'पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन' से नारी तन में परिवर्तित नारी मन तक की यात्रा

सविता शर्मा
सविता शर्मा

शोधार्थी, पीएच.डी. (हिंदी), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
ईमेल savita3590@gmail.com 

विमर्शों की बात करें तो विमर्श की सर्वाधिक बेहतर विधा आत्मकथाओं को माना जाता है। स्त्री-विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि विमर्शों में भी आत्मकथाओं का विशेष योगदान रहा है। इसी प्रकार किन्नर विमर्श में भी आत्मकथाओं का अहम रोल है। दरअसल जब सहानुभूति और स्वानुभूति का प्रश्न आता है तो उसमें अधिक महत्त्व स्वानुभूति को ही दिया जाता है। आत्मकथाएँ स्वानुभूति को ही पुख्ता करती है। जिस कारण किसी भी विमर्श में आत्मकथाओं को अत्यधिक प्रासंगिक माना जाता है। किन्नर विमर्श हाल ही में आरम्भ हुआ विमर्श है जिस कारण इस विमर्श पर अभी अधिक आत्मकथाएँ नहीं लिखी गई है। किन्तु फिर भी कुछ आत्मकथाएँ है जिनका अपना साहित्यिक महत्त्व है जैसेः- ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘ (मानोबी बंद्योपाध्याय), ‘मैं हिजड़ा....मैं लक्ष्मी!‘ (लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी) आदि।

 ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘ मानोबी बंद्योपध्याय की आत्मकथा है, जो कि भारत की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल है। मानोबी अपनी आत्मकथा में बचपन से लेकर महाविद्यालय की प्रिंसिपल बनने तक का सफर बड़ी ही बेबाकी से बताती है। जिसमें किसी ट्रांसजेंडर के लिए पढ़-लिखकर इतने बड़े औहदे को प्राप्त कराना वाकई सभी लोगों के लिए एक मिसाल है। वो भी ऐसे समय में जब भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कोई विशेष अधिकार कानून में नही थे। मानोबी एक ऐसा नाम है जो सिखाती है कि जीवन चलते रहने का नाम है। चाहे जीवन में कितनी ही विपरीत पस्थिति क्यों न हो? हमें बस अपने लक्ष्यों को पाने के लिए दृढ़निश्चयी होना चाहिए। जिससे एक दिन सभी असफलताएँ सफलताओं में बदल जाती है। हालांकि समाज के दबाव में आकर बाद में उन्हें प्रिंसिपल के पद से इस्तीफा देना पड़ा किन्तु यह इस्तीफा केवल मानोबी का इस्तीफा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक भारत का आईना भी है, जहाँ हाशिए के वर्ग के साथ कैसा व्यवहार समाज करताहै उसका उदाहरण है। हालांकि मानोबी एक इस्तीफे से नहीं रूक सकती क्योंकि वह तो दर्द और जिन्दगी को साथ लेकर चलने वाली, बेबाक स्वभाव भी तृतीयलिंगी है।

 मनोबी बंदोपाध्याय की बेबाकी व स्पष्टता का एक उदाहरण उनके एक साक्षात्कार में दिये गए जवाब से ही लगाया जा सकता है। जब उनसे एक प्रश्न किया गया कि समाज आपके साथ कैसा व्यवहार करता है? तब मानोबी जवाब देते हुए कहती हैं, "मैं लोगों के व्यवहार की चिंता नहीं करती, केवल अपने भीतर झाँककर देखती हूँ, अपने से सवाल करती हूँ कि मैं क्या चाहती हूँ। कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार क्यों कर रहा है, इसको लेकर मैं परेशान नहीं होती हूँ।

 कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि समाज मुझे किस ढंग से देखता है, मेरे बारे में क्या सोचता है। मेरे लिए महत्त्व की बात है कि मैं कैसे समाज को देखती हूँ। आज मेरे पास कुछ करने की पावर है, इसलिए मैं जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ। मैं समाज को जवाब देना चाहती थी इसलिए उच्च शिक्षा हासिल की।"1

 आगे एक प्रश्न कि प्रिंसिपल बनने के बाद क्या आपको समाज में स्वीकृति मिली है? इस पर मानोबी कहती है, "कोई मुझे स्वीकारे न स्वीकारे, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वैसे भी आप मुझे बताएँ कि एक्सपेक्टेशन की परिभाषा क्या है सब बेकार की बात है, इसलिए किसी की स्वीकृति की मोहर मुझे अपने ऊपर नहीं लगानी है। क्या मैं कोई ग्रहण हूँ, क्या मैं कोई गंदी चीज हूँ जो मुझे स्वीकारने का प्रश्न उठता है। मेरे लिए जरूरी है आत्मसम्मान और उसी के साथ सिर उठाकर मैं अपनी राह पर चल रही हूँ ‘पहले मेरी आत्मा स्त्री की थी और शरीर पुरुष का, अब मेरी आत्मा और शरीर दोनों एक हो गए हैं।

