिग्गजों के बारे में सुनना चकित करता था।

बाद में भारती जी जब ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ से ‘नंदन’ में आए, तो स्वाभाविक है कि बाल साहित्य में उसी तरह का मयार निमित करने की उनकी लालसा और सपना रहा होगा। शुरू में उससे बाल साहित्य के बड़े-बड़े शीर्षस्थ साहित्यकार जुड़े भी। इनमें बहुतों के बारे में मझे खुद भारती जी से ही सुनने को मिला। इनमें मूर्धन्य कवि सोहनलाल द्विवेदी जी के बारे में तो उन्होंने बहुत बातें बताईं। द्विवेदी जी दिल्ली आते तो ‘नंदन’ कार्यालय में जरूर आते थे। कभी-कभी भारती जी के आवास पर भी वे रुक जाते थे। उनमें एक बालसुलभ सरलता थी, जिसके बहुतेरे हैरत भरे वृत्तांत भारती जी सुनाया करते थे। कभी वे कोई ऐसी चीज देखते, जिसके बारे में जानते न हों या पहले कभी वह देखी न हो, तो बड़ी अबोध जिज्ञासा से भारती जी से पूछते थे कि, “अरे भई भारती, यह कौन सी चीज है, इसका तो तुमने कुछ बताया नहीं।...” फिर जब तक बालसुलभ जिज्ञासा से पूरी तरह उस चीज के बारे में जान नहीं लेते थे, उन्हें तृप्ति नहीं होती थी।
 
भारती जी के घर एक बड़ी खूबसूरत जापानी गुड़िया थी, जो एकदम जीवंत लगती थी, और खुद भी कुछ चकित करने वाले काम कर लेती थी। भारती जी ने मुझे बताया कि उस जापानी गुड़िया की मोहिनी की तारीफ करते हुए, खुद सोहनलाल द्विवेदी किसी भोले बच्चे सरीखे लगते थे। और बहुत मुग्ध होकर उसे देखा करते थे। जब वे यह प्रसंग सुना रहे थे, तो कहीं न कहीं मुझे लग रहा था कि शायद इसी अबोधता और सरलता ने ही सोहनलाल द्विवेदी जी को बच्चों का सिरमौर कवि बनाया होगा!

सच ही भारती जी के समय में ‘नंदन’ की ऐसी धज थी कि बाल साहित्य के बड़े से बड़े दिग्गज लेखक बड़े आनंद और उत्सुकता से भरकर वहाँ आया करते थे। इनमें शकुंतला सिरोठिया, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, सेवक जी, डा. श्रीप्रसाद, राष्ट्रबंधु जैसे साहित्यकार भी थे और ‘नंदन’ बाल साहित्य ही नहीं, बाल साहित्यकारों का भी स्वाभाविक ‘अपना घर’ बन गया था। एक तरह का हॉल्ट स्टेशन। इन बड़े कद के साहित्यकारों में शकुंतला सिरोठिया, माहेश्वरी जी और सेवक जी के आने पर भारती जी किस तरह आंतरिक उत्साह से धधाकर उठते थे और उनसे गले मिलते थे, इसकी मुझे अच्छी स्मृति है। यहाँ तक कि शकुंतला सिरोठिया जी के आने पर भी नमस्कार जैसी औपचारिकता न होती थी, बल्कि बहुत दिन बाद घर आई बहन को कंधे लगकर भाई जिस तरह आत्मीय और घरेलू ढंग से स्वागत करता है, कुछ-कुछ वैसा विहंगम दृश्य मैंने देखा है और वे स्नेहिल क्षण अब भी मेरी स्मृति में अटके पड़े हैं। उन्हें भुलाया भी कैसे जा सकता है, क्योंकि ऐसे पल तो खुद में बाल साहित्य की एक बड़ी धरोहर हैं।

जाहिर है, बाल साहित्य के इन बड़े साहित्यकारों के आने पर पत्रिका का रोजमर्रा का काम थोड़ी देर के लिए छूट जाता था। ऐसे क्षणों में ‘नंदन’ सिर्फ एक पत्रिका ही नहीं, बाल साहित्य का एक स्वाभाविक विचार-मंच और कभी-कभी तो बाल साहित्य का एक तीर्थ बन जाती थी, जहाँ विभिन्न दिशाओं और ओर-छोर से मुसाफिर आते थे तो साथ ही बाल साहित्य की अलग-अलग धाराएँ मिलकर पयस्विनी बनती थीं। बेशक भारती जी को ही इसका श्रेय जाता है कि एक व्यावसायिक पत्रिका को उन्होंने अपनी सुरुचि और संस्कारों से बाल साहित्य का एक सांस्कृतिक तीर्थ बना दिया था। 

ये ऐसे क्षण होते थे, जब भारती जी भी संपादक नहीं रहते थे, बल्कि संपादक की कुर्सी से नीचे उतरकर, वे खुद एक साहित्यमना पाठक या अबोध जिज्ञासु की तरह अतिथियों को मानो खुद से ऊँचे सिंहासन पर बैठाकर मनोयोग से उनकी बातें सुना करते थे और गुनते भी थे। इसी तरह दामोदर अग्रवाल अकसर ‘नंदन’ के कार्यालय में आया करते थे और बाल साहित्य तथा खुद दामोदर जी की बाल कविताओं की चर्चा चलते-चलते अंत में खुद दामोदर जी की निजी व्यथा-कथा तक को समेट लेती थी। 

यहाँ भारती जी के संपादक का जो मानवीय और संस्कारी रूप मैंने देखा, उसकी गहरी छाप अब भी मेरे मन में है। इसी तरह बाँकेबिहारी भटनागर जब ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादक न रहे, तब उनकी पहले वाली धज भी न रही। आर्थिक मुश्किलें भी थीं। ऐसे में काम निकालकर परे सरक जाने वाले लोगों की कमी नहीं रहती। पर भारती जी ने उस समय भी उनके सम्मान की चिंता की और कई तरह से उन्हें सहारा दिया। इस बारे में खुद उनके सुनाए कुछ ऐसे मार्मिक प्रसंग मुझे याद आ रहे हैं, जिन्हें सुनकर भारती जी के प्रति मेरा आदर कई गुना बढ़ गया था। और ऐसा तो कई बार हुआ कि दफ्तर में उनके किसी व्यवहार से मेरा मन कुछ खिन्न हुआ, तो उन्होंने अपने पास बैठाया और बातों-बातों में अपने पत्रकारिता जीवन के ऐसे अद्भुत प्रसंग छेड़ दिए कि मेरा मन न सिर्फ उनके साथ बहने लगा, बल्कि मन में उतर आया अवसाद भी अनजाने ही बह गया।

इस तरह भारती जी जाने-अनजाने मुझे बाल साहित्य में कुछ बड़े कामों के लिए तैयार कर रहे थे, और अपने सपने को मेरे मन और आत्मा में उतार रहे थे, इसकी ओर तब इतना ध्यन ही नहीं गया था। पर आज सोचता हूँ, तो मन विस्मय से भर जाता है। 

 
मैं इस बात के लिए जीवन भर भारती जी का शुक्रगुजार रहूँगा कि वे बड़े दुख और तकलीफ के दिनों में मुझे ‘नंदन’ में लाए। और इससे भी बड़ी बात मेरे लिए यह थी कि बड़े सम्मान के साथ मेरा पदार्पण हुआ। हिंदुस्तान टाइम्स पत्रकारिता की शिखर संस्था थी, पर इसमें नियुक्ति के लिए न मेरी कोई लिखित परीक्षा हुई और न कोई औपचारिक इंटरव्यू, जबकि आम दौर से संपादकीय विभाग में नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षा और फिर इंटरव्यू आदि की प्रथा है। बहुत से लोग संपादकीय विभाग में प्रशिक्षु के रूप में आए और बाद में कुछ अंतराल के बाद वे उप-संपादक नियुक्त हुए। पर उप-संपादक के रूप में ही मेरी सीधी और बिल्कुल अनौपचारिक किस्म की नियुक्ति थी। अखबार में संपादकीय विभाग के खाली पद के लिए जिस तरह विज्ञापन दिया जाता है, वैसी औपचारिकता तक नहीं।

