अमेरिका में काव्य की धारा बखूबी बह रही है: सुधा ओम ढींगरा

साक्षात्कार: सुधा ओम ढींगरा से योगेन्द्र सिंह की संक्षिप्त वार्ता
योगेन्द्र सिंह
योगेन्द्र सिंह: कृपया अपने जीवनवृत्त के बारे में बताइये।
सुधा ओम ढींगरा: मेरा जन्म 7 सितम्बर 1959 को जालंधर, पंजाब में हुआ था। मेरे पिता स्वर्गीय इंद्रजीत शर्मा और माता स्वर्गीय शशिबाला दोनों ही चिकित्सिक थे। मेरे पिता डॉ. इंद्रजीत शर्मा और भाई डॉ. दिनेश शर्मा दोनों ही उर्दू और पंजाबी के शायर थे। हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वर्गीय उपेन्द्रनाथ अश्क मेरे ताऊ जी और आलोचक नीलाभ मेरे भाई थे। इस तरह मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि चिकित्सा के साथ-साथ साहित्यिक भी रही है।

योगेन्द्र सिंह: आप भारत से अमेरिका कब और क्यों गईं? कृपया संक्षेप में बताइये।
सुधा ओम ढींगरा: मैं विवाह उपरांत 9 अप्रैल 1982 में अमेरिका आई। पति पहले से अमेरिका में थे।

योगेन्द्र सिंह: आपके अमेरिका जाने और वहाँ बसने का अनुभव कैसा रहा है?
सुधा ओम ढींगरा: पहले पहल तो नए देश, नए परिवेश और अजनबी लोगों में आकर जो जिज्ञासु मन की स्थिति होती है, वही मेरी हुई। अब तो कर्मभूमि और जन्मभूमि दोनों प्रिय हैं। इस देश में रहते हुए बहुत समय हो गया है। भारत में कम समय रही हूँ, यहाँ रहते अधिक समय हो गया है।

सुधा ओम ढींगरा
योगेन्द्र सिंह: अमेरिका प्रवास के समय वहाँ आपको भारत, भारतीय भाषाओं और भारतीय संस्कृति किस रूप में और कैसे मिली?
सुधा ओम ढींगरा: 1982 में जब मैं अमेरिका आई, तो यहाँ बहुत कम भारतीय थे। भारतीय भाषाएँ तो तब भी और आज भी विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती हैं। भारतीय कम हों या अधिक अपनी सभ्यता की पोटली और संस्कृति का आचार तो साथ बाँध ही लाते हैं।

योगेन्द्र सिंह: आज हम देख रहे हैं कि अमेरिका में प्रवासी भारतीय डायस्पोरा निरंतर अपनी नई पहचान निर्मित कर रहा है। आपकी नजर में यह विस्तार क्या केवल उन प्रवासियों तक सीमित है अथवा उनके इस विस्तार में भारतीय संस्कृति का भी विस्तार हो रहा है।
सुधा ओम ढींगरा: योगेंद्र सिंह जी, प्रवासी भारतीय डायस्पोरा का विस्तार और उसकी नई पहचान सिर्फ एक पक्ष या एक पहलू को लेकर नहीं हुई, पूरी तरह से इसका निर्माण और विस्तार हुआ है। यहाँ के भारतीयों से संस्कृति अलग ही कब होती है। मैं तो अक्सर कहती हूँ कि आने वाली पीढ़ी जब अपनी संस्कृति के अवशेष ढूँढना चाहेगी तो उसे विदेशों में आना पड़ेगा।

योगेन्द्र सिंह: आज अमेरिका में रचे जा रहे प्रवासी हिंदी साहित्य ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अमेरिका में हिंदी साहित्य के उद्भव और विकास यात्रा के विषय में संक्षेप में बताइए?
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिका में हिंदी साहित्य का उद्भव 1960 के दशक में सोमा वीरा, सुनीता जैन और उषा प्रियंवदा से माना जाता है। उसके बाद डॉक्टर वेदप्रकाश वटुक, कमला दत्त इत्यादि के नाम जुड़े। 1970 के दशक में सुषम बेदी का नाम सामने आया और 80 के दशक में अनिल प्रभा कुमार, सुदर्शन प्रियदर्शिनी और सुधा ओम ढींगरा लेखन में उतरीं। 1990 के दशक में अमरेंद्र कुमार और इला प्रसाद के नाम सामने आए। गद्य और पद्य दोनों में अनगिनत रचनाकार हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं पर मैंने प्रमुख लेखकों के नाम लिए हैं। 1960 के दशक से अमेरिका में हिंदी साहित्य का उद्भव माना जाता है और अब तक इसका निरंतर विकास हो रहा है।

