ग़ज़लें: अभय शुक्ला

ग़ज़ल 1

क्या क्या सितम नहीं किए हैं, ज़िंदगी के साथ,
और इंतिहा तो ये कि किया सब ख़ुशी के साथ।

हम को तो एक शख़्स से करनी थी आशिक़ी,
पर हम ने दिल लगा लिया है आशिक़ी के साथ।

कोई ख़ुशी मिली न ही आगे उमीद है,
पर ज़िंदगी बितानी हमें आप ही के साथ।

इतना बुरा तो कोई अँधेरा न कर सका,
जैसा चराग़ ने किया है रोशनी के साथ।

बेचा है अपने आप को इक फ़न के वास्ते,
सौदा किया है आत्मा का शायरी के साथ।

आज़ाद कर दिया मुझे इज़्ज़त के फेर से,
मेरा तमाशा कर दिया तुम ने सभी के साथ।

मेरे सभी यक़ीन ज़मींदोज़ कर दिए,
तुम ने डिगा दी नींव महज़ आमदी के साथ।

क्यों मैं कहूँ जो बात न कहने की है उसे,
क्यों हो धमाका गर वो सुने शांती के साथ।

कुछ सौ-हज़ार ख़ामियाँ गिनवाई हैं मगर,
कोई गिला नहीं मिरी वाबस्तगी के साथ।

क्या क्या न कर सके है बशर, जानता था रब,
रिश्ते बना के उलझा दिया ज़िंदगी के साथ।

इन मुश्किलों को पार लगाने के तोहफ़े में,
अगला मुक़ाबला तिरा इन से बड़ी के साथ।

मैं भाग जाउँगा मैं तुम्हें छोड़ जाउँगा,
इतना यकीन ठीक नहीं दोस्ती के साथ।

अपनी अमाँ में ले के उसे बे अमाँ किया,
अपना अजीब रब्त था ज़िंदादिली के साथ।

जिस का रहा मैं उम्र भर,उस का न हो सका,
ऐसा मज़ाक हो न किसी आदमी के साथ।

अपने कहे किए से कभी कुछ नहीं हुआ,
सो अब बसर करेंगे सफ़र ख़ामुशी के साथ।
***


ग़ज़ल 2

निकाल अपने से बाहर ऐ मेरे यार मुझे,
न पैरहन सा यूँ ख़ुद पर पहन उतार मुझे।

मैं दुख हूँ और मैं पत्थर पे भी उग आता हूँ,
जगह बनाने को काफ़ी है इक दरार मुझे।

मैं तेरे साथ हूँ मेरा गुमान क़ायम रख,
मिरे बगल में खड़े हो के मत पुकार मुझे।

कम अज़ कम अक़्स दिखाता था मुझ को औरों का,
अब आइना भी दिखाता है आर पार मुझे।

ये ज़िंदगी के सफ़र की नहीं टिकट मुझ पर,
ये बस तू चाहे जहाँ ले जा पर उतार मुझे।

मुझे मिले हो न जाने ये किस तरीक़े से तुम,
तुम्हारे खो ने का डर ही नहीं है यार मुझे।

गुज़िश्ता वक़्त मिले गर कभी कहीं तो मैं,
ये पूँछ लूँगा कि "हम" दोगे क्या उधार मुझे।

न जाने कैसी कशिश थी मिरे ज़वाल में जो,
ठिठक के देखता रहता था आबशार मुझे।

जहाँ लगा की ये सब से हसीन दुख है वहीं,
हसीन-तर किसी दुख ने कहा, निहार मुझे।
***


ग़ज़ल 3

नया उरूज, पुराना ज़वाल होता है।
बदन किसी का हो तेरा ख़याल होता है।

तू नैचुरल है अदाकारी में या सीखा है?
कमाल करता है तू या कमाल होता है?

वो एक वक़्त की हर दर्द मीठा लगता है,
फिर इक समय की ख़ुशी का मलाल होता है।

वो संग कब है जो मंदिर में हो गया साकित,
वो संग होता है जो पाएमाल होता है।

नई अमीरी से ग़ुरबत पुरानी झाँकती है,
नए रईसों का अक्सर ये हाल होता है।

ग़मे जहाँ से तिरी ढाल भी अलहदा है,
जो तेरे ज़ेरे सितम ख़ुद निढाल होता है।

हसीन गलियों में जाने का ये अदब सीखो,
जो जितना लुटता है सो माला माल होता है।

जो यादें याद थीं कम थीं जो फेसबुक पर अब,
बा क़ाएदा हिसाबे माहो साल होता है।

कहानीकार भी दर्शक सा देखता होगा,
क्या तेरी मेरी कहानी का हाल होता है।
***


ग़ज़ल 4

नई मुश्किल पुरानी की दवाई हो गई मालिक,
तबीअत आप के आने से अच्छी हो गई मालिक।

बुरे सपने ही आते थे पुराने हादसों से पर,
जो ख़ुशियाँ आप ने दीं, नींद आधी हो गई मालिक।

मनोरंजन की ख़ातिर रब ने की तामीर यह दुनिया,
बची है कितनी पिक्चर, और कितनी हो गई मालिक?

अगर मुश्किल पे मुश्किल सोचनी है तो ज़रा सोचो,
दलित-मुस्लिम घराने में जो बच्ची हो गई मालिक।

जहाँ निनयानवे पर होते हो, डस लेता है कोई,
तुम्हारी ज़िंदगी तो साँप सीढ़ी हो गई मालिक।

मिरा ज़िम्मा है अब तुम पर, ख़ुदा हिम्मत तुम्हें बख़्शे,
मिरी सब हसरतों की तुम से शादी हो गई मालिक।

न दी जाए, न ली जाए है उल्फ़त फिर भला वो क्या,
ज़रूरत है कि इक लड़की ज़रूरी हो गई मालिक।

नए लोगों को कम तनख़्वाह पर रखते हैं मालिक अब,
वफ़ादारी की क़ीमत कितनी सस्ती हो गई मालिक।

जब अंदर से थे रोशन लोग, दीवाली भी रोशन थी,
धुएं और शोर का मतलब दिवाली हो गई मालिक।

ग़रीबी के जो हालात आप ने देखे सुने हैं बस,
हमारी उम्र उन की ही दुहाई हो गई मालिक।

है पे दरकार रिंदों को परिंदों में बदलने को,
बची हर शर्त इक प्याले में पूरी हो गई मालिक।

मैं चुप था, आप भी ख़ुश थे, मरासिम चल रहा था, पर,
मुझे उकसा के बुलवाया, तसल्ली हो गई मालिक?

***

दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय महाविद्यालय में बी. कॉम. (ऑनर्स)  अंतिम (तीसरे) वर्ष के छात्र। भोपाल, इन्दौर, दिल्ली व हैदराबाद आदि नगरों के भिन्न भिन्न मंचों पर प्रस्तुति। साहित्य संबंधी प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय त्वरित शायरी लेखन के विजेता।
निवास: भोपाल (मध्य प्रदेश)
चलभाष: +91 798 786 0730

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