यों मेरे ‘नंदन’ में आने की भी एक कहानी है। मैं तब दिल्ली प्रेस में संपादन विभाग में था। उससे पहले पंजाब के एक डी.ए.वी. कॉलेज में प्राध्यापक रहा। उन दिनों भिंडराँवाले के कारण पंजाब में जो हालात बने, उनमें मुझे अपना दम घुटता हुआ लगा। उन्हीं दिनों गरमी की छुट्टियों में मैं दिल्ली आया। दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में अकसर मेरी रचनाएँ छपती थीं। मैं उसी सिलसिले में दिल्ली प्रेस के मालिक और ‘सरिता’ समेत सभी पत्रिकाओं के संपादक विश्वनाथ जी से मिलने गया। उन्होंने पूछा, “आप इस समय कहाँ हैं?” मैंने कहा, “पंजाब में प्राध्यापक हूँ। पर वहाँ इस माहौल में अच्छा नहीं लग रहा।” विश्वनाथ जी ने कहा, “हमें एक मेहनती आदमी चाहिए। आप चाहें तो हमारे यहाँ ज्वाइन कर लीजिए।” मैंने कहा, “कब?” उन्होंने मुसकराते हुए कहा, “आप चाहें तो आज ही ज्वाइन कर लीजिए।” मैंने बिना कुछ जाने ज्वाइन कर लिया। यह भी पूछने की जरूरत नहीं समझी कि वहाँ मुझे वेतन क्या मिलेगा?

कुछ ही दिनों में मैं समझ गया कि गलती हो गई। वहाँ पत्रकारिता की जो हालत थी, उससे मन दुखी था। मुझे दिल्ली प्रेस की सभी पत्रिकाओं में आने वाली रचनाओं का संपादन करना था। इनमें ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘गृहशोभा’ और ‘भूभारती’ जैसी पत्रिकाएँ थीं तो बच्चों की ‘चंपक’ और ‘सुमन सौरभ’ भी। इनमें बहुत सी रचनाएँ तो काफी बुरी लिखाई में होती थीं, जिनमें भाषा की भद्दी भूलें होती थीं। बहुत ज्यादा काम था। कोई चार आदमियों के बराबर। हमेशा एक पहाड़ हमेशा सिर पर लदा रहता था और शाम होते-होते मेरी हालत खराब हो जाती थीं। पर मैं दिल लगाकर काम करता था। जितनी मेहनत हो सकती थी, करता था। मेरी मेज के एक तरफ उन रचनाओं का ढेर पड़ा होता था, जिन्हें मुझे सुधारना था। मेज के दूसरी ओर की फाइल में मैं सुधारी हुई रचनाओं को रखता जाता था। शाम तक आँखें बेहद श्रम और थकान के कारण लाल सी हो जाती थीं। और उस पर भी मैं इन पत्रिकाओं में लेख लिखने के लिए दफ्तर के समय के बाद भी रुकता था और निरंतर लिखता था।

संपादन विभाग में मेरे एक सहयोगी थे कृष्णकुमार। वे भारती जी के मित्र थे और केंद्रीय हिंदी निदेशालय से सेवामुक्ति के बाद कुछ समय ‘नंदन’ में भी काम कर चुके थे। वे न जाने क्यों मुझ सरीखे चुप्पे और बेहद अंतर्मुखी आदमी से प्यार करने लगे थे। बार-बार मुझसे एक ही बात कहते थे, “आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए। यह जगह आप जैसे प्रतिभावान व्यक्ति के लिए नहीं है...!”

मैं प्रतिभावान था या नहीं, पर विद्रोही था और शायद एक नाराज किस्म का युवक भी। लिहाजा कभी-कभी चिढ़कर उन्हें झिड़क भी देता था, “आप कृपया मेरी निजी बातों की चर्चा न करें।”

पर ‘नंदन’ में उप-संपादक के लिए जगह खाली थी और भारती जी ने कृष्णकुमार जी से कहा था कि कोई योग्य और मेहनती व्यक्ति दिल्ली प्रेस में हो, तो वे बात करके बताएँ। कुछ ही समय पहले मेरी एक बाल कविता ‘नंदन’ में छपी थी। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ और ‘पराग’ समेत बाकी सब पत्र-पत्रिकाओं में तो निरंतर मेरी रचनाएँ छपती ही थीं। कृष्णकुमार जी ने जब मेरा नाम लिया तो भारती जी ने कहा, “हाँ, प्रकाश मनु के नाम से तो मैं अच्छी तरह परिचित हूँ। पर क्या वे दिल्ली प्रेस छोड़कर हमारे यहाँ आना पसंद करेंगे? वहाँ तो एक बड़ा संसार है, पर हमारी पत्रिका तो सिर्फ बच्चों की ही है। तो क्या उनके लिए यह रुचिकर होगा?”

मैं उन दिनों बहुत परेशानी में था। रात-दिन ताबड़तोड़ मेहनत करने पर भी उतना नहीं मिलता था कि ठीक से दाल-रोटी खा सकूँ। पर कृष्णकुमार जी ने मेरी इज्जत रखी। कहा, “मैं उनसे बात करके आपको बताऊँगा!”
अगले दिन उन्होंने मुझसे कहा, “देखिए मनु जी, भारती जी से मेरी बात हुई है। वे ‘नंदन’ में आपको लेना चाहते हैं। मेरी मानिए, आप वहाँ ज्वाइन कर लीजिए। यह जगह वाकई आपके लिए नहीं है। मुझे बहुत दुख होता है आप जैसे प्रतिभावान व्यक्ति को यहाँ देखकर। यहाँ आपकी कोई कद्र नहीं है।”

तब तक मेरा मन कृष्णकुमार जी के प्रति ढलने लगा था। मेरे इतने रोष के वावजूद वे निरंतर अपनी कोशिशों में लगे थे। उन्होंने कहा, “मैंने आपके बारे में सब कुछ भारती जी को बताया है। वे आपको लेने के लिए उत्सुक हैं। शायद आपके पास कभी उनका फोन आएगा। आपसे वे पूछें कि क्या आप ‘नंदन’ में आना चाहेंगे, तो आप ‘हाँ’ कह दें।” 
मैंने कहा, “ठीक है कृष्णकुमार जी!” 

और सचमुच उसके दो-एक दिन बाद ही भारती जी का फोन दिल्ली प्रेस में आया, “आप क्या मनु जी बोल रहे हैं? मैं भारती हूँ...!”