 मेरा मानना है कि सभ्यता एक बड़ी डिपोक्रेसी है। इस सभ्यता से मेरा कोई संबंध नहीं है। जो लोग अपने को सभ्य मानते हैं। वही सबसे ज्यादा असभ्य हैं। मैं बचपन से देख रही हूँ ऐसे सभ्य लोगों को जो ट्रांसजेंडर्स का यूज करके उन्हें छोड़ देते है। ये लोग लड़कियों का यूज करके उन्हें वेश्या बना देते है। हम तो वेश्या भी नहीं है। हम तो रास्ते में खड़े होकर भीख मांगते हैं। हर ट्रांसजेंडर का यौन शोषण होता है। बचपन में न जाने कितनी बार मेरा यौन शोषण हुआ है और वह भी परिवार के लोगों द्वारा।"2

 अपनी इसी बेबाकी के साथ मानोबी अपने अनुभव अपनी आत्मकथा ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘ में भी लिखती है। मानोबी बंद्योपाध्याय एक ऐसा ट्रांसजेंडर है जो सोमनाथ बद्योपाध्याय के रूप में जन्म लेकर बाल्यावस्था से ही अपने भीतर कैद स्त्री की आत्मा से संचालित होकर पुरुषोचित व्यवहार के विपरीत पुरुषों के प्रति आसक्त होकर वासना के जाल में फँसती जाती है। वह अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए जीवन भर स्वयं से और समाज से लड़कर अंत में अपना लिंग परिवर्तन करा लेती है। वह सोमनाथ से मानोबी नामक एक सुंदर स्त्री में रूपांतरित होकर अपना जीवन बिता रही है। ऐसी ही ट्रांसजेंडर स्त्री ‘मानोबी बंद्योपाध्याय‘ की आत्मकथा है-‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘। प्रस्तुत आत्मकथा मूल बंग्ला में रचित है जो हिन्दी और अंग्रेजी में अनूदित हुई।
 अपनी आत्मकथा ‘पुरुषतन में फँसा मेरा नारी मन‘ को पाठकों को समर्पित करते हुए मानोबी लिखती हैं, "उन सबके नाम, जिन्होंने मुझे अपमानित किया और अमानव कह कर जीवन के हाशिये पर धकेल दिया। उन्हीं के कारण मुझे लड़ने की ताकत मिली और मैं जीवन में आगे बढ़ पाई। आशा करती हूँ कि पुस्तक मुझ जैसों के लिए प्रेरणात्मक सिद्ध होगी और वे भी जीवन में सफल हो पायेंगे। मैं कौन हूँ और मैं एक पुरुष की देह में कैद स्त्री के रूप में क्यों जन्मी? मेरी नियति क्या है? मेरे इस रंग-बिरंगे बाहरी आकरण के नीचे, शर्मसार व चोटिल वैयक्तिकता छिपी है जो आज़ाद होने के लिए तरस रही है-अपनी शर्तों पर जीवन जीने की आज़ादी और जो मैं हूँ, उसी रूप में रहने की आज़ादी! मैं अपने लिए यही आज़ादी और स्वीकृति चाहती हूँ।”3

 मानोबी अपने संघर्षों के साथ प्रेम संबंध पर भी खुलकर अपनी आत्मकथा में बात करती है। संबंध के विषय में वे कहती है-‘कई बार मेरा दिल भी टूटा। पर हर बार मुझे एक नया सबक सीखने का अवसर मिलता। मैंने बहुत अच्छी तरह और गहराई से प्यार किया और आशा करती हूँ कि मैरे साथी जहाँ भी हैं, वे चुपचाप मेरे उस रूप को याद करते होंगे। यह और बात है कि संबंध कभी मेरे लिए कारगर नही हो सके। जिन्होंने मुझे प्रेम किया, वे सदा मुझे छोड़ कर चले गए और हर बार जैसे मेरा कुछ हिस्सा भी, उनके संग कही खो गया।”4