योगेन्द्र सिंह: अमेरिका में हिंदी एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार से जुड़े प्रमुख व्यक्ति, संस्थाएँ कौन सी हैं? संक्षेप में बताइए।
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिका के हर शहर, हर प्रदेश में हिंदी एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए संस्थाएँ बनी हुई हैं और वे इस कार्य को बड़ी लग्न से कर रही हैं। किसी एक व्यक्ति और संस्था का नाम नहीं लिया जा सकता। हाँ अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति अमेरिका की सबसे पुरानी संस्था है,जिसकी शाखाएँ अमेरिका के तकरीबन हर प्रदेश के और हर शहर में हैं। यही संस्था पूरे अमेरिका और कैनेडा में कवि सम्मेलन करवाती है जिससे यह विधा अमेरिका वासियों में जिंदा है और बहुत लोकप्रिय है। जिससे जुटाए धन से विश्वविद्यालयों तथा स्कूलों तक हिंदी ले जाने में इस संस्था का बहुत बड़ा योगदान है। संस्था के संस्थापक है स्वर्गीय कुँवर चंद्र प्रकाश और अब उनके बेटे डॉक्टर रवि प्रकाश सिंह इसे सँभाल रहे हैं।

योगेन्द्र सिंह: अमेरिका से प्रकाशित होने वाली हिंदी पत्रिकाओं और उनके संपादकों के विषय में बतलाइए।
सुधा ओम ढींगरा: इस समय अमेरिका से सिर्फ दो पत्रिकाएँ* प्रकाशित हो रही हैं। एक विश्वा दूसरे 'विभोम-स्वर'। विश्वा अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति, अमेरिका की पत्रिका है और विभोम-स्वर ढींगरा फैमिली फाउन्डेशन, अमेरिका की पत्रिका है। विभोम-स्वर भारत और अमेरिका दोनों जगह से प्रकाशित होती है। विश्वा के संपादक हैं- रमेश जोशी और विभोम-स्वर की मुख्य संपादक हैं- सुधा ओम ढींगरा।

*सम्पादकीय टिप्पणी: सुधा जी द्वारा "अमेरिका से सिर्फ दो पत्रिकाएँ प्रकाशित" कहना एक तथ्यात्मक त्रुटि है। सेतु सम्पादन मण्डल यह स्पष्ट करना चाहता है कि विश्वा के अतिरिक्त वैश्विक पहुँच वाली हिंदी की अग्रणी मासिक पत्रिक सेतु अमेरिका के पिट्सबर्ग नगर से प्रकाशित होती है। इसके अतिरिक्त विश्व हिंदी न्यास की पत्रिका हिंदी जगत, विश्व हिंदी ज्योति की पत्रिका हिन्दी कौस्तुभ, विश्व हिंदी समिति की पत्रिका सौरभ, व हिंदी क्लब ऑफ़ इलिनॉय की पत्रिका दृष्टि सहित कई हिंदी पत्रिकाएँ इस समय अमेरिका की भूमि से प्रकाशित हो रही हैं। अमेरिका से प्रकाशित पत्रिकाओं में प्रसिद्ध हिंदी व अंग्रेज़ी लेखिका मुक्ता सिंह ज़ॉक्की द्वारा सम्पादित ई-कल्पना शायद अकेली ऐसी पत्रिका है जो अपने लेखकों को मानदेय देती रही है। साहित्यिक अभिरुचि वाली पत्रिकाओं के अलावा संयुक्त राष्ट्र समाचार, अमेरिका की धरती से हिंदी में प्रकाशित होने वाला एक प्रमुख हस्ताक्षर है। यदि आपको अमेरिका से प्रकाशित होने वाली किसी अन्य पत्रिका की जानकारी है तो कृपया अपनी बहमूल्य टिप्पणी अवश्य दें। 

विभोम स्वर
योगेन्द्र सिंह:
आप अमेरिकी प्रवासी हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं से जुड़ी रही हैं। इनमें से आप किस विधा को अमेरिकी हिंदी साहित्य की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा मानती हैं?
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिकी प्रवासी हिंदी साहित्य में सभी विधाएँ लोकप्रिय हैं। हर विधा के लेखक यहाँ पाए जाते हैं और हिंदी साहित्य में उनका योगदान है।