मैं अचकचाया, “भारती जी...?” इसलिए कि दिमाग से वह बात कुछ उतर सी गई थी। और ‘कनुप्रिया’ वाले धर्मवीर भारती भी तो मन में लगातार दस्तक देते ही थे। मैं शायद कुछ देर और पसोपेश में रहता, पर तभी फिर से आवाज आई, “मनु जी, मैं जयप्रकाश भारती बोल रहा हूँ।...कृष्णकुमारजी ने आपको बताया होगा।”

अब संदर्भ समझने में जरा भी देर नहीं हुई। “जी भारती जी, बताइए।” मैंने उन्हें नमस्कार करके कहा। भारती जी ने कहा, “कल आप मुझसे मिलने आ सकते हैं क्या? आपसे कुछ बात करनी है।”

“ठीक है भारती जी, मैं दोपहर बाद आ जाऊँगा।” मैंने कहा।

अगले दिन दिल्ली प्रेस से आधे दिन की छुट्टी लेकर मैं ‘नंदन’ के दफ्तर पहुँचा तो भारती जी बड़े प्रेम से मिले। संपादक होने का जरा भी रोब नहीं। आवाज कुछ धीमी और मृदुल सी। मेरे लेखन के बारे में शायद कुछ और जान लेना चाहते थे। क्या मैं ‘नंदन’ पढ़ता हूँ? कैसी लगती है? क्या इसे और बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझाव हैं मेरे पास? यह भी पूछा। जैसा मुझे लगा, मैं बेलाग ढंग से बताता गया। सुनकर बीच-बीच में मुसकराने लगते। इस तरह बहुत सारी बातें हुईं। 

मेरे व्यक्तिगत जीवन, रुचियों, पढ़ाई-लिखाई और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के बारे में भी बातें चलीं, जहाँ से मैंने शोध किया था। उन्होंने पूछा, “बाल साहित्य की दुनिया तो उतनी बड़ी नहीं है। दिल्ली प्रेस में तो आप सारा कुछ देखते हैं। तो यहाँ बच्चों के लिए सिमटकर कुछ अटपटा तो नहीं लगेगा?” मैंने कहा, “नहीं भारती जी, बल्कि मुझे अच्छा लगेगा, ताकि बाकी सबसे मुक्त होकर इसे अच्छी तरह समझ सकूँगा। और अपनी पूरी शक्तियाँ इसी में लगाऊँगा, तो हो सकता है, मैं कुछ ठोस और सार्थक काम कर पाऊँ।”

सुनकर भारती जी को अच्छा लगा। उनके चेहरे पर संतुष्टि और प्रसन्नता की छाप दिखाई दी। उन दिनों ‘नंदन’ में महान नायकों की चित्रकथाएँ छापने का सिलसिला शुरू हुआ था। उन्होंने मुझसे ‘नंदन’ के लिए आदि शंकराचार्य जी पर चित्रकथा लिखने का आग्रह किया। मैंने उन्हें चित्रकथा लिखकर दी, तो उन्हें काफी अच्छा लगा। फिर उनके कहने पर मैंने ‘नंदन’ के बड़े लोकप्रिय स्तंभ ‘तेनालीराम’ के लिए तेनालीराम की हास्य और चतुराई की भी कुछ कथाएँ लिखीं।

मुझे पता नहीं था कि भारती जी का यह अपना ढंग था मेरे अनजाने में ही मुझे जाँचने-परखने का। उन दिनों हिंदुस्तान टाइम्स के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन थे। भारती जी ने बानगी के तौर पर मेरी कुछ रचनाओं पर अपनी राय लिखकर उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष के पास भिजवा दिया। साथ ही एक नोट में लिखा कि प्रकाश मनु की योग्यता से मैं संतुष्ट हूँ। ‘नंदन’ में उप-संपादक के रूप में मैं इनकी नियुक्ति करना चाहता हूँ।

फिर कुछ ही समय बाद हिंदुस्तान टाइम्स के कार्यकारी अध्यक्ष के दफ्तर में एक बड़ा अनौपचारिक सा इंटरव्यू हुआ। नरेश मोहन जी को आश्चर्य हुआ कि मैंने डॉक्टरेट की है और बाल पत्रिका ‘नंदन’ में आना चाहता हूँ। उन्होंने पूछा, “आपकी कोई और माँग तो नहीं हैं? क्या आप कोई विशेष इंक्रीमेंट चाहेंगे?”

इस पर मेरा जवाब था, “नहीं, मैं बस वहाँ से मुक्त होना चाहता हूँ। मेरी कोई माँग नहीं है।” और यों मैं ‘नंदन’ में आ गया।


यों भारती जी को सिर्फ श्रेय नहीं जाता कि वे मुझे ‘नंदन’ में लाए, बल्कि कहना चाहिए कि मुझे एक लेखक के पूरे सम्मान के साथ लाए। मैं काम करने में सुख पाने वाला व्यक्ति था। मैंने सोचा कि अगले दिन से ही मुझे काम बता दिया जाएगा और मैं उसमें लीन हो जाऊँगा।

पर भारती जी ने मुझसे कहा, “अभी कुछ दिनों तक आपको कुछ नहीं करना। बस, ‘नंदन’ की पुरानी फाइलें हैं। इन्हें बीच-बीच में से उलटते-पलटते और पढ़ते रहिए।” और मुझे याद है कि कोई हफ्ते-दो हफ्ते यही सिलसिला चला। शाम को रोजाना भारती जी अपने कमरे में बुलवाते और कोई घंटे-दो घंटे तक मुझसे बातें करते। ‘नंदन’ में जो अच्छा लगा, वे मुझसे जानना चाहते थे। जो अच्छा नहीं लगा, वह भी। बाल साहित्य की महत्ता और ऐतिहासिक विकास-क्रम के बारे में वे मुझे बताते और इस बात पर खेद प्रकट करते कि बाल साहित्य को जो महत्त्व मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा। इसके साथ ही वे इस बात की ओर भी बार-बार मेरा ध्यान आकर्षित करते कि बाल साहित्य में अच्छे ढंग के संदर्भ ग्रंथ नहीं है। इनके बिना कोई भी साहित्य आगे नहीं आ सकता और उसके विकास के रास्ते नहीं खुल सकते।

भारती जी की इन बातों का वाकई मेरे मन पर गहरा असर पड़ा। यों मैं बच्चों के लिए लिखने तो बहुत पहले से लगा था, पर कहना चाहिए कि बाल साहित्य की पहली दीक्षा मुझे भारती जी ने ही दी। मुझे बाल साहित्य से जोड़ने और संस्कारित करने का काम भी उन्होंने बहुत अनोखे ढंग से किया। ‘नंदन’ की हर फाइल (जिल्द) में बारह अंक होते थे। मैं करीब दो दिन में एक पूरी फाइल पढ़ लेता था और उनमें छपी हुई रचनाओं की भारती जी से चर्चा करता था। पर उससे पहले तो खुद मेरे भीतर एक बहस छिड़ जाती कि यह रचना अच्छी है। यह कहीं ज्यादा अच्छी है और यह तो बड़ी अद्भुत और बेमिसाल है। इस तरह बाल साहित्य की कहानियों, कविताओं आदि के साथ-साथ बाल साहित्य के अच्छे रचनाकारों से भी मैं परचने लगा। उन दिनों का पढ़ा हुआ, सच कहूँ तो आज तक काम आ रहा है। बरसों की तपस्या के बाद, आगे चलकर मैंने हिंदी बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास लिखा, जिसे इस क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य या ‘मील का पत्थर’ माना गया, तो उसकी भूमिका बनाने का काम वास्तव में भारती जी ने ही किया था। कहना चाहिए, भारती जी ने मुझे अनजाने में ही बाल साहित्य का बड़ा स्वस्थ और सही संस्कार दिया और यों संस्कारित करने के बाद ही धीरे-धीरे संपादन का काम सौंपना शुरू किया।

संपादन के अलावा भारती जी ने मुझे ‘नंदन’ के लिए कविताएँ चुनने का जिम्मा भी सौंपा। जिन दिनों मैं दिल्ली प्रेस में था, तो ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘गृहशोभा’, ‘भूभारती’, ‘चंपक’ और ‘सुमन सौरभ’ में प्रकाशनार्थ आने वाले सभी गीत और कविताएँ विश्वनाथ जी मेरे पास भिजवाया करते थे। मैं उनमें से छपने लायक रचनाओं का चयन करके विश्वनाथ जी के पास भिजवा देता था। फिर वे उनमें से ही कुछ रचनाएँ स्वीकृत करते थे, बाकी वापस चली जाती थीं। छपने से पहले उनके संपादन का जिम्मा भी मेरा ही था। ‘नंदन’ में भी यह सिलसिला चल निकला।

