अहिंसा एवं व्रत

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

‘व्रत’ शब्द के विभिन्न अर्थ हैं। हम उन अर्थों में न जाएँ लेकिन सनातन सभ्यता में नाना प्रकार के जीवन जीने की पद्धतियाँ हैं। सत्यनिष्ठ एवं अनुशासित जीवन पद्धतियों को सदाचार कहा गया। अनुशासन सद-प्रवृत्तियों, अच्छे आचरण और संयम से आता है। सद-प्रवृत्तियाँ हमारे अपने वातावरण, संगति और सीख से उद्भूत होती हैं। यह सब निरंतर गतिशील जीवनधारा में सम्मिलित रहे हैं। हम अपने पूर्वजों से प्रेरणा लेते हैं। बड़ों से सीखते हैं। गुरु से सीखते हैं। यह सीखने की प्रवृत्तियाँ सनातन हैं। 
सीखना, जानना, और व्यवहार में लाना भी व्रत है। व्रत मनुष्य के आभूषण हैं। आत्म के परिष्कार के शुद्ध माध्यम हैं। व्रत से व्यक्ति, व्यक्ति-मनुष्य और समष्टिगत सोच को अपने भीतर प्रतिष्ठापित करता है। यह सब यदि जीवन का हिस्सा नहीं है तो मनुष्य-जीवन ही व्यर्थ है। यह सब कुछ निःसंदेह विद्या और तप से कोई भी प्राप्त कर सकता है। व्रती व्यक्ति ही तप करता है। विद्या अर्जित करता है। ज्ञान प्राप्त करता है। प्रज्ञावान होता है। संस्कृत में एक श्लोक है-
येषां न विद्या, न तपो, न दानं,
ज्ञानं न शीलं, न गुणो न धर्मः।
ते मृत्यु लोके भुविभारभूता,
मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति।।

अर्थात  जिस मनुष्य के पास न विद्या है, न तप है, न दान देने की प्रवृत्ति है। जिसके पास न ज्ञान है, न शील है, न तो कोई  गुण है और न धर्म है, वे लोग इस मृत्यु लोक में पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में होकर भी भार समान पशुवत विचरण करते हैं। प्रज्ञावान लोग ऐसे आचरण नहीं करते जो पशुवत आचरण कहलाए।

व्रती कोई हो सकता है। आस्था से व्रत रखना और संकल्प के साथ व्रत रखना, इन दोनों में विद्वान अंतर करते हैं। आस्था से व्रत रखने वाले तो व्रत करते हैं, पर उसके लाभ-हानि के प्रति भी उतना ही अज्ञानी होते हैं, जितना वह किसी व्रत को करने को लेकर अज्ञानी हैं। उन्हें तो बस व्रत करना है, इसलिए करते हैं व्रत। प्रज्ञाशील व्यक्ति अपने किसी भी संकल्प को यदि व्रत में ढालता है तो अनुशासित होकर व्रत की मर्यादा को पूर्ण करता है। ऐसा व्रत करने वाला व्रत करने से पूर्व और पश्चात् दोनों समय-काल में व्रत के दौरान निर्वहन किये गए आचरण को जीवन का अंग बना लेता है। वह व्रत से भयरहित हो जाता है।

जैन परम्पराएँ (प्रायश्चित व्रत) हों या भारत की अन्य सिख और हिन्दू परम्परा (महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज द्वारा प्रसिद्ध व्रतकोश में १६२२ व्रतों की बात की गई है) उनके लिए व्रत की महत्ता जीवन-मूल्यों से जुड़ी होती है। यह इस लिए होता है क्योंकि संस्कार में ही हमारी पूर्ववर्ती पीढ़ियाँ हमें यह सब सिखाती रही हैं। विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि बनने के लिए या राजा हरिश्चंद्र को सत्य पर खरा उतरने के लिए जो व्रत धारण किया गया, और जो आचरण निभाया गया, उसकी पृष्ठभूमि में जो कथाएँ हैं, वह कदाचित दुनिया के किसी दूसरे भूभाग में मिलें। इसलिए भारत को पुण्य-भूमि कहा गया है और व्रत को यहाँ पर अनुष्ठान के रूप में न लेकर अनुशासन के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। एक ऐसा अनुशासन जिसमें चेतना और निर्विकार होकर सद-चिद-आनंद की खोज करने लगती है। इसलिए हमने व्रत को योग के रूप में देखा है। सच्चिदानंद की अनुभूति प्रेम की अनुभूति है। प्रेम ही तो अहिंसा है। यानी हमारे जितने व्रत हैं, वे अहिंसा पर आश्रित हैं।