योगेन्द्र सिंह: आपके लेखन की शुरुआत कैसे और कब हुई? कृपया अपने लेखन की रचनात्मक मनोभूमि के विषय में बतलाइये?
सुधा ओम ढींगरा: एक साहित्यिक परिवार में जन्म हुआ। मेरे मम्मी, पापा और भैया डॉक्टर थे। तीनों ही साहित्य प्रेमी भी थे। घर में बहुत बड़ी लाइब्रेरी थी। सबको पढ़ने का बेइंतिहा शौक था। पापा पंजाबी के शायर थे और भैया उर्दू के। हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी की पुस्तकों की भरमार थी। पढ़ने-लिखने पर कोई रोक-टोक नहीं थी। इस तरह एक साहित्यिक पृष्ठभूमि में मेरी आँख खुली। पोलियो सर्वाइवर हूँ, इसलिए 12 साल तक घर में ही शिक्षा हुई। उसके बाद स्कूल, कॉलेज गई। 1982 में शादी के बाद अमेरिका आ गई। यहाँ आकर फिर पढ़ाई की और फैमिली काउंसलर बनी। बचपन में मैं खेल नहीं पाई तो माँ-बाप ने हाथ में ब्रश, रंग, पेन और कागज दे दिए। पर आगे चल कर कलम और कागजों ने मुझे चुन लिया जो आज तक साथ निभा रहे हैं। बहुत सकारात्मक सोच वाला परिवार था मेरा। बचपन में खेल नहीं पाई तो मेरी ऊर्जा को उन्होंने कला और रचनात्मक कार्यों की ओर लगा दिया, ताकि शारीरिक कमजोरी मेरे भीतर कोई कुंठा या ग्रंथि ना पैदा कर दे। छोटी उम्र में ही मैं अखबारों में बच्चों के पृष्ठों पर छपने लगी थीं। उस समय की अखबारों में साहित्यिक संस्करण, बच्चों का संस्करण, महिला परिशिष्ट यानी हर रोज कुछ नया होता था। पाँच वर्ष की उम्र से मैं आकाशवाणी जालंधर से जुड़ गई थी। बच्चों के प्रोग्राम से शुरू होकर युवावाणी और फिर नाटकों की कलाकार शादी होने तक रही।

इसी तरह अखबारों की दुनिया में बच्चों के पृष्ठों से शुरू हुआ सफर किशोरावस्था से युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते पंजाब केसरी की पत्रकार बनने पर समाप्त हुआ। पढ़ाई के साथ-साथ मैं पंजाब केसरी के लिए इंटरव्यू लेती थी और डोमेस्टिक कोर्ट केसों की कवरेज करती थी। रंगमंच की दुनिया से भी मैं उन्हीं दिनों जुड़ गई थी। कब कहानी लिखनी शुरू की मुझे पता ही नहीं चला और एक उपन्यास 'और गंगा बहती रही' उन्हीं दिनों लिखा था जो पंजाब केसरी में धारावाहिक छपा था। बस यही मेरी साहित्यिक पृष्ठभूमि है, रचनात्मक मनोभूमि है।

योगेन्द्र सिंह: आपने गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में साहित्य सृजन किया है आपकी लोकप्रिय विधा कौन सी है?
सुधा ओम ढींगरा: मैं हर विधा में सहज रहती हूँ। हाँ, मुझे कहानी लिखना और साक्षात्कार लेना बहुत अच्छा लगता है।

योगेन्द्र सिंह: अमेरिकी प्रवासी हिंदी काव्य धारा को आप किस रूप में देखती हैं? इसके विस्तार और विकास की क्या संभावनाएँ हैं?
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिकी प्रवासी हिंदी काव्य धारा निर्बाध रूप से बह रही है। निरंतर विकासशील और संभावनाओं से भरपूर है।

योगेन्द्र सिंह: आपकी दृष्टि में अमेरिकी प्रवासी हिंदी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर कौन-कौन से हैं? कृपया अपने समकालीन अमेरिकी प्रवासी कवियों और उनके लेखन के वैशिष्ट्य के विषय में बतलाइएँ।
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिका में गद्य की अपेक्षा पद्य के रचनाकार अधिक हैं। काव्य की धारा बखूबी से बह रही है। शशि पाधा की कविताओं में छायावाद की झलक मिलती है तो रचना श्रीवास्तव की कविताएँ छंद मुक्त और हाइकु प्रधान हैं। देवी नागरानी और धनंजय कुमार को गजल प्रिय है और राकेश खण्डेलवाल को छंद। अनिल प्रभा कुमार, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, रेखा भाटिया, नीलू गुप्ता, रेखा राजवंशी गुप्ता, इला प्रसाद, अनीता कपूर, अभिनव शुक्ल की कविताएँ सामाजिक सरोकारों से भरपूर हैं। अमेरिका के हर शहर में कवि तो अनगिनत हैं। मैंने विशिष्ट कवियों का ही नाम लिया है।

योगेन्द्र सिंह: वर्तमान समय में आप अमेरिका में हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति को किस रूप में देख रही है?
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिका के हिंदी साहित्य ने साहित्य की मुख्यधारा में अपना स्थान बना लिया है। जैसा कि मैं पहले कह चुकी हूँ, संस्कृति के अवशेष ढूँढ़ने अगामी पीढ़ी को अमेरिका आना पड़ेगा।

योगेन्द्र सिंह: अमेरिका में हिंदी साहित्य की विस्तार यात्रा को आप किस रूप में देखती हैं? क्या आप इस साहित्यिक विस्तार को हिंदी जातीयता के विस्तार से भी जुड़ा हुआ पाती हैं?
सुधा ओम ढींगरा: अमेरिका में साहित्य किसी वाद, गुट या विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं लिखा जाता। हर रचनाकार स्वतंत्र विचारधारा से लिखता है।
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योगेन्द्र सिंह
शोधार्थी, हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ
ईमेल: yogendrasin77@gmail.com
चलभाष: +91 983 712 7252


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