“चंद्रप्रकाश जी, ‘नंदन’ में कविताएँ अब आप ही देखिए। जो कविताएँ प्रकाशनार्थ आएँगी, उन्हें मैं आपके पास भिजवाता रहूँगा। उन्हें देखकर आप अच्छी रचनाओं को चुनकर अलग रखते जाइए। फिर मुझे बता दीजिए कि ये कविताएँ छपने लायक है।”

भारती जी मुझे मेरे पूरे नाम से यानी ‘चंद्रप्रकाश जी’ कहकर ही बुलाते थे। शुरू में कुछ दिन उन्होंने ‘मनु जी’ कहा, पर शायद इसमें उन्हें कुछ बनावटीपन लगा। लिहाजा जल्दी ही वे मेरा वास्तविक नाम चंद्रप्रकाश पुकारने लगे और अंत तक मैं उनके लिए ‘चंद्रप्रकाश जी’ ही रहा। हाँ, जब उनके साहित्यिक मित्र और लेखक आते थे, जो मुझे भी जानते थे, तो कुछ समय के लिए मैं ‘प्रकाश मनु’ हो जाता था।

अलबत्ता ‘नंदन’ के लिए कविताओं के चयन की यह जिम्मेदारी सन् 1986 में मेरे साथ जुड़ी और सन् 2010 तक, जब मैं ‘नंदन’ की सेवाओं से मुक्त हुआ—तब तक चलती रही। ‘नंदन’ में छपने के लिए बहुत कविताएँ आती थीं। निरंकारदेव सेवक जी, द्वारकाप्रसाद माहेश्वरी, शकुंतला सिरोठिया, डा. श्रीप्रसाद, दामोदर अग्रवाल सरीखे बाल साहित्य के बड़े से बड़े पुरोधाओं की कविताएँ देखने को मिलती थीं, तो युवा कवियों और एकदम नवोदितों की भी। मैं अच्छी रचनाओं को चिह्नांकित करके अलग रखता जाता था। कभी-कभी किसी कवि की एक साथ बहुत कविताएँ आ जाती थीं। तब उसमें से जो ठीक-ठाक लगती थी, उन पर निशान लगा देता था। हर महीने जब ‘नंदन’ की सामग्री प्रेस में छपने जाती थी, भारती जी मुझे बुला लेते थे। कहते थे, “चंद्रप्रकाश जी, कविताएँ ले आइए।”

मैं कविताओं की पूरी फाइल उठाकर ले जाता था। उसमें अच्छी रचनाओं को मैं आगे रख लेता था। भारती जी अकसर वही देख लेते थे। एक-एक कविता पर देर तक बात चलती थी। किसी कविता का मुखड़ा उन्हें अच्छा लगता था, तो आगे की लाइनें और छंद पटरी से उतरता जान पड़ता। कोई कविता अच्छी लगती, पर उसकी आखिरी कुछ पंक्तियाँ खटकतीं। कई बार तुक जबरदस्ती वाली लगती, या फिर कोई बिंब बहुत उलझाऊ जान पड़ता। वे कहते, “चंद्रप्रकाश जी, यहाँ मामला अटक गया। यह बात तो बच्चा नहीं समझेगा। भला वह इस बिंब का क्या मतलब निकालता फिरेगा? पता नहीं, बच्चों के लिए लिखने वाले कवि यह बात क्यों नहीं सोचते।” 

यहाँ तक कि कई बार वरिष्ठ कवियों की यह असावधानी या भूल-गलती उन्हें नागवार लगती। वे कुछ खिन्न होकर कहते, “चंद्रप्रकाश जी, कवि तो ये अच्छे हैं, कविता भी ठीक है पर जरा देखिए, इन्होंने कैसी जबरदस्ती की तुक भिड़ा थी! यहाँ मामला बिल्कुल चौपट हो गया।...यहीं तो हमारे अच्छे-अच्छे कवि मार खा जाते हैं। वे इतना भी नहीं समझ पाते कि अगर कोई कविता सहज नहीं है तो वह बच्चों की कविता तो हो ही नहीं सकती। बच्चे उसे पढ़ना ही नहीं चाहेंगे, उठाकर एक ओर रख देंगे।”

और उनसे बातचीत में न जाने कब, अनायास ही बाल कविता को जानने-समझने की एक आलोचनात्मक दृष्टि मेरे भीतर विकसित होने लगी। आगे चलकर बेशक उसी से ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’, ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’ और मेरी बहुतेरी किताबें लिखी गईं। बीज रूप में भारती जी की बातों-बातों में दी गई यह बड़ी सीख ही मुझे राह दिखा रही थी।

हमें हर महीने लगभग चार-छह सौ कविताओं में से चार-पाँच कविताएँ चुननी होती थीं। पर भारती जी चाहते थे कि ये कविताएँ मानक हों, जिससे लोगों को पता चले कि हिंदी की सर्वश्रेष्ठ बाल कविताएँ कैसी हैं या कैसी होनी चाहिए। उनकी इस बारीक निगहबानी से मैंने बहुत कुछ सीखा। और आज भी कोई अच्छी कविता पढ़ता हूँ तो मन में आता है कि भारती जी होते तो इसे पढ़कर क्या कहते? क्योंकि अच्छी कविता को देखते-पढ़ते ही उनके चेहरे पर बड़ी मृदुलता का भाव आता था और वे विभोर हो उठते थे। कहते थे, “हाँ, सच में बहुत अच्छी कविता है।” 

बेशक कविताओं की मेरी रुचि उनकी रुचि से बहुत मिलती थी। बहुत उपदेशात्मक और सपाट कविताएँ न उन्हें भाती थीं और न मुझे। उनका कहना था कि ‘नंदन’ में जो कविताएँ छपें, उनसे बाल कविता की एक नजीर बननी चाहिए। और यह बहुत कम होता था कि जो कविताएँ मैंने चुनीं, उन्हें उन्होंने स्वीकार न किया हो। हाँ, किसी कविता की भाषा या छंद उन्हें न जँचे, तो स्वीकृति के साथ ही उस पर अपनी टीप लिख देते, “कविता में छंद गड़बड़ा रहा है। चंद्रप्रकाश जी, जरा छंद ठीक कर दीजिए।”

इसी तरह भारती जी बड़े साहित्यकारों का सम्मान करते थे, चाहे वे बाल साहित्य के हों या नहीं, और उनसे आग्रह करके ‘नंदन’ के लिए रचनाएँ माँगते थे। विनोद शर्मा, प्रताप सहगल, सुरेश धींगड़ा, ओमप्रकाश सिंहल सरीखे बहुत से साहित्यिकों को ‘नंदन’ और बाल साहित्य से जोड़ने का श्रेय भारती जी को ही है। पर साथ ही नई पीढ़ी के लिए भी वे बहुत उदार थे। मुझे याद है, हर महीने जब ‘नंदन’ के ताजा अंक के लिए कविताओं के चयन की बात होती, तो मैं कभी-कभी किसी एकदम नए कवि की कविता देने के लिए उनसे आग्रह करता था, “भारती जी, यह एकदम नए कवि की रचना है, जिन्हें मैंने पहले कभी पढ़ा नहीं। ‘नंदन’ में इनकी कभी कोई रचना नहीं छपी। पहली बार इनकी यह कविता जाएगी। देखकर तो लगता है कि इनमें अच्छी संभावना है...!” 

सुनकर वे एकदम उत्सुक हो उठते। फिर कविता को बड़े गौर से पढ़कर कहते, “हाँ कविता तो अच्छी है चंद्रप्रकाश जी, जरा-मरा ठीक करनी होगी। दे दो इस बार इनको ही!”