व्रत को लोगों ने पेशे के साथ भी जोड़ा। व्रत को लोगों ने मजाक के तौर पर भी आजमाना शुरू किया। व्रत को लोग किसी जाति-पंथ से भी जोड़कर उसका उपहास करने लगे। व्रत को एक खास जाति का षड्यंत्र भी बताया गया। किन्तु व्रत तो अर्जुन की गांडीव पर भी परखा गया। सीता की अग्निपरीक्षा में भी परखा गया। कृष्ण और विदुर के प्रेम में भी व्रत को खोजा गया। यह व्रत गीता में भी उद्धृत हुआ। और भीष्म-प्रतिज्ञा में भी। कर्ण के दान में भी और मैत्री संधि में व्रत को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्यापित किया गया। महाभारत के ‘दान पर्व’ में अनेक व्रत बताए गए हैं। भगवान परशुराम के अपने व्रत थे तो चाणक्य के अपने। सबके व्रत के अपने-अपने निहितार्थ रहे हैं। किन्तु व्रत एक वैज्ञानिक शक्ति है। वह किसी भी प्रयोगशाला में भी तभी सिद्ध हुआ जब उद्देश्य और संकल्प साथ रहे। कोई भी अनुसंधान या सिद्धि बिना व्रत के पूर्ण नहीं हो सका। इसलिए व्रत मनुष्य के भीतर छुपी शक्ति के लिए ऊर्जा है। इसे प्रतीकों और मुहावरों में नहीं समझा जा सकता बल्कि जीवन-व्यवहार में लाकर जीवन को अलंकृत किया जा सकता है।

इसमें दो विषय को प्रायः अनदेखा करके व्रत धारण कर लिया जाता है- एक, स्वयंभू बनने की अभिलाषा और दूसरा श्रेष्ठ कहलाने की महत्वाकांक्षा। किन्तु अनिष्ट के माध्यम से अनिष्ट संकल्प के साथ किया गया व्रत अनिष्टकारी ही होता है। उसका परिणाम कभी भी सभ्यतामूलक विमर्श में सही नहीं आँका गया। अनिष्ट व्रत के भी बहुत से प्रमाण हैं। युक्रेन और रूस के बीच इन दिनों चल रहा युद्ध इसका बहुत अच्छा उदाहरण है। अपने अनुसार बदलने का हठ व्रत नहीं होता वह तो अनिष्ट होता है। वह विनाशकारी होता है। अशुभ होता है। हिंसा को जन्म देता है। हिंसाएँ युद्ध का रूप ले लेती हैं और युद्ध मनुष्यता ही नहीं वरण पूरी सृष्टि को प्रभावित करते हैं।

इसलिए व्रत किस निमित्त किया गया है, इसका ज्ञान होना आवश्यक है। व्रत का पुण्य तब मिलता है जब उसे अनिष्ट मन, भाव या वृत्ति से नहीं किया गया हो। व्रत से भाग्योदय भी तभी होते हैं जब शुभ सोच द्वारा व्रत किए जाएँ और उसका उद्देश्य शुभ ही हों। यज्ञ आदि के लिए भी किए गए व्रत यदि सात्विक भाव से किए जाएँ, उसमें प्रकृति, नभ और पृथ्वी के साथ ब्रह्माण्ड के लाभ हों तो वह व्रत अहिंसक-व्रत होता है। हमारे यहाँ इसीलिए व्रत करने वाले को सार्वभौमिक स्वरूप में स्वीकार किया गया। यानी ऋषि-महर्षि और देवी-देवता इन्हें सार्वभौम के कल्याणकारक के रूप में माना गया। उनके व्रतों को भी इसीलिए पुनीत भाव से अंगीकृत किया गया।

भारत में व्रत-त्यौहार के पूरे वर्ष अनुष्ठान हैं। अब चैत्रमास में नवरात्रि के व्रत शुरू हो रहे हैं। इसी प्रकार के नवरात्रि के दो बार अनुष्ठान और व्रत हमारे आध्यात्मिक लोग करते हैं। ऐसे अनेक व्रत हैं भारत में। इसे हम मनुष्यता की दीर्घकालीन जीवन की उपस्थिति के रूप में देखते हैं। यह माना जाता है कि भारतीय व्रत और त्यौहार हमारे सुदीर्घ सभ्यता के वाहक हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जितने भी रूढ़िवादी व्रत हैं, उसे भी उन्हीं श्रेणी में रखकर देखें जिनसे भला नहीं होने वाला है। इसलिए उचित और अनुचित के भी प्रश्न स्वयं से करने हैं और अपने मन और निष्ठा को किसी के अधीन नहीं होने देना है। सत्य के अधीन हुआ मन, अनुशासन के अधीन हुआ वचन और प्रेम एवं अहिंसा के अधीन हुआ हमारा व्यवहार-आचार-विचार-बर्ताव हमारे सच्चे भविष्य के व्रत की कसौटी हैं। इससे हमारा कल्याण होगा। इससे हमारी सभ्यता में निखारेगी और हम आने वाली पीढ़ी के लिए प्रज्ञावान समय सौंप सकेंगे।

किसी भी राष्ट्र का उत्थान तभी होता है जहाँ दृढ़-प्रतिज्ञ मनीषी पैदा होते हैं। किसी भी भूभाग की धरती उर्वर तभी होती है जब वहाँ के मनीषी दृढ़-प्रतिज्ञ होकर अपनी जन्मभूमि के लिए कार्य करते हैं। इतिहास भी उन्हीं का यशोगान करता है जिस भूभाग के लोग दृढ़-व्रती होकर कुछ अनूठा कर जाते हैं। इसलिए हमारे लिए सौभाग्य क्या है, और दुर्भाग्य क्या है, इसको समझते हुए व्रती बनने की आवश्यकता है और आवश्यकता यह है कि हम समय के साथ पूरे मनोयोग से व्रत धारण करके अपनी उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ें। शुद्ध मन से व्रत धारण कर अहिंसा की प्रतिष्ठा से निःसंदेह हम उस उन्नतिशील समय की संकल्पना कर सकते हैं जिसमें हम अधिकतम के सुख की कभी-कभी कामना करते हैं।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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