बांग्ला कहानी: एक मिठास भरी मुहिम

विकास प्रकाश जोशी
लेखक: विकास प्रकाश जोशी
अनुवाद: राजश्री अग्रवाल


"खोका, हम कोलकाता चल रहें हैं, तैयारी कोरो," शरारती सी मुस्कान के साथ माँ ने रोशन से कहा।

उस रात खाना खाते समय माँ की यह बात सुनकर रोशन ख़ुशी से उछल पड़ा। वह हमेशा कोलकाता जाने की राह देखता था। हर साल नवंबर में जब स्कूल की जाड़े की छुट्टियाँ होती थीं तब परांजपे परिवार पुणे में अपने घर से वहीं चला जाता था। इस यात्रा का रोशन परांजपे को हमेशा इंतज़ार रहता था क्योंकि उसे अपने नाना-नानी से मिलने, स्वादिष्ट बंगाली भोजन करने और रंगीन कोलकाता नगरी घूमने का मौका मिल जाता था।

अगले कुछ दिन छमाही परीक्षाओं में और शामें पैकिंग की गहमागहमी में निकल गए। पूरे घर को साफ़ करके बंद कर दिया गया। और एक सुहानी सी शाम को उन्होंने पुणे स्टेशन से ट्रेन पकड़ी और कोलकाता के लिए चल पड़े। वे हावड़ा रेलवे स्टेशन पर उतरे और ढाकुरिया झील के पास उसके नाना-नानी के घर पहुँचे। अपने मौसेरे भाई-बहन शौरादीप और सुदक्षिणा को भी वहाँ पाकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

राजश्री अग्रवाल
सुबह उसने देखा कि नीलांजना माशी और दीदीमाँ के साथ उनकी घरेलू सहायिका रसोईघर में काम में जुटी थीं और रसगुल्ले, संदेश, चमचम और लांचा बनाकर उनके ढेर लगा रही थीं। रोशन के मुँह में पानी आ गया। मुँह में लेते ही पिघल जाने वाले, चाशनी में डूबे रसगुल्ले, रेशमी मुलायम संदेश, सुनहरे चमचम और मिष्टी दोई - इतनी मिठाइयाँ तो भूखे हाथियों के एक परिवार का पेट भरने के लिए भी काफ़ी थीं।

रोशन ने एक योजना बनाई। उसने सोचा कि इससे पहले कि शौरादीप और सुदक्षिणा सारी मिठाइयाँ हड़प लें, उसे कुछ करना पड़ेगा। 

उस दिन उसने बाबा, अपने भाई-बहन शौरादीप और सुदक्षिणा, मेशोमोशाय और नीलांजना माशी के साथ मज़ेदार कोलकाता दर्शन किया- साइंस सिटी, दक्षिणेश्वर, काली बाड़ी, विक्टोरिया मेमोरियल, चिडियाघर और पार्क स्ट्रीट। जब वे वापस घर पहुंचे तब तक दिन ढल चुका था। स्नान करके रोशन ने थोड़ा आराम किया। टेबल पर रखे खाने को देखकर उसने सोच लिया कि उसे तो कुछ हल्का - फ़ुल्का ही खाना होगा।

खाने के दौरान ही उसने अपनी योजना को अंजाम देना शुरू कर दिया। उसने ऐलान किया कि वह ज़्यादा नहीं खाएगा। यह सुनकर सब उससे सहानुभूति जताने लगे, बिलकुल उसकी उम्मीद के मुताबिक।

"बेचारा बच्चा, सारा दिन धूप में घूमता रहा...," माशी ने कहा, "एक पैरासिटामोल ले लो।"

रोशन ने, विश्वास दिलाने की उम्मीद से, सिर हिलाकर हामी भरी।

"सिरदर्द ?"