यहाँ ‘जरा-मरा’ पढ़कर आप कुछ चौंके तो नहीं? असल में भारती जी का यह मेरठी जुबान का मुहावरा था। उनके मुँह से ऐसे ही कुछ शब्द-युग्म शायद मैंने जिंदगी में पहली बार सुने थे, मसलन, ‘जरा-मरा’, ‘थोड़ा-मोड़ा’, ‘थोड़ी-मोड़ी’, ‘मोटा-मोटी’...और भी बहुत होंगे। पर इस समय तो यही याद आ रहे हैं। इन्हें सुनकर शुरू में तो मेरी बहुत हँसी छूटती थी और मैं उसे अंदर-अंदर घोटता था, पर बाद में मैं खुद भी बोलने लगा, कि “देखो भाई, मोटी-मोटी इतने लोग तो आएँगे ही...!” आदि-आदि। पर यह सौ प्रतिशत भारती जी का ही प्रभाव है।

उस समय हिंदी की सर्वाधिक प्रमुख और अग्रणी बाल पत्रिका ‘नंदन’ का रुतबा क्या था, यह समझना शायद आज के लेखकों के लिए मुश्किल हो। कोई साढ़े तीन या पौने चार लाख ‘नंदन’ का सर्कुलेशन था और कभी-कभी तो बड़े नामी और स्थापित लेखक भी इस बात के लिए तरसते थे कि ‘नंदन’ में उनकी रचना छपे। कई बार कवि-सम्मेलनी तुकबाज कवि भी ‘नंदन’ में रचना छपवाने के लिए बेकरार हो जाते। ऐसे ही हास्य के एक तुक्कड़ कवि एक दिन आए और अपनी कविताओं का पुलिंदा भारती जी को दे गए। भारती जी ने उसे मेरे पास भिजवाया। पिर पूछा, “कैसी लगीं आपको कविताएँ?” मैंने कहा, “भारती जी, इनमें तो एक भी कविता छपने लायक नहीं है।” उन्होंने कविताओं पर एक नजर डाली, फिर कहा, “अच्छा चंद्रप्रकाश जी, आप इन्हें रख लीजिए। जब ये आएँगे, तो वापस कर देंगे।” 

इसके कुछ दिनों बाद वही कवि जी भारती जी के पास आए और कविताओं के बारे में पूछा। भारती जी उस समय कहीं जा रहे थे। उऩ्होंने उन सज्जन को मेरे पास भेज दिया। उनके पूछने पर मैंने उन्हें बताया, “नंदन में हम लोग ऐसी कविताएँ छापते हैं, जो कुछ नयापन लिए हुए हों और बच्चे के मन में सीधे उतर जाएँ। इस लिहाज से आपकी कविताएँ मुझे ठीक नहीं लग रहीं। वैसे, अंतिम निर्णय तो भारती जी ही करेंगे।” सुनते ही वे सज्जन भड़क गए। बोले, “मनु जी आप अपने आप को समझते क्या हैं! हिंदुस्तान टाइम्स में होने से क्या होता है? जितना आपकी एक महीने की तनख्वाह है, उतना तो मैं एक दिन में कमा लेता हूँ।”

इस पर मैंने बगैर उत्तेजित हुए बड़े शांत लहजे में कहा, “हो सकता है, जितनी मेरी एक महीने की तनख्वाह है, आप उससे दस गुना एक दिन में कमा लेते हों। या इससे भी ज्यादा कमा लें। पर इससे आपकी कविताओं के बारे में मेरी राय तो नहीं बदल जाएगी।” इस पर वे सज्जन उठे और गुस्से में कुछ बड़बड़ाते हुए तुरंत बाहर चले गए।

अगले दिन मैंने भारती जी के आगे उन सज्जन की कविताएँ रख दीं। कहा, “भारती जी, इन कविताओं के बारे में अब आप निर्णय ले लीजिए कि इनका क्या करना है? कल ये मेरे पास आए थे। कह रहे थे कि आप हिंदुस्तान टाइम्स में हैं, तो खुद को क्या समझते हैं? जितनी आपकी महीने भर की तनख्वाह है, उतना तो मैं एक दिन में कमा लेता हूँ।”

इस पर अकसर सौम्य रहने वाले भारती जी की उस समय जो असामान्य रूप से कठोर मुखमुद्रा थी, वह मैं आज भी भूल नहीं पाया। गुस्से में आकर बोले, “वैसे तो यह शख्स मेरे आगे गिड़गिड़ाता रहता है कि भारती जी, मेरी भी कोई कविता ‘नंदन’ में छपनी चाहिए। पर अब यह इतना बड़ा हो गया! ज्यादा पैसे वाला है तो हमें खरीद लेगा क्या? अब इसकी कोई कविता हम नहीं छापेंगे।...अप अभी डाक से ये कविताएँ वापस भिजवा दीजिए।”

कहना न होगा कि सिर्फ मेरा ही नहीं, बल्कि मेरे साथ-साथ पूरी पत्रकार बिरादरी का अपमान उन्हें खल गया था। 
भारती जी का यह रूप कहीं मेरे भीतर गड़ गया।
 
यह तो हुई कविता की बात। पर ‘नंदन’ तो, जैसा कि भारती जी बार-बार कहते थे, मूल रूप से कथा-पत्रिका थी और उसका यह रूप वे हर हाल में बनाए रखना चाहते थे। कभी-कभी कुछ फोटो फीचर आदि या अन्य सामग्री भी चली जाती थी, पर इसमें अधिक पृष्ठ न जाएँ और पत्रिका में कहानियों की संख्या काफी हो, यह उनकी पहली प्राथमिकता थी। वे अकसर कहते भी थे, “बच्चे कहानियों को सबसे अधिक रुचि से पढ़ते हैं और उनसे ही सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसके अलावा थोड़ा-बहुत कुछ और चला जाए तो हर्ज नहीं। पर कहानियों की कीमत पर नहीं। पत्रिका में कहानियाँ अधिक से अधिक जानी चाहिए।”

‘नंदन’ में मोटे तौर से पारंपरिक कहानियाँ जाती थीं, पर बीच-बीच में आधुनिक किस्म की कहानियाँ भी चली जाती थीं। हर साल ‘नंदन’ के तीन विशेषांक निकलते थे, परीकथा विशेषांक, प्राचीन कथा विशेषांक और उपहार विशेषांक, जिनकी खासी धूम रहती थी। ‘नंदन’ में परीकथाएँ, लोककथाएँ और प्राचीन कथाएँ काफी छपती थीं, पर उनमें भाषा और कथ्य को चुस्त-दुरुस्त करने पर कितनी मेहनत की जाती थी और नजरिया क्या रहता था, इसका बहुतों को पता नहीं है। भारती जी का आग्रह होता था कि बहुत छोटे-छोटे और सरल वाक्यों में अपनी बात कही जाए। बोलचाल के बहुत आसान शब्द हों।

अकसर लेखक जो रचनाएँ भेजते, उनमें वाक्य पेचीदा और जटिल होते, लिहाजा संपादन में बहुत मेहनत की जाती थी। कभी-कभी तो पूरी कहानी ही दोबारा लिखनी होती थी, ताकि भाषा सहज और बहती हुई हो और बच्चे और कहानी के बीच में दीवार बनकर न खड़ी हो जाए। इसी तरह कोई परीकथा हो, प्राचीन कथा या लोककथा, उसमें कोई ऐसी बात न चली जाए, जो बच्चे को गलत संस्कार दे या आधुनिक मूल्यों के विरोध में हो, या फिर जो बच्चे के मन में किसी तरह की मनोवैज्ञानिक ग्रंथि या अंधविश्वास पैदा करे—इसकी तरह भारती जी का बहुत ध्यान रहता था। और यही ‘नंदन’ की नीति भी बन गई थी, जो उनके बाद भी चलती रही। इसमें बहुत कुछ ऐसा है, जिससे आज भी सीखा जा सकता है।