 झिमली मुखर्जी पांडे ने मानोबी बंद्योपाध्याय के मुख से उसके जीवन की कहानी को सुनकर बांग्ला में लिपिबद्ध किया। जो पुस्तकाकार से पहले बांग्ला और फिर अनूदित होकर हिंदी एवं अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। हिंदी में इस कृति का अनुवाद रचना भोला यामिनी के द्वारा किया गया जो सन् 2018 में राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुआ। आत्मकथा का शीर्षक ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘ प्रतीकात्मक और भाव व्यंजक है जिसके माध्यम से मानोबी जन्म से लेकर वर्तमान तक की अपनी संघर्ष गााथा का विशद वर्णन प्रस्तुत करती है। इस आत्मकथा में सोमनाथ बंद्योपाध्याय नामक बालक से मानोबी बंद्योपाध्याय नामक सुंदर स्त्री में रूपांतरित होने तक का संघर्ष, शोषण और यातनाओं के अनुभूत सत्य के उजागर किया गया है।

 "आत्मा की अधूरी प्यास है”-पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन। यह किताब परिवार में पैदा हुए एक लड़के की कहानी है जिसे सोमनाथ के नाम से जाना जाता है। उनके पिता विशेष रूप से खुश थे क्योंकि उनका जन्म 2 लड़कियों के बाद हुआ था। शुभचिंतकों ने उनके जन्म के समय, परिवार की बढ़ती समृद्धि पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, "यह एक लड़का है लक्ष्मी!”5 हालांकि, यह बहुत पहले नहीं था जब छोटे से इस लड़के को अपने शरीर में कुछ अपर्याप्त सा महसूस होना शुरू हो गया था और अपनी खुद की पहचान पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था। क्योंकि उसे लगातार महसूस हुआ कि वह एक लड़की थी जबकि उसके पुरुष अंग थे। वह एक तरह से लड़कों के प्रति आकर्षित थी। इतना अधूरा महसूस करने के लिए वह क्या कर सकती थी? यह स्पष्ट रूप से भाग्य का एक क्रूर मजाक था, जिसे परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। इस तरह की उथल-पुथल के बावजूद वह अपने शिक्षाविदों का पीछा करना जारी रखा और एक गर्ल्स कॉलेज की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल बन जाती है और ऐसा करने में उसने न केवल अपनी पहचान को परिभाषित किया, बल्कि अपने पूरे समुदाय को भी प्रेरित किया।
 बंगाली साहित्य का अध्ययन करने के लिए अपने गृहनगर नैहाटी के ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज से जादवपुर विश्वविद्यालय में जाने के बाद, मानोबी की दृष्टि का विस्तार शंख घोष, पबित्रा सरकार और उनके समान बौद्धिक रूप से उत्तेजक सभी छात्रों की संगति में हुआ। रंगमंच, नृत्य और लेखन ने उसे शारीरिक और मानसिक अशांति की एक निरंतर स्थिति प्रदान की। यह पुस्तक उनके निजी संबंधों और उनके परिवार की लम्बे समय से चली आ रही पहचान को अस्वीकार करने का एक कच्चा चिट्ठा है।

 अपने जादवपुर के दिनों में, मनोबी एक अन्य ट्रांसजेंडर (जूही) जगदीश, जो एक सार्वजनिक कलाकार था, से निकटता से परिचित हो गयी। जगदीश ने ‘अबोमनोब‘ (जिसका अर्थ है सबहुमन)-भारत की पहली ट्रांसजेंडर पत्रिका शुरू की-जो समुदाय और समाज के बाकी हिस्सों के बीच संवाद के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करती है। पत्रिका ने स्वास्थ्य, स्वच्छता, रहने की स्थिति, भाषा, लिंग, साक्षात्कार, बंधियाकरण, सम्मेजनों, कलंक और निश्चित रूप से, आगे बढ़ने जैसे विषयों पर छुआ। इसके सार्वजनिक क्षेत्र में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए जगह बनाई, "तब तक, हिजड़े एक ऐसे समुदाय के थे, जो कि टैफिक सिग्नल पर ताली बजाते और भीख मांगते थे या जब नए-नवजातों को अस्पताल से लाते थे, तब उन्हें पैसे मिलते थे। यह तथ्य कि उनके कारण के लिए पूरी पत्रिका समर्पित हो सकती है, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सके।"6

 ‘ए गिफ्ट ऑफ देवी लक्ष्मी‘ का हिन्दी अनुवाद ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन‘ उनके जीवन पर केंद्रित है। यह पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में विवेकानंद शतवार्षिकी महाविद्यालय में बंगाली साहित्य के व्याख्याता के रूप में उनके कठोर अनुभवों को विस्तार से बताता है। बंद्योपाध्याय के लिए जीवन कभी भी सरल नहीं रहा, क्योंकि वह बड़ी होकर अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के साथ आने के लिए संघर्ष कर रही थी। एक तरफ रूढ़िवादी और निर्णय लेने वाले परिवार के सदस्यों द्वारा भड़क गई और चचेरे भाई और पड़ोसियों ने उसका यौन शोषण किया। हालांकि वर्षों से सामने आने वाले अन्याय के प्रति आनोबी का आक्रोश उचित है।

