कन्हैया त्रिपाठी की पाँच कविताएँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
बहुत भयावह है 
 
युद्ध धीरे-धीरे आता है
कुछ मतभेद, कुछ मतभेद और
कुछ लालच, की डोर पकड़ आ जाता है युद्ध।

युद्ध आता है तो
पाण्डवों से बचते हैं छह, कौरवों से कुछेक
कुछ वे बचते हैं, जो नहीं लड़ते युद्ध।

युद्ध धीरे-धीरे आता है 
सब नष्ट करके युद्ध, शांति नहीं बनता 
युद्ध कभी न कभी फिर बन आता है युद्ध।

युद्ध मारता है 
युद्धरत सैनिकों को, छद्म को, जन को  
युद्ध नहीं मार पाता तो केवल एक नया युद्ध 

युद्ध धीरे धीरे आता है 
युद्ध भोजन नहीं करता, सभ्यता और संस्कृति 
लील जाने का दम रखता है युद्ध। 
***


युद्ध बीच फँसे मासूम

अभी जन्मे,
वे दूध पीते बच्चे,
खिलौनों से खेल रहे बच्चे,
विद्यालयों में पढ़ रहे बच्चे 
पिता को ऊँट पीठ पर बैठे खेल रहे बच्चे 
नहीं जानते वे कहाँ फँस गए।

माँ-पिता की व्याकुल चेहरे पढ़कर
अपने छोटे या बड़े-भाई-बहनों की 
डबडबाई बेचैन आँखें देखकर 
सबकी अफरातफरी के बीच मुस्कराते
बच्चे खेलना चाहते हैं।

सभी सामानों को सुरक्षित बांधकर 
अपने परिजनों के पीठ पर बांधे हुए बच्चे
नहीं समझ पा रहे हैं कुछ भी क्योंकि
नहीं जानते वे कहाँ फँस गए।

मीलों रास्ते तय करके  
भूखे प्यासे बच्चे, अबोल और कुछ 
समझदार बच्चे, नहीं जानते क्या हो होने वाला है 
वे अव्यक्त से, सोचते जरूर होंगे कि 
नहीं जानते वे कहाँ फँस गए।

माँ-पिता-भाई-बहनों के चीखकर
रोने की आवाज़ सुन, रोने जैसा मुह बनाते बच्चे 
नहीं जानते युद्ध क्या होता है
नहीं जानते वे कि कहाँ फँस गए।

क्या है युद्ध की क्रूरता, उद्देश्य और प्राप्ति
नहीं जानते मासूम बच्चे 
नहीं जानते वे कि कहाँ फँस गए।
***


युद्ध और सकपकाई लड़कियाँ 

युद्ध शुरू होने से पहले
युद्ध शुरू होने के बाद 
जारी युद्ध से युद्ध करती लड़कियाँ 
नहीं जानती कि यह घना अँधेरा, 
उनके लिए कितना भयावह है?

उस लड़की की छटपटाहट यह है- 
जो लड़कियाँ सुरक्षित निकल रही  थीं 
उन्हें दुश्मन देश के सैनिकों के पकड़ लिया
पुरुष भी साथ थे, उन्हें छोड़ दिया 
केवल ले गए लड़कियाँ।

उस लड़की की छटपटाहट यह है-
बहुत बदतमीजी की गई उन लड़कियों के साथ 
पुरुषों को मारकर खदेड़ दिया, 
छुड़ाती लड़कियों को पीटते-चिल्लाते स्वघोषित योद्धा,
दुश्मन देश के सैनिक उनके साथ क्या करेंगे?

उस लड़की की छटपटाहट यह है-
बंकरों में छिपी हम लड़कियाँ,
अपनी माँ की छाती से चिपकी लड़कियाँ,  
उनके बारे में जानेंगी कैसे, कुछ भी 
सहेजेंगी अब कैसे अपना जीवन?

युद्धरत इंसानों के बीच, निःशब्द हैं 
सकपकाई लड़कियाँ।
***


युद्ध के बाद क्या?

आसमान का रंग अपना है,
उसे स्याह-सुर्ख रंग देने वाले 
उसे बदरंग करने वाले यह नहीं जानते 
अपनी हठ से विषैला बना रहे हैं।

पृथ्वी की अपनी शांति है,
उसकी जमीं पर युद्ध से क्रांति लाने वाले 
उसे बेचैन बनाने वाले यह नहीं जानते 
उनकी नस्लें उन्हें धिक्कारेंगी।

प्रकृति की अपनी निरंतरता है
बारूद और परमाण्विक क्षति पहुँचाने वाले
उसे अस्थिर करने वाले यह नहीं जानते 
उन पर उनकी क्रूरता महंगी पड़ेगी 

उन्हें जिस आधिपत्य की जल्दी है
वे ठहरकर पूछें तो
युद्ध के बाद क्या?
***


उचित और अनुचित के बीच  

मतदान करना, 
सही चयन करना भी 
युद्ध है।

3 comments :

  1. Dr. Vishnu Balkrushna WahatuleMarch 2, 2022 at 8:04 AM

    Very nice poem sir

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  2. You are all rounder and extra ordinary...Regards...

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