तीन कविताएँ: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

एक पत्र रामदरश जी के लिए


मैंने गाँव नहीं देखा
पर मैंने आपमें गाँव देखा है रामदरश जी
आपकी बातों की लुनाई और चेहरे पर बनती-मिटती रेखाओं में 
नई-नई शक्लें लेता
और रोज समय के साथ करवटें लेता गाँव।

बहुत हैं जो गाँवों पर लिखते हैं
और तमाम तो झंडाबरार हैं आंचलिकता के सिरमौर भी 
इन दिनों
किसी भारी-भरकम ताज की तरह उसे सिर पर उठाए
चलते हैं चाल बड़ी प्रगल्भ सी

चेहरे पर हमेशा दूसरों से कुछ अलग होने की सुर्खी
उन्हें खासमखास तो बनाती ही है
कभी-कभार ऊँचे तख्तनशीनों के करीब भी पहुँचा देती है

वहाँ गाँव को लेकर पूरा एक गणित है 

ऐसे में दूर कहीं अपनी धूलभरी पगडंडी पर चलते 
नजर आते हैं आप रामदरश जी, 
होंठों में कुछ गुन-सुन सा करते
डूबे-डूबे पुराने गमक भरे दिनों की स्मृतियों में
तो थोड़ा ताज्जुब होता है

कौन साथ आ रहा है कौन नहीं इस सबसे बेपरवाह 
कौन सुर में सुर मिला रहा है और कौन साथ चलते 
एकाएक रास्ता बदल
बेसुरी भीड़ का हिस्सा हो गया—
इस सबको भी परे ठेलकर
मस्ती से बतियाते जा रहे हैं आप गाँव के किसी मामूली राहगीर, 
कि माटी के आखर पढ़ने वाले किसी नवोदित लेखक से 
मुसकराते मंद-मंद,
मुझ सरीखे किसी आत्मीय के कंधे पर धरे हाथ...!

तब एकाएक हवा में घुलने लगती है 
किसी फागुनी गीत की महक
वसंत पेड़ों के पत्तों से अरुणाभ टेसू के फूलों सा
टपकता है...
और फिर देखते ही देखते समय रुक जाता है
और एक ही समय में कितने युग, सदियाँ, मन्वंतर
दस्तक देने लगते हैं भीतर-बाहर...!!

कभी जोरदार ठहाके के साथ हजारी बाबू से रूबरू हैं हम, 
तो कभी मंद-मंद मुसकराते आचार्य शुक्ल चले आते हैं
आपकी बातों में
कभी विश्वनाथ मिश्र सरीखी खुद्दार शख्सियतों के साथ 
पहुँच जाते हैं हम इतिहास के लंबे गलियारों में 
जहाँ घूमने का रोमांच कुछ अलग ही है

यों कभी-कभी साहित्य पथ के उन अधपागल सहचरों से भी 
हो जाती मुलाकात कि जो नामीगरामी न सही
मगर इस ऊबड़खाबड़ रास्ते को अपने लहू और माथे से टपकते 
पसीने से 
जिन्होंने उर्वर बनाया है...

फिर कभी अचानक आ जाते हैं आप ‘हेमंत्स फादर’
कहानी से निकलकर कथानायक हेमंत के साथ-साथ चलते
अपनी खुरदरी शख्सियत के साथ
और सुरगंगा में कभी उदासी कभी खुशी तो कभी आग 
के रंग घुल जाते हैं...
बीच में अचानक पास आकर बैठ जाती हैं सरस्वती जी
दिन भर रसोई और घर में खटने के बाद
माथे का पसीना पोंछ, मुसकराती हुई 
तो सीधी सी कथा-कहानी में तुलसी के बिरवे की सी 
मिठास घुल जाती है।

यों अनवरत चलती है कहानी एक सादा से पुरसुकून 
आदमी की
जो पहले कुछ कदम अकेला चला, फिर साथ मिलता गया दूसरों का
यों कदमों के साथ कदम कुछ और मिल जाते हैं
कुछ और..और आगे...
और एक अकेला चलता आदमी एक काफिला बन जाता है...