 जब मानोबी ने जादवपुर विश्वविद्यालय में एक छात्र के रूप में प्रवेश लिया तो उनके पास एक विशेष स्वतंत्रता थी, क्योंकि वे विशेषाधिकार प्राप्त और खुले विचारों वाले सामाजिक क्षेत्रों में घूमती थी, शिक्षण में जाने के बाद चीजें काफी बदल गई। कुछ छात्रों से समर्थन प्राप्त करने के बावजूद, उसने अपने सहयोगियों की एकमत राय के बारे में स्पष्ट समझ के साथ छोड़ दिया, जिसे वह अपनी पुस्तक में संक्षेप में प्रस्तुत करती है। "वे स्वाभाविक रूप से मेरी उपस्थिति से स्तब्ध थे और मेरे खिलाफ खुलेआम युद्ध की घोषणा कर रहे थे, मेरे करियर को बर्बाद करने की धमकी दे रहे थे क्योंकि किसी भी हिजड़े को प्रोफेसर बनने का अधिकार नहीं था। एक हिजड़े के रूप में किसी को भी कॉलेज में पढ़ाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, एक ही स्टाफ रूम, शौचालय और सुविधाओं को साझा करना चाहिए।”7 

 हमारे शैक्षणिक संस्थानों की विविधता कैसे बढ़ेगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अन्य ट्रांसजेंडर शिक्षाविदों को उनके यौन अभिविन्यास के कारण यौन उत्पीड़न से लेकर गैर-कानूनी मुकदमेबाजी और अपमान झेलने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। एक अन्य साक्षात्कार में वे कहती है, "लोग कह सकते है कि वे ऐसा करने के लिए तैयार नहीं है। वे मुझे एक प्रिंसिपल के रूप में नहीं बल्कि टैफिक सिग्नल पर भीख मांगते हुए देखना स्वाभाविक समझते हैं।”8

 मानोबी की पुस्तक एक प्रमुख के रूप में उनकी नौकरी में बसने के बाद उत्थान के एक नोट पर समाप्त होती है। लेकिन दिसंबर में पद से इस्तीफा देने के डेढ़ साल बाद उनके इस्तीफे ने मीडिया में लहरें पैदा कर दी और किताब में एक अलग तरह के पंख लगा दिए। अंत में, कॉलेज ने उनसे वापस आने का अनुरोध किया और मानोबी ने 2 जनवरी को अपनी स्थिति फिर से शुरू की और छात्रों ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया।

 मानोबी बंद्योपाध्याय द्वारा बंग्ला में रचित आत्मकथा हिन्दी और अंग्रेजी में अनुदित होकर साहित्य जगत मे चर्चा का विषय बन गई है। एक ट्रांसजेंडर महिला के स्वानुभवों का यह जीवंत दस्तावेज है। ट्रांसजेंडर व्यक्ति का जीवन थर्ड जेंडर (किन्नर) समुदाय के लोगों से काफी भिन्न होता है, इस यथार्थ को समझने के लिए प्रस्तुत आत्मकथा उपयोगी है। लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया से जुड़े अनेक अज्ञात तथ्यों को उद्घाटित करने में मानोबी की आत्मकथा सहायक हो सकती है। मानोबी ने बिना किसी दुराव के लोकलाज की परवाह किए बिना अपने शरीर और आत्मा पर हुए हिंसक हमलों का वर्णन करती हैं। प्रस्तुत आत्मकथा सभ्य समाज के लिए एक चुनौती है। निश्चित रूप से समाज में परिवर्तन की आवश्यकता को प्रस्तुत कृति रेखांकित करती है। आखिरकार मानोबी ने पुरुष तन में फँसे नारी मन को मुक्त कर ही दिया।

संदर्भ:
1. प्रभात खबर अखबार, 8 फरवरी 2019 का ‘सभ्यता एक बड़ी हिपोक्रेसी है’, लेख
2. वही - (सभ्यता एक बड़ी हिपोक्रेसी है) लेख
3. पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन - मानोबी बंद्योपाध्याय (झिमली मुखर्जी पांडे) (राजपाल एण्ड सन्ज़ 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली - 110006) पृष्ठ संख्या 3 
4. वही, पृष्ठ संख्या 7
5. वही, पृष्ठ संख्या 15
6. वही, पृष्ठ संख्या 77
7. वही, पृष्ठ संख्या 83
8. साहित्य सिनेमा सेतु में छपे एक साक्षात्कार से 

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