"नहीं, सिरदर्द नहीं है। ऊँ... अर्... मतलब, हाँ थोड़ा... थोड़ा सिरदर्द है। मैं थोड़ा सा ही खाऊँगा," उसने वादा किया। ज़रा सा खा लेने से किसी को शक नहीं होगा।

सब चिंतित थे। केवल बाबा ने ही भौंहें सिकोड़कर उसे देखाl "दोपहर में तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई, जब तुम मुग़लई पराठे और चिकन चॉप ऐसे खाए जा रहे थे जैसे कि पुणे में हम तुम्हें भूखा ही रखते हैं," उन्होंने चुटकी ली। रोशन जानता था कि उसे कुछ तो खाना ही पड़ेगा ताकि बाबा और माँ को ज़्यादा चिंता न हो।

भोजन के समय जल्दी-जल्दी थोड़े से चावल और घुगनी निगलकर रोशन बंकबेड पर चढ़ गया। उसने कोल बालिश लिया और उसपर अपना सिर टेका। अब जगे रहना ज़रूरी था; वह छत की ओर ताकने लगा। डिब्बे में रखी मिठाइयों के बारे में सोचते हुए उसके मुँह में पानी भर आया।

रोशन बिस्तर में लेटे हुए छत की ओर देख रहा था और बड़ी मुश्किल से जगे रहने की कोशिश कर रहा था।

अचानक उसके कान खड़े हो गएI

धीरे-धीरे घर में आवाज़ें कम हो गईं और सब सोने के लिए जाने लगे।

देर रात तक चलने वाले बंगाली धारावाहिकों और राजनैतिक चर्चाओं की आवाज़ें भी सुनाई देना बंद हो गईं।

यही मौका था!

अपना साहस बटोरते हुए, उसने याद किया कि स्टेनलेस स्टील वाला डिब्बा फ्रिज में था। उसकी आँखों के सामने रसगुल्ले घूम रहे थे, वह बिस्तर में कैद कैसे रह सकता था! बंक बैड का सहारा लेते हुए वह हल्के कदमों से नीचे उतरा। पहले तो उसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था।

उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि उसकी आँखें अंधेरे की आदी नहीं हो रही थीं। यह उसकी कल्पना थी या अंधेरा सामान्य से ज़्यादा गहरा था? कुछ देर के लिए वह रुक गया लेकिन आख़िर में उसने निश्चय किया कि उसे आगे बढ़ना ही पड़ेगा।

रोशन ने अपनी आँखें मलीं और एक पल के लिए उसने सोचा कि क्या उसे रुक जाना चाहिए? लेकिन जब शौरादीप के खर्राटों की आवाज़ सुनी तो उसे लगा कि अभी नहीं तो कभी नहीं।

बेइंतेहा इंतज़ार करने के बाद आख़िर उसे चीज़ों का आकार थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा; बस इतना कि पता चल जाए कि वे क्या हैं।

वह अच्छी तरह से जानता था कि रसोईघर कहाँ है और उसके कमरे से वहाँ कैसे पहुँचना है। एक-एक इंच रेंगता हुआ वह कमरे के दरवाज़े से रसोईघर तक और आख़िर फ्रिज तक पहुँच गया।

उसने डिब्बे खोले और उनमें रखी मिठाइयों की दावत उड़ाई, विशेषकर रसगुल्लों और संदेश की। उसे याद भी नहीं रहा कि वह कितने चट कर चुका था लेकिन आख़िरकार उसका पेट फूटने को आ गया।

अब रोशन को बिस्तर तक वापस जाना था। और एक बार फिर, उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अंधेरा अभी भी था, हालांकि उतना गहरा नहीं था। उसने तय किया कि वह अपने चारों हाथ-पैरों के बल रेंगता हुआ वहाँ तक पहुँच जाएगा। वापस जाते समय कमरे के दरवाज़े से उसका सिर भिड़ गया। वह रो ही पड़ता लेकिन उसने अपने होंठ दबा लिए। बहुत धीरे-धीरे लेकिन मुश्किल से वह बंक बेड पर चढ़ा। 

सुबह 'कि आछे?' और 'के कोरलो?' के शोर से उसकी नींद खुली। दबे पाँव चलता हुआ वह कमरे के दरवाज़े तक पहुँचा और रसोईघर में झाँकने के लिए अपने सिर को बाहर निकाला। वैसे भी, जब माँ और माशी बात करते थे तब अपने कानों पर ज़्यादा ज़ोर डालने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।

"किसी ने इतने सारे रसगुल्ले खा लिए! मागो!" माँ ने कहा। नीलांजना माशी ने शक्की नजरों से डिब्बे में गहराई तक ऐसे झाँका मानो गुनहगार उसकी तली में ही मिल जाएगा। दीदीमाँ ने एक-एक करके बाकी डिब्बे भी खोले।

"शोंदेश और चोमचोम भी!" दीदीमाँ ने चिल्लाते हुए कहा। "आख़िर इतना सब खाया किसने?"