उस काफिलों के किसी छोर पर हँसते मुसकराते 
रामविलास नजर आते हैं
तो कभी ऊँचे कद वाले लहीम-शहीम निराला
और कभी लंबी सफेद दाढ़ी के साथ ठहाका लगाते सत्यार्थी
चुटीली मुसकान वाले विष्णु प्रभाकर...
और जिंदगी में जिंदगी नजर आती है

यों होती है हर पल पुनर्नवा यह कहानी...
होते हैं पुनर्नवा आप
और एक नया वसंत आपके और सरस्वती भाभी के
हर नए दिन की शुरुआत पर खिल उठता है...
इस धरती को सच ही वत्सल शस्य श्यामला बनाता!

मैंने आपमें और आपकी कविताओं में पहाचानी है
इस धरती की लुनाई और गंध
जिसे आप थामे हैं अपनी सादगी से
वहीं शायद कोई एक डगर है
जहाँ सारे खोए हुए रास्ते मिल जाएँगे रामदरश जी

और आप और आपकी चुप्पियों में खुल रहे जो आखर 
जिंदगी के
उन्हीं से बनेगी कल की दुनिया और कायमात
और तब समझ में आएगा कि आपका और आपकी कविताओं का होना
हमारे लिए क्या है...

आप जिएँ अभी और-और जिएँ रामदरश जी
पूरे जोश और तरंग में
पूरे करें कमजकम सौ साल
हम सबके लिए सीधी राह चलते एक लेखक की मिसाल बन,
और इस धरती को अपने धूपछाँही शब्दों से कुछ और नर्म, मुलायम
और सुंदर बनाएँ,
अमीन।
***


वहाँ मिलेंगे राही जी


जहाँ प्यार के मोती पलते, वहाँ मिलेंगे राही जी,
सच्चाई के सिक्के चलते, वहाँ मिलेंगे राही जी।
मन के हैं अरमान मचलते, वहाँ मिलेंगे राही जी,
गिर-गिरकर हैं लोग सँभलते, वहाँ मिलेंगे राही जी।

जहाँ फूल ही फूल खिले हैं, वहाँ मिलेंगे राही जी,
धरती औ’ आकाश मिले हैं, वहाँ मिलेंगे राही जी।
नदिया सा यह मन लहराता, वहाँ मिलेंगे राही जी,
मस्ती में बंजारा गाता, वहाँ मिलेंगे राही जी।

जहाँ निराला की कविता से, दिन हैं बड़े निराले से,
गजल सरीखी हैं पर रातें, वहाँ मिलेंगे राही जी,
लिखना भी अब क्या लिखना है, खुद से खुद की बातें हैं,
शब्दों की अविरल बरसातें, वहाँ मिलेंगे राही जी।

जहाँ पार्क में धूम मचाती नटखट बच्चों की टोली,
पोती जी को गोद उठाए, वहाँ मिलेंगे राही जी,
बचपन की घाटी में अब भी कैसा जंतर-मंतर है,
जहाँ गए ये राज बताए, वहाँ मिलेंगे राही जी,

लंचबॉक्स में मम्मी, रखना, ये चीजें, वो-वो चीजें,
जहाँ प्यार से कहता मुन्ना, वहाँ मिलेंगे राही जी,
नाच रही है मीनू, संग-संग नाच रहा उसका गुड्डा,
पहने लंबा एक सुथन्ना, वहाँ मिलेंगे राही जी।

नटखट मन की नई शरारत, और अजूबे ढेरों हैं,
जहाँ मौज बच्चों की हर पल, वहाँ मिलेंगे राही जी,
जहाँ हवाएँ उड़-उड़ जातीं होली के हुलियारों सी,
नदिया बहती चंचल-चंचल, वहाँ मिलेंगे राही जी।