यों भारती जी ने ‘नंदन’ के लिए जो प्रतिमान गढ़े, उसी से यह करिश्मा संभव हो पाया था कि बच्चे ही नहीं, उनके माता-पिता, दादा-दादी और परदादा-परदादी—ये चार पीढ़ियाँ ‘नंदन’ को एक साथ पढ़ती थीं। उन दिनों बाकायदा यह विज्ञापन ‘नंदन’ में छपता था और यह सच भी था, जिसका गवाह खुद मैं हूँ। जिस रेलगाड़ी से मैं रोजाना फरीदाबाद से दिल्ली आता-जाता था, उसमें मैंने कई बुजुर्गों को भी बड़े चाव से ‘नंदन’ पढ़ते देखा है। और बच्चे किस कदर उनके दीवाने थे, यह कोई कहने की ही बात नहीं। परीकथा विशेषांक की तो कई बार एकाध प्रति भी कार्यालय में नहीं बचती थी, जबकि वह सामान्य अंकों से बहुत ज्यादा छपता था। सचमुच, यह एक करिश्मा ही था, जो इससे पहले कोई पत्रिका नहीं कर सकी।

मुझे याद है, मैंने जब ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग में ज्वाइन किया था, तब प्राचीन कथा विशेषांक की जोर-शोर से तैयारी चल रही थी। इसके लिए ज्यादातर कहानियाँ ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग के लोग ही लिखते थे। मैंने भी इस अंक के लिए छोटी-बड़ी मिलाकर दस-पंद्रह कहानियाँ लिखीं और उनसे मैंने जाना कि बच्चों के लिए लिखना होता क्या है। पुराणों-उपनिषदों में उपदेश भरे पड़े हैं। कहानियाँ भी बहुत लंबी, उलझाऊ और कभी-कभी असंबद्ध भी होती थीं। हम लोग उसमें से कथा-सूत्र ले लेते और उसी परिवेश के अनुकूल चरित्रों को विकसित करते हुए, ऐसी रोचक कथा गढ़ते कि एक बार शुरू करने पर बाल पाठक उसे छोड़ ही नहीं सकता था। इसी बहाने कलम मँज गई और कहानी कहने की कला मैंने सीखी। ‘नंदन’ इस हिसाब से कहानी लिखने की एक आदर्श कार्यशाला थी।

बहुत से लोग ‘नंदन’ की इन कहानियों पर नाक-भौं सिकोड़ते थे और कहते थे कि ‘नंदन’ बच्चों को बाबा आदम के जमाने में ले जाना चाहता है। पर सच्चाई यह नहीं थी। जीवन-मूल्य भारती जी के सामने भी आधुनिक ही थे, पुराने, पिछड़े हुए या सामंती नहीं, जैसा कि कुछ अतिवादी लोग आरोप लगाते हैं। ‘नंदन’ की ज्यादातर कहानियाँ चाहे भले ही पुराने परिवेश की हों और “बहुत पुराने समय की बात है” से शुरू होती हों, पर वे बच्चों के मन में प्यार, करुणा, भाईचारा और हमदर्दी पैदा करती थीं और उन्हें सच्चाई और स्वाभिमान से जीना और दुख में औरों की मदद करना सिखाती थीं। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में माँ और नानी से सुनी कहानियों से हम इनसानियत का पहला पाठ पढ़ते हैं। भला इसमें गलत क्या है? मैं तो नहीं समझ पाता। 

इसी तरह परीकथाओँ में अगर कल्पना और फंतासी की दुनिया है तो इसमें गलत क्या है? बच्चों का तो कल्पना की दुनिया से पहला रिश्ता है। आज बड़ों के लिए लिखे गए कथा-साहित्य में भी ‘जादुई यथार्थवाद’ की बात की जाती है, जिससे फंतासी के जरिए हम यथार्थ की कहीं अधिक प्रभावी तसवीर पेश करें। तो फिर बच्चे से यथार्थ-चित्रण के नाम पर कल्पना और फंतासी का आनंद छील लेना तो मेरे खयाल से बड़ा भारी अन्याय है। पर मैं देखता हूँ, कि भारती जी पर उनके जीवन-काल में तो आक्रमण होते ही थे, उनके जाने के बाद भी ऐसे मिथ्या आरोप थमे नहीं हैं। 
हालाँकि भारती जी ‘नंदन’ की एक लंबी और समृद्ध परंपरा के रूप में इतनी लंबी लकीर खींच गए हैं कि उसे छोटा करना किसी के भी बस की बात नहीं है। उनके समय में ‘नंदन’ को जो लोकप्रियता मिली, वह अब एक इतिहास बन चुकी है।

इसी सिलसिले के बीच न जाने कब ‘हिंदी के श्रेष्ठ बालगीत’ की भूमिका बन गई। मैंने ‘नंदन’ की पिछले बीस बरसों की फाइलें अब तक खूब ध्यान से पढ़ ली थीं। कविताएँ मुझे प्रथमतः आकर्षित करती हैं। इसलिए कविताओँ पर सबसे ज्यादा ध्यान गया और अच्छी कविता पढ़ते ही मन मतवाला हो उठता। कभी-कभी ‘नंदन’ में रंगीन पन्नों पर भी अच्छी कविताएँ छपती थीं। और फिर ‘कवि एक : रंग अनेक’ तो ‘नंदन’ का बड़ा प्रतिष्ठित कॉलम था, जिसमें हिंदी के एक से एक बड़े और दिग्गज बाल कवियों की रचनाएँ छपती थीं। साथ ही उनका फोटो भी दिया जाता।
नवंबर 1964 में नेहरू जी के बाल दिवस पर ‘नंदन’ का पहला अंक निकला था। बीस बरसों की फाइलों में ‘नंदन’ ही नहीं, समूचे बाल साहित्य की विकास-यात्रा भी आँखों के आगे आ जाती। मन में अच्छी बाल कहानियों और बाल कविताओं की पहचान स्थिर करने में ‘नंदन’ के उन अंकों से मुझे बड़ी मदद मिली। इसलिए कि वह बाल साहित्य के भीतर मेरी एक लंबी प्रफुल्ल यात्रा थी, जिसमें कोई पूर्वग्रह मेरे सामने न था। बाल साहित्य के तीन या चार पीढ़ियों के लेखकों की रचनाएँ मेरे आगे पसरी हुई थीं। मैं उनमें से किसी को पढ़कर मगन होता, किसी के साथ दूर तक बहता और अभिभूत होता, किसी-किसी को पढ़कर तनिक निराशा भी होती।

पर मैं तो अच्छी रचनाओं में भी कहीं ज्यादा अच्छी और बहुत-बहुत अच्छी या अनुपम की तलाश में था, जिनसे बाल साहित्य की एक उम्दा पहचान बनती हो। खास तौर से मन में गहरे उतर जाने वाली प्रभावपूर्ण और कुछ नए ढंग की कविताएँ और कहानियाँ। और वे मुझे मिलीं, तो बाल साहित्य के बड़े और उस्ताद लेखकों की एक पहचान भी मन में अंकित हुई। कहना न होगा, यही पहचान या परख की कसौटी जीवन भर बाल साहित्य के क्षेत्र में काम करते समय मेरा पथ प्रशस्त करती रही—और आज भी इसी से घोर अँधेरे में भी राहें प्रकाशित होती चलती हैं। बेशक भारती जी ने मुझे मुक्त मन से ‘नंदन’ की पुरानी फाइलों को पढ़ने की जो सलाह दी थी, वह मेरे बहुत काम आई और मैं मन ही मन इसके लिए उनके प्रति कृतज्ञता महसूस करता हूँ।

‘नंदन’ के पुराने अंकों को पढ़ते हुए लगा, शायद ही बाल साहित्य का कोई लेखक हो, जो उनमें न छपा हो। इनमें सोहनलाल द्विवेदी, निरंकारदेव सेवक, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, शकुंतला सिरोठिया, भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, योगेंद्रकुमार लल्ला, डा. शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, डा. श्रीप्रसाद, दामोदर अग्रवाल, सरस्वतीकुमार दीपक, बालकृष्ण गर्ग, प्रयाग शुक्ल, रमेश कौशिक सरीखे कवि थे। बच्चों के लिए उम्दा कहानियाँ और उपन्यास लिखने वालों में अमृतलाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, कृश्न चंदर, मनोहर श्याम जोशी, हरिशंकर परसाई, राजेंद्र अवस्थी, हरिकृष्ण देवसरे सरीखे लेखक थे। यहाँ तक कि प्रख्यात कथाकार कृष्णा सोबती की बड़ी सुरीली बाल कविताएँ भी मुझे ‘नंदन’ के पुराने अंकों में मुझे नजर आईं।

मैंने एक दिन भारती जी को सुझाव दिया, “अगर एक पुस्तक में हिंदी के सभी प्रतिष्ठित कवियों की चुनिंदा कविताएँ हों, तो हिंदी बाल कविता की एक अच्छी पहचान सामने आएगी। ‘हिंदी के श्रेष्ठ बालगीत’ पुस्तक का नाम हो सकता है। बाद में इसी तरह बाल कहानियों और नाटकों के भी संचयन बन सकते हैं।”

सुनकर भारती जी बहुत खुश हुए। बोले, “चंद्रप्रकाश जी, यह तो बहुत अच्छा आइडिया है। पहले कविताओं की किताब तैयार करते हैं। आप जरा सूची बना लीजिए कि पुस्तक में किन-किन कवियों को शामिल किया जाए...?”
मैंने सूची बनाई तो उसे थोड़ा सा फेर-फार करके उन्होंने अंतिम रूप देते दिया। रचनाएँ आमंत्रित की गईं। यों ‘हिंदी के श्रेष्ठ बालगीत’ संचयन की पांडुलिपि तैयार हुई, जिसमें सोहनलाल द्विवेदी, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी और निरंकारदेव सेवक सरीखे बाल साहित्य दिग्गज कवियों के साथ ही नई पीढ़ी के कवि भी शामिल थे। मेरी कविताएँ भी थीं। पुस्तक को आकार देने में मैंने अनथक श्रम किया था, और कहना न होगा, इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हुआ। स्वाभाविक रूप से भारती जी इस बात से प्रसन्न थे। 

फिर तो उन्होंने अपने सारे खजाने मेरे आगे खोल दिए। मुझे उन्होंने बहुत कुछ अनमोल सौंपा, जिसे मैं ऐतिहासिक थाती मानता हूँ। पुराने बहुत से बाल कवियों की कविता की दुर्लभ पुस्तकें भारती जी ने मुझे दीं। इसके अलावा भी बाल साहित्य के बहुत से महत्त्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथों के बारे में भी मुझे उन्हीं से पता चला। बाल साहित्य की विभिन्न योजनाओं में वे मुझे सहयोगी बनाते रहे और उसमें उपयोग के लिए बहुत सारी सामग्री उन्होंने ही मुहैया कराई थी। 
इसी तरह, मुझे याद है, निरंकारदेव सेवक का ऐतिहासिक महत्त्व का ग्रंथ ‘बालगीत साहित्य : आलोचना और इतिहास’ पहलेपहल भारती जी के पास ही मुझे देखने को मिला, जिसने मेरे भीतर अलग ढंग से काम करने का एक जुनून ही पैदा कर दिया। पुराने कवियों की कविताओं पर उनसे लगातार मेरा विमर्श होता और ऐसे क्षणों में वे मानो ‘नंदन’ के संपादक की कुरसी से उतरकर मुझसे बिल्कुल बराबरी के स्तर पर बात करते। और फिर बाल साहित्य में नया क्या-क्या हो सकता है और किन-किन योजनाओं पर गंभीरता से काम होना चाहिए, इस पर बात चल निकलती, तो उनकी आँखों में सचमुच एक अनोखी और पवित्र चमक आ जाती, जिसमें एक संपादक का गर्व और बड़प्पन बह जाता। वे मानो वर्तमान से उठकर भविष्य की ओर देखने लगते, जिसमें बाल साहित्य को इक्कीसवीं सदी के केंद्र में आ जाना था।

इसके अलावा ‘नंदन’ की पुरानी फाइलें तो थीं ही, जिन्हें मैं पढ़ता और रोमांचित होता। भारती जी और ‘नंदन’ में मिले परिवेश के कारण बाल साहित्य का एक गौरवशाली इतिहास मेरे सामने था और मैं उसे शब्दबद्ध करने के सपने में डूबा हुआ था। इसी से अपना इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ लिखने की मुझे प्रेरणा मिली और फिर एक के बाद एक आने वाली तमाम मुश्किलों और बाधाओं के बावजूद मैं उसे पूरा भी कर सका। बेशक हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना मेरे जीवन का एक बड़ा सपना था। पर मेरे मन में उस सपने को जगाने का काम तो भारती जी ने ही किया था।

हालाँकि हिंदी बाल साहित्य के इतिहास से कोई पंद्रह बरस पहले मेरी पुस्तक ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ छप चुकी थी। और यह मेरे जीवन का एक विचित्र रोमांचक क्षण था कि जिस समय भारती जी ‘नंदन’ से सेवामुक्त हो रहे थे, करीब-करीब तभी मेरी पुस्तक ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ छपकर आई। मैंने उन्हें पुस्तक की एक प्रति भेंट की तो उन्होंने खासी प्रसन्नता प्रकट की और कहा, “चंद्रप्रकाश जी, मैं इसे जरूर पढ़ूँगा।”

इसके कुछ दिनों बाद किसी निजी काम से वे ‘नंदन’ में आए तो मैं उन्हें नीचे गाड़ी तक छोड़ने गया। उन्होंने कहा, “चंद्रप्रकाश जी, आपकी कुछेक बातों से मैं सहमत नहीं हूँ। पर इतना तय है कि यह काम आप ही कर सकते थे। हिंदी में इतनी मेहनत करने वाले लोग हैं नहीं।”

सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने बहुत भावुक होकर कहा, “भारती जी, सीखा तो आपसे ही है।” और कुछ कहा ही नहीं गया। मेरा गला भरा हुआ था। कुछ और कहता तो स्वर भर्राने लगता।

इसके बाद बाल साहित्य पर बहुत श्रमपूर्वक लिखी गई मेरी और भी बहुत सी पुस्तकें आईं, हालाँकि तब तक भारती जी अपनी जीवन-यात्रा पूरी करके जा चुके थे। पर उन्हें तैयार करते समय और करने के बाद भी बहुत बार मैंने भारती जी का स्मरण किया है, जिन्होंने मेरे भीतर बड़े काम करने का सपना जगाया था। सच कहूँ तो आज भी उनकी प्रतिक्रिया मैं अंदर ही अंदर महसूस करता हूँ कि “ठीक है चंद्रप्रकाश जी, यह तो कुछ ठीक सा काम हो गया। पर अभी तो बहुत काम पड़ा है करने के लिए...!”

और मैं विगलित होकर कहता हूँ, “हाँ भारती जी, करूंगा, जितना मेरे बस में होगा, जरूर करूंगा। मैं आपको वचन देता हूँ!”

पर भारती जी कोरे संपादक नहीं थे। वे बड़े समर्थ लेखक भी थे और उन्होंने स्वयं भी बाल साहित्य की कई विधाओं में लिखा है। इनमें बच्चों के लिए लिखी गई बड़ी खिलंदड़ी कविताओं के अलावा रसपूर्ण कहानियाँ, बाल जीवनियाँ और ज्ञान-विज्ञान की बड़ी सुंदर पुस्तकें हैं। भारती जी के शिशुगीत और बाल कविताओं की भी कई पुस्तकें हैं, जिनसे उनके बच्चों सरीखे सरल मन और स्वभाव का पता चलता है। खासकर उनके कुछ शिशुगीतों में बहुत कुछ नयापन है। 

अगर भारती जी का सबसे अच्छा शिशुगीत चुनना हो तो मुझे एक पल की भी देरी नहीं लगेगी। उनका यह अद्भुत शिशुगीत है ‘राजा-रानी’। जाहिर है, ये नए जमाने के राजा-रानी हैं तो इनमें बहुत कुछ नया होगा ही। भारती जी ने एकदम नए अंदाज में उनका यह दिलचस्प खाका पेश किया है—
एक था राजा, एक थी रानी, 
दोनों करते थे मनमानी।
राजा का तो पेट बड़ा था, 
रानी का भी पेट घड़ा था।
खूब थे खाते छक-छक-छककर,
फिर सो जाते थक-थक-थककर।
काम यही था बक-बक, बक-बक,
नौकर से बस झक-झक, झक-झक!

यह ऐसा मजेदार शिशुगीत है कि एक बार पढ़ लेने पर इसे भूल पाना असंभव है। भारती जी छोटे बच्चों के लिए लिखी गई कविताओं में क्या चाहते थे, या उसका कैसा आदर्श खाका उनके दिमाग में था, इसकी मिसाल खुद उनका लिखा यह बड़ा प्यारा सा गीत है। इसी तरह वैज्ञानिक विषयों पर भी बोलचाल के अंदाज में चुस्त, सधे हुए गीत लिखे जा सकते हैं, भारती जी का ‘रॉकेट’ शिशुगीत इसका एक उम्दा उदाहरण है।

शिशुगीतों में खिलंदड़ापन कैसे लाया जाए, इसकी कोशिश उनके यहाँ निरंतर है। ‘दिल्ली की बिल्ली’ उनका ऐसा ही नए रंग का एक बढ़िया शिशुगीत है जिसमें लय और रवानगी अच्छी है और एक तरह का शोख, चटपटा अंदाज भी, जो खासकर नन्हे-मुन्ने शिशुओं को भाता है—
दिल्ली से इक बिल्ली आई
बिल्ली क्या मरगिल्ली आई,
मैंने पूछा बिल्ली ताई—
खाओगी तुम दूध-मलाई?
खाकर दूध-मलाई भाई,
वह तो करने लगी लड़ाई।
करती फिरती म्याऊँ-म्याऊँ—
अभी भूख है, अब क्या खाऊँ?

पर भारती जी मूल रूप से या कहें प्रथमतः शायद कहानीकार हैं और उन्होंने बच्चों के लिए एक से एक सुंदर कहानियों लिखी हैं। ‘लो गुब्बारे’, ‘दीप जले शंख बजे’, ‘सूरज का खेल’ और ‘हीरे-मोती मणियाँ’ समेत उनकी बाल कहानियों के कई संग्रह हैं। इनमें ‘लो गुब्बारे’ उनका सबसे चर्चित संग्रह है, जिसमें उनकी चुनी हुई ग्यारह कहानियाँ शामिल हैं। इनमें ‘जन्मदिन’, ‘ढोल’, ‘गुब्बारे’, ‘छोटा झोला-बड़ा झोला’, करामाती केतली’, ‘शीशे का महल’ कहानियाँ खासी प्रसिद्ध हैं। खासकर ‘ढोल’ कहानी तो ऐसी मजेदार है कि बच्चे पढ़ते-पढ़ते चहक उठेंगे। 
ऐसे ही ‘दीप जले शंख बजे’ वेल्दी नामक एक विदेशी लड़की की कहानी है जिसने दीपों के त्योहार के बारे में अपनी नानी से सुना था। तभी उसने तय कर लिया था कि वह भारत जाएगी और स्वयं अपनी आँखों से उस त्योहार की जगर-मगर देखेगी। आखिर वेल्दी नारायणपुर में आई, स्वामी सदानंद से मिली और भारत में आकर कुछ इस कदर ‘भारतीय’ हो गई कि गाँव की औरतें कहने लगीं, ‘यह औरत तो लक्ष्मी है। इसने हमारे गाँव को बदल दिया। हमें नई रोशनी में जीना सिखा दिया।’

इसके अलावा बच्चों के लिए नएपन और ताजगी से भरपूर ज्ञान-विज्ञान साहित्य की सर्जना में भारती जी का योगदान बहुत बड़ा है। उन्होंने बच्चों को आसान और रोचक शैली में वैज्ञानिक विषय की जानकारी देने की पुरजोर कोशिश की। उनकी कई किताबें विज्ञान-लेखन की शैली के लिहाज से मॉडल कही जा सकती हैं।

सचमुच बाल साहित्य में भारती जी का योगदान इतना बड़ा और बहुमुखी है कि थोड़े में उसे समेटना मुश्किल क्या, असंभव ही है। वे सही मायने में बाल साहित्य के पितृपुरुष थे, जिन्होंने बहुत लोगों को बाल साहित्य से जोड़ा। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, भारती जी ने ही सबसे पहले यह नारा दिया था कि इक्कीसवीं सदी बालक और बाल साहित्य की होगी।

उस समय हम लोग शायद इसे ठीक-ठीक समझने की मनःस्थिति में भी नहीं थे और उनकी यह बात हमें शुभाशंसा मात्र लगती थी। पर अब जबकि हम इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हैं, भारती जी का सपना पूरा नहीं, तो भी एक अंश में हमें साकार होता नजर आता है। बच्चे और बाल साहित्य को एक तरह का केंद्रीय महत्त्व मिलना शुरू हुआ है। बाल साहित्य भी अब धीरे-धीरे मुख्य धारा में आ रहा है।

यहाँ तक कि जिन विद्वानों और समालोचकों को पहले हम नाक-भौं सिकोड़ते देखते थे कि बाल साहित्य भी कोई गंभीरता से लेने की चीज है, वे अब इस पर गंभीरता से सोच रहे हैं और बात कर रहे हैं। इसका श्रेय काफी हद तक भारती जी को ही जाता है जिन्होंने निरंतर अपने लेखों और किताबों के जरिए बाल साहित्य की मशाल को जलाए रखा।

फिर भारती जी का काम इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने से पहले की पीढ़ी और बाद की पीढ़ी के बीच लगभग एक सेतु जैसा काम किया, जिससे बाल साहित्य की समूची ऊर्जा और शक्ति एक साथ बिजली की कौंध की तरह सामने आई और उससे बाल साहित्य का एक मयार बना। आज भी वही समूची इक्कीसवीं सदी को अपने आलोक से प्रकाशित करने के लिए संकल्परत नजर आता है।

हालाँकि बाल साहित्य की इन दमकती संभावनाओं के बीच मुझे आज भी रह-रहकर भारती जी का सौम्य चेहरा नजर आता है, जिसमें एक सपने के पूरे होने का संतोष है। लगता है, आज भी ध्रुवतारा बनकर वे हमें राह दिखा रहे हैं और बरसों तक इसी तरह आशा का संबल बनकर हमारा मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।

2 comments :

  1. बहुत ही जबरदस्त लिखा है आपने । एक इतिहास की यात्रा सा लगा ।

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  2. सुन्दर , ज्ञानवर्धक और समर्पित आलेख

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