"ज़रूर शौरो होगा। इतना पेटू है ना," माँ ने रुखेपन से कहा।

नीलांजना माशी ने नाक भौं सिकोड़ीं लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।

"मैं तो सो रहा था, सच!" शौरादीप ने ज़ोर देकर कहा।

रोशन बहुत ख़ुश था। वह यूँ ही चहलक़दमी करते हुए दाँत साफ करने के लिए वॉश बेसिन की तरफ़ जा रहा था। अचानक माँ खिलखिलाईं।

"रोशन, इधर आना," माँ ने कहा। रोशन आगे बढ़ा।

"नीलांजना दी, हमारे रोशन को देखो।"

सब उसे घूरने लगे और उसी समय एक साथ दबी हुई हँसी हँसने लगे। रोशन की समझ में नहीं आ रहा था कि सब आखिर क्या देख कर हँस रहे हैं।

"खोका, बोलो, कल रात तुमने कितने शोंदेश और रोशोगुल्ले खाए?"

माशी ने बड़े प्यार से पूछा, हर अक्षर को अपने होठों से गोल-गोल घुमाते हुए।

"मैंने कुछ नहीं खाया... सु... कुभक्षणा... शौरादीप ने खाए!" जवाब में केवल हंसी के ठहाके ही सुनाई दिए।

"कहता है, मैंने कुछ नहीं खाया," दीदीमाँ ने हँसकर कहा।

हँसी के ठहाकों के बीच माँ उसे कंधे से पकड़कर खींचते हुए स्नानघर की ओर ले गईं।

"आईने में देखो बच्चे।"

रोशन शर्म से पानी-पानी हो गया।

उसकी पूरी कमीज़ और मुँह पर रसगुल्ले के टुकड़े, मालपुए की चाशनी के दाग़, संदेश और चमचम लगे हुए थे। बिस्तर पर वापस पहुंचने की जल्दी में वह अपने हाथ और मुँह धोना बिलकुल भूल ही गया था।
"अपने पूरे चेहरे पर फैली हुई इन चीज़ों के कारण मैं एकदम मूर्ख बंदर जैसा लग रहा हूँ," अफ़सोस के साथ उसने सोचा।

नाश्ते के तुरंत बाद रोशन के पेट ने तय किया कि पिछली रात रोशन ने बंगाली मिठाइयों की जो भरपूर दावत उड़ाई थी, वह बहुत ज़्यादा हो गई थी। वह शौचालय की ओर भागा और काफ़ी देर तक अंदर ही रहा।

हाँ, शौचालय से निकलकर रोशन से सोचा। बहुत ज़्यादा मिठाइयाँ खाना भी शायद अच्छी बात नहीं है। मगर रसगुल्ले थे बहुत स्वादिष्ट। उसे कोई पछतावा नहीं था। भारतीय बच्चा होने के नाते मिठाइयाँ खाना उसका कर्त्तव्य था और हर भारतीय बच्चे को अपना कर्त्तव्य निभाना चाहिए।

बाबा को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने इसके उजले पहलू की ओर इशारा किया।

रोशन का कंधा थपथपाते हुए, उसे शर्मिंदा करते हुए, उन्होंने कहा, "इसके अच्छे पहलू को देखो रोशन। कम से कम अब तुम्हें यह पता चल गया है कि किसी गुब्बारे में बहुत ज़्यादा हवा भरने से क्या होता है!"
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लेखक परिचय: विकास प्रकाश जोशी
पुणे निवासी विकास प्रकाश जोशी लेखक, संपादक, अनुवादक, सार्वजनिक वक्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं। उन्होंने 17 साल की आयु में नगर के अंग्रेजी अखबार में छोटी कहानियों और एक कॉलम से बच्चों के लिए लिखना आरम्भ किया था। उनकी अंग्रेजी रचनाएँ 29 भाषाओं में अनूदित हुई हैं। बच्चों के लिए उनकी पहली किताब, माई नेम इज सिनामोन शीघ्रप्रकाश्य है।

अनुवादक परिचय: राजश्री अग्रवाल
तीस वर्षों से भाषा के क्षेत्र में काम कर रही राजश्री की रुचि भाषाएँ सीखने-सिखाने में है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषा पर इनकी अच्छी पकड़ है। कला और संस्कृति में भी रुचि रखने वाली राजश्री अपनी जीवनशैली में पर्यावरण हानि को न्यूनतम रखने में प्रयासरत हैं।

1 comment :

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