सात रंग के घोड़ों वाला सूरज का रथ दौड़ रहा,
जहाँ कहीं वह थम जाएगा, वहाँ मिलेंगे राही जी,
जहाँ किसी कवि की आँखों से गंगा-जमुना बहती हैं,
भर्राए सुर में गाएगा, वहाँ मिलेंगे राही जी। 

भावुक दिल में अभी-अभी, लो, फूल खिला है बिजली का,
भावों का सत्कार जहाँ है, वहाँ मिलेंगे राही जी,
जहाँ किसी कवि की खुद्दारी पर तुल जाते सिंहासन,
कवियों की सरकार जहाँ है, वहाँ मिलेंगे राही जी।

बड़े-बड़े फन्ने खाँ आकर पानी जहाँ भरा करते हैं,
होरी-धनिया तनकर चलते, वहाँ मिलेंगे राही जी।
एक नए युग की रामायण लिखती है कवि की बानी,
आखर-आखर मोती ढलते, वहाँ मिलेंगे राही जी।

जहाँ प्यार की बस्ती सजती शब्दों की गलबाँही से,
कविता का हर नाज उठाते, वहाँ मिलेंगे राही जी,
गुरबत है, खुद्दारी भी है, जिस कविता की महफिल में,
मित्रों संग कहकहे लगाते, वहाँ मिलेंगे राही जी।
***

शेरजंग जी आए हैं


बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

जहाँ हवाएँ चंचल-चंचल, उस दुनिया से आए हैं,
गंगा जल से भी जो निर्मल, उस दुनिया से आए हैं,
खुशबू से भी कोमल-कोमल, उस दुनिया से आए हैं,
एक नई दुनिया में रहकर सीख बहुत कुछ आए हैं।

एक बड़ा सा बैग हाथ में, जाने क्या-क्या लाए हैं,
शायद उस दुनिया की कुछ सौगातें भी ले आए हैं।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

लट्टू नाच रहा तो संग-संग नाच रहा है उनका मन,
लो, पतंग उड़ चली साथ ही उड़ता है उनका बचपन,
टीचर बनकर पढ़ा रही है गुड़िया उनकी कविता में,
खिड़की में से झाँक रही है चिड़िया उनकी कविता में।

एक नटखट सी हँसी छिपी है, उनकी चंचल आँखों में,
कविता अभी लिखी है ताजा, उसे सुनाने आए हैं,
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

ईंट-ईंट पर रखकर कैसे बनती जातीं दीवारें,
उठा आदमी, तो वक्तों की बदल दिया करता धारें,
शब्दों की ताकत के आगे, थम जाती हैं तलवारें,
शब्दों की ताकत के आगे, बेदम होतीं फुफकारें।

जीवन तो मस्ती है, मस्ती के बिन जीना क्या जीना,
एक खेल है यह जीवन भी, यही सिखाने आए हैं,
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

बड़े पुराने से लगते ये बापू के तीनों बंदर,
बदल गई रफ्तार समय की, बदल न पाए ये बंदर,
अहंकार ताकत वालों का, देखा हमने चुप रहकर,
तो बोलो, क्या नहीं घुटेगा दिल अपना अंदर-अंदर?

नहीं समय के साथ चले तो झूठे हैं सारे आदर्श,
नए समय के बदले-बदले, पाठ सिखाने आए हैं।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

अपना देश बनाएँगे हम, बिल्कुल नए उसूलों से,
अपना देश सजाएँगे हम ताजा-ताजा फूलों से,
इतिहासों के पाठ नए सीखेंगे पिछली भूलों से,
बंदूकों से डरना कैसा, डरना कैसा शूलों से।

देश नहीं है नक्शा केवल, देश नहीं है दीवारें,
देश बना करता लोगों से, यही बताने आए है।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

पेड़ों पर पैसे लगते तो दुनिया कैसी हो जाती,
आलस में पसरी वो भाई, बिल्कुल बूदम कहलाती,
एक उदासी गली-गली में, सड़कों पर भी छा जाती,
इस धरती को भी तब शायद, जमुहाई सी आ जाती।

मार गया हो काठ सभी को, होता ऐसा सन्नाटा,
वो दुनिया भी कैसी होती, यही बताने आए हैं।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

एक झरोखा है यह खिड़की, जिससे दिखती है दुनिया,
एक झरोखा है यह खिड़की, जिस पर बैठी ललमुनिया,
एक झरोखा है यह खिड़की, जो लोगों से जोड़ रही,
एक झरोखा है यह खिड़की, सन्नाटे को तोड़ रही।

आओ, खिड़की खोलें भाई, आया नया जमाना है,
खिड़की खोल जरा दुनिया के दृश्य दिखाने आए हैं।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं।

नागा बाबा रोज वहाँ रस्ता चलते मिल जाते हैं,
दाढ़ी वाले सत्यार्थी तो हँसकर गले लगाते हैं,
तिरलोचन के ठाट अजब हैं, बात-बात पर हँसते हैं
सुजन सखा हरिपाल आजकल ठीक बगल में बसते हैं।

उस दुनिया में सारे ही हैं, सचमुच मस्ती के मस्ताने,
कैसी उनकी मस्त अदाएँ, यही बताने आए हैं।
बड़े दिनों के बाद अचानक शेरजंग जी आए हैं। 
***

सम्पर्क: प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फऱीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327, 
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

15 comments :

  1. आदरणीय प्रकाशमनु जी ने आद0रामदरश मिश्र जी, राही जी और शेरजंग गर्ग जी पर अपनी कविता में अद्भुत और मार्मिक रेखाचित्र प्रस्तुत किए हैं।

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  2. एक कवि द्वारा अपने समय के दूसरे कवि या कवियों पर कविता लिखना, अपनी रचना के आईने में इन प्रकाश पुंजों को प्रतिबिंबित करना जैसा सुखद रचना कर्म है, एक इसे भाव-सेतु का निर्माण करने जैसा है जहाँ से समय और समाज एक व्यक्तित्व से दूसरे व्यक्तित्व की बीच अंतर्यात्रा कर रहा होता है. मनु जी की ये तीनों कविताएँ यह संभव बनाती हैं.
    डॉ रामदरश जी एक विराट कवि व्यक्तित्व हैं. वे मेरे भी गुरू हैं. उन पर कविता लिखना मनु जी की भाव-दृष्टि और रचना सामर्थ्य ही है. इस विश्वसनीय और आकर्षक बिम्बों से रचित कविता के लिए उन्हें बधाई. राही जी जैसे सरल, तरल और अक्खड़- फक्कड़ गीतकार पर तो शायद उनका हर परिचित ऐसी ही आत्मीय कविता लिखना चाहेगा जैसी मनु जी ने लिखी है, वहीं तीसरी कविता प्रसिद्ध बाल-गीतकार, व्यंगकार और प्रखर ग़ज़लकार शेरजंग गर्ग (जो पिछले साल हमसे विदा हो गए) पर लिखते हुए मनु जी इस कविता में जैसे उनका भीतर-बाहर एक साथ उतार रहे हैं. अपने समय के इन महान साहित्य-प्रतीकों पर ये अद्भुत कविताएँ. मनु जी ने इन रचनाकारों से जो स्मृतियाँ जो भाव-संबंध स्थापित किये हैं, इनमें स्वयं उनकी विलक्षणता भी आलोकित हो रही है. उन्हें पुन: बधाई.


    हरेराम समीप

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  3. एक कवि द्वारा अपने समय के दूसरे कवि या कवियों पर कविता लिखना, अपनी रचनात्मकता के आईने में इन प्रकाश पुंजों को प्रतिबिंबित करना जैसा महत्वपूर्ण रचना कर्म है, यह एक ऐसे भाव-सेतु का निर्माण करने जैसा है, जहाँ से समय और समाज एक व्यक्तित्व से दूसरे व्यक्तित्व की बीच अंतर्यात्रा कर रहा सकता है. मनु जी की ये तीनों कविताएँ यह संभव बनाती हैं.
    डॉ रामदरश जी एक विराट कवि व्यक्तित्व हैं. वे मेरे भी गुरू हैं. उन पर कविता लिखना मनु जी की भाव-दृष्टि और रचना-सामर्थ्य ही है. इस विश्वसनीय और आकर्षक बिम्बों से रचित पत्रात्मक कविता के लिए उन्हें बधाई. राही जी जैसे सरल, तरल और अक्खड़- फक्कड़ गीतकार पर तो शायद उनका हर परिचित ऐसी ही आत्मीय कविता लिखना चाहेगा जैसी मनु जी ने लिखी है, वहीं तीसरी कविता प्रसिद्ध बाल-गीतकार, व्यंगकार और प्रखर ग़ज़लकार शेरजंग गर्ग (जो पिछले साल हमसे विदा हो गए) पर लिखते हुए मनु जी इस कविता में जैसे उनका भीतर-बाहर एक साथ उतार रहे हैं. अपने समय के इन महान साहित्य-प्रतीकों पर ये अद्भुत कविताएँ. मनु जी ने इन रचनाकारों से जो स्मृतियाँ जो भाव-संबंध स्थापित किये हैं, इनमें स्वयं उनकी विलक्षणता भी आलोकित हो रही है. उन्हें पुन: बधाई.
    हरेराम समीप

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  4. बहुत बढ़िया।

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  5. स्मृतियाँ ताजा कर दी
    डाॅ राभ दरश मिश्र राही जी शेरजंग गर्ग जी को कविता में नहीं शब्द चित्र के माध्यम से दिल में उतार दिया ।बहुत-बहुत बधाई
    चक्रधर शुक्ल कानपुर

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  6. तीनों महान शख्सियतों पर लाजबाव कविताएँ लिखने के लिए आदरणीय प्रकाश मनु जी बधाई के पात्र हैं। अपने अपने क्षेत्र में मशहूर रचनाकारों के संपूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कविता गड़ लेना कोई आसान काम नहीं है। समाज और साहित्य के लिए ऐसी कविताएँ निश्चित ही प्रेरक रहेंगी।
    प्रत्यूष गुलेरी, धर्मशाला हिमाचल प्रदेश

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  7. आदरणीय राही जी और शेरजंग गर्ग जी पर लिखी कविताओं ने बेहद प्रभावित किया। राम दशरथ मिश्र जी वाली कविता पूरी नहीं पढ़ पाया। यह ज्यादा गरिष्ठ लगी। मेरी शुभकामनाएं। इस तरह के भावों से परिपूर्ण कविता भला कहां मिलती है, जहां लोग अपनी प्रशंसा के पुल बांधने में लगे हैं। फिर से आपको बधाई और और सहज कलम को नमन।

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  8. बहुत सुंदर। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आपको ।तीनों कविताएँ बड़ी अद्भुत हैं। आपने आदरणीय मिश्रजी, डाॅ. शेरजंग गर्ग और राही जी के समूचे व्यक्तित्व को कविताओं के माध्यम से बहुत ही सटीक और मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान की है। आपका यह काव्य - कौशल आश्चर्यचकित करने वाला है।
    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित!
    सादर,
    भैरूंलाल गर्ग

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  9. सुकीर्ति भटनागर, 9 मई, 2022
    विद्वान साहित्यकार श्री प्रकाश मनु जी ने शब्दों के ताने- बाने में अपनी स्मृतियों को इतनी सुंदरता से पिरोया है कि उनकी तीनों कविताओं में उनका विगत साकार हो उठा है। अपने मित्रों से उनके आत्मीय संबंधों का चित्रण बहुत मार्मिक है। अपने मन के समस्त स्नेहिल उदगारों को मानों बूंद- बूंद करके इन रचनाओं में उढेल दिया है उन्होंने। बहुत सी पंक्तियाँ तो ऐसी हैं जो विचारों के गहन सागर में उतर जाने को विवश कर देती हैं, यथा
    ' एक अकेला चलता आदमी काफ़िला बना देता है " यह एक पंक्ति ही किसी भी काव्य रचना को शाश्वत बनाने की क्षमता रखती है। छंदबद्ध और उपमाओं- अलंकारों से युक्त दो कविताएं, ' वहां मिलेंगे राही जी ' और ' शेरजंग जी आए हैं ' में तो कल्पना की उड़ान देखते ही बनती है, यथा:
    जहां हवाएं उड़ - उड़ जातीं,
    होली की हुलियारों सी
    नदिया बहती चंचल-चंचल,
    वहां मिलेंगे राही जी।
    इसी कविता की एक अन्य पंक्ति देखिए:
    लिखना भी अब क्या लिखना है, खुद से खुद की बातें हैं
    शब्दों की अविरल बरसातें, वहां मिलेंगे राही जी।
    मनु जी की सभी कविताएं अपने आप में सम्पूर्ण और भावनाओं से ओत- प्रोत हैं।शब्द चित्रों को जिस प्रकार उन्होंने कागज़ पर उकेरा है, वह अदभुत है। उनकी तीनों रचनाएं उत्कृष्ट, भावपूर्ण एवं अत्यधिक प्रभावित करने वाली हैं, अंतर्मन को छू लेने वाली हैं। ऐसी सुंदर, और श्रेष्ठ रचनाओं के सृजन हेतु आदरणीय प्रकाश मनु जी बधाई के पात्र हैं।
    सुकीर्ति भटनागर
    पटियाला

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  10. तीनों कविताओं से हृदय के निश्छल भाव छलक पड़े हैं। अभिनंदन।

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  11. तीनों कविताएं पढ़ गया।
    रामदरश मिश्र
    राहीजी तथा
    शेरजंग गर्ग पर।
    कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टिकोण से अनूठी।
    नए बिंबों की आपने झड़ी लगा दी है।ः
    प्रकाश मनु जैसा शीर्षस्थ रचनाकार ही ऐसी कविताएं लिख सकता है।
    हार्दिक बधाई, श्रद्धेय।
    श्यामपलट पांडेय

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  12. मनुभाई,रामदरश जी,राही जी, और शेरजंग गर्ग तीनों ही कविताएं बेहद प्यारी और आत्मीयता से भरी-पूरी हैं। देसज शब्दों की ठसक मन को मोह.गई। लुनाई,गमक, वाह क्या बात है। कविताएं मेरे लिए थोडी़ लंबी अवश्य थीं पर पूरी.धज के साथ। ऐसी आत्मीय कविताएं अब.कौन लिखता है? मजा आगया,यह तो नहीं कहूंगा बस,आंखें भीग गई।

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  13. प्रकाश मनु सर!
    कितनी सुंदर और बेजोड़ रचनाओं के दर्शन कराए आपने!! अद्भुत कहन, बेहतरीन सम्प्रेषणीयता, भावों की श्लिष्टता, सादा-सी भाषा लेकिन गहरे-से अर्थ, अर्थों का जादुई इस्पेक्ट्रम....इन्हें सॉनेट कहूँ, गीत कहूँ, संस्मरणात्मक कविता कहूँ...सचमुच, ये सब कुछ लगीं मुझे। बहुत दिनों बाद कुछ बहुत अच्छा पढ़ने को मिला। आभारी हूँ कि आपने इसे शेयर किया😊🌹🙏🏻आप यूँ ही लिखते रहिए। ईश्वर आपको दीर्घायु करे---आमीन😊!

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  14. आदरणीय अग्रज, आपने अपनी लेखनी से ऐसा सुंदर भाव चित्र केरा है। आत्मीयता छलकी पड़ रही है। चित्र सा सामने उकर आ रहा है। आपकी अनोखी शैली के आगे नतमस्तक हूँ।

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  15. आज पढ़ा। मन भीग गया। नत मस्तक हूँ। 